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गणितसारसंग्रह (महावीराचार्य - प्रो. लक्ष्मीचन्द्र जैन सविस्तार हिन्दी अनुवाद सटीक)

Ganitasarasangraha of Mahaviracharya with Hindi Translation

महावीराचार्य (अनुवादक: प्रो. एल. सी. जैन) द्वारा

DevanagariHindipublished421 पृष्ठ

१०६ ] गणितसारसंग्रहः [ ६. ७०-
सैकार्धकपञ्चार्धकषडर्धकाशीतियोगयुक्तास्तु ।
मासाष्टके षडधिका चत्वारिंशच्च षट्कृतिशतानि ॥ ७० ॥
संकलितस्कन्धमूलस्य मूलवृद्धिविमुक्तिकालानयनसूत्रम्—
स्कन्धाप्तमूलचितिगुणितस्कन्धेच्छाग्रघातियुतमूलं स्यात् ।
स्कन्धे कालेन फलं स्कन्धोद्धृतकालमूलहतकालः ॥ ७१ ॥
अत्रोद्देशकः
केनापि संप्रयुक्ता षष्टिः पञ्चकशतप्रयोगेण । मासत्रिपञ्चभागात् सप्तोत्तरतश्च सप्तादिः ॥ ७२ ॥
तत्षष्टिसप्तमांशकपदमितिसंकलितधनमेव । दत्त्वा तत्सप्तांशकवृद्धिं प्रादाच्च चितिमूलम् ॥
किं तद्वृद्धिः का स्यात् कालस्तदृणस्य मौक्षिको भवति ॥ ७३ १/२ ॥
उत्पन्न हुए व्याजों को मूलधनों में जोड़ने पर देखा जाता है कि वे बराबर हो जाते हैं । उन विनियोजित
रकमों को निकालो ॥ ७० ॥
समान्तर श्रेढि बद्ध किस्तों द्वारा चुकाई गई ऋण की रकम के सम्बन्ध में धन, ब्याज और
ऋण मुक्ति का समय निकालने के लिये नियम—
इष्ट ऋण धन वह मूलधन है जो मन से चुनी हुई (महत्तम प्राप्य किस्त की) रकम और
श्रेढि के पदों की संख्या के भिन्नीय भाग के गुणनफल को (१ जिसका प्रथम पद है, १ प्रचय है और
उपर्युक्त महत्तम ऋण की रकम को प्रथम किस्त द्वारा विभाजित करने से प्राप्त पूर्णाङ्क मान वाली संख्या
(भजनफल) जिसके पदों की संख्या है, ऐसी) समान्तर श्रेढि द्वारा गुणित प्रथम किस्त से मिलाने पर
प्राप्त होता है । ब्याज वह है जो किस्त की अवधि में उत्पन्न होता है । किस्त की अवधि को प्रथम
किस्त द्वारा विभाजित करने और मन से चुनी हुई ऋण की महत्तम रकम द्वारा गुणित करने पर जो
प्राप्त होता है वह ऋण मुक्त होने का समय है ॥ ७१ ॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
एक मनुष्य ने ५ प्रतिशत प्रतिमाह की दर से ब्याज लगाये जाने वाले ऋण की मुक्ति के लिये
६० को महत्तम रकम चुना तथा ७ प्रथम किस्त चुनी जो उत्तरोत्तर ३/५ माह में होनेवाली किस्तों में ७ द्वारा
बढ़ती चली गई । इस प्रकार, उसने ६०/७ पदों वाली समान्तर श्रेढि के योग को ऋण रूप में चुकाया
तथा उन ७ के अपवर्त्यो ( multiples ) पर लगने वाले ब्याज को भी चुकाया । श्रेढि के योग की
संवादी ऋण रकम को निकालो, चुकाये गये ब्याज को निकालो और बतलाओ कि उस ऋण की मुक्ति
का समय क्या है ? ॥ ७२–७३ १/२ ॥ किसी मनुष्य ने ५ प्रतिशत प्रतिमास ब्याज की दर लगाये जाने
(७१) यह नियम (कई शब्द छूट जाने के कारण) अत्यन्त भ्रमोत्पादक है तथा ७२–७३ १/२
वीं गाथा के उदाहरण हल करने पर स्पष्ट हो जावेगा । यहाँ मूल अथवा किस्त की महत्तम प्राप्य रकम
६० है । यह प्रथम किस्त की रकम ७ द्वारा विभाजित होने पर ६०/७ अथवा ८ ४/७ होती है जिसमें से ८
समान्तर श्रेढि के पदों की संख्या है । ऐसी समान्तर श्रेढि का १ प्रथम पद है, १ प्रचय है और ४/७ अग्र
अथवा ऊपर का भिन्नीय भाग है । उपर्युक्त श्रेढि के योग ३६ को प्रथम किस्त ७ द्वारा गुणितकर ४/७
और ६० के गुणनफल में जोड़ देते हैं । यहाँ ६० महत्तम प्राप्य रकम है । इस प्रकार ३६ × ७ + ४/७ × ६०
= ३०० ४/७ प्राप्त होता है जो ऋण का इष्ट मूलधन है । ३०० ४/७ पर ३/५ माह में ५ प्रतिशत प्रतिमाह की दर
से पूर्ण पर चुकाया गया ब्याज होगा । ऋण मुक्ति की अवधि ( ३/५ ÷ ७ ) × ६० = ३६/७ माह होगी ।

