कबीर कृष्ण गीता
Kabir Krishna Gita
युगल आनंद विहारी द्वारा
स्रोत: Kabir Krishna Gita - Yugal Anand Vihari · Archive.org (उद्गम)
८०
कबीरकृष्णगीता ।
भयउ सुगंध महा घन घोरा । भयउ अंजोर भाग चल चोरा ॥
लिंग समेट गदहा होइ भागा । तबहिं विष्णु शिव गोहने लागा ॥
फिर शिव देख कहा बल भयऊ । कबीरके त्रास गदहा होयगयऊ ॥
कबीरवचन ।
कहैं कबीर हरि आव सिंहसन । विष्णो झोह हीन भक्ष डासन ॥
प्रेत पिशाच भूत रखवारे । तासो बंजनी कहा हमारे ॥
हमरे साथ भजन सतनामा । भूत पिशाच घोर अघकामा ॥
साधनका जो दुखावे आई । आपन बल करे नाम सुहाई ॥
हमरे नाम सुरत चित गहहू । सकल समयस्तो निर्भय रहहू ॥
प्रथमहिं सिंध मथन तिहुं लरऊ । कबीर प्रताप तहाँ निश्तरऊ ॥
ब्रह्मा शिव देवी कर दूता । कहैं विष्णु भोहि दुखावे बहुता ॥
सत्यकबीर एक तुव प्रतापा । कालहिं जीत भक्त स्थापा ॥
दोहा—कहैं कबीर कृष्ण सुन, हम तोहि सदा सहाय ।
सुमरे नाम जो मेरो, और सतपंथ चलाय ॥
त्रिगुणके पिता निरंजन ऐठा । पुनहिं पाप करावे वैठा ॥
पुण्य पाप नहिं नाम समाना । साधुसेवा गुरु भक्त प्रणामा ॥
दोहा—कहैं कबीर कृष्ण सुन, साधु सरूप है राम ।
विष्णु साधु सरूप गुरु, गुरु सरूप सतनाम ॥
बहुरि शंभु सनकादिक आये । ब्रह्मा अवागन ससुझाये ॥
यहां कबीर कृष्ण सतरूपा । अंतर दीन्ह दर्श नहिं भूपा ॥
एक वार शिव बरस अंगारा । सब अंगारपर रुद्र कपारा ॥
सनकादिका शिवका जिलानेके लिये प्रार्थना करना
कवीरकृष्णगीता ।
८१
जरा जरे बांच लट तीनी । बहुर कवीर भस्म तेहि कोन्ही ॥
तब अज सनकादिक चल भागी । तबहींके तन लूक सो लागी ॥
तब सनकादिक विष्णु पुकारा । विष्णु कहा सुमरहु करतारा ॥
कवीर बस्ते तो बांचहु झारा । सबके मूल कवीर करतारा ॥
सनकादिकमचन ।
कहैं सनकादिक राख कवीरा । ज्वाला छुटा भौ निर्धल शरीरा ॥
तब सनकादिक स्तुति कीन्हा । सत्यकवीर कहा सब चीन्हा ॥
सनकादिक तन तपके पूजा । हीरा विष्णु रुद्र अज गुंजा ॥
दोहा—सत्यकबीरके पगु परे, सनकादिक बिलखाय ।
अब तो बरुसहु चक्र प्रभु, रुद्रहि देहु जिआय ॥
सरजिव कीन्ह कवीर दयाला । चक्षुहीन जपु सुंडके माला ॥
रुद्र आंखके भा रुद्राक्षा । आपन चक्षु आप शिववाक्षा ॥
बहुर चक्षु कवीर कर दीन्हा । आद सिरसापन दैवे लीन्हा ॥
तुम तीनों भई हर सरदारा । रहियो विष्णुके आज्ञाकारा ॥
तबते रुद्र कवीरहिं चीन्हा । रहियो सेवा विष्णु अधीना ॥
छांठ धुरत मत जोग अराधा । भांग धतूरा माहुर साधा ॥
गगन ध्यान मन जोत प्रकाशा । परम जोत दिन मुक निरासा ॥
परमजोत सत्यनाम कवीरा । जोत निरंजन काल अहीरा ॥
सत्यकबीर गुप्त होय गयऊ । सनकादिक हर पूछे लियऊ ॥
कहिये विष्णु कबीरके माहिभा । हम बहु माना कबीरके सीमा ॥
कहैं हरि तुव मानिक होई । सत्यकबीरके यम डर रोई ॥
सुनहु आदके बात गोसाई । जबते हम कवीर लाखि पाई ॥
सनकादि और विष्णुका सम्वाद - वेदादिकी उत्पत्ति
८२
कबीरकृष्णगीता ।
प्रथमहि सतयुग यम मोहि जारो । निराकार यम पिता हमारो ॥
तीनों देव औ कोट तैतीसा । सबकहैं जार भ्रम कर पीसा ॥
जीवहिं कब दीन्ह बहु काला । तहाँ भगट सतपुरुष दयाला ॥
जिन सब जीव सोंप धर्मराई । सो सत्यनाम कबीर सुखदाई ॥
महाभयंकर काल निरंजन । धर्म अजाजिल वंस अंजन ॥
