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गरीबदास जी की बानी (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर परम्परा एवं अमर ग्रन्थ)

गरीबदास जी की बानी (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर परम्परा एवं अमर ग्रन्थ)

Garibdas Ji Ki Bani: Belvedere Press Allahabad

सन्त गरीबदास जी छुड़ानी (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा

DevanagariHindipublished186 पृष्ठ

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पृष्ठ 180

१७० गरीबदास जी की बानी
( १६ )
राम कहे मेरे साध कूँ, दुख मत दीजो कोय ।
साध दुखावै मैं दुखी, मेरा आपा भी दुख होय ॥ टेक ॥
हिरनाकुस उदर बिदारिया, मैं हीं मारा कंस ।
जो मेरे साध कूँ आन दुखावै, जाका खोऊँ बंस ॥ १ ॥
पहुँचूँगा छिन एक में, जन अपने के हेत ।
तेंतिस कोट की बन्ध छुटाई, रावन मारा खेत ॥ २ ॥
कला१ बढ़ाऊँ२ संत की, परगट करिहै मोय३ ।
गरीबदास जुलहा कहै, मेरा साध न दहियो४ कोय ॥ ३ ॥
( २० )
करो निबेरा रे नरो, जम माँगै बाकी ।
कर जोड़े धरम राय खड़५, सतगुरु है साखी ॥ टेक ॥
माटी का कलबूत६ है, सतगुरु का साजा ।
उस नगरी डेरा करो, जहाँ सब्द अवाजा ॥ १ ॥
नूर मिलेगा नूर में, माटी में माटी ।
कोइक७ साधू चढ़ गये, उस औघट घाटी ॥ २ ॥
रोम रोम में राम है, अजपा जप लीजै ।
सुरत सुहंगम डोर गहि, प्याला मधु पीजै ॥ ३ ॥
जम की फरदी८ ना चढ़ै, सोई जन सूरा ।
परसा दास गरीब है, जोगेसर पूरा ॥ ४ ॥
( २१ )
अगम ज्ञान की धुन सुनी, दुलहिन भई बौरी ।
यह भगलीगिर का जंत्र है, कोई लखै न डोरी ॥ टेक ॥
जूठे फल परवान हैं, परतीत जु स्योरी९ ।
यह अनुराग अनादि है, जो अमर भई गौरी१० ॥ १ ॥
(१) महिमा । (२) बढ़ाऊँ । (३) मुझको । (४) सतावो । (५) खड़ा । (६) सांचा,
शरीर । (७) कोई एक । (८) फर्द, चिट्ठा । (६) जो सेवरी भिल्लनी सरीखी प्रतीत है।
(१०) पारबती ।