कबीर कृष्ण गीता
Kabir Krishna Gita
युगल आनंद विहारी द्वारा
स्रोत: Kabir Krishna Gita - Yugal Anand Vihari · Archive.org (उद्गम)
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कबीररुग्णगीता ।
भूप अनेक कांक्ष बहु आये । हांथ न लगी जाहि पछताये ॥
नृपत पद पतिव्रता राती । पिय आज्ञा किया चहे पिय माती
गुरु करेको अंकुर कीन्हा । पुन पिये प्रति अबोझा दीन्हा ॥
जब पिय आवैं देखों आंखी । तब गुरु करौं कबीर सत भाषी ॥
गुरु प्रतीत तुरंत मिल स्वामी । धन्य सहृदु गुरु अंतर्थाभी ॥
बाजत गाजत आव बराता । सुनके कोथ भयउं तब ताता ॥
तब पुत्री कहैं गारी दीन्हा । धन सर्वस नाहक खर्च कीन्हा ॥
सुना कुंभरि पिय करे अवाई । अधिक गीत कब पिय पद पाई ॥
पिता पहाँ दुलहिन चलि गयऊ । पूछ पिता पुत्री कस आयऊ ॥
कहे पतिव्रता संभाषण करहू । नहिं तो द्रव्य मम गहना धरहू ॥
सुन पितइ पठय नौवारी । किहुं सनमाने जेता धारी ॥
बहुरि दीप बार कुंभरि बुलाये । माला तिलक झलक झलकाये ॥
सतकबीर करुणा वै बोले । तब पतिव्रतते श्रवण खोले ॥
पूछे सुंदरी कहु नृपवारा । कोहवर जैवे कौन प्रकारा ॥
परदा सात चदर देहु अंतर । निज पिया नाम जपहिं उरमंदर ॥
कहैं कुंभर जानहिं अरधंगा । दुइ बरा पायऊं एके संग ॥
यह सुन पतिव्रता पगु लागी । परदा सात भरसपट त्यागी ॥
परे चरण पिय छुये न ताहीं । पूछे विष्णव भये कि नाहीं ॥
कहे पतिव्रता यह मन आज । जिहि पियसों पग हो तेहि पाऊ ॥
कहे कुंभर साकट जेहि नारी । तेहि संग बूडे पुरुष अनारी ॥
यह कहि कुंभर चला अपना दल । साकट हांथ न उचित लेन जल ॥