कबीर कृष्ण गीता
Kabir Krishna Gita
युगल आनंद विहारी द्वारा
स्रोत: Kabir Krishna Gita - Yugal Anand Vihari · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 157, कुल 168 में से
संदर्भ में पढ़ेंकबीरकृष्णगीता ।
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एक निरमोह सुरत सतनामा । दुतिय निरमोह कबीरशिष्यराभा
स्याम लालभी रंग सोहाई । अजपा सहस्र कबीर लखाई ॥
सहस्रकमलदलाझलमिलझलके । मन पवन झीर मानसरोवरसे ॥
सुरत कमलपर सट्टुर वासा । एक सहस्र अजपा प्रकाशा ॥
गुन गुहिंज निरगुण सरबादी । शब्दसरूप सुरत संग स्वादी ॥
वतिस पट्टम पत्र गुण गाना । सुखा कंबल गुरु दरश पयाना ॥
दलअसंख्यकोकरवलसो भूला । जेहि २विन शून्य २ अस्थूला ॥
असंख्यदलकंबलकेदेखहुआगे । सतसाहेब दसमे बढभागे ॥
सतसाहेब सतनाम कबीरा । कहै कबीर हम सकल शरीरा ॥
हंस हमार सकल भत ताते । जीवधातके निकट न जाते ॥
कहै कबीर सुनो वृषवासन । काया लखहु देवन जहँ आसन ॥
अट्ट कोट पर्वत तहँहाडा । नौ सौ नदी समानीजेहिभांडा ॥
ज्ञानहीन जिव रात अमावस । पूनम चाँद गहुजगतगुरुआवस ॥
गुरु सट्टुर कबीर मिल तरना । कलश सवांरहु रतन सुवरणा ॥
सवा हाथ नभको गगन घर । वरणहु एक २ सुन संकर ॥
पृथ्वी आप तेज वायु अकाशा । यही नाम पंच तत्व प्रकाशा ॥
और सुनहु पांचहुके भाजा । ताते जीवन पोत दो मरजा ॥
पृथ्वीतत्वकी सुनहु प्रकृती । गुरु प्रताप कहैं संतन जीती ॥
असत भेद नारि तुच रोमा । बंधु पंच यह पृथ्वी तत भोमा ॥
लाल भसेव सुकल सोभ सुनं । पंच बंधु वह आपकी सुनं ॥
वायु तत्तकी भारजा बोली । लिये पवन फिरे उठन खटोली ॥
गावन धावन बोलन अगोचर । अटवा नतसी प्राणन दूसर ॥
क्रीतम वायु पंचतत्त संग तेहि बंधु।तेहि मुख बैन बोले भज नंद ॥