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हिन्दुत्व: हिन्दू कौन है? (स्वातंत्र्यवीर विनायक दामोदर सावरकर - रत्नागिरि जेल में रचित वैचारिक ग्रन्थ)

Hindutva: Who is a Hindu? by Veer Savarkar

स्वातंत्र्यवीर विनायक दामोदर सावरकर द्वारा

DevanagariHindipublished167 पृष्ठ

१३८ हिन्दुत्व
वे अपने अन्तःकरणमें यह अनुभव करती थीं कि मैं हिन्दू हूं, और
यही एकही बात और सब बातोंसे बढ़कर है और हिन्दुत्व परख-
नेकी सच्ची कसौटी है। पर इस बातको भूलनेसे काम न चलेगा
कि हम हिन्दुत्वके लक्षण बहुजन समाजके संस्कारोंकी बुनियाद-
पर ही स्थिर करते हैं। और इसलिये हमें यह कहना पड़ेगा कि
अहिन्दू माता-पितासे उत्पन्न कोई मनुष्य तभी हिन्दू हो सकता
है जब इस देशको स्वदेश मानकर इस देशमें अपना रक्त-संबंध
करे और इस तरह इसे यथार्थमें पितृभू मानकर पूजे, और हमारी
संस्कृतिको मानकर इस देशको अनन्य भावसे अपनी पुण्यभू
माने। इस प्रकारके सम्बंधसे आगे होनेवाली सन्तति निश्चय ही
हिन्दू होगी। इसके आगे अब हम नहीं बढ़ सकते।
परन्तु, हिन्दूके किसी धर्म-सम्प्रदायको माननेसे कोई भी
विदेशी मनुष्य सनातनी, सिख या जैन कहला सकता है और ये
सब धर्म-सम्प्रदाय हिन्दूद्वारा ही प्रवर्त्तित होनेसे ये सब हिन्दू-
धर्म भी माने जाते हैं और इसलिये इनमेंसे किसी भी सम्प्रदायमें
सम्मिलित मनुष्य धर्म-सम्प्रदायके नाते "हिन्दू" कहला भी
सकता है। परन्तु ध्यानमें रखनेकी बात यह है कि इस प्रकारसे
धार्मिक विश्वास और संस्कार-संस्कृतिसे हिन्दू बना हुआ विदेशी
मनुष्य हिन्दुत्वके तीन लक्षणोंमेंसे केवल इस एक ही लक्षणसे
युक्त है अर्थात् केवल किसी हिन्दू-धर्म-सम्प्रदायको माननेसे ही
वह हिन्दू नहीं माना जाता। हमारी मातृ-भूमि और संस्कृतिकी
जो अमूल्य सेवा भगिनी निवेदिता या एनी बेसंट जैसी विदुषियों-

Uploaded By Rajesh Tanti.
हिन्दूजातिकी शक्ति १३६
द्वारा होती है उसके लिये हमारे हृदयमें इतनी कृतज्ञता है, हिन्दू-
जाति किसीके प्रेम-स्पर्शसे इतनी मृदुलहृदय हो जाती है कि
भगिनी निवेदिता अथवा उनके जैसी कोई स्त्री या पुरुष अपने
जीवनको हिन्दू-जातिके जीवनसे समरस कर दें तो हिन्दू-जातिमें
आप ही उनका बेमालूम समावेश हो जाता है । परन्तु इसे सामान्य
नियमका अपवाद ही समझना चाहिये । और कोई सामान्य
नियम बहुत कठोर भी नहीं हो सकता और बहुत मुलायम भी
नहीं हो सकता । जिन कसौटियोंपर हमने हिन्दुत्वकी परिभाषा-
को अबतक कसा उनसे यह स्पष्ट हो गया होगा कि इस परि-
भाषामें ये दोनों बातें हैं और उसमें न अव्याप्तिका दोष है और
न अतिव्याप्तिका ।
—————
(८)
हिन्दूजातिकी शक्ति
—-❖-—
यहां तक हमने हिन्दुत्व क्या है, इस बातका तटस्थ रहकर
विचार किया और उसमें उपयुक्तताका विचारतक न आने दिया ।
अब सम्पूर्ण विवेचन जब हो चुका है तब इस बातका विचार
करना अप्रासंगिक न होगा कि हिन्दुत्वके इन लक्षणोंसे हमारी
जातिकी शक्ति, अखण्डता और उन्नतिमें कहां तक सहायता मिल
सकती है । क्या ये लक्षण इतनी विस्तृत, इतनी गहरी ओर