अजाजील धर्मराय लखाये । आप काल करता कहलाये ॥
कहइ रक्षाके भक्षक ताहीं । ध्रुव प्रह्लाद अजहु पछताहीं ॥
भक्ष करे जिव चांपे काला । जार बार करे निपट बेहाला ॥
राम कहे सत कहे नरेशा । सत्यनाम विन कागके भेषा ॥
दोहा-धुनकट कौसे अंस भरी, सप्रथ सत्यकबीर ।
पतिव्रता गंगा गती, वण्ड्य व्यास रघुवीर ॥
कृष्णवचन ।
कहैं कृष्ण प्रगटे सतनामा । सत्यकबीर जोगजीत सुखके धामा ॥
हने सीस मम पितुके अनंता । जार भ्रम किय यमहिं तुरंता ॥
सत्यकबीर आजा मैं नाती । कबीर दुलहा हम सबहि बराती ॥
कालहिं जार भ्रम यम साखा । दान कदसा अंस भर राखा ॥
दोहा-धुनकट केंस अंस भरि, बहरे काल बरिआन ॥
जाय स्वर्ग गे लागा, देवतन देख रिसान ॥
सकल देव तेहि यासन धावा । भाग सबे कबीर पहुँ आवा ॥
तत्क्षण सत्यकबीर जोगजीता । कालीहिं भ्रम कीन्ह भये रीता ॥
लक्ष बार तेहि जार निकंदा । पुनि सजीव कीन्ह कहैं मैं बंदा ॥
कवीरकृष्णगीता
८३
कवीरवचन ।
कहे कवीर वंदा तैं काकर । जाकर दास नाम ले ताकर ॥
निरजनवचन ।
कहे काल कवीरको दास । जिन मोहि छिनया सिरज विनासा ॥
कहे कवीर तैं कासो डरसी । काकर भक्त विहुन भक्ष करसी ॥
कहे काल मैं पुरुषके अंसा । पुरुष कवीर एक परसंसा ॥
सत्यकवीर सो हमरे श्रेष्ठा । और न करे छिनक महे नष्टा ॥
बहुर सहस्र बेर तेहि जारा । सिरजेउं बहुरि काल तव हारा ॥
पृच्छिहि जोगजीत सुन काला । कासो डरस कहु यम ब्याला ॥
बोले काल रोप सिर धुनिया । तुम्हरो दास तुव मेरे सिर मणिया ॥
तुव सत्यपुरुष हम तुम्हरे चेरा । तुम्हरे दास मकुट सिर मेरा ॥
जो लेहि सत्यनाम परवाना । तोहे सम ताहि गिनो निरवाणा ॥
दोहा—सत्यकवीरके दास, जो मैं पुन ताके दास ।
जो जिव विलग कवीरसे, यम तेहि घाले फांस ।
धन्य सत्यनाम कवीर अटोटा । जिन महाकाल बांध यम कोटा ॥
यमके कोट कर्म भ्रम धोखा । सत्यकवीर विन पावे नहि मोषा ॥
कवीरवचन ।
कहे कवीर सुन काल निरंजन । अजाजील तुम साकटभंजन ॥
हमहिं गौय कस पाया चोरा । आपहि पुरुष थाप कस भोरा ॥
कालवचन ।
कहे काल मोहि व्यापेउ ऐसा । पुरुषहिं मेट राज करें वैसा ॥
जब मन महे अस चितवन कीन्हा । दस बीस सीस दूट परभीना ॥
८४
कबीरकृष्णगीता ।
बहुर कीन्ह मैं सुमरण साईं । सीस मोर धड लागे आई ॥
तब मैं जाना पुरुष दयाला । सेवक चूक न मन महीं चाला ॥
निशि दिन धरों मैं पितु पगु ध्याना । पै कछु मन महीं भौ अभिमाना
तब तुम योहिं भ्रम कर डारा । कबीरते आद अंत यम हारा ॥
जो सतनाम राखे तो रहऊं । डाहे तो बिन अगिन डहाऊं ॥
दोहा—सत्यकबीर जो सुमरहीं, तोहि मैं निकट न जाऊं ।
कबीरके भक्त विद्वान जो, कहे काल तेहि खाऊं ॥
कृष्णवचन ।
कहे कृष्ण सनकादिक सुनहूँ । आद पुरुष कबीर चित गुनहूँ ॥
सनकादिकवचन
कहे सनकादिक अब हम चीन्हा । सब मूल कबीर गम कीन्हा ॥
अब हम सत्यकबीरके शिष्या । कबीरके सुरत हृदयमो लिखा ॥
बला सुत हम सहस्र अठासीं । कबीर बिना सब परे यमफांसी ॥
अब जिव सत्य कबीरहिं दीन्हा । कबीरके अगुवा विष्णुहिं चीन्हा ॥
कृष्णवचन ।
कहे कृष्ण जब लेहो परवाना । यम त्रिण तोर संहाय सतनामा ॥
यह सुन सनकादिक धर ध्याना । कृष्णके स्तुति आप बखाना ॥
सत्यलोकके हंस संग आये । झलकत झलझल सुवास बसाये ॥
कोटिन रावे शशि एक न तुलहीं । एक हंस ससि अर्बन तुलहीं ॥
