गरीबदास जी की बानी (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर परम्परा एवं अमर ग्रन्थ)
Garibdas Ji Ki Bani: Belvedere Press Allahabad
सन्त गरीबदास जी छुड़ानी (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंराग काफी १७३
झिलमिल नैना अनहद बैना, लाग रही उनमुन तारी ॥७॥
या जग जिन्दा विन्दा करिहै, कोइ अस्तुत कोइ दे गारी ॥८॥
गरीबदास दीदार दरस कर, फगुआ खेलन की बारी ॥६॥
( ५ )
दम दा नहीं भरोसा साधो, अब तू कर चलने दा सोच ॥टेक॥
मुए पुरुष संग सती जरत है, परी भरम की भूल ॥ १ ॥
पीठ मनुका१ दाख लदी है, करहा२ खात बँबूल ॥ २ ॥
मेंड़ी३ मंदिर बाग बगीचे, रहसी डाल न मूल ॥ ३ ॥
जिदा पुरुष अचल अबिनासी, बिना पिंड अस्थूल ॥ ४ ॥
नैनों आगे झुक झुक आवै, रतन अमोली फूल ॥ ५ ॥
गरीबदास यह अलल४ ध्यान है, सुरत हिंडोले झूल ॥ ६ ॥
( ६ )
तारेंगे तहकीक सतगुरु तारेंगे ॥ टेक ॥
घट ही में गंगा घट ही में जमुना, घट ही में जगदीस ॥१॥
तुम्हरै ज्ञाना तुम्हरै ध्याना, तुम्हरै तारन की परतीत ॥२॥
मन कर धीरा५ बाँध ले बौरे, छाँड़ देय पिछलों की रीत ॥३॥
दास गरीब सतगुरु का चेला, टारैं जम की रसीत६ ॥४॥
जल थल साछी एक है रे, डुंगर७ डहर८ दयाल ॥५॥
दसों दिसा कूँ दरसनं, ना कहिं जोरा काल ॥६॥
(१) मुनक्का । (२) ऊँट । (३) मड़ई, मकान के ऊपर का खंड । (४) अलल पच्छ,
देखो नोट पृष्ठ ६५ । (५) थिर । (६) हुक्मनामा । (७) पहाड़ । (८) रास्ता ।