गरीबदास जी की बानी (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर परम्परा एवं अमर ग्रन्थ)
Garibdas Ji Ki Bani: Belvedere Press Allahabad
सन्त गरीबदास जी छुड़ानी (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा
राग विलावल १५६
बिन पर भँवर उड़ाइया, बिन पगों१ पयाना२ ।
दास गरीब अगमपुरी, जहँ ज्ञान न ध्याना ॥१२॥
( ५ )
मैं अमली निज नाम का, मद खूब चुवाया ।
पिया पियाला प्रेम का, सिर साँटे३ पाया ॥ टेक ॥
गन गंधर्प जोधा बड़े, कैसे ठहराया ।
सील खेत रन जंग में, सतगुरु सर४ लाया ॥ १ ॥
पाँच सखी नित संग हैं, कैसे हैं त्यागी ।
अमर लोक अनहद रते, सोई अनुरागी ॥ २ ॥
परपंची पाकर५ लिया, बिरहे का कंपा६ ।
जहँ संख पद्म उजियार है, भलकल है चंपा ॥ ३ ॥
कुंभ७ कलाली भर दिया, महँगा मद नीका ।
और अमल नापाक है, सब लागत फीका ॥ ४ ॥
एक रती पावे नहीं, बिन सीस चढ़ाये ।
वह साहब राजी नहीं, नर मुंड मुड़ाये ॥ ५ ॥
नौधा के नर बहुत हैं, बैकुंठ सिधौरा८ ।
सुकिरत नाम सँभालियो, लूटत जम जौरा ॥ ६ ॥
सुकिरत नाम समीप है, सिव गौर सुनाया ।
सुवटे से सुकदे हुआ, पारस पद पाया९ ॥ ७ ॥
रंग महल में रोसनी, रमते से मेला ।
परसा दास गरीब है, सतगुरु का चेला ॥ ८ ॥
( ६ )
आज का लाहा लीजिये, कल्ह किस कूँ होई ।
यह तन माटी में मिलै, जानै सब कोई ॥ टेक ॥
(१) पांव । (२) चलाना । (३) बदले में यानी सिर देकर । (४) बान । (५) पकड़ ।
(६) चिड़िया फँसाने की तीलियाँ । (७) घड़ा । (८) जाने वाले । (९) देखो कथा नोट
पृष्ठ ७८ ।
१६० गरीवदास जी की बानी
लखी करोड़ी चल गये, बहु जोड़ खजाना ।
जा तन चंदन लेपते, सो धरे मसाना ॥ १ ॥
हस्ती घोड़े पालकी, दल बल बहु साजा ।
सवा लाख संगी गये, रावन से राजा ॥ २ ॥
कुम्भकरन से बीर थे, लंका छत्रधारी ।
नाम बिना बंस बूड़ि है, समझावै नारी ॥ ३ ॥
भभीछन पद भेदिया, निरगुन निरबाना ।
रावन दई बिसार रे, तज गरब गुमाना ॥ ४ ॥
बड़ चकवै१ काल चक्र पड़े, जिन नाम बिसारा ।
कंस केसि चानूर से, धर बाल पछारा ॥ ५ ॥
हिरनाकुस समझे नहीं, पहलाद पढ़ावै ।
उदर बिनासा आन कर, तब कौन छुड़ावै ॥ ६ ॥
जरासिंध से मारिया, और सहस्राबाहू ।
ग्राह से गजहि छुड़ाइया, निज नाम है साऊ२ ॥ ७ ॥
दूसासन पर लै गये, एकोतर३ भाई ।
दुरजोधन की देह कूँ, तन गीधन खाई ॥ ८ ॥
निरगुन निरभय नाम है, भज लोजो सोई ।
अगर दीप सतलोक में, तब बासा होई ॥ ६ ॥
सहस अठासी दीप में, उतपति की खानी ।
दास गरीब भक्ती मिलै, जब थिर होय प्रानी ॥१०॥
( ७ )
ज्ञान की अँखियाँ रँग भरी, लै नहि निज नूरी ।
मिरगा बाहर भरमही, नाभी कस्तूरी ॥ टेक ॥
पीतंबर मस्तक बना, त्रिकुटी अति सोहै ।
सो घट छाना४ ना रहै, पद५ परसा लोहै ॥ १ ॥
(१) चक्रवर्ती राजा । (२) सहायक । (३) एक से एक । (४) खाली । (५) त्रिकुटी