-६. ७८½ ] मिश्रकव्यवहारः [ १७७
केनापि संप्रयुक्ताशीतिः पञ्चकशतप्रयोगेण ।। ७४½ ।।
अष्टाद्यष्टोत्तरतस्तदशीत्यष्टांशगच्छेन । मूलधनं दत्त्वाष्टाद्यष्टोत्तरतो धनस्य मासार्धात् ।। ७५½ ।।
वृद्धिं प्रादान्मूलं वृद्धिश्च विमुक्तिकालश्च । एषां परिमाणं किं विगणय्य सखे समाचक्ष्व ।। ७६½ ।।
एकीकरणसूत्रम्—
वृद्धिसमासं विभजेन्मासफलैक्येन लब्धमिष्टः कालः । कालप्रमाणगुणितस्तदिष्टकालेन संभक्तः ।।
वृद्धिसमासेन हतो मूलसमासेन भाजितो वृद्धिः ।। ७७½ ।।
अत्रोद्देशकः
युक्ता चतुरशतीह द्विकत्रिकपञ्चकचतुष्कशतेन । मासाः पञ्च चतुर्द्वित्रयः प्रयोगैककालः कः ।।७८½।।
इति मिश्रकव्यवहारे वृद्धिविधानं समाप्तम् ।
वाले ऋण की मुक्ति के लिये ८० को महत्तम रकम चुना । इसके साथ, ८ प्रथम किस्त की रकम थी
जो प्रति ½ माह में उत्तरोत्तर ८ द्वारा बढ़ती चली गई । इस प्रकार, उसने समान्तर श्रेढि के योग
को ऋण रूप में चुकाया । इस समान्तर श्रेढि में ८०/८ पदों की संख्या थी। इन ८ के अपवर्त्यो पर
ब्याज भी चुकाया गया । हे मित्र ! श्रेढि के योग की संवादी ऋण की रकम, चुकाया गया ब्याज
और ऋण मुक्ति का समय अच्छी तरह गणना कर निकालो ।। ७३½-७६ ।।
औसत साधारण ब्याज को निकालने के लिये नियम —
( विभिन्न उपार्जित होने वाले ) ब्याजों के योग को ( विभिन्न संवादी ) एक माह के दातव्य
ब्याजों के योग द्वारा विभाजित करने पर परिणामी भजनफल, इष्ट समय होता है । ( काल्पनिक )
समयदर और मूलधनदर के गुणनफउ को इष्ट समय द्वारा विभाजित करते हैं और ( उपार्जित होने
वाले विभिन्न ) ब्याजों के योग द्वारा गुणित करते हैं । प्राप्तफल को विभिन्न दिये गये मूलधनों के
योग द्वारा फिर से विभाजित करते हैं । इससे इष्ट ब्याज दर प्राप्त होती है । ॥ ७७-७७½ ॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
इस प्रश्न में, चार सौ की ४ रकमें अलग-अलग क्रमशः २, ३, ५ और ४ प्रतिशत प्रतिमास की
दर से ५, ४, २ और ३ माहों के लिये ब्याज पर लगाई गईं । औसत साधारण अवधि और ब्याजदर
निकालो ।। ७८½ ।।
इस प्रकार, मिश्रक व्यवहार में वृद्धि विधान नामक प्रकरण समाप्त हुआ ।
( ७७ और ७७½ ) विभिन्न उत्पन्न होने वाले ब्याज वे होते हैं जो अलग-अलग रकमों के, विभिन्न
दरों पर उनकी क्रमवार अवधियों के लिये ब्याज होते हैं ।
प्रतीक रूप से, { (ध₁ × अ₁ × बा₁) / (आ × घा) + (ध₂ × अ₂ × बा₂) / (आ × घा) + ............ } ÷
{ (ध₁ × १ × बा₁) / (आ × घा) + (ध₂ × १ × बा₂) / (आ × घा) + ............ }
= अ_औ अथवा औसत अवधि ;
और [(घा × आ) / अ_औ] × { (ध₁ × अ₁ × बा₁) / (आ × घा) + (ध₂ × अ₂ × बा₂) / (आ × घा) + ............ } ÷
( ध₁ + ध₂ + ............ ) = ब_औ अथवा औसत ब्याज ।