शोभासिंधु राससुख मूछं । ताहि सुख जेहि कबीरसम तुछं ॥
सत्यकबीर जग दास कहाये । साधरूप धर भक्त हठाये ॥
इह हम कहैं यमसुखते बचावा । जगमहैं हमरे नाम खिडावा ॥
कबीरकृष्णगीता ।
८५
कहै कृष्ण पग समर्थ नाई । कहैं लग कहों मैं समर्थ बढाई ॥
सतकबीर मेटो यम दुःखा । सनकादिक सुन प्राण पिशुषा ॥
यम त्रिण तोड कालसुख थूका । आरती यंगल यम धर लूका ॥
दोहा—दियो पान सनकादिको, मग्न भये सब साथ ।
कहे सनकादिक सुख भये, मिटा काल आध ॥
कहैं सनकादिक धन्य सतनामा । क्षण यहैं हम सबको भो कामा ॥
जै जै सत्यकबीर दयाला । सनकादिक जप कबीरको माला ॥
मग्न भये सब तन मन शोधा । पांच पचीस मन सहज सभोधा ॥
चैदह यम त्रिगुण जेहिथाकी । अरिहित सम लघु दृग एक ताकी
धन्य सो सतकबीर सत्यनामा । मैं लघु सेवक कबीर सुखधामा ॥
सयकादिक बहु स्तुति कबीरा । सुरति निरति गहि तन मन थीरा
व्याघ्र भ्यानहर अज बिग कागा । चारों झोहर करने लागा ॥
सब हरे सनकादिक क्रांति । मिल सनकादिक साधुके पांती ॥
एक बारके हुकार सब गजी । आप आप कह अज हरी तजी ॥
तब कबीर सनकादिक आगे । सतकबीर आवत यम भागे ॥
कछु पग जाय भये चक्षुहीना । बहुर कुष्ट होय चुये अभीना ॥
पगुके हीन भये सिर कूटा । जरि भो चिता केर जस खूंट ॥
दोहा—चारों मूठ नर पूछे, कहे आप महशोय ।
जो कबीर ना आवते, तो सब खात बिगोय ॥
ऐसे भौ पुन चारों वेदा । स्तुति करहि कबीरको भेदा ॥
कहा कबीर वेद समुझाई। धर तन शक्त करहु मनलाई ॥
८६
कबीरकृष्णगीता ।
चारों वेदके तारन हारा । पंचयें सुसम वेद सोहंगम तारा ॥
सतकबीरको अंस सोहंगा । स्तुति वेद कबीर प्रसंगा ॥
आज्ञा मान भक्त चित दीन्हा । चार वर्ण भये भक्त अधीना ॥
ब्राह्मण क्षत्री वैश्य औ शूद्रा । कोई करे भक्त कोई तपमुद्रा ॥
भक्त विना धन वित सब छारा । सतकबीर विनती यम धारा ॥
सत्यकबीर सत्य सो राजी । काम क्रोध मिथ्या यम बाजी ॥
सोहंसा सारपद चाही । अजर अमर जिव अमर व्याही ॥
भजहिं कबीर सो जाहिं अमरपुर । सब सुख विलसहिं कर्म कालदुर
भजे सो सत्यकबीर पतिव्रत छवा । तिभिर थिठै जब उदे ज्ञानवा ॥
तिभिर त्रिगुण मन मत सब चारा । सोतहवां अंजोर कबीर मत सार ॥
विष्णु अवरण तुलसी भूषण । मृतुका तिलक काहु नहिंदूषण ॥
अंकुर कंद मूल गुर घीऊ । पान फूलपट सेत सोइ लेऊं ॥
दोहा—मीन मांस जो भखे, तासु अन्न जल नाहिं ।
साकटको घर भात ताजि, छूट साधको खाइ ॥
एक दिन महाकाल रिसियाना । तीन. लोकमो परा भगाना ॥
सहस्रमुखी तक्षक होइ उठा । जाय इंद्रासन इस इंद्र सुडा ॥
भागे देवता अखिल पताला । वहां सहस्रमुखी जहैं जवाला ॥
दौरे काल कैलासहि आवा । शिव कहैं डंक कीन्ह बहु भावा ॥
बहुर काल धाये वैकुंठा । जै औ विजय सांस धर उठा ॥
खैच उरधके डसेउ बनाई । विष्णुके ढिग दीन्ह गिराई ॥
मृतुक साथ तक्षक गिर तहां । विष्णु व्यास सुखदेव सब जहां ॥
कबीरकृष्णगीता ।
८७
कै प्रहापे अहि धाय विष्णु पर । सतकबीर तब कहा सुरलीधर ॥
सहस्रमुख सन्मुख कबीरा । पुन कबीर घर अमित शरीरा ॥
रूप कबीर देखत यम हारा । आपन विष भौ आपहिं छारा ॥
लीन्ह उवार विष्णुहिं सतनामा । जै कबीर कह विष्णु प्रणामा ॥
जै २ सत्यकबीर अरिघातक । काल मर्दन रक्षक सतपातक ॥
सत्यकबीर सबे गुण आगर । पतित तार देहीं सुक्त उजागर ॥