पद को "पारस" कहा है ।
राग बिलावल १६१
सील संतोष बिबेक रे, और ज्ञान विज्ञाना।
दया दुलीचे बैठ कर, है ब्रह्म समाना ॥ २ ॥
छिमा छत्र जेहि ढुरत है, तामस नहिं तेजं।
सो नर परसे जानिये, अवगत की सेजं ॥ ३ ॥
कमल हिरंबर खिल रहे, अनुभौ अनुरागी।
दास गरीब सतलोक के, सोई बैरागी ॥ ४ ॥
( ८ )
सजन सुराही हाथ है, अमृत का प्याला।
हम बिरहिन बिरहै रँगी, कोई पूछै हाला ॥ टेक ॥
चोखा फूल चुवाइया, बिरहिन के ताईं।
मतवाला महबूब है, मेरा अलख गुसाईं ॥ १ ॥
प्रेम पियाला पीय कर, मैं भई दिवानी।
कहा कहूँ उस देस की, कुछ अकथ कहानी ॥ २ ॥
बरवै राग सुनाय कर, गल डारी फाँसी।
गाँठ घुली१ खुलै नहीं, साजन अबिनासी ॥ ३ ॥
गुझ की बात किस कूँ कहूँ, कोई महरम जानै।
अगली पिछली मत गई, बेधी इक तानै२ ॥ ४ ॥
सुन्न मँडल सतलोक से, बिरहा चल आया।
मुझ बिरहिन के लेन कूँ, मेरे सजन पठाया ॥ ५ ॥
रोम रोम में राग है, बिरहा रँग रासी।
लोक बेद झूठे लगे, पिछली बुध नासी ॥ ६ ॥
अनहद नादू बाजहीं, अमरापुर माँई।
सुन्न मँडल सतलोक कूँ, दुलहिन उठ धाई ॥ ७ ॥
अरस गुमठ गुलजार है, गैबी गलताना।
सेत धजा जहँ फरहरैं, पँचरंग निसाना ॥ ८ ॥
(१) मज़बूत हो गई। (२) एक ही तान में बेध दिया।
१६२ गरीबदास जी की बानी
तन मन छाकै प्रेम से, मन मंगल महली ।
दुलहिन दास गरीब है, जहाँ सेज सलहली¹ ॥ ६ ॥
( ९ )
सुन्न सरोवर हंस मन, मोती चुग आया ।
अगर दीप सतलोक में, ले अजर झराया ॥ टेक ॥
हंस हिरंबर हेत है, हैरान निसानी ।
सुख सागर मुक्ता भये, मिल बारह बानी² ॥ १ ॥
पिंड अंड ब्रह्मांड से, वह न्यारा नादू ।
सुन्न समभिया बेग रे, गये बाद बिबादू ॥ २ ॥
सतगुरु सार जु गाइया, धर कूंची ताला ।
रंग महल में रोसनी, घट भया उजाला ॥ ३ ॥
दीपक जोड़ा नूर का, ले अस्थिर बाती ।
बहुर न भौजल आवहीं, निरगुन के नाती ॥ ४ ॥
नाम सहर बेगमपुरा, जहाँ लागी ताली ।
सब घट मन मौजूद है, नाहीं कोउ खाली ॥ ५ ॥
अजब दिवाना देस है, जहाँ हिल मिल रहिये ।
कहता दास गरीब है, मुक्ता पद लहिये³ ॥ ६ ॥
( १० )
ज्ञान तुरंगम⁴ पाड़िया⁵, ताजी दरियाई ।
पासर⁶ घाली प्रेम की, चित चाबुक लाई ॥ टेक ॥
प्रेम धाम से ऊतरे, हुकमी सैलानी ।
सब्द सिध मेला करें, हंसों के दानी ॥ १ ॥
असंख जुग परलै गये, जब के गुन गाऊँ ।
ज्ञान गुरज है दस्त में, ले हंस चिताऊँ ॥ २ ॥
(१) सुखाली। (२) खालिस सोना। (३) पाइये। (४) घोड़ा। (५) इकट्ठा किया।
(६) डोरी, फंदा।
राग बिलावल १६३
सील हमारा सेल१ है, औ छिमा कटारी ।
तत्त तीर तक मार हूँ, कहँ जात अनारी ॥ ३ ॥
बुधि हमरी बन्दूक है, दिल अंदर दारू२ ।
प्रेम पियाला सार का, चित चकमक झारू३ ॥ ४ ॥
तत्त हमारी तेग४ है, जो असल असीलं ।
सूरे सनमुख लेत हैं, कायर मुख पीलं ॥ ५ ॥