१०८ ] गणितसारसंग्रहः [ ६. ७९½-
प्रक्षेपकुट्टीकारः
इतः परं मिश्रकव्यवहारे प्रक्षेपकुट्टीकारगणितं व्याख्यास्यामः ।
प्रक्षेपकरणमिदं सवर्गविच्छेदनाशयुतिहृतमिश्रः ।
प्रक्षेपगुणकारः कुट्टीकारो बुधैः समुद्दिष्टम् ॥ ७९½ ॥
अत्रोद्देशकः
द्वित्रिचतुष्षड्भागैर्विभाज्यते द्विगुणषष्टिरिह हेम्नाम् ।
भृत्येभ्यो हि चतुर्भ्यो गणकाचक्ष्वाशु मे भागान् ॥ ८०½ ॥
प्रथमस्यांशत्रितयं त्रिगुणोत्तरतश्च पञ्चभिर्भक्तम् ।
दीनाराणां त्रिशतं त्रिषष्टिसहितं क एकांशः ॥ ८१½ ॥
आदाय चाम्बुजानि प्रविश्य सच्छावकोऽथ जिननिलयम् ।
पूजां चकार भक्त्या पूजार्हेभ्यो जिनेन्द्रेभ्यः ॥ ८२½ ॥
वृषभाय चतुर्थांशं षष्ठांशं शिष्टपार्श्वाय । द्वादशमथ जिनपतये त्र्यंशं मुनिसुव्रताय ददौ ॥ ८३½॥
नष्टाष्टकर्मणे जगदिष्टायारिष्टनेमयेऽष्टांशम् । षष्ठघ्नचतुर्भागं भक्त्या जिनशान्तये प्रददौ ॥ ८४½ ॥
कमलान्यशीतिमिश्राण्यायातान्यथ शतानि चत्वारि ।
कुसुमानां भागार्थं कथय प्रक्षेपकाख्यकरणेन ॥ ८५½ ॥
प्रक्षेप कुट्टीकार ( समानुपाती भाग )
इसके पश्चात् हम इस मिश्रक व्यवहार में समानुपाती भाग के गणित का प्रतिपादन करेंगे—
समानुपाती भाग की क्रिया वह है जिसमें दी गई ( समूह वाचक ) राशि पहिले ( विभिन्न
समानुपाती भागों का निरूपण करने वाले ) समान ( साधारण ) हर वाले भिन्नों के अंशों के योग द्वारा
विभाजित की जाती है । ऐसे समान हर वाले भिन्नों के हरों को उच्छेदित कर विचारते नहीं हैं ।
प्राप्त फल को प्रत्येक दशा में क्रमशः इन समानुपाती अंशों द्वारा गुणित करते हैं । इसे बुधजन (विद्वज्जन)
'कुट्टीकार' कहते हैं ॥ ७९½ ॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
इस प्रश्न में १२० स्वर्ण मुद्राएँ ४ नौकरों में क्रमशः १/२, १/३, १/४ और १/६ के भिन्नीय भागों में
बाँटी जाती हैं । हे अंकगणितज्ञ ! मुझे शीघ्र बतलाओ कि उन्हें क्या मिला ? ॥ ८०½ ॥ ३६३ दीनारों
को पाँच व्यक्तियों में बाँटा गया । उनमें से प्रथम को ३ भाग मिले और शेष भाग को उत्तरोत्तर ३
की साधारण निष्पत्ति में बाँटा गया । प्रत्येक का हिस्सा बतलाओ ॥ ८१½ ॥ एक सच्चे श्रावक ने
किसी संख्या के कमल के फूल लिये और जिन मंदिर में जाकर पूज्यनीय जिनेन्द्रों की भक्तिभाव से
पूजा की । उसने वृषभ भगवान् को १/४, १/६ पूज्य पार्श्व भगवान् को, १/१२ जिन पति को, १/३ मुनि सुव्रत
भगवान् को भेंट किये; १/८ भाग आठों कर्मों का नाश करने वाले जगदिष्ट अरिष्टनेमि भगवान् को और
१/६ का १/४ शांति जिन भगवान् को भेंट किये । यदि वह ४८० कमल के फूल इस पूजा के लिये लाया हो
तो इस प्रक्षेप नामक क्रिया द्वारा फूलों का समानुपाती वितरण प्राप्त करो ॥ ८२½-८५½ ॥ ४८० की
( ७९½ ) ८०½ वीं गाथा के प्रश्न को इस नियमानुसार हल करने में हमें १/२, १/३, १/४, १/६ से
६/१२, ४/१२, ३/१२, २/१२ प्राप्त होते हैं । हरों को हटाने के पश्चात्, हमें ६, ४, ३, २ प्राप्त होते हैं । ये
प्रक्षेप अथवा समानुपाती अंश भी कहलाते हैं । इनका योग १५ है, जिसके द्वारा बाँटी जानेवाली रकम