इंद्र रुद्र सब देव जिआये । सब देवन मिलस्तुति लाये ॥
सहस्रमुखी तब विष्णुहिं कीन्हा । महाविष्णुकी पदवी दीन्हा ॥
वेद विदित जाने संसारा । सहस्रसिरषा पुर्ष विचारा ॥
सहस्रसिरषापातिआनंदसिपासो । सो सतपुरुष कबीर दिखासो ॥
एक अनंतकी कौन बतावे । कोट अनंत पार नहिं पावे ॥
जाके खोजत सब पचहारे । सो सतनाम कबीर पुकारे ॥
जासु अंस एक रोम निरंजन । सो सतनाम कबीर दुखभंजन ॥
जिन प्रभु इच्छाते सब कीन्हा । सो सदुरु कबीर हर चीन्हा ॥
महाविष्णु औ विष्णु व्यासा । सत्यकबीर सुभरो हरि स्वासा ॥
दोहा—सत्यकबीरसत्यनामप्रभु, दुखनासिकासुखधाम ।
सर्व मई सो रम रहे, संतनमें विश्राम ॥
जहां सांच तहैं प्रगट आही । दयाहीनके निकट न जाही ॥
गुरु भक्त सबते अधिकारी । साध भक्त गुरु भक्त सुखारी ॥
कोटिन देवी देव अराधे । विन गुरु भक्त काल घर बाधे ॥
कोट अनंत कर्म संसारा । गुरुके भक्त विनसवे असारा ॥
८८
कबीरकृष्णगीता ।
इहां वहां गुरु भक्त सुहेखा । गुरु आज्ञा कर सोई चेला ॥
गुरु कहैं आद ब्रह्म कर लेखे । गुरु सरूप संतन कहैं पेखे ॥
गुरु सोई जो तिहुँलोकते न्यारा । सद्गुरु अमरलोक विस्तारा ॥
विष्णु अंस सद्गुरुके आहीं । सद्गुरु सर्वे मई बरताहीं ॥
सद्गुरु सत्यकबीर अविनाशी । रहे निरंतर सब घटवासी ॥
जिभि चंदा नभ कुंभक दीसा । पुनि जिभिरविप्रकाशपद ईसा ॥
एके साहेब सद्गुरु आदी । कीतनउपजी विनासिषटस्वादी ॥
तीन लोककेहैं विष्णु श्रेष्ठा । विष्णुते सत्यकबीर गरिष्ठा ॥
सत्यकबीर सबके सुखदाई । सुरति सुमतिते वै भल पाई ॥
दोहा—सत्यकबीर सुखदाया, जो सुमरे एक चित्त ।
विष्णु व्यास कहैं सब, ते सुख कबीर प्रतीत ॥
जै जै जै सतनाम कबीरा । सत्यसुक्त सो अजर शरीरा ॥
पुष्पविमान सतलोकते आवा । सकलआयचरणनशिर नावा ॥
निज सिंहासन ठाकुर दीन्हा । चरणपस्वारचरणाभूतलीन्हा ॥
विष्णुव्यास सुखदेव सतव्यासा । सतकबीर पग परस हुलासा ॥
कर जोरे जै हरखित कहहीं । सतकबीर कहत सुख लहहीं ॥
जो सुमरे सतनाम सुखधामा । सच २ सो सद्गुरु नामा ॥
सत्यलोक अम्बर सुचकाया । तहां सो सत्य पुरुष रहाया ॥
बेहंग सोहंग वोहंगके मूला । ओंकार मकारके मूला ॥
कालके कारण करण गोसाई । रक्षपालक सब जिव सुखदाई ॥
तीन लोकते न्यारा रहहीं । सर्वे मई पुन सबसों कहहीं ॥
अवतारोंकी कथा
कवीरकृष्णगीता ।
८९
धरणी अकाश पवन औ पानी । चंद सूर्य जेते नष सानी ॥
सबके आद सोहे सतनामा । सच दया मिल जीवको कामा ॥
सर्वमूल अविनाशी रामा । सोई सतकवीर सुखवाया ॥
जो सुभरे सतनाम कवीरा । ताके काल न आवे निषरा ॥
कीन्हो स्तुति विष्णु बहुता । कहा कवीर वैठहु पूता ॥
तुम स्तुति जब बहुते कीन्हा । तब हम आय दरशतोहि दीन्हा ॥
कौन काज तुम सुभरेहु मोही । टोरो सब संकट जत तोही ॥
परहि कालमुख झरकहि जबहीं । सतकवीर कह चितवे तवहीं ॥
कृष्णवचन ।
कहे कृष्ण पलकन पग झारे । मैं नाती तुम आज्ञा प्यारे ॥
धन्य भाग्य मम शुभ दिन मोश । दीन्हो दरश कवीर बंदीछोरा ॥
कवीरते अधिक और नहि कोई । आद अंत सब जिनते होई ॥
हम सब हैं कवीरके अंसा । सतकवीरके सब निज वंसा ॥
सिद्ध साध मत वेद पुराना । सतकवीर गुण सबहि बखाना ॥
कवीर निरवान मुक्तके दाता । जाको अंत न लखे विधाता ॥
दोहा—सब करताके करता, सब दाताके तार ।
सकल मूल सतसाहेब, सो कवीर औतार ॥