घायल घूमै अरस में, जिस लगी करारी ।
औषध निःचा नाम है, जिन्ह पीड़५ पुकारी ॥ ६ ॥
पाखरिया६ सतलोक के, रन-जीत पठाये ।
कहता दास गरीब है, गुरुगम से आये ॥ ७ ॥
( ११ )
घट ही अंदर गारडू७, धोखे मर गइया ।
सार सब्द चीन्हा नहीं, कुछ भेद न लहिया ॥ टेक ॥
न्योल जड़ी कूँ सूँघ कर, गृह डंक लगावै ।
सरपिन बाँबिहि सूँ डसी, कहिं जान न पावै ॥ १ ॥
बाजी अनहद बीन रे, फूँ भई फुँकारा ।
भगल बिद्या बाजीगरी, जानै गुरु म्हारा ॥ २ ॥
सतगुरु मिलिया गारडू, जिन्ह मंतर दीन्हा ।
नागदमन८ तिरगुन जड़ी, बिषयर६ बस कीन्हा ॥ ३ ॥
बाजीगर की डुगडुगी, बिषयर भरमाया ।
घाल पिटारे ले चला, घरबार नचाया ॥ ४ ॥
ऐसा सतगुरु कीजिये, बाजीगर पूरा ।
दास गरीब अमर करै, दिल दरस जहूरा ॥ ५ ॥
(१) भाला । (२) बारूद । (३) एक लोहे की चीज जिसको पत्थरों पर मार कर
आग निकालते हैं । (४) तलवार । (५) दरद । (६) लोहे की जाली जो लड़ाई में घोड़े
की हिफाजत के लिए उस पर डालते हैं । (७) साँप का मंत्र जानने वाला । (८) साँप की
जड़ी । (६) साँप ।
१६४ गरीबदास जी की बानी
( १२ )
दरदमंद दरवेस है, बेदरद कसाई।
संत समागम कीजिये, तज लोक बड़ाई॥ टेक॥
डिंभी१ डिंभ न छोड़हीं, मरघट के भूता।
घर घर द्वारे फिरत हैं, कलजुग के कूता॥ १॥
डिंभ करें डुंगर२ चढ़ें, तप होम अँगीठी।
पंच अगिन पाखंड है, यह मुक्ति बसीठी३॥ २॥
पाती तोरे क्या हुआ, बहु पान झरो रे।
तुलसी बकरा खा गया, ठाकुर क्या बौरे॥ ३॥
पीतल ही का थाल है, पीतल का लोटा।
जड़ मूरत कूँ पूजते, आवैगा टोटा॥ ४॥
पीतल चमचा पूजिये, जो खान परोसै।
जड़ मूरत किस काम की, मत रहौ भरोसे॥ ५॥
कासी गया पराग४ रे, हरपैड़ी नहाये।
तारावति५ दरसन किये, बहु दाग दगाये॥ ६॥
इन्द्रदौन अस्नान रे, कर पुस्कर परसे।
द्वादस तिलक बनाय कर, बहु चंदन चरचे॥ ७॥
अठसठ तीरथ सब किये, बृन्दावन फेरी।
नाम बिना खूले नहीं, दिब दृष्ट अँधेरी॥ ८॥
सतगुरु भेद लखाइया, निज नूर निसानी।
कहता दास गरीब है, छूटे सो प्रानी॥ ६॥
( १३ )
नजर निहाल दयाल हैं, मेरे अंतरजामी।
सोलह कला सपूरना, लख बारहबानी६॥ टेक॥
(१) धोखेबाज। (२) पहाड़। (३) बकवाद। (४) प्रयाग। (५) द्वारिका।
(६) खालिस सोना।
राग बिलावल १६५
उलट मेरुडंड चढ़ गये, देखा सो देखा।
संख कोटि रबि झिलमिलैं, गिनती नहिं लेखा॥ १॥
बरन बरन के तेज हैं, पँचरंग परेवा१।
मूरत कोट असंख्य हैं, जा मध इक देवा॥ २॥
(जाके) ब्रह्मा झाडू देत हैं, संकर करें पंखा।
सेस चरन चंपी लगैं२, अगमी गढ़ बंका॥ ३॥
धर ऐनक दुरबीन कूँ, धुन ध्यान लगावै।
उलट कमल अरसा३ चढ़े, तब नजरों आवै॥ ४॥
सूछम मूरत सोहनी, अगमै इक-रासा।
रहता रमता राम है, घट पिंड न स्वासा॥ ५॥
जो देखा सो किस कहूँ, अचरज इक ख्याला।
कहता दास गरीब है, निज रूप बिसाला॥ ६॥
( १४ )