१४० हिन्दुत्व
इतनी मजबूत नींव बन सकते हैं कि इस नींवपर हिन्दू-जाति
अपना वह भविष्य-निर्माण कर सकेगी जिससे उसपर होनेवाले
आक्रमणोंका निवारण हो जाय, या हिन्दू-जातिने यह बालूकी
भीत खड़ी की है ?
कुछ प्राचीन राष्ट्रोंने अपने समग्र देशको ही दुर्गकी तरह
सुरक्षित करनेके लिये बड़ी बड़ी दीवारें खड़ी कीं। आज वे
दीवारें टूट-फूट गयी हैं और यत्र-तत्र दिखायी देनेवाले उनके
अवशिष्ट चिह्नोंसे ही उनकी पहचान होती है; और जिन जातियों-
की रक्षाके लिये ये दीवारें खड़ी की गयीं उनका तो कहीं पता
ही नहीं है ! हमारे पुराने पड़ोसी चीनियोंने पीढ़ी-दर-पीढ़ी
परिश्रम करके अपने विशाल साम्राज्यके एक छोरसे दूसरे छोर-
तक एक इतनी बड़ी, इतनी ऊंची और इतनी मजबूत दीवार
खड़ी की कि संसार उसे मानवी प्रयत्नका एक आश्चर्य समझता
है। यह आश्चर्य भी, अपने ही बोझके नीचे दब गया। सभी
मानवी आश्चर्योंकी अन्तमें यही गति होती है ! परन्तु प्राकृतिक
आश्चर्योंको देखो ! जिसकी सब इच्छाएं परितृप्त हो चुकी हों
ऐसे अचल स्थितप्रज्ञ साधुकी तरह यह हिमालय ज्योंका त्यों
खड़ा है। वैदिक कालमें ऋषियोंने इसका जो रूप देखा वही
आज हम भी देख रहे हैं। यह हिमालय ही हमारा कोट (प्राचीर)
है, जिसने इस विशाल देशको एक अभेद्य गढ़ बना दिया है।
आप खाई खनकर गगरियोंसे उनमें पानी भरते हैं और
उसे परिखा कहते हैं। पर देखिये, यहां प्रत्यक्ष वरुण-देव ही

हिन्दू जातिकी शक्ति १४१
अपने एक हाथसे आठ खंड पृथ्वीको एक ओर ठेलकर दूसरे
हाथसे वहां समुद्रपर समुद्र जल छोड़ रहे हैं ! यह हिन्द-महासागर
और इसके ये उपसागर ही हमारी परिखा हैं।
ऐसी हमारी चतुःसीमा है और इससे हमें पृथ्वी और जल
(सागर-तट) दोनोंका लाभ मिल रहा है।
हमारी मातृभूमि ईश्वरकी सबसे लाड़ली कन्या है। इसे उसने
अपने महान् ऐश्वर्यसे सुसंपन्न किया है। इसकी नदियां गंभीर
हैं और उनका प्रवाह अखंड है। इसकी भूमिमें इतनी मृदुता
है कि हलसे वह जोती जाती है और उसके खेत हरे-भरे रहते हैं।
इसकी आवश्यकताएं अत्यन्त अल्प हैं और इसकी प्रकृति इसके
प्रत्येक अभावको पूर्ण करनेके लिये सदा प्रस्तुत है। वनस्प-
तियों और फलफूलोंकी कोई कमी नहीं—स्वयं सूर्यनारायण
प्रकाश और उष्णता प्रदान कर उसे वैभवसंपन्न किये हुए हैं।
उसे हिमाच्छादित देशोंकी लालसा नहीं है—वे उन्हींको मुबारक
हों जो वहां रहते हैं। यहां यदि कभी ऐसी गरमी भी पड़ती है
कि जी घबरा जाय तो वहां इतनी सरदी पड़ती है कि हाथ-पैर
ठिठुर जायं। वहां सरदीसे यदि शारीरिक श्रम अधिक होता
है तो यहां गरमीसे उसकी आवश्यकता ही कम हो जाती है।
उष्ण आहारसे गला भून डालनेकी अपेक्षा, शीतल जलसे तृषा
शांत करनेमें ही इसे अधिक आनंद मिलता है। जिन्हें यह
आनन्द नहीं मिलता वे उसे प्राप्त करनेके प्रयत्नका आनन्द लें
परन्तु जिन्हें यह आनन्द प्राप्त है वे उससे आनन्दित क्यों न हों