सच २ सच हर गई । सतकवीर जिव रक्षक भाई ॥
ये कवीरको महिमा जानो । और सब मनभत बौरानो ॥
गरुड चरण हरि शीस नवाई । महिमा कृष्ण कवीर परवाई ॥
अस शोभा नहि देखो काहू । करता कृष्ण राम तुव आहू ॥
५
९०
कबीरकृष्णगीता ।
दोहा-सोई पुरुष कबीर है, जेहि हम कीन्हो खोज ।
सबे कहै मोहि वाउर, कहै भसुंड बनरोज ॥
त्रेता रामचंद्र मोहि जांचा । नागफांस परिचित भौ कांचा ॥
तहां पहुँच अहिनास उबारा । तब मैं करतातेहिनावविचारा ॥
करता निरबंद योनि नहि आवे । नागफांस तेहि बांधको पावे ॥
तब हम चीन्ह कौसिल जाये । भक्तवत्सल क्षत्रीरूप धर आये ॥
दोहा-क्षत्रीरूप राजसी, सातकी सद्गुरु रूप ।
तमगुण तामस सकल सब, त्रिगुण बित्त तेहि भूप ॥
अब हम सत्यपुरुषको चीन्हा । कबीरकेस्तुतिगरुडबहुकीन्हा ॥
कृष्णवचन ।
कहै कृष्ण गरुड तुम जानहु । कबीरकेअंस सुपच पाहिचानहु ॥
जिनके भोजन घंट जो बाजा । अधर अकाशजो धजा विराजा ॥
सो कबीरके सेवक रहई । जेहि सपनाकोउतिहँपुरअहई ॥
उधसेन भक्त बंद मै छोरा । ताते मोहि संत कहैं बंदिछोरा ॥
कबीर छोरहिँ चौरासी यम फंदा । निर्गुण नाम कबीर निर्दिदा ॥
जापर दायरा करहिँ सतनामा । सो देखे सतलोक सुखधामा ॥
कहैं कृष्ण सुन आसन मोरा । महा सुज्ञान गरुड बल जोरा ॥
हमही रहे त्रेता रघुवंसा । तवहीं कबीर मेटे यम संसा ॥
सतकबीरके अंस एक राऊ । सो पूंजी यम पितहिँ दियाऊ ॥
राय रभिता राम सोहँगी । ताके नार देह अर्धगी ॥
रामचंद्र अर्धगी सांता । रावण चोर संधि सिर दीता ॥
कबीरकृष्णगीता ।
९१
तेहि प्रति रामचंद्र दुख पावा । वन २ रटत वचन पितु पावा ॥
वचन सरूप धरे सब देवा । डासन त्रिण भोजन फल मेवा ॥
सिंधु सेत वांधे हरि ताका । पर्वत सबे सिंधु महीं राखा ॥
वांधन लगे सिंधु गंभीरा । तब हरि सुमरे सत्यकवीरा ॥
आय कबीर तुरत दरसावा । कबीर रूप हरि हृदय समावा ॥
रामचंद्रके हृदय कबीरा । आद ब्रह्म कबीर गंभीरा ॥
कबीरके अंस हैं लक्ष्मण वाला । लिखा मेर पर अंक रिसाला ॥
लक्ष्मण अंक सेतु लेहु वांधा । रामचंद्रका छूटा धंधा ॥
उत्तरा सैन लंकागढ दूटा । सकल देवका वंदी छूटा ॥
दीन्हो राज्य विभीषण थापी । कोइ न वांचे राक्षस पापी ॥
सिय बंदिछोर राम लियो संग। । सत्यकबीर प्रताप सुरंगा ॥
सुन खगपति सब देव मुनीसा । सृष्टि कबीर सबन कहैं दासा ॥
दोहा—कहैं कृष्ण सुनु देव मुनि, रक्षक नाम कबीर ।
हमहिं औसर सुमरहीं जन, गाठे परे शरीर ॥
जीवके सुख देवे कारण । पुरुष कबीर प्रगट कलि सारन ॥
रामनाम गुरु महिमा भाषा । सत्संगतके इच्छा राखा ॥
सत्संगत गुरु मार्ग पाई । गुरु सदुरु मिल ज्यास नसाई ॥
खरा खोटा परख दिखाये । सदुरु सो जिन सत्य चिन्हाये ॥
निर्गुण एक कबीर बखाना । सर्गुण सकल देव मिल जाना ॥
निर्गुण बोलता कबीरको अंसा । रमता राम सकल घट हंसा ॥
कहैं कृष्ण कबीर परजाई । सदुरु सत्य कबीर गोसाई ॥
९२
कबीरकृष्णगीता ।
दोहा-सद्गुरु सत्य कबीर हैं, निहचल अजर शरीर ।
भौसागर तारन तरन, समर्थ सत्य कबीर ॥
व्यास सुखदेव समेता । अज हरि हर प्रभु कृपानिकेता ॥
नारद ऋषि इंद्रादि सनकादी । सके न कोई कबीरसंवादी ॥
कहैं कृष्ण सुन व्यास सुखदेऊ । कबीरहिं मानुष कहे जनि कोऊ ॥
कबीर सर्वाधिक करताके करता । भरी ठरै फिर खाड़ी भरता ॥