सोई साध अगाध है, आपा न सरावै४।
पर निंदा नहिं संचरै, चुगली नहिं खावै॥ टेक॥
काम क्रोध त्रिस्ना नहीं, आसा नहिं राखै।
साँचे सूँ परचा भया, जब कूड़ न भाखै॥ १॥
एकै नजर निरंजना, सबही घट देखै।
ऊँच नीच अंतर नहीं, सब एकै पेखै॥ २॥
सोई साध सिरोमनी, जप तप उपकारी।
भूले कूँ उपदेस दे, दुर्लभ संसारी॥ ३॥
अकल५ यकीन पठाय दे, भूले कूँ चेतै।
सो साधू संसार में, हम बिरले भेंटे॥ ४॥
सूतक६ खोवैं सत कहैं, साँचे सूँ लावैं।
सो साधू संसार में, हम बिरले पावैं॥ ५॥
(१) कबूतर—यहाँ हंस से मतलब है। (२) मुक्की लगाना, पाँव दाबना। (३) अर्श।
(४) सराह्रै। (५) बुद्धि। (६) अशुद्धता।
३२
१६६ गरीबदास जी की बानी
निरख निरख पग धरत हैं, जिव हिंसा नाहीं ।
चौरासी तारन तरन, आये जग माहीं ॥ ६ ॥
इस सौदे कूँ ऊतरे, सौदागर सोई ।
भरे जहाज उतार दे, भौसागर लोई ॥ ७ ॥
भेष धरैं भागे फिरैं, बहु साखी सीखैं ।
जानैं नहीं बिबेक कूँ, खर के ज्यूँ रीकैं१ ॥ ८ ॥
खास मुकामा दरस है, जो अरस रहंता ।
उनमुन में तारी लगी, जहँ अजप जपंता ॥ ६ ॥
सुन्न महल अस्थान है, जहँ अस्थिर डेरा ।
दास गरीब सुभान२ है, सत साहब मेरा ॥१०॥
( १५ )
सत्त कहन कूँ राम है, दूजा नहिं देवा ।
ब्रह्मा बिसुन महेस से, जा की करते सेवा ॥ टेक ॥
जप तप तीरथ थोथरे, जा की क्या आसा ।
कोट जग्ग पन दान से, जम कटै न फाँसा ॥ १ ॥
इहाँ देन उहा लेन है, यह मिटै न झगरा ।
बिना पंथ की बाट है, पावै को डगरा३ ॥ २ ॥
बिन ही इच्छा देन है, सो दान कहावै ।
फल बंधै४ नहिं तासु का, अमरापुर जावै ॥ ३ ॥
सकल दीप नौ खंड के, छत्री जिन जीते ।
सो तो पद में ना मिले, बिद्या गुन चीते५ ॥ ४ ॥
कोट उनंचा६ पृथ्वी, जिन दीन्ही दाना ।
परसराम औतार कूँ, कीन्हे कुरबाना ॥ ५ ॥
कंचन मेरु सुमेर रे, आये सब माहीं ।
काम धेनु कल्प बृच्छ रे, सो दान कराहीं ॥ ६ ॥
(१) गधे को तरह रेंकैं। (२) पवित्र । (३) रास्ता । (४) चाहै । (५) क्योंकि उनके
चित्त में बिद्या और गुन का घमंड था । (६) शास्त्रों के अनुसार पृथ्वी उन्चास कोट
जोजन नाप में है ।
राग बिलावल १६७
सुर नर मुनि जन सेवहीं, सनकादिक ध्यावैं।
सेस महेस मुख रटत हैं, जाका पार न पावैं ॥ ७ ॥
ब्रह्मा बिसुन महेस रे, देवा दरबारी।
संख कलप जुग हो गये, जाकी खुलै न तारी ॥ ८ ॥
परलै संख असंख रे, पल माँह बिहानी१।
गरीबदास निज नाम की, महिमा हम जानी ॥ ६ ॥
( १६ )
सुख के सागर राम हैं, जेहि धरिये ध्याना।
तिरबेनी के घाट रे, कीजे असनाना ॥ टेक ॥
नाभि कमल से उच्चरे, दम लेखे लावो।
परबी कोट अनंत हैं, सुख सागर न्हावो ॥ १ ॥
अनंत कोट धुन होत हैं, सुख सागर माहीं।
पैड़ी पंथ न महल के, जहाँ हंसा जाहीं ॥ २ ॥
औं मूल उच्चार है, जपिये मन माला।
सुछम बेद से धुन लगी, पहुँ चे चित्र साला ॥ ३ ॥
