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सर्वकोश
कबीर कृष्ण गीता

कबीर कृष्ण गीता

Kabir Krishna Gita

युगल आनंद विहारी द्वारा

स्रोत: Kabir Krishna Gita - Yugal Anand Vihari · Archive.org (उद्गम)

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कबीरकृष्णगीता ।

इहां वहां गुरु भक्त सुहेखा । गुरु आज्ञा कर सोई चेला ॥
गुरु कहैं आद ब्रह्म कर लेखे । गुरु सरूप संतन कहैं पेखे ॥
गुरु सोई जो तिहुँलोकते न्यारा । सद्गुरु अमरलोक विस्तारा ॥
विष्णु अंस सद्गुरुके आहीं । सद्गुरु सर्वे मई बरताहीं ॥
सद्गुरु सत्यकबीर अविनाशी । रहे निरंतर सब घटवासी ॥
जिभि चंदा नभ कुंभक दीसा । पुनि जिभिरविप्रकाशपद ईसा ॥
एके साहेब सद्गुरु आदी । कीतनउपजी विनासिषटस्वादी ॥
तीन लोककेहैं विष्णु श्रेष्ठा । विष्णुते सत्यकबीर गरिष्ठा ॥
सत्यकबीर सबके सुखदाई । सुरति सुमतिते वै भल पाई ॥

दोहा—सत्यकबीर सुखदाया, जो सुमरे एक चित्त ।
विष्णु व्यास कहैं सब, ते सुख कबीर प्रतीत ॥

जै जै जै सतनाम कबीरा । सत्यसुक्त सो अजर शरीरा ॥
पुष्पविमान सतलोकते आवा । सकलआयचरणनशिर नावा ॥
निज सिंहासन ठाकुर दीन्हा । चरणपस्वारचरणाभूतलीन्हा ॥
विष्णुव्यास सुखदेव सतव्यासा । सतकबीर पग परस हुलासा ॥
कर जोरे जै हरखित कहहीं । सतकबीर कहत सुख लहहीं ॥
जो सुमरे सतनाम सुखधामा । सच २ सो सद्गुरु नामा ॥
सत्यलोक अम्बर सुचकाया । तहां सो सत्य पुरुष रहाया ॥
बेहंग सोहंग वोहंगके मूला । ओंकार मकारके मूला ॥
कालके कारण करण गोसाई । रक्षपालक सब जिव सुखदाई ॥
तीन लोकते न्यारा रहहीं । सर्वे मई पुन सबसों कहहीं ॥