भक्त रूप धर प्रगट दिखाये । गुरुकी भक्ति ठिग दास कहाये ॥
युग २ रक्षा हमरी कीन्हा । भक्त रूप होय दर्शन दीन्हा ॥
रामरूप संग लक्ष्मण सीता । सत्यकबीर बन दास पुनीता ॥
दोहा-कहैं कृष्ण सब कोइ सुनो, इत उत दास कबीर ।
सतकबीर सत युग २ सुमेर, दोउ दीन गुरु पीर ॥
व्यासवचन ।
कहैं व्यास सकल मिल वाणी । धन्य कबीर जेहि कृष्ण बखानी ॥
कृष्णवचन ।
कहैं कृष्ण सुन व्यास सुख देऊ । हमहु न लखा कबीरका भेऊ ॥
जब कबहुँ हम त्रसित निरंजन । तहां कबीर काल शिर भंजन ॥
कबीरको चरणोदक जब लीन्हा । जबते अगम गम्य हम चीन्हा ॥
हमरे कहे के पिता निराकारा । हम कहै ये कबीर प्रतहारा ॥
कबीरके पांव निरंजन लागे । और जीव कहा कस आगे ॥
निरंजन एक दिन प्राप्त धाये । कबीर नाम जप जीव बचाये ॥
गुरुभक्तिकी महिमा
कवीरकृष्णगीता ।
९३
दोहा—एक हंसके पाछे, + आद नाम सर देख ।
अद्वुत शोभा अकह छिव, कवीरको कला अनेक॥
कवीर है अमरलोकके माहीं । यहां दरद देस जीव बंचाही ॥
जब हम बैठे सप्त पताला । नाथे कालीनाग निसाला ॥
तब नाथिन मोहि विष संचारा । तहैं कबीर गये प्राण उबारा ॥
संगहि आये बलभद्रके भेसा । बालबच्छ राचि मेढेउ अहेसा॥
जब हरनाकुश कीन्होसि वरिआई । तहैं कबीर पुन भये सहाई ॥
रामरूप चेतता हम जांचा । परम जोत कहि बोलेहु बाचा॥
परम जोति कहि कियेउं पुकारा । तहां कबीर आय दुख दारा ॥
दोहा—कबीर सुखदाता जीवके, अमरलोक विश्राम ॥
सो जिव सुख घर पहुँचे, जो सुमरे कबीरको नाम ॥
कलि हमरे जो बोध शरीरा । देवल थापेउ दास कबीरा ॥
तट देवल सिंधु तर गाडा । तब कबीरको ध्यान हम माडा॥
तुरत कबीर प्रगटे तुलसी चौरा । विप्ररूप मैं दर्शनको दौरा ॥
तुलसी चौरा जाय मैं दासा । हंस कबीर अंकम ले परसा ॥
सिंधुतीर गये आसन कीन्हा । सिंधु त्रास भये चरण अधीना॥
बोइल द्वारिका दै मंडपराखा । सत्यकबीरके हम सब साखा ॥
चारों युग भो वार अनेका । सब दिन सत्यकबीर मोहि टेका॥
दोहा—कहैं कृष्ण गुरु गुप्त रासि, कबीर सबनके मूल ।
हम कबीर कहैं सुमरहीं, भक्त मुक्त समतूल ॥
गरुडकी चेतना - गरुड और कबीर सम्वाद
९४
कवीरकृष्णगीता ।
सकल देवता सुन थर हरेऊँ । धाय कवीरके चरणन परेऊ ॥
चरणोदक लै मुखमहँ लीन्ह। चरण परसि प्रदक्षिण कीन्ह। ॥
कबीरवचन ।
कहँ कवीर सुनो सुनि व्यासा । गुरुके भक्त कटे यम फाँसा ॥
गुरु विन राम न भावे हांथा । गुरु विन डोलहिँ जीव अनाथा ॥
गुरुकी भक्त साधुकी सेवा । हरषि गोपाल मिले यह भेवा ॥
हमहू गुरुको करता जाना । काउ जीत गुरु नाम बसाना ॥
गुरु सोई जो अंतहु थीठा । जन्म बरण गुरुलागे सीठा ॥
दोहा—योग यज्ञ तप तीर्थ, प्रतिमा भूत मसान ।
कहँ कवीर सदुरु विना, जीव जात यम थान ॥
उठके गरुड टाढ बये आगे । हरिसों विनती करने लागे ॥
आज्ञा देहु मोहि त्रिसुवननाथा । हमहु जीव निज करहु सनाथा ॥
हम कवीर कहँ सदुरु करहीं । सेवा तुम्हार ध्यान उर धरहीं ॥
कृष्ण विहँस कहवे अस लीन्ह। सुनहु विहँग सबन चित दीन्ह ॥
यहिते श्रेष्ठ अमर कछु नाहीं । धन्य सो जो गुरु शरण समाहीं ॥
हमहू गुरुके शरण समाने । सदुरु कर कवीर कहँ जाने ॥
कबीरके आस सबनको भाई । कहहि कृष्ण पुन गरुड बुझाई ॥
दोहा—खगपति गये कवीर पहुँ, शरण देहु सतनाम ॥
यमसे त्रास निवारहु, देहु भक्त सतधामा ॥
कबीरवचन ।
