कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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छन्द.
साहेव स्वतः प्रकाश पारख, त्रास नहीं यम दंडके ॥ वास
शरण बिलास तजि, सब आस पिंड ब्रह्मांडके ॥ गांस फांस मिटाय
दास, हुलास ज्ञान अखंडके ॥ नहीं नाश ते इतिहास सुनि,
सो आदि अंत प्रचंडके ॥ यम हंत एक अनंत, तेहिके फांस
बहु वर्णतके ॥ बहु जंत गाई हरंत, कूप पंतत बहुते गनंतके ॥
सब दास होई रहंत, दुष्ट पंत चीन्ह न कंतके ॥ आदि अंत जे
मुनहि संत, नहीं धावहि सो बेअंतके ॥ जीव हाल कीन्ह बेहाल,
काल कराल सुनि अवजालके ॥ उरसाल अनेकन्हि भाल, सो
बाचाल कवितन गालके ॥ तेहि टाल डाल प्रचंड होहु, निहाल
नाल कृपालके ॥ लहू परख माला माल भेटि, भव जाल शरण
दयालके ॥ यह बुदबुदा जो शरीर, नीर न थीर झूठाहीरके ॥
परपंच बहु ततबीर, तेहिके बीर उबरे हीरके ॥ तजु ललनि कीर
फकीर, जेहि डर नहीं वजीर अमीरके ॥ गुरु पीर हरे भवभीर,
अभय गंभीर शरण कबीरके ॥ नारदादि शुकादि लै, ब्रह्मादि
सब जेहि गावहीं ॥ गाइ धाइ हेराइ, बारम्बार मन पछतावहीं ॥
जस जस जतन छूटन करहीं, भव बूड़े थाह न पावहीं ॥ सोई
धार कठिन अंधार, ते गहि पार पारख लावहीं ॥ २७ ॥
दोहा —
संतत सुख है परखमें, साधन जतन बिनास ।
भूलि भटकि मति जाहु जिय, विविध कर्मके फांस ॥
अर्जनामा अष्टक -
हौं सेवक अज्ञान मोपर दया दृष्टि निहारिये ॥ बाल जानि
कृपालु मोको सुरतिमें नहीं टारिये ॥ हौं निपट बुद्धि मलीन
जगत आधीन मै ताते भयो ॥ जो होय तुव पद लीन सोई
विपिन मन काहे न रह्यो ॥ १ ॥ यह जगत जाल कराल मोह