कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
पृष्ठ 67, कुल 968 में से
संदर्भ में पढ़ेंशब्दावली
(६१)
अपारं अनामी ॥ विदेहं सहरूपं कवीरं नमामी । दर्दं काल पीरा
जबै जिव सताये । लिये नाम लाहा जोलाहा हो आये ॥ लखोरे
लखोरे कृपासिंधु स्वामी । विदेहं सहरूपं कवीरं नमामी ॥ अघै-
खान जेते कियो हानि तेते । गहो सत्यपंथे उहै संत हेते ॥ बसो
देश जाको जहां है अरामी ॥ विदेहं सहरूपं कवीरं नमामी ॥ जपो
नाम नीको सदा ये कवीरं । मिले लोक बासा हरे काल पीरं ॥
अभीरं अपीरं सो है तासु नामी । विदेहं सहरूपं कवीरं नमामी ॥
हरे मत्त मंदा करै सो अनंदा ॥ उबारो उबारो महाकाल फंदा ॥
अभय बास जाको सो है अंतर््यामी । विदेहं सहरूपं कवीरं नमामी ॥
कवीर अष्टक जो पढै औ पढावै । महाप्रेमबानी सुनै औ सुनावै ॥
कहे दीनबंदा सो फंदा न आनी । विदेहं सहरूपं कवीरं नमामी ॥
स्तोत्र (जय जय कबीर) कवित्त
जय जय कबीर धीर, हरन सकल काल पीर, निर्गुण अवि-
नाशी, ब्रह्म शब्दरूप साई ॥ चर अचर भूत ब्याल, व्योम मृत्यु
औ पताल, सुर नर मुनि यक्ष गंधर्व, सकल में समाई ॥ अम-
रलोक के निवास, पुढूप दीप को सुवास, शब्द कोट अति
हुलास, विविधविध बनाई ॥ जहां हंसन को निवास, षोडश
रविको प्रकास, अमृतफल चुगे सुपास, सर्व श्रुथा जाई ॥ जग
मगात हंस अंग, शब्द को भयो प्रसंग, अकह वृक्ष साई संग,
सुराजत समुदाई ॥ बंदीछोर प्रभु दयाल, भंजन भवसिंधु जाल,
सतगुरु साहब कृपाल, सुमिरत अघ जाई ॥ जहां सदगुरुको
निवास, कोटिन शाश्विको प्रकास, छाड़ लोक हंस पास, भौजल
में आई ॥ कठिन काल को संहार, लीन्हो हंसन उबार, कीन्हो
भवसिंधु पार, सकल भ्रम मिटाई ॥ माया मद मोह हरन, काम
क्रोध गर्भ दलन, चिन्तामणि हंस रमन, संतन सुखदाई ॥ जे