कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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सो प्रगटे गुरु रूप, सो हंस उबारन् ॥ सतगुरु चरण सरोज,
जे जन मन ध्यावहीं । जरा मरण दुख नाशि, अचल चर
पावहीं ॥ २ ॥
दया श्रुको ।
अथ संज्ञापाठ ।
गुरुस्तुति (बुद्धान पुत्री)
दोहा-नमो नमो गुरु देवजु, साधु स्वरूपी देव । आदि अंत
गुण कालके, जाननहारे भेव ॥ १ ॥
सोरठा-मेटेउ कालको जाल, ताते गुरु तुव नाम यह । बन्दी-
छोर दयाल, अशरण शरण उदार अति ॥ २ ॥
गुरुशतक सार नाम ॥ बोपाई ।
दीनबंधु करुणामयसागर । हंस उधारण तारण आगर ॥ दीना-
नाथ शरण सुख दाई । अभय तासु पद गुरुसम राई ॥ बन्दीछोर
बिरद अति तासु । हंसरूप परगट जगजासु ॥ अधमउधारण-
तारणस्वामी । परवरदिगार मालिक अनुगामी ॥ काल जालके
मेटनहारे । बिरद लाज राखन पति प्यारे ॥ धीरज दया तत्व
संयुक्ता । राम भूमिका बासक युक्ता ॥ चिंता रहित अर्चित
गोसाई । परमरूप परकाशक साई ॥ अखिल ब्रह्मांडके जानन-
हारे । कर्ता नाम प्रगट विस्तारे ॥ निष्कामी माया परचंडा ।
ताको नासक पूरण ब्रह्मांडा ॥ मंगल रूप गोसाई आपू । जगत
विदित पूरण परितापू ॥ साहेब निर्भय पद दातारा । कर्ता पुरुष
सबनके पारा ॥ महा मोह दलनाशक स्वामी । हंसन नाह अपार
अगामी ॥ आनंद सिंधु अहंतातीता । रामरूपमें परम पुनीता ॥
सत्य यथार्थ अतिप्रिय साधू । मन मायाको मेटेउ व्याधू ॥
पूजनीय अनुमान विनासिक । सत्यसुकृत प्रकाश प्रकाशिक ॥