कहँ कवीर सुनो खगराई । बडे भाग गुरु शरण समाई ॥
गुरुकी आज्ञा शिष्य जो माने । शिष्य सोईजो गुरु सुरति समाने ॥
कबीरकृष्णगीता ।
९५
चरण टेक विनवें नभगामी । आज्ञाकरहु सो मागो स्वामी ॥
कहो तो सीस कल्प सुँइ धरऊँ । कहो निजहु तासन परऊँ ॥
हमहू गुरुकी महिमा जाना । गुरुते श्रेष्ठ और नहीं आना ॥
हम त्रिभुवन पातिके सुखपाला । हमरे पीठ जो सदा गोपाला ॥
जब हम देस गोपाल तेहि सेवा । परेउं चरण तर लीन्ह तुव भेवा ॥
दोहा—कहे तक्षक आरि जोर कर, विनय सीस पग राख ।
काटहु यम कर फाँस प्रभु, गुरुड दीनता भाष ॥
कबीर वचन ।
कहे कबीर सुनो खगराया । मिले ना समर्थ सद्गुरु दाया ॥
आपन जीव सम सब कह लेखे । एके राम सकल घट पेखे ॥
सुर असुरारी चाल निहारे । नीर क्षीर बिलगाइ सुधारे ॥
ज्ञान औ मनकी दशा विचारे । सतपद गहि गुरु सुरत निहारे ॥
जेते आमिष मीन मद मांसू । परधन परनिंदा उपहासू ॥
कबीरवचन ।
कहैं कबीर सुन गुरुड सुजाना । अंकुर सुगंध पवित्र फुल पाना ॥
दोहा—गुरु कहैं करता जाने, साधन गुरु कह लेख ।
कहैं कबीर सुन खगपाति, राम सकल घट देख ॥
गुरुडवचन ।
गुरुड कहे तब सीस नवाई । सत्यकबीर तुम समर्थ साई ॥
तुम्हरे सिखापन हृदय मानो । शरण देहु कहे श्रीमगवानो ॥
कबीरवचन ।
श्रीकृष्ण तुम त्रिभुवन राऊ । गुरुडहि बोधे कहहु सुभाऊ ॥
१६
कबीरकृष्णगीता ।
दोहा-शब्द हमारे शीतल, अमृत मोद सो भाव ।
भक्तपंथ समिता ज्ञान दृढ, अभे सुक्त पद लेव ॥
भले गुरुड जाय आनहु साजा । गह २ वैकुंठ वाजन बाजा ॥
कहे गुरुड भाषहु प्रभु साउज । सत्यपुरुष कह चढे सब सांउज ॥
कहे कबीर नारिअर भरपूरा । सेत गरी मिष्टान खजुरा ॥
दोहा-पान फूल चंदन सुाचि मेवा, गऊ घृत जोत प्रकाश।
सो अमर प्रत नाम गुरु, चरण सतिहर दास ॥
सेत सिंहासन क्षत्र चंदेवा । ध्वजा पताका सेत सजेवा ॥
गुर मिष्टान छान जल झारी । थार जोतिधर पंच मुख वारी ॥
आज्ञा मांग गुरुड उठ धाये । तैतिस कोट देव हकराये ॥
सवा लाख नीरअर ले आना । सवा सो मन मिष्टान प्रवाना ॥
कृष्णहि नेवत दीन्ह कर जोरी । तुव प्रताप गुरु मम बंदछोरी ॥
शिव सनकादि ब्रह्मादि विष्णुवादी । देवकृष्ण सुन सुखसे सादी ॥
सब मिल आय कीन्ह धुन ध्याना । भजन अखंड शब्द प्रवाना ॥
दोहा-सकल देव मुनि चक्रित, गुरुड शरण सतनाम ।
सत्यकबीर जो सुमरे, तेहि गाढे आवे काम ॥
दीन्ह पान यम त्रिण तोराई । चरणासुत तिलक दठाई ॥
पाय प्रवाना गुरुड अनंदा । जस चकोर पाये निस चंदा ॥
महायसाद सकल मिल लीन्हा । विनवहिं गुरुड असीस तब दीन्हा
कृष्णवचन ।
कहे कृष्ण स्वगति बढ भागी । तुम सदुरुके दास सुभागी ॥
धन्य भाग तेहि प्राणी केश । शरण कबीर गये दुख फेरा ॥
कबीरकृष्णगीता
( ९७ )
सरगुण भक्त जो आवा गौना । तन थर दुख सुख पावे पवना ॥
निर्गुण भक्त शरण सतनामा । नाम कबीर भजन सुखधामा ॥
दोहा—कहैं कबीर सुन खगपाति, नाम कबीर कंडहरा।
निरगुण भक्त सब ऊपर, आवागवन निवार ॥
सकल देव मिल स्तुति लावा । बडे भाग हम दर्शन पावा ॥
व्यासदेव सुखदेव सुनियारद । विनती करें सुरपाति गण शारद ॥
श्रीकृष्णसे पूछे व्यासा । कबीरकी माहिमा करहु प्रकाशा ॥
तुमते भेछ कबीर कस भयऊ । यह चरित्र हम जान न पायऊ ॥
श्रीकृष्णवचन ।
कहैं कृष्ण सुन व्यास सुख जाना। कबीर आद करता निरवाना ॥
