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कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

Devanagarihipublished968 पृष्ठ

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शब्दावली

(६९)

छन्द-समुद्भि देखु चित त्यागि, नास्ति सुखजो अनित्य पाग,
गुरु चरणन करु संगति, संत साधुकी ॥ हो मिस्कीन, राखु
निश्चय याकीन, तू तो जमापद बाकी खर्च काहे आबादकी ॥
मनमनसा दोऊ लौडि निकारिडारो, मारो हंकारतृष्णाकुबुद्धि
कुबादकी ॥ रूप हंस धार, ठहरि कीजिये विचार, यार बफादार
दीनानाथ, दीनबंधु गुरु साधुकी ॥ ८ ॥

॥ शब्द अष्टपदी ॥

प्रभुजी तुम विन कौन छुडावे ॥

महा कठिन यमजाल फाँस है तासों कौन बचावे ॥ १ ॥ नाना
फाँस फँसाय जीवको, अपने रूप छिपावे ॥ पंच कोश है परगट
ग्रासे, तेहिको कौन लखावे ॥ २ ॥ आपुहि एक अनेक कहावे,
त्रिविधि रूप बनावे ॥ सन्निपात होय दुष्ट नष्ट सो, परलय अंत
दिखावे ॥ ३ ॥ विषय विकार जगत अरुझावे, जहाँ तहाँ भटकावे ॥
योग ध्यान विगुर्चन भारी, ताहि सुरति अटकावे ॥ ४ ॥
आस नाम नौका बैठावे, भवकी धार बहावे ॥ तत्त्वमसी कहि
ताहि डुबावे, अंत कोइ नहीं पावे ॥ ५ ॥ चारि मुक्ति जोइन
चौरासी, तेहि मिलि हेतु बढावे ॥ नेम धर्म पूजा औ संजम,
बहुविधि लागि लगावे ॥ ६ ॥ भेष अलेख करे को पावे, जीवहिं
चैन न आवे ॥ चार वेद षट अष्टदशों लों, शून्यहि शून्य
समावे ॥ ७ ॥ काल चक्र बसि उत्पत्ति परलय, जीव दुसह दुख
पावे ॥ साहेब दया कीन्ह परखाये, रामरहस गुण गावे ॥ ८ ॥ ९ ॥

दोहा ।

सुख साहेब सुखरूप जो, हरन कालके पीर ॥ जो जन आवे शरणमें;
परखि लगायउ तीर ॥ १० ॥ करुणार्णव कृपाल गुरु, सुखनिधान
दुखभूर ॥ बन्दीछोर अशरण शरण, परख प्रकाश निजमूर ॥ ११ ॥
जीवनके दुख मेटिया, परखाये सब जाल ॥ ताते गुरु तुव नाम