१४२ हिन्दुत्व
हिमाच्छादित टेम्स नदीमें चाहे जितनी तेजीके साथ अपना प्रपंच
रचिये; यहां तो पतितपावनी गङ्गाके किनारे चन्द्रमाके शीतल
शुभ्र प्रकाशमें घाट घाट नौकाओंद्वारा विहार करनेमें ही अधिक
आनन्द आता है। हमारा यह हल, यह मयूर, यह कमल, यह
हाथी और यह गीता बनी रहे, फिर चाहे हिमाच्छन्न देशोंमें जो कुछ
आनन्द हो वह न मिले तो आर्यमाताको कोई परवा नहीं।
सब कुछ अपने मन जैसा हो यह नहीं होता। इसके उद्यानोंमें
हरियाली छायी हुई है, इसके खलिहान भरे हुए हैं, इसकी
सर-सरिताओंका जल स्फटिकके समान स्वच्छ है, इसके पुष्प
सौरभमत्त हैं, इसके फल सरस हैं और इसकी जड़ी-बूटियोंमें
रोग-निवारणकी अद्भुत शक्ति है। इसकी चित्रकलाकी तूलिका
उषाके रंगोंमें रंगी हुई और उसकी वीणाका गीत गोकुलके
संगीतसे मिला हुआ है। सचमुच ही हिंदमाता परमेश्वरकी
सकल ऐश्वर्य-संपन्न कन्या है।
क्या इंग्लेण्ड और क्या फ्रांस—चीनियों और कदाचित्
अमेरिकनोंको छोड़कर—कोई देश ऐसा नहीं है जो नैसर्गिक बल
और वैभवमें सिन्धुस्थानकी बराबरी कर सके। एक देश—
एक घरका होना स्थायी और सुदृढ़ राष्ट्रके होनेके लिये, सबसे
पहली बात है। संसारमें जितने देश हैं उनमें कोई ऐसा देश नहीं
है जो इस विषयमें हिन्दुस्थानसे बढ़कर हो—हिन्दुस्थान-
की भूमिकी रचना एक महान् राष्ट्रकी समृद्धिके लिये जितनी
उपयुक्त है उससे अधिक उपयुक्त प्राकृतिक रचना और किसी भी