ऐनक आदि अनाद है, दुरबीन धियाना।
पलकों चौरा कीजिये, त्रिकुटी अस्थाना ॥ ४ ॥
सहस कमल दल जगमगै, जहाँ भँवर गुँजारा।
घटा गरज बहु दामिनी, अनहद झनकारा ॥ ५ ॥
गरजै सिंध अगाध रे, बिन सरवन सुनिया।
नर की क्या बुनियाद है, पहुँचत नहि मुनिया२ ॥ ६ ॥
मन पौना के गमन३ से, आगे लख भाई।
सुरत निरत के पंख ले, हंसा उड़ जाई ॥ ७ ॥
अधर बिहंगम उड़ चलै, भौंरी ले भौंरा।
गरीबदास कहु क्या करै, जा का जम जोरा ॥ ८ ॥
(१) बीत गये। (२) मुनी। (३) पहुँच।
१६८ गरीबदास जी की बानी
( १७ )
कर साहब की बंदगी, बैरागर ले रे।
समरथ साँई सीस पर, तो कूँ क्या भै रे॥ टेक ॥
सील संतोष बिबेक हैं, अरु ज्ञान बिज्ञाना।
दया धरम चित चौतरे, बाँचो परवाना॥ १ ॥
धरम धजा जहँ फरहरै, होहि जग१ ज्योणारा।
कथा कीरतन होत है, साहब दरबारा॥ २ ॥
सुमता२ माता मित्र है, रख अकल यकीनं।
सत्त धरे तें खुलत है, दिल में दुरबीनं॥ ३ ॥
जा के पिता बिबेक से, अरु भाव से भाई।
या पटतर३ नहिं और है, कुछ बहिन सगाई४ ॥ ४ ॥
दृढ़ के डुंगर५ चढ़ गये, जहँ गुफा अनादं।
लागी सब्द समाध रे, धन सतगुरु साधं॥ ५ ॥
सहस मुखी जहँ गंग है, तालिब तिरबेनी।
जहाँ ध्यान असनान कर, परबी सुख चैनी॥ ६ ॥
कोट करम कसमल६ कटै, उस परबी नहाये।
वह साहब राजी नहीं, कुछ नाचे गाये॥ ७ ॥
अगर मूल महकंत है, जहँ गंध सुगंधा।
एक पलक के ध्यान से, कटिहै सब फंदा॥ ८ ॥
दो मुड़ की भाठी चुवै, जहँ सुखमन पोता।
इला पिंगला एक कर, सुखसागर गोता॥ ६ ॥
अबल बली बारियाम है, निरगुन निरबानी।
अनंत कोट बाजे बजैं, बाजैं सहदानी७ ॥१०॥
तन मन निःचल हो गया, निज पद से लागे।
एक पलक के ध्यान से, दुन्दर८ सब भागे ॥११॥
(१) यज्ञ। (२) सुमति, अच्छी बुद्धि। (३) बराबर। (४) सगी, अपनी। (५)
पहाड़। (६) पाप। (७) शहनाई। (८) दुन्द, अंधकार।
राग बिलावल १६६
पुर पट्टन के घाट में, एक पिगल पंथा।
छुटैं फुहारे नूर के, जहँ धार अनंता ॥१२॥
झिल मिल झिल मिल होत है, उस पुर में भाई।
घाट बाट पावै नहीं, है द्वारा राई१ ॥१३॥
तहँ वहँ संख सुरंग है, मध औघट घाटा।
सतगुरु मिलैं कबीर से, तब खुलै कपाटा ॥१४॥
सेत कमल जहँ जगमगै, पीताँबर छाया।
सूरज संख सुभान२ है, अबिनासी राया ॥१५॥
अगर डोर से चढ़ गये, धुन अलल धियाना।
दास गरीब कबीर का, पाया अस्थाना ॥१६॥
( १८ )
लोक लाज नहिं कीजिये, निरभय हो रहिये।
यह मन साधों दीजिये, (तौ) गोबिन्द पद पइये ॥ टेक ॥
भौसागर जोनी जनम, हरि दास मिटावैं।
बहुर बहुर नहिं आवहीं, मुक्ता पद पावैं ॥ १ ॥
ऐसे हरि जन संत हैं, संगत नित कीजै।
झूठे जग की लाज में, नाहीं चित दीजै ॥ २ ॥
यह जग बदरा३ धुँध का, मिहर४ पौना डरिये।
जौ मन चाहे राम कूँ, दासा तन करिये ॥ ३ ॥
हस्ती डर माने नहीं, जे स्वान भुकाहीं।
सतसंगी संगत ना तजैं, चित राम बसाहीं ॥ ४ ॥
