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कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

Devanagarihipublished968 पृष्ठ

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शब्दावली

( ६५ )

तौ वहि मातुलु दृष्टिन जोई । तौपुनि लोटत पोटत अंग में, तब
लेत उठाय दया करि ओही । हे गुरु देव कवीर कृपाल त्यों,
है इक आश शरनागत तोही ॥ ३ ॥ दासको संकट देखि दया-
निधि, हो करुणा करि आतुर धायो । इन्दुमती जब टेरे कियो
प्रभु, जाय तहाँ वहि पीर भिटायो । बांधत सेत सहाय कियो
प्रभु, रामहु केर उपाय बनायो । कौन सु संकट मोहि गरीबको,
जो तुमसे नहिं जात छुडायो ॥ ४ ॥ जाय पुरी पुरुषोत्तम के
प्रभु, देकर दण्ड ससुद्र हटायो । विघ्नको अभिमान महाप्रभु,
तोडनको बहुरूप दिखायो । अभय दीन पडचो चरणों जब,
चारिउ जात सो एक मिलायो । दास जहाँ जहाँ कोऊ टेरत,
ताकहँ होहु तुम वेगि सहायो ॥ ५ ॥ मो कह काहि विभारत
समर्थ, दीन दयाल कवीर उदारा । आनन्द आप अजीत
गुसाईं सु, मोहमया सबते प्रभु पारा ॥ साक्षि सरूप अन्नपम
शोभित, पारवरूप अकार तुम्हारा । मैं अति दीन अधीन दुखी
बहु, मेटहु मोर अघोर अंधारा ॥ ६ ॥ यह वर मांगहुँ देहु दया
करि, अन्तर्यामीसु ज्ञान परकासा । बोध सरूप सदा निरनय
गुरु, मममें तुम होहु उजासा ॥ वेद कुरान पुरान जु गावहिं,
पार न पावहिं होहिं उदासा । जापर मौज करौ तुम साहब, सो
पुनि हंस मिले तुम पासा ॥ ७ ॥ ये गुरु अष्टक पाठ करे नर,
आप सुने अरु ध्यान धरेंगे । होय शरधा अति प्रेमउ पावत,
मारग चाल सुचाल चलेंगे ॥ ते नर पावहिं सुक्ति पदार्थ,
पाखंड रूप विकार तजैंगे । होहिं सुखी लहि आनन्दको पद,
सो भवसागर पार तरैंगे ॥ ८ ॥

कविता--

अजर अखण्ड रूप मरम परकाशी देखों, सुरसे उजासी देखों

कवीरपंथी शब्दावली ३