हिन्दूजातिकी शक्ति १४३
देशकी नहीं है। इसलिये हम हिन्दुओंमें वह प्रेम-बन्धन है—
मातृभूमिका प्रेम ही हमारा सबसे पहला धर्म है और इससे वह
प्रेमबन्धन इतना दृढ़ है कि वह राष्ट्रको संघटित और सुदृढ़ रख-
कर उसे अधिकाधिक पराक्रम करनेका उत्साह और सामर्थ्य
प्रदान करता है।
हिन्दुत्वका जो दूसरा लक्षण है वह हमारे राष्ट्र-संघटन और
गौरवकी प्रच्छन्न शक्तियोंको जगानेमें और भी अधिक समर्थ होता
है। चीनको छोड़ संसारमें कोई ऐसा देश नहीं है जहां लोग इतने
एक जातीय और साथ ही इतने प्राचीन, और संख्याबल तथा
जीवनी शक्तिदोनोंके विचारसे इतने शक्तिमान हों जितने कि हिन्दु-
स्थानमें हम हिन्दू हैं। अमेरिकन लोग, जिन्हें हम देखते हैं कि राष्ट्री-
यताके देशिक आधारमें हमारे समान ही सौभाग्यवान हैं, तौभी
वे इस बातमें हमसे पीछे ही रह जाते हैं। मुसलमान तो कोई
जाति ही नहीं हैं और न ईसाई ही। इनका तो साम्प्रदायिक
संघ है—जातीय या राष्ट्रीय संघ नहीं। पर हम हिन्दू जातीय
संघ हैं, साथ ही साम्प्रदायिक और राष्ट्रीय संघ भी, और हम
रहते भी हैं उसी एक ही प्राचीन हिन्दू-देश हिन्दुस्थानमें ही।
हमारा संख्याबल भी कम नहीं है।
और संस्कृति? अंगरेज और; अमेरिकन दोनों अपनेको
एक जातिके समझते हैं, क्योंकि शेक्सपियरपर दोनोंका एकसा
अधिकार है। परंतु हम हिन्दुओंके लिये अकेले कालिदास या
भास ही नहीं हैं, रामायण और महाभारत भी हम सब हिन्दुओं-

१४४ हिन्दुत्व
की समान संपत्ति हैं! और वेद? वेदोंकी बात ही क्या कहें?
अमेरिकामें अमेरिकन बालकोंको एक राष्ट्रगीत सिखाया जाता
है जिसमें उनके हृदयमें आत्मगौरवका भाव जगानेके लिये यह
कहा गया है कि, "अमेरिकनो, तुम्हारे पीछे चार सौ वर्षका
इतिहास खड़ा है!" हम हिन्दुओंका इतिहास सदियोंके इस छोटेसे
पैमानेसे नहीं नापा जाता, बल्कि यहां युगों और कल्पोंसे गिनती
करनी पड़ती है और आश्चर्यके साथ यह पूछना पड़ता है कि
"रघुपतेः क्व गतोत्तरकोशला। यदुपतेः क्व गता मथुरापुरी !!"
हिन्दू आत्मगौरवका भाव जगानेका इतना प्रयत्न नहीं करता
जितना सत्यको जगानेका प्रयत्न करता है। और शायद इसी
कारणसे रामसेस और नेबुचडनजरकी अपेक्षा हिन्दू अधिक आयु-
ष्मान् है। जिस राष्ट्रको कोई भूतकाल नहीं, उसका कोई भविष्य-
काल भी नहीं। यदि यह सच है तो जिस हिन्दू-जातिने भूतकालमें
अनंत वीरोंको जन्म दिया और जिसको यह स्मरण है कि हमने
यूनान और रोम, फारोहा और इनकस जैसे राष्ट्रोंका ध्वंस
करनेवाली शक्तियोंको भी नष्ट कर डाला, उस हिन्दू-जातिके
इतिहासमें निश्चय ही यह इसके भविष्यका भी अन्य किसी
भी जातिसे अधिक विश्वसनीय आश्वासन है।
परंतु संस्कृतिके अतिरिक्त पुण्यभूमिका एक होना ऐसा
बन्धन है जो कभी कभी मातृभूके बन्धनसे भी अधिक बल-
शाली होता है। मुसलमानोंको देखिये। दिल्ली और आगरेकी
अपेक्षा मक्केकी ओर ही उनका ध्यान अधिक जाता है। कुछ

