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सर्वकोश
कबीर कृष्ण गीता

कबीर कृष्ण गीता

Kabir Krishna Gita

युगल आनंद विहारी द्वारा

स्रोत: Kabir Krishna Gita - Yugal Anand Vihari · Archive.org (उद्गम)

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कबीरकृष्णगीता ।

१४१

काया माहिं कै अंस हैं ताता । सोकहु कै अंस आहिं तन माता ॥
कौन तत्त केहि जोनी साजा । योग भलाके भोगे राजा ॥
श्रुतुक मरे जरे तन क्षारा । परम पुरुष होय तनते न्यारा ॥
कौन देह धरि नरक भोगाई । को है सेवक लेय भिलाई ॥
चौदह सुवन कायामहैं काही । कहिये तन प्रचे मोहि पाही ॥
पांच सत्तका रंग कौन है । विन मंदिरका है सो कौन है ॥
कौन योगीको सिंगी बजावे । कौन आसन कौन विभूत रमावे ॥
काहेकी डिब्बी काहेका ढकना । कौन बेगाना को है अपना ॥
कौनसो चावल कौनसो दाली । कौनसी अगिन जात कहिवाली ॥
कौन कपिल को देवता आही । केतिक अनपा कहाँ जपाही ॥
विनती कर शिव पूछहिं भेऊ । कहैं कबीर सुनहु सब कोऊ ॥
योग यज्ञ तप तीर्थ कर्म काटा । यह मत चलि जिव बारह वाटा ॥
सार भक्त विन तरे न कोई । चहुं युग भक्ति श्रेष्ठ गुरु सोई ॥
कहैं कबीर सुन प्रेतके ईशा । गहहु देव पथ तारहु सीसा ॥
तुम सब लीन्ह पान परवाना । भक्ति चावल चित तज मम कामा ॥
एक २ अंश देहते काढहु । तेहि पितु सेव राख पितु बाढहु ॥
दोहा—अपनी अकित दुतिअन, सिरजा तीनो देव ।
बनिजा तीनो छट्टुर मिले, क्रीतम देव पितु सेव ॥
छै सौ बीस सहस्र इकईसा । येतिक स्वास दिवस निशि ईसा ॥
मनु पवनाको धायियो तारी । विना तेल औ दीपक वारी ॥
साठे तीन कर क्षीनीजहैंथा । आंगुर चार अकाशको माथा ॥
मल निकास बछ गनपत राजा । रिद्ध सिद्ध समसावत्री विराजा ॥
सकल सिद्ध मिल गुरुपद सेवा । गुरु विन गनपति भक्ति बहेवा ॥