गरीबदास जी की बानी (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर परम्परा एवं अमर ग्रन्थ)
Garibdas Ji Ki Bani: Belvedere Press Allahabad
सन्त गरीबदास जी छुड़ानी (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंराग काफी १७१
बिन तरवर१ के बाग है, जहँ लागै मौरी२ ।
त्रिकुटी सिंध पिछान ले, मधुकर है भौरी ॥ २ ॥
अष्ट कमल दल भीतरा, सुमिरन सुमिरो री ।
यह औसर चूको नहीं, कुछ होय सु हो री ॥ ३ ॥
पिंड प्रान तिस वारहू, तन मन अरपो री ।
गरीबदास पद अरस में, सुर्त सिंध मिलो री ॥ ४ ॥
॥ राग काफी ॥
मन मगन भया जब क्या गावै ॥ टेक ॥
ये गुन इंद्री दमन करेगा, बस्तु अमोली सो पावै ॥१॥
तिरलोकी की इच्छा छाँड़े, जग में बिचरै निर्दावै ॥२॥
उलटी सुलटी निरत निरंतर, बाहर से भीतर लावै ॥३॥
अधर सिंहासन अवचल आसन, जहँ उहँ सुरती ठहरावै ॥४॥
त्रिकुटी महल में सेज बिछी है, द्वादस अंदर छिप जावै ॥५॥
अजर अमर निज मूरत सूरत, ओऽमं सोहं दम ध्यावै ॥६॥
सकल मनोरथ पूरन साहब, बहुर नहीं भौजल आवै ॥७॥
गरीबदास सतपुरुष बिदेही, साँचा सतगुरु दरसावै ॥८॥
( २ )
मन मगन भया कैसे जाना ॥ टेक ॥
ब्रह्म खुमारी सुन्न अधारी, आठ बखत रहे गलताना ॥१॥
ओऽमं सोहं सार बस्तु है, अजपा जाप सही जाना ॥२॥
यह तन देही बहुर नहीं है, अष्ट कमल दल अस्थाना ॥३॥
थावर जंगम में जगदीसं, क्या पूजै जल पाषाना ॥४॥
सुरत सनेही सिन्ध मिलेंगे, दिल खोजैं दिल-दाना ॥५॥
या मन मूरत चंपा सूरत, समझ बूझ ले ब्रह्म ज्ञाना ॥६॥
(१) पेड़। (२) बौर।