हिन्दू-जातिकी शक्ति १४५
मुसलमान तो यह साफ साफ कह भी देते हैं कि यदि इस्लामके
गौरवके लिये या मक्केकी रक्षाके लिये आवश्यक हो तो हिन्दु-
स्थानकी सब बातोंका बलिदान कर सकते हैं। यहूदियोंको
देखिये। जिन देशोंमें ये लोग रहे, जहां इन्होंने पनाह पायी, जहां
रहे और फले-फूले उन देशोंसे इनका अपनी पुण्यभूमिसे अधिक
क्या, उतना भी प्रेम नहीं हुआ। इनका प्रेम सदा ही अपनी पुण्य-
भूमि और मातृ-भूमि इन दोनोंमें बँटा हुआ ही रहेगा। यदि यहूदि-
योंका स्वप्न कभी सत्य हुआ—फिलस्तीन यदि कभी यहूदी राष्ट्र
बना तो ये अपनी पुण्यभूमिका स्वार्थ पहले देखेंगे और पीछे
अपनी अमेरिका और यूरोपकी मातृभूमिका; और यदि इस यहूदी
राज्य और इनकी मातृभूमिके बीच युद्ध छिड़ा तो इनकी सहानु-
भूति यहूदी राज्यकी तरफ ही होगी, चाहे तनसे वे उस तरफ जा-
कर न मिलें। इतिहासमें इस प्रकारके उदाहरण भरे पड़े हैं।
यूरोपमें क्रूसेडकी जो लड़ाइयाँ हुईं उनमें भिन्न-भिन्न जातियों,
राष्ट्रों और भाषाओंके लोग एक होकर अपनी पुण्यभूके लिये लड़े।
इससे भी पुण्यभूका प्रभाव कितना बलवान होता है यह स्पष्ट
मालूम हो जाता है।
इसलिये किसी राष्ट्रके पूर्ण संघटित और अखंड होनेके लिये
जो सबसे उत्तम अवस्था हो सकती है वह यही है कि मातृभू
और पुण्यभू एक ही हो—वही पूर्वपुरुषोंकी भूमि हो, वही देव-
ताओं और आचार्योंकी भूमि हो; वही अपने इतिहासकी घटना-
ओंकी भूमि हो, वही ईश्वरी लीलाके दृश्योंकी भूमि हो।
१०

१४६ हिंदुत्व
हिन्दू ही एक ऐसी जाति है जिसे यह आदर्श स्थिति प्राप्त
है। चीनियोंको भी यह अवस्था नसीब नहीं हुई। केवल अरब
और फिलस्तीन—यदि कभी यहूदी वहां अपना राज कायम कर
सके तो—इस अवस्थाको प्राप्त कर सकते हैं। परंतु किसी जाति-
को गौरवान्वित करनेवाली जो प्राकृतिक, सांस्कृतिक, ऐतिहा-
सिक तथा ऐसी ही अन्य बातें हैं, उनका तो अरबमें प्रायः
अकाल ही है और यदि कभी फिलस्तीनमें यहूदियोंका राज्य
हुआ जिसका कि वे स्वप्न देख रहे हैं और जिसमें उनके साथ
हमारी सहानुभूति है, तौभी वहां इन बातोंका तो अभाव ही
रहेगा।
इंग्लैंड, फ्रान्स, जर्मनी, इटली, तुर्की, ईरान, जापान,
अफगानिस्तान, वर्त्तमान, मिस्र (वर्त्तमान इसलिये कि “पंटो” की
पुरानी संतति और उनका मिस्र तो बहुत पहले ही नष्ट हो चुके
हैं), और अन्य राज्य, मेक्सिको, पेरू, चिली और कहां तक
गिनावें, ये सब देश जातिके नाते कुछ या बहुत कुछ एक होने-
पर भी दैशिक, सांस्कृतिक, ऐतिहासिक और संख्याबलके
विचारसे, हम हिन्दुओंके मुकाबले बहुत ही क्षुद्र हैं। उसमें भी
यह तो उन्हें नसीब ही नहीं कि उनकी मातृभू और पुण्यभू एक
ही हो। अब रहे-सहे देशोंमें एक रूस और दूसरा अमेरिकाका
राज्यसंघ ये दो देश भौगोलिक दृष्टिसे हमारे देशके समान होने-
पर भी राष्ट्रीयताकी अन्य बातोंमें हमसे बहुत ही हीन हैं ।
अभी जो राष्ट्र जीवित हैं उनमें एक चीन राष्ट्र ही ऐसा है जो