स्वान रूप संसार है, कुछ करसी नाहीं।
सीस महल कूँ देख कर, भौंकत मर जाहीं ॥ ५ ॥
मतवाले महबूब हैं, साधू जग माहीं।
गरीबदास समझावहीं, जिग्यासी५ ताईं ॥ ६ ॥
(१) राई के समान झीना। (२) पवित्र। (३) बादल। (४) मिहर अर्थात दया
के पवन से डरता है। (५) खोजी।
१७० गरीबदास जी की बानी
( १६ )
राम कहे मेरे साध कूँ, दुख मत दीजो कोय ।
साध दुखावै मैं दुखी, मेरा आपा भी दुख होय ॥ टेक ॥
हिरनाकुस उदर बिदारिया, मैं हीं मारा कंस ।
जो मेरे साध कूँ आन दुखावै, जाका खोऊँ बंस ॥ १ ॥
पहुँचूँगा छिन एक में, जन अपने के हेत ।
तेंतिस कोट की बन्ध छुटाई, रावन मारा खेत ॥ २ ॥
कला१ बढ़ाऊँ२ संत की, परगट करिहै मोय३ ।
गरीबदास जुलहा कहै, मेरा साध न दहियो४ कोय ॥ ३ ॥
( २० )
करो निबेरा रे नरो, जम माँगै बाकी ।
कर जोड़े धरम राय खड़५, सतगुरु है साखी ॥ टेक ॥
माटी का कलबूत६ है, सतगुरु का साजा ।
उस नगरी डेरा करो, जहाँ सब्द अवाजा ॥ १ ॥
नूर मिलेगा नूर में, माटी में माटी ।
कोइक७ साधू चढ़ गये, उस औघट घाटी ॥ २ ॥
रोम रोम में राम है, अजपा जप लीजै ।
सुरत सुहंगम डोर गहि, प्याला मधु पीजै ॥ ३ ॥
जम की फरदी८ ना चढ़ै, सोई जन सूरा ।
परसा दास गरीब है, जोगेसर पूरा ॥ ४ ॥
( २१ )
अगम ज्ञान की धुन सुनी, दुलहिन भई बौरी ।
यह भगलीगिर का जंत्र है, कोई लखै न डोरी ॥ टेक ॥
जूठे फल परवान हैं, परतीत जु स्योरी९ ।
यह अनुराग अनादि है, जो अमर भई गौरी१० ॥ १ ॥
(१) महिमा । (२) बढ़ाऊँ । (३) मुझको । (४) सतावो । (५) खड़ा । (६) सांचा,
शरीर । (७) कोई एक । (८) फर्द, चिट्ठा । (६) जो सेवरी भिल्लनी सरीखी प्रतीत है।
(१०) पारबती ।
राग काफी १७१
बिन तरवर१ के बाग है, जहँ लागै मौरी२ ।
त्रिकुटी सिंध पिछान ले, मधुकर है भौरी ॥ २ ॥
अष्ट कमल दल भीतरा, सुमिरन सुमिरो री ।
यह औसर चूको नहीं, कुछ होय सु हो री ॥ ३ ॥
पिंड प्रान तिस वारहू, तन मन अरपो री ।
गरीबदास पद अरस में, सुर्त सिंध मिलो री ॥ ४ ॥
॥ राग काफी ॥
मन मगन भया जब क्या गावै ॥ टेक ॥
ये गुन इंद्री दमन करेगा, बस्तु अमोली सो पावै ॥१॥
तिरलोकी की इच्छा छाँड़े, जग में बिचरै निर्दावै ॥२॥
उलटी सुलटी निरत निरंतर, बाहर से भीतर लावै ॥३॥
अधर सिंहासन अवचल आसन, जहँ उहँ सुरती ठहरावै ॥४॥
त्रिकुटी महल में सेज बिछी है, द्वादस अंदर छिप जावै ॥५॥
अजर अमर निज मूरत सूरत, ओऽमं सोहं दम ध्यावै ॥६॥
सकल मनोरथ पूरन साहब, बहुर नहीं भौजल आवै ॥७॥
गरीबदास सतपुरुष बिदेही, साँचा सतगुरु दरसावै ॥८॥
( २ )
मन मगन भया कैसे जाना ॥ टेक ॥
ब्रह्म खुमारी सुन्न अधारी, आठ बखत रहे गलताना ॥१॥
ओऽमं सोहं सार बस्तु है, अजपा जाप सही जाना ॥२॥
यह तन देही बहुर नहीं है, अष्ट कमल दल अस्थाना ॥३॥
थावर जंगम में जगदीसं, क्या पूजै जल पाषाना ॥४॥