  • ६. ८९½ ] | मिश्रकव्यवहारः | [ १०९
    --- | --- | ---

चत्वारि शतानि सखे युतान्यशीत्या नरैर्विभक्तानि ।
पञ्चभिराचक्ष्व त्वं द्वित्रिचतुःपञ्चषड्गुणितैः ॥ ८६½ ॥
इष्टगुणफलानयनसूत्रम्—
भक्तं रूपैर्मूल्यं गुणगुणितं तेन योजितं प्रक्षेपम् ।
तद्द्रव्यं मूल्यघ्नं क्षेपविभक्तं हि मूल्यं स्यात् ॥ ८७½ ॥
अस्मिन्नर्थे पुनरपि सूत्रम्—
फलगुणकारैर्हत्वा पणान् फलैरेव भागमादाय ।
क्षेपेषु ये गुणाः स्युस्त्रैराशिकः फलं वदेन्मतिमान् ॥ ८८½ ॥
अस्मिन्नर्थे पुनरपि सूत्रम्—
स्वफलहृताः स्वगुणघ्नाः पणास्तु तैर्भवति पूर्ववच्छेषः ।
इष्टफलं निर्दिष्टं त्रैराशिकसाधितं सम्यक् ॥ ८९½ ॥

रकम ५ व्यक्तियों में २, ३, ४, ५ और ६ के अनुपात में विभाजित की गई । हे मित्र ! प्रत्येक के हिस्से में कितनी रकम पड़ी ? ॥ ८६½ ॥
इष्ट गुणफल को प्राप्त करने के लिये नियम—
मूल्यदर