निरंजन हमरे पिता दृग काला । जार मार जिव करहि बेहाला ॥
सतकबीर काल शिर भंजन । कबीर नाम ते त्रसित निरंजन ॥
दोहा—तीन लोकते न्यारा, अमरलोक विस्तार ।
जो कबीरको सुमरे, सोइ उतरे भौपार ॥
कहैं कृष्ण मैं कहों परमारथ । निर्गुण भक्त जन्म जुग स्वारथ
जब कलकाल निरंजन कोपिहै । भिटिहै दया धर्म विश रोपिहै ॥
गंगा सती सिद्ध औ साधक । सबके सत घटि है कलबाधक ॥
गिराकार सब जीव गरासे । भक्तहीन तेहि काल तरासे ॥
निर्गुण भक्तिहीन जो प्राणी । पापी पुनी जार सब सानी ॥
सबकर सत् काल बिचलाई । कबीरसे संत अडे रहाई ॥
गाहैं ताहि कबीर ले राखी । आगे तेहि निजु कबीर हरि भाबी ॥
९८
कबीरकृष्णगीता ।
दोहा-अजर मुक्त सो पावे जो, सुभरे सत्यकबीर ।
नरकी दैही त्यागके, हिरंमर धरे शरीर ॥
७३ पंडव नारद सुख व्याप्ता । एक दिन सुन कस भयउ तमाप्ता ।
जीव एक सतलोक चलि जाई । दूत ताहि नहिं पायउ प्राई ॥
गये दूत धर्मरायके पास । धर्मराय आप यम वासा ॥
हम त्रिय बंधु यम सहित सिधायो । हेरत जीव कितहु नहिं पाये ॥
सब थाके हम देश देखा जाई । सुन्यके पार मानसर जाई ॥
महासुगंध देश उजियारा । कामिन शोभा अकह अपारा ॥
कोटिन चंद सूर्य छवि एका । हंस असंख हंसनि तेहि रेखा ॥
दोहा-जहैं सतपुरुष कबीर निज, सो नहिं देखेउं ठौर ।
पुरुषलोकको आभा, मानसरोवर मोर ॥
अपनी कंचन उदित अटारी । हंसनीको लगी गंध हमारी ॥
द्वारपाल एक पठडन वेगी । देश निकार धायो बहु वेगी ॥
मोहिं घर बांहनीकारीस बाहर । मैं सुभरेउं कबीर तेहि ठाहर ॥
तहैं कबीर मोहि लीन्ह बचाई । बार अनेक दया उर लाई ॥
जहांसे गयऊं निरंजन खोदा । कबीरके आद न जाने वेदा ॥
कबीर सबनके आद बखाना । कबीरके आद कोई नहिं जाना ॥
कबीर नाम कायाको वीरा । कदली तन पौनगरसीरा ॥
दोहा-काया कदल दल, गुप्त प्रगट कबीर ।
सबके भीतर बाहर, स्वास निहस्वास शरीर ॥
सचलोककी ऐसी शोभा । कहि न सिराय मोर मनलोभा ॥
एक हंस तरवन जोती । छिन्न एक महैं देखऊं ससीकोती ॥
कृष्ण गरुड सम्वाद
कबीरकृष्णगीता ।
९९
एक हंसनी रवि शशिकी खानी । अनंत कोट रवि शशी प्रवानी ॥
निराकार एक तिहुँ पुर जारे । सचकबीर सो जरत उवारे ॥
जबते हम देखा अस थाना । तबते मनमें निशिदिन ध्याना ॥
तीन लोक तेहि लेखामाहीं । सतलोकको नहिं परछाहीं ॥
तीन लोकमहँ नरककी काया । सब सुगंध सतलोक लखाया ॥
दोहा—काल कठिन परंपची, तीन लोक दुख देय ।
ताके निकट न आवे जो, कबीर प्रवाना लेय ॥
जबहिं कृष्ण अस परचे दीन्हा । तबहिं व्यास चरणोदक लीन्हा ॥
सुखदेव औ सब देव अधीना । सबहि कबीर कहँ सट्टुर चीन्हा ॥
सत्यनामकी परी दोहाई । सबहि कबीर कहँ सीस नवाई ॥
विनवें सबे कबीरके आगे । सत्यकबीर कहवे अस लागे ॥
कबीरवचन ।
हम जग भक्त रूप दासा तन । जीवके दरद आये देखावन ॥
हम हैं अजर अमर घरवासी । जहँ सब जीवको घर सुखरासी ॥
जब २ जीव निरंजन आसी । तब २ आय काटेँ यम फांसी ॥
दोहा—कहँ कबीर प्रमारथ, सत्य दया धर धीर ।
दरद पराई जाहि घट, ते घट राम कबीर ॥
गरुडवचन ।
गरुड गमन मन स्तुति लावा । भाग बडे कबीर गुरु पावा ॥
कहँ गरुड सुन कृष्ण सुरारी । जीवनकी गति कहो विचारी ॥
कोटिनमें एक कबीरहिं चीन्हा । तिन निज जन्म सुफल कर लीन्हा
औरहिंकी गत कैसी स्वामी । सो कहिये भोहिं अंतर्थाभी ॥