सुरत सनेही सिन्ध मिलेंगे, दिल खोजैं दिल-दाना ॥५॥
या मन मूरत चंपा सूरत, समझ बूझ ले ब्रह्म ज्ञाना ॥६॥
(१) पेड़। (२) बौर।
१७२ गरीबदास जी की बानी
बिनमसि१ का इक अंक अरस२ में, क्या पाढ़ये पोथी पाना३ ॥७॥
संख कँगूरा४ बाजैं तूरा, सेत धजा लख असमाना ॥८॥
उजल हिरंबर सब्द घुरंबर५, जम जोरा नहिं तलबाना ॥६॥
गंगा जमुना मद्ध सुरसती, मान सरोवर में न्हाना ॥१०॥
मोछ मुक्त जहँ पित्र होत हैं, वहाँ करो पिंड परदाना६ ॥११॥
अर्थ धर्म सब काम मोछना, आद पुरुष पद निरबाना ॥१२॥
गरीबदास दरपन मुख दरवै७, संख कला रवि ससि भाना ॥१३॥
( ३ )
मन मगन भये का सुन रासा ॥ टेक ॥
यह इंद्री परकिरती प्रेरै, डार चलै तिरगुन पासा ॥१॥
सफम सफा८ है मिले नूर में, काम क्रोध का कर नासा ॥२॥
यह तन खाक मिलेगा भाई, क्या पहिरे मलमल खासा ॥३॥
पिंड ब्रह्मांड कुछ थीर नहीं है, गगन मँडल में कर बासा ॥४॥
चिंता चेरी दूर परै री, काट चलो जम का फाँसा ॥५॥
मान बड़ाई जमपुर जाई, होय रहो दासन दासा ॥६॥
गरीबदास पद अरस अनाहद, ओअं सोहं जप स्वासा ॥७॥
( ४ )
मन मगन भया सो ब्रह्मचारी ॥ टेक ॥
यहमन अकल अजीत जीतिया, दमन९ करी पाँचो नारी ॥१॥
दुरमत का तो देवल१० ढाहा, पकर लई मनसा दारी११ ॥२॥
चित के अंदर चौपड़ खेलै, जहँ फिरती सोलह सारी१२ ॥३॥
जा की नरद पकी घर आवै, गर्भ बास में ना जा री ॥४॥
जोनी संकट मोछ होत है, उतर गये भौजल पारी ॥५॥
दुहूँ दीन षट दरसन त्यागे, ऐसी ही धारन धारी ॥६॥
(१) सियाही। (२) अर्श। (३) पन्ना, बरफ। (४) छोटे छोटे बुर्ज। (५) घिर रहा है।
(६) प्रदान। (७) दरसै। (८) साफ से साफ। (९) जेर। (१०) मंदिर। (११) नारी।
(१२) नरद, गोटी।
राग काफी १७३
झिलमिल नैना अनहद बैना, लाग रही उनमुन तारी ॥७॥
या जग जिन्दा विन्दा करिहै, कोइ अस्तुत कोइ दे गारी ॥८॥
गरीबदास दीदार दरस कर, फगुआ खेलन की बारी ॥६॥
( ५ )
दम दा नहीं भरोसा साधो, अब तू कर चलने दा सोच ॥टेक॥
मुए पुरुष संग सती जरत है, परी भरम की भूल ॥ १ ॥
पीठ मनुका१ दाख लदी है, करहा२ खात बँबूल ॥ २ ॥
मेंड़ी३ मंदिर बाग बगीचे, रहसी डाल न मूल ॥ ३ ॥
जिदा पुरुष अचल अबिनासी, बिना पिंड अस्थूल ॥ ४ ॥
नैनों आगे झुक झुक आवै, रतन अमोली फूल ॥ ५ ॥
गरीबदास यह अलल४ ध्यान है, सुरत हिंडोले झूल ॥ ६ ॥
( ६ )
तारेंगे तहकीक सतगुरु तारेंगे ॥ टेक ॥
घट ही में गंगा घट ही में जमुना, घट ही में जगदीस ॥१॥
तुम्हरै ज्ञाना तुम्हरै ध्याना, तुम्हरै तारन की परतीत ॥२॥
मन कर धीरा५ बाँध ले बौरे, छाँड़ देय पिछलों की रीत ॥३॥
दास गरीब सतगुरु का चेला, टारैं जम की रसीत६ ॥४॥
जल थल साछी एक है रे, डुंगर७ डहर८ दयाल ॥५॥
दसों दिसा कूँ दरसनं, ना कहिं जोरा काल ॥६॥
(१) मुनक्का । (२) ऊँट । (३) मड़ई, मकान के ऊपर का खंड । (४) अलल पच्छ,