देश, जाति, संस्कृति और संख्या, इन सब बातोंमें प्रायः हमारा
समभाग्य है परंतु राष्ट्रीयत्वकी दो बातोंमें चीनी भी हमसे घट-
कर हैं। वे दो बातें हैं-पूर्ण विकासको प्राप्त संस्कृत भाषा
और यह पावन जन्म-भूमि ।
इस प्रकार हिन्दुत्वके आधारभूत जो लक्षण हैं वे राष्ट्रीयताके
भी आधारभूत तत्व हैं। यदि हम चाहें तो हिन्दुत्वकी इस
आधारभूमिपर अपना वह भविष्य निर्माण कर सकते हैं जिसे
आजतक संसारके अन्य किसी राष्ट्रने स्वप्नमें भी न देखा हो--
वह भविष्य जो हमारे प्राचीन गौरवसे भी अधिक महान् हो ।
शर्त यह है कि हम इन बातोंका उपयोग करनेमें समर्थ हों । लोग
यह स्मरण रखें कि यह समय संघका है--चारों ओर बड़े बड़े
संघ बन रहे हैं। राष्ट्रोंका संघ, मित्रराष्ट्रोंका संघ, अखिल-
इस्लाम-संघ, स्लाव जातियोंका संघ, ये सब क्या हैं ? यह सब
छोटे छोटे जीवोंका संघटनद्वारा बड़े होनेका उद्योग है जिसमें
इस जीवनसंग्राममें विजयी होकर रहनेकी शक्ति प्राप्त हो । जो
लोग संख्या-बलमें कम हैं, जिनकी देशिक स्थिति दुर्बल है, जो
प्राकृतिक और ऐतिहासिक बलसे संपन्न नहीं हैं, वे औरोंके साथ
मिलकर प्रबल होना चाहते हैं। धिक्कार है उनको जिन्हें जन्मतः
ये सब बल प्राप्त हैं पर जिन्हें उनका पता नहीं या पता होकर
भी जो उनका तिरस्कार करते हैं ! संसारका प्रत्येक राष्ट्र किसी
न किसी संघमें स्थान प्राप्त करनेके लिये बेचैन होकर चेष्टा कर
रहा है । परन्तु हिन्दुओ ! आप चाहे जैन हों, समाजी]

१३८ हिन्दुत्व
हों, सिख हों, सनातनी हों, कोई भी हों; क्या इस महासंघसे
अलग होकर इसे नष्ट करना क्या आपके लिये लाभकारी होगा ?
और आपका यह संघ भी कैसा संघ है—सन्धियोंके कागजोंसे
जुटा हुआ कोई कृत्रिम संघ नहीं, संकट विशेषके भयसे बना
हुआ संघ नहीं, बल्कि यह ऐसा संघ है जो एक रक्त और एक
संस्कृतिके अखंडनीय बन्धनोंसे संघटित हुआ है। यदि कुछ
सामर्थ्य हो तो इस संघको और बलशाली बनाओ। अल्पसंख्यक
समाज यह ध्यानमें रखें कि वे अखिल हिन्दू जातिसे अलग होकर
जिस डारपर बैठे हैं उसी डारको काटनेका काम करेंगे। जिस
किसी संबंधसे तुम अखिल हिन्दू जातिके साथ संबद्ध हो चाहे
वह संबंध रक्तका हो, भाषाका हो, पर्व और त्योहारोंका हो,
संस्कृति और मातृ-भूमिका प्रेम हो, उसे और भी मजबूत करो।
हिन्दू रक्तकी यह प्राचीन पुनीत धारा अटकसे कटकतक नस-
नसमें प्रवाहित हो और समग्र हिन्दू-जाति एक, अखंड, अभेद्य और
फौलादकी तरह तीक्ष्णण हो।
एक बार पीछे फिरकर देखो, और फिर वर्तमानको देखो।
क्या दिखायी देता है?—एशियामें अखिल-इस्लाम-संघ, यूरोपमें
राजनीतिक संघ, अफ्रीका और अमेरिकामें नीग्रो जातिका संघ,
इन दृश्योंको देखकर सोचो कि तुम्हारा भविष्य इस हिन्दू देशके
भविष्यमें ही मिला हुआ है या नहीं; और यह हिन्दू-देशका
भविष्य आखिर तुम हिन्दुओंकी ही शक्तिपर निर्भर करता है या
नहीं। हम लोग अपने भरसक ऐसा उद्योग कर रहे हैं और ऐसा

