कबीर कृष्ण गीता
Kabir Krishna Gita
युगल आनंद विहारी द्वारा
स्रोत: Kabir Krishna Gita - Yugal Anand Vihari · Archive.org (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंकबीरकृष्णगीता ।
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एकको लोहु एकको पानी । दौय मिल सिरजा विदेहनिस्सानी ॥
निहअक्षर निहतत्तसो निरगुण । अमी नीर विन कुंभक सरगुण ॥
सट्टुर शब्दसे खागी धरनी । उर्ध्व सुरत सोहंग परवनी ॥
पितुके बुंदसो हाड औ गूदा । मांस रक्त औ येद औजूदा ॥
पुन पितु अंस रुधिर तन तबलों । तबलहि तन श्रोनित जिव जबलों ॥
चार अंस तनमहँ पितुकेरा । पांच अंस माता वन घेरा ॥
एक अधिक माता गुण भयऊ। चित देखो पन सतगुण कियऊ ॥
पौन आगे परा चल पाछे । धरिया माहिँ तन कछनी कांछे ॥
पिता पौन ले सांचहि दारी । तब जिव परा परातम नारी ॥
आतम परमातप जिव संग। नांद बिंदु मिलना मत रंगा ॥
अब जो अंस सुनहु शिव आही। जे जननी सो जो इन होय खाही ॥
जेहि जननी तन पांच प्रकृती । रोम चाम नख दंत भगोती ॥
जत द्वार तन तत भग जानी । आद लिंग सोहंग बखानी ॥
आठो पहर करे रति सोई । आवागवन महा दुख होई ॥
जबलग अमरलोक नहि पहुँचे । आवागौन भग भोगि विगूचे ॥
भक्त करे तो बारहि नीकी । भक्त बिहून सकल जग फीकी ॥
कीतम निरंजन पितु मम आही। तनके मात पिता यह साही ॥
जीव सब सत्यनामके आही । सत्यकबीर सतनाम लखाही ॥
महादेववचन ।
कहैं शंखु संसे गढ़ मोरी । तुम दयाल मम बंदीछोरी ॥
अब साहेब कहु जीवत लेखा । कौन तत्त कोहि जोनि परेखा ॥