देखो नोट पृष्ठ ६५ । (५) थिर । (६) हुक्मनामा । (७) पहाड़ । (८) रास्ता ।
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।। राधास्वामी ।।
संतबानी की संपूर्ण पुस्तकों का संशोधित सूचीपत्र, १९८२
गुरु नानक की प्राण संगली भाग १ ८) गरीबदास जी की बानी =
गुरु नानक की प्राण संगली भाग २ ८) रैदास जी की बानी =
संत महात्माओं का जीवन चरित्र संग्रह ४) दरिया साहिब बिहार (दरिया सागर) ३
कबीर साहिब का अनुराग सागर ६) दरिया साहिब के चुने पद और साखी ३
कबीर साहिब का बीजक ६) दरिया साहब मारवाड़ वाले की बानी . ३
कबीर साहिब का साखी-संग्रह १०) भीखा साहिब की शब्दावली ४
कबीर साहिब की शब्दावली, भाग १ ५) गुलाल साहिब की बानी =
कबीर साहिब की शब्दावली, भाग २ ५) बाबा मलूकदास जी की बानी ३
कबीर साहिब की शब्दावली, भाग ३ ३) गुसाईं तुलसीदास जी की बारहमासी ॥
कबीर साहिब की शब्दावली, भाग ४ २) यारी साहिब की रत्नावली . १
कबीर सा० की ज्ञान-गुदड़ी, रेखते, झूलने ३) बुल्ला साहिब का शब्दसार २
कबीर साहिब की अखरावती २) केशवदास जी की अमीघूंट १
धनी धरमदास जी की शब्दावली ५) धरनीदास जी की बानी =
तुलसी सा० हाथ० की शब्दावली भाग १ ८) मीराबाई की शब्दावली ४)
तुलसी सा० भाग २ पद्मसागर सहित ८) सहजोबाई का सहज-प्रकाश ४)
तुलसी साहिब का रत्नसागर ८) दयाबाई की बानी २)
तुलसी साहिब का घटरामायण भाग १ १०) संतबानी संग्रह, भाग १ (साखी) १२॥)
तुलसी साहिब का घटरामायण भाग २ १०) संतबानी संग्रह भाग २ (शब्द) • १२॥)
दादू दयाल की बानी भाग १ "साखी" १३) लोक परलोक हितकारी ४)
दादू दयाल की बानी भाग २ "शब्द" ८)
सुन्दर बिलास ८) संत महात्माओं के चित्र
पलटू साहिब भाग १ (कुण्डलियां) ५) संत तुलसीदास ॥
पलटू सा० भाग २ (रेखते, झूलने) आदि ५) कबीर साहेब ॥
पलटू सा० भाग ३ (भजन, साखियां) ५) दादू दयाल ॥
जगजीवन साहिब की बानी भाग १ ६) मीराबाई ॥)
जगजीवन साहिब की बानी भाग २ ६) दरिया साहब ॥)
दूलनदास जी की बानी २) मलूकदास ॥)
चरनदास जी की बानी, भाग १ ५) तुलसी साहेब हाथरस वाले ॥)
चरनदास जी की बानी, भाग २ ५) गुरु नानक ॥)
पुस्तकें मंगवाने के नियम
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वह अलग से लिया जायेगा। पुस्तकों के आर्डर के साथ आधी रकम पेशगी मनीआर्डर से भेजना
अति आवश्यक है। मनीआर्डर कूपन पर पूरा नाम, पता, डाकखाना, मुकाम व जिला साफ-साफ
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पुस्तकें मँगवाना हो तो अपने पास के रेलवे स्टेशन का नाम अवश्य लिखें। पोस्ट आफिस ५ दिन से
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लेना चाहिये। फोन नं० ५१४१०
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