हिन्दू-जातिकी शक्ति १४६
करना हमारा कर्तव्य ही है कि जिससे इस देशके सब लोग हिन्दू,
मुसलमान, पारसी, ईसाई और यहूदियोंके अन्दर यह भाव जाग
उठे कि हम सब पहले हिन्दुस्थानी-भारतवासी हैं और फिर और
कुछ। पर इस ओर हिन्दुस्थानकी जहांतक भी प्रगति हुई हो,
एक बात ऐसी है जिसे भुलानेसे काम न चलेगा। वह बात यही
है कि क्या हिन्दुस्थानमें और क्या संसारके किसी भी देशमें,
किसी राष्ट्रके खड़े होने और ठहरनेके लिये कोई आधारभूमि
होनी चाहिये। यह आधारभूमि क्या है? किसी राष्ट्रका
जीवन उस राष्ट्रके उन नागरिकोंके ही जीवनपर निर्भर करता
है जिनका स्वार्थ, जिनका इतिहास और जिनकी सदभिलाषाएं
उस राष्ट्रके देशके साथ मिली हुई हों। ये ही लोग हैं जिन्हें
हम राष्ट्रकी आधारभूमि कह सकते हैं। उदाहरणार्थ, तुर्कोंको
देखिये। राज्यक्रांति होनेके पश्चात् तरुण तुर्कोंको अपनी
पार्लमेंट और सामरिक संस्थाओंके द्वार आर्मेनियनों और
ईसाइयोंके लिये खोल देने पड़े इस नाते कि ये भी राष्ट्रके
अङ्ग हैं चाहे इनका धर्म-संप्रदाय कुछ भी हो। पर जब सर्विया-
के साथ युद्ध छिड़ा तब ईसाइयों और आर्मेनियनोंके मन
पहले तो चंचल हुए और पीछे उनकी कितनी ही पलटनें शत्रु-
पक्षमें जा मिलीं, क्योंकि राजकीय, जातीय और धार्मिक दृष्टिसे
सर्वियनोंके साथ इनका अधिक सम्बन्ध था। अमेरिकाका उदा-
हरण लीजिये। जब जर्मन महायुद्ध छिड़ा तब जर्मन-वंशके अमे-
रिकन अमेरिका छोड़कर जाने लगे और अमेरिकापर यह एक