११० ] गणितसारसंग्रहः [ ६. ९०½-
अत्रोद्देशकः
द्वाभ्यां त्रीणि त्रिभिः पञ्च पञ्चभिः सप्त मानकैः ।
दाडिमाम्रकपित्थानां फलानि गणितार्थवित् ॥ ९०½ ॥
कपित्थात् त्रिगुणं ह्याम्रं दाडिमं षड्गुणं भवेत् ।
क्रीत्वानय सखे शीघ्रं त्वं षट्सप्ततिभिः पणैः ॥ ९१½ ॥
दध्याज्यक्षीरघटैर्जिनबिम्बस्याभिषेचनं कृतवान् ।
जिनपुरुषो द्वासप्ततिपलैस्त्रयः पूरिताः कलशाः ॥ ९२½ ॥
द्वात्रिंशत्प्रथमघटे पुनश्चतुर्विंशतिर्द्वितीयघटे ।
षोडश तृतीयकलशे पृथक् पृथक् कथय मे कृत्वा ॥ ९३½ ॥
तेषां दधिघृतपयसां ततश्चतुर्विंशतिर्घृतस्य पलानि ।
षोडश पयःपलानि द्वात्रिंशद् दधिपलानीह ॥ ९४½ ॥
वृत्तिस्त्रयः पुराणाः पुंसश्चारोहकस्य तत्रापि । सर्वेऽपि पञ्चषष्टिः केचिद्भग्ना धनं तेषाम् ॥ ९५½ ॥
संनिहितानां दत्तं लब्धं पुंसा दशैव चैकस्य ।
के संनिहिता भग्नाः के मम संचिन्त्य कथय त्वम् ॥ ९६½ ॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
अनार, आम और कपित्थ क्रमशः २ पण में ३, ३ पण में ५ और ५ पण में ७ की दर से प्राप्य
हैं। हे गणना के सिद्धांतों को जानने वाले मित्र ! ७६ पणों के फल लेकर शीघ्र आओ ताकि आमों की
संख्या कपित्थों की संख्या की तिगुनी हो और अनारों की संख्या ६ गुनी हो ॥ ९०½-९१½ ॥ किसी
जिनानुगामी ने जिन प्रतिमा का दही, घी और दुग्ध से पूरित कलशों द्वारा अभिषेक कराया ।
इनके ७२ पलों द्वारा ३ पात्र भर गये । प्रथम घट में ३२ पल, दूसरे घट में २४ तथा तीसरे में १६
पल पाये गये । इन दधि, घी, दूध मिश्रित पात्रों में मिश्रित द्रव्यों को अलग-अलग ज्ञात और प्राप्त
करो जबकि कुल मिलाकर २४ पल घी, १६ पल दूध और ३२ पल दही है ॥ ९२½-९४½ ॥
एक अश्वारोही सैनिक का वेतन ३ पुराण था । इस दर पर कुल ६५ व्यक्ति नियुक्त थे । उनमें से कुछ
मारे गये और उनके वेतन की रकम रणक्षेत्र में शेष रहनेवाले सैनिकों को दे दी गई । इस प्रकार,
प्रत्येक मनुष्य को १० पुराण प्राप्त हुए । मुझे बतलाओ कि रणक्षेत्र में कितने सैनिक खेत रहे और
कितने जीवित बचे ? ॥ ९५½-९६½ ॥
करते हैं । इस प्रकार हमें २/३ × ६, २/३ × ३, २/३ × १ से क्रमशः ४, २ और २/३ प्राप्त होते हैं । ये समानुपाती
भाग हैं । ८८½ और ८९½ सूत्रों में इन समानुपाती भागों के संबंध में प्रक्षेप की क्रिया का प्रयोग करना
पड़ता है । परन्तु, ८७½ करण नियम में यह क्रिया पूरी तरह वर्णित है ।

[-६. १०१½ ] मिश्रकव्यवहारः [ १११

इष्टरूपाधिकहीनप्रक्षेपककरणसूत्रम्—
पिण्डोऽधिकरूपोनो हीनोत्तररूपसंयुतः शेषात् । प्रक्षेपककरणमतः कर्तव्यं तैर्युता हीनाः ॥ ९७½॥
अत्रोद्देशकः
प्रथमस्यैकांशोऽतो द्विगुणद्विगुणोत्तराद्भजन्ति नराः ।
चत्वारोऽशः कः स्यादेकस्य हि सप्तषष्टिरिह ॥ ९८½ ॥
प्रथमाद्ध्यर्धगुणात् त्रिगुणाद्रूपोत्तराद्विभाज्यन्ते ।
साष्टा सप्ततिरेभिश्चतुर्भीरांशकान् ब्रूहि ॥ ९९½ ॥
प्रथमाद्ध्यर्धगुणाः पञ्चार्धगुणोत्तराणि रूपाणि । पञ्चानां पञ्चाशत्सैका चरणत्रयाभ्यधिका॥१००½॥
प्रथमात्पञ्चार्धगुणारचतुर्गुणोत्तरविहीनभागेन ।
भक्तं नरैश्चतुर्भिः पञ्चदशोनं शतचतुष्कम् ॥ १०१½ ॥

समानुपाती भाग सम्बन्धी नियम, जहाँ मन से चुनी हुई कुछ पूर्णांक राशियों को जोड़ना अथवा घटाना होता है—

