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सर्वकोश
हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)

हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)

नारायण पण्डित द्वारा

स्रोत: हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित) · चौखम्बा विद्याभवन · 2017 (उद्गम)

DevanagariHindipublished302 पृष्ठ

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पृष्ठ 241

-१० ] चित्रवर्ण की मनमोहक बातें करना २२१
संशोधन क्षणक्षणमें अवश्य करना चाहिये। और वह आपने नहीं किया इसलिये
उस भूलका फल भुगता । गिद्धके सिखाये भलाये मेघवर्ण कौएने दुर्ग जला दिया।
राजा निःश्वस्याह, —
'प्रणयादुपकाराद्वा यो विश्वसिति शत्रुषु ।
स सुप्त इव वृक्षाग्रात् पतितः प्रतिबुध्यते' ॥ ९ ॥
राजाने साँस भर कर कहा—'जो मनुष्य स्नेहसे अथवा उपकारसे शत्रुओं पर
विश्वास करता है वह सोये हुएके समान वृक्षकी फुनगीसे गिर कर जाग पड़ता है,
अर्थात् आपत्तिमें पड़ कर उसे जानता हैं' ॥ ९ ॥
प्रणिधिरुवाच— 'इतो दुर्गदाहं विधाय यदा गतो मेघवर्णस्तदा
चित्रवर्णेन प्रसादितेनोक्तम्— 'अयं मेघवर्णोऽत्र कर्पूरद्वीपराज्ये-
ऽभिषिच्यताम् ।
दूत बोला—'यहाँसे गढ़का दाह करके जब मेघवर्ण गया तब चित्रवर्णने
प्रसन्न हो कर कहा—'इस मेघवर्णको इस कर्पूरद्वीपके राज्य पर राजतिलक
कर दो ।
तथा चोक्तम्,—
कृतकृत्यस्य भृत्यस्य कृतं नैव प्रणाशयेत्।
फलेन मनसा वाचा दृष्ट्या चैनं प्रहर्षयेत्' ॥ १० ॥
जैसा कहा है— जिस सेवकने कार्य सिद्ध किया है उसके किये हुए कृत्यको
कभी निष्फल नहीं करना चाहिये; वरना पारितोषिकसे, मनसे, वचनसे और
दृष्टिसे, उसको प्रसन्न करना चाहिये' ॥ १० ॥
चक्रवाको ब्रूते —'ततस्ततः ?।' प्रणिधिरुवाच —'ततः प्रधान-
मन्त्रिणा गृध्रेणाभिहितम्— 'देव ! नेदमुचितम् । प्रसादान्तरं
किमपि क्रियताम् ।
चकवा पूछने लगा—'उसके पीछे फिर क्या हुआ ?' दूत बोला- 'पीछे प्रधान
मंत्री गिद्धने कहा— 'महाराज ! यह बात उचित नहीं है, कुछ दूसरे भी
प्रसाद कीजिये;