१५० हिन्दुत्व
बड़ा संकट उपस्थित हुआ। अमेरिकाके नीग्रो भी अपने अफ्रिका-
वासी नीग्रो भाइयोंसे जितना प्रेम करते हैं उतना अपने अमेरिका-
वासी यूरोपियनोंसे नहीं। इसलिये अमेरिकाका भाग्य वहांके
ऐंग्लो-सैकसन लोगोंके भाग्यसे ही बंधा हुआ है। यही बात
हिन्दुओंकी है। इनका भूत, भविष्य, वर्तमान तीनों काल
हिन्दुस्थानके साथ दृढ़बद्ध होनेसे यही देश उनकी “पितृभू'
और “पुण्यभू है। इसलिये हिन्दुस्थानी या भारतीय राष्ट्रकी
आधारभूमि हिन्दू ही हैं। इसलिये भारतीय राष्ट्रके नाते भी,
हिन्दू भाइयो, अपनी हिन्दू राष्ट्रीयताको सुदृढ़ और संघटित
करो; अपने अहिन्दु भाइयोंको या संसारके किसी भी प्राणीको
किसी प्रकारका कष्ट पहुंचानेके लिये नहीं बल्कि इसलिये
कि संसारमें चारों ओर जो गुट कायम हुए हैं उनमेंसे
किसीके लिये भी यह संभव न हो कि वह हमारे ऊपर आक्रमण
कर सके। जब हिन्दुस्थानके अन्य समाज हिन्दुस्थानके ही हितको
अपना सबसे श्रेष्ठ हित और धर्म माननेको तैयार नहीं हैं और
जबतक संसारके सभी देश मानव-जातिके हितको अपना व्यव-
हार्य लक्ष्य बनानेको तैयार नहीं हैं, बल्कि ये सब लोग जाति या
धर्म-संप्रदयदाय या राष्ट्रके नाते संकुचित स्वार्थों की बुनियादपर
आक्रमण और संरक्षणके लिये, गुटबंदियां कायम कर रहे हैं, तब-
तक, कमसे कम तबतक तो हिन्दुओ, अपने उन सूक्ष्म बंधनोंको
दृढ़ करो जो तुम्हारे एकीभूत विराट शरीरके ही स्नायु हैं। जो
लोग इन बन्धनोंको तोड़ डालनेकी आत्मघात:करनेवाली चेष्टा

हिन्दू-जातिकी शक्ति १५१
करते या “हिन्दू”नामको ही अस्वीकार करते हैं उन्हें पीछे अनुताप
होगा और यह दिखायी देगा कि हिन्दू-जातिसे अलग होकर
उन्होंने अपने जातीय जीवन और शक्तिके स्रोतसे अपने आपको
अलग कर लिया ।
“हिन्दुत्व” की व्याख्यामें राष्ट्रीयताके जिन लक्षणोंकी मीमां-
सा की गयी उनमेंसे कुछ ही लक्षणोंके होनेसे स्पेन और पुर्तगाल
जैसे राष्ट्र संसारमें सिंह जैसे पराक्रम कर सके । तब, जिस
हिन्दू-जातिमें राष्ट्रीयताके सभी लक्षण मौजूद हैं उसके लिये
संसारमें कौनसी ऐसी बात है जो दुष्प्राप्य हो ?
२२ करोड़ हिन्दू जिनकी कर्मभूमि, पितृभूमि और पुण्यभूमि
हिन्दुस्थान है, जिनका ऐसा दिव्य इतिहास है, जो रक्तसंबंध और
संस्कृतिके बंधनोंसे एक हैं, उनकी तरफ आंख उठाकर कौन देख
सकता है ? सारे संसारको सिर झुकाकर उनकी बात माननी
पड़ेगी । एक दिन वह आनेवाला है जब मानव-जातिको इस
महा-शक्तिका परिचय मिलेगा ।
और यह भी निश्चित है कि जब कभी हिन्दू उस अवस्थाको
प्राप्त करेंगे जब संसारको उनका आदेश सुनना पड़े तब हिन्दू
जातिका वह आदेश गीताके और बुद्धके उपदेशसे भिन्न नहीं
होगा । जब कोई हिन्दू हिन्दुत्वातीत होता है तब उसका हिन्दुत्व
अथाह हो जाता है और भगवान् शङ्कराचार्यकी तरह “वाराणसी
मेदिनी” कहकर समग्र भूमण्डलमें वह अपनी काशीका विस्तार
देखने लगता है, अथवा तुकारामके साथ यह गाने लगता है कि
“आमुचा स्वदेश । भुवनत्रयामध्यें वास । मेरा स्वदेश समग्र
पृथिवीकी चतुःसीमामें व्याप्त है—वही मेरे देशकी चतुः-
सीमा है !”
॥ इति ॥