दी गई कुल राशि को जोड़ी जाने वाली पूर्णांक राशियों द्वारा ह्रासित किया जाता है, अथवा घटाई जानेवाली पूर्णांक धनात्मक राशियों में मिलाया जाता है । तब इस परिणामी राशि की सहायता से समानुपाती भाग की क्रिया की जाती है, और परिणामी समानुपाती भागों को क्रमशः उनमें जोड़ी जानेवाली पूर्णांक राशियों से मिला दिया जाता है; अथवा, वे उन घटाई जानेवाली पूर्णांक राशियों द्वारा क्रमशः ह्रासित की जाती हैं ॥ ९७½ ॥

उदाहरणार्थ प्रश्न

चार मनुष्यों ने उत्तरोत्तर द्विगुणित समानुपाती भागों में और उत्तरोत्तर द्विगुणित अन्तरों वाले योग में अपने हिस्सों को प्राप्त किया । प्रथम मनुष्य को एक हिस्सा मिला । ६७ बाँटी जाने वाली राशि है । प्रत्येक के हिस्से क्या हैं ? ॥ ९८½ ॥ ७८ की रकम इन चार मनुष्यों में ऐसे समानुपाती भागों में वितरित की जाती है जो उत्तरोत्तर प्रथम से आरम्भ होकर प्रत्येक पूर्ववर्ती से १½ गुणे हैं और ( योग में ) जिनका अन्तर एक से आरम्भ होकर तिगुना वृद्धि रूप है । प्रत्येक के द्वारा प्राप्त भागों के मान बतलाओ । ॥ ९९½ ॥ पाँच मनुष्यों के हिस्से क्रमिकरूपेण प्रथम से आरम्भ होकर प्रत्येक पूर्ववर्ती से १½ गुने हैं, और योग में अन्तर की राशियाँ वे हैं जो उत्तरोत्तर ( पूर्ववर्ती अन्तर ) से २½ गुणी हैं । ५१¾ विभाजित की जाने वाली कुल राशि है । प्रत्येक के द्वारा प्राप्त भागों के मान बतलाओ ॥ १००½ ॥ ४०० ऋण १५ को चार मनुष्यों के बीच ऐसे भागों में विभाजित किया जाता है जो पहिले से आरम्भ होकर प्रत्येक पूर्ववर्ती से २½ गुणे हैं, और जो उन अंतरों द्वारा ह्रासित हैं जो उत्तरोत्तर पूर्ववर्ती अंतर से ४ गुने हैं । विभिन्न भागों के मानों के प्राप्त करो ॥१०१½॥


(९७½) समानुपाती भाग की क्रिया यहाँ ८७½ से ८९½ में दिये गये नियमों में से किसी भी एक के अनुसार की जा सकती है ।

( ९८½ ) हिस्सों में जोड़ी जानेवाली अंतर राशि यहाँ १ है जो दूसरे मनुष्य के संबंध में है । यह दो शेष मनुष्यों में से प्रत्येक के लिये पूर्ववर्ती अंतर की दुगुनी है । यह अंतर दूसरे मनुष्य के लिये स्पष्ट रूप से उल्लिखित नहीं है जैसा कि इस उदाहरण में १ उल्लिखित है । १००½ वीं गाथा और १०१½ वीं गाथा के उदाहरण में भी स्पष्ट उल्लेख नहीं है ।

११२ ] गणितसारसंग्रहः [ ६. १०२½-
समधनार्घानयनतज्ज्येष्ठधनसंख्यानयनसूत्रम्—
ज्येष्ठधनं सैकं स्यात् स्वविक्रयेऽन्त्यार्घगुणमपैकं तत् ।
क्रयणे ज्येष्ठानयनं समानयेत् करणविपरीतात् ॥ १०२½ ॥
अत्रोद्देशकः
द्वावष्टौ षट्त्रिंशन्मूलं नृणां षडेव चरमार्घः । एकार्घेण क्रीत्वा विक्रीय च समधना जाताः ॥१०३½॥
सार्धैकमर्धमर्धद्वयं च संगृह्य ते त्रयः पुरुषाः ।
क्रयविक्रयौ च कृत्वा षड्भिःपश्चार्घात्समधना जाताः ॥ १०४½ ॥
( व्यापार में लगाई गई ) सबसे ऊँची रकम ज्येष्ठ धन का मान तथा बेचने की तुल्य रकमें
उत्पन्न करने वाली कीमतों के मान को निकालने के लिये नियम—
लगाया गया सबसे बड़ा धन, १ में मिलाने पर ( बेची जाने वाली ) वस्तु के