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कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

Devanagarihipublished968 पृष्ठ

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पृष्ठ 76

(७०)

कबीरपंथी—

यह, बन्दीछोर दयाल ॥ १२ ॥ अशरण शरण नाम तुव,
बरणत हैं सब संत ॥ ताते गुरु न विसारिये, परखायो जीव
आंत ॥ १३ ॥ जो गुरु बसे बनारसी, शिष्य समुन्दर तीर ॥
बिसराये बिसरै नहीं, जो गुण होय शरीर ॥ १४ ॥ गुरु उपमा
क्या दीजिये, पटतर नहीं कोय ॥ पलक पलक कई बंदगी,
छिन छिन निरखों सोय ॥ १५ ॥ जो तू चाहे मुझको, छोड़
सकलकी आस ॥ मुझही ऐसा है रहो, सब सुख तेरे पास ॥ १६ ॥
साहेब दीनदयाल गुरु, सो पर और न कोय ॥ शरण आय
यमसे बचे, आवा-गवन न होय ॥ १७ ॥ दयाकरन अवगुण हरण,
तारण तरण उदार ॥ अशरण शरण बन्दों चरण, तुम विन नहीं
निस्तार ॥ १८ ॥ देखि अधमता आपनी, परवश यमके हाथ ॥
त्रसित गहेऊँ साहेब शरण, भवभय हारि सनाथ ॥ १९ ॥ प्रभु
सब लायक पारखी, हौं भौंमक अज्ञान ॥ लोह कनक पारस करे,
साहेब शरण समान ॥ २० ॥ बन्दों चरण सब दुख हरण,
प्रभु प्रसाद दुख धूरि ॥ दयाकरी सब दुख हरी, संसृति झूल भौ
दूरि ॥ २१ ॥ बहे बहाये जात थे, भव सागरके माहिं ॥
दयाकरी परखाय सब, झरणाये गहिं बाहिं ॥ २२ ॥
संतत अभय गुरुकी शरण, सदा परख परकास ॥ शमन सबै
भव जाल तम, रामरहस सुखबास ॥ २३ ॥ सर्वोपरि गुरुके चरण,
जो हारी भव खेद ॥ परम उदार सागर दया, थाह न पावे
वेद ॥ २४ ॥ चारि वेद जग विदित हैं, ब्रह्मा कीन्ह प्रकास ॥
चारि रूपसो जानिये, चारि अवस्था भास ॥ २५ ॥ भास मिटावे
जीवको, काटे यमके फंद ॥ साहेब दीनदयाल गुरु, संशय खंडे
द्वंद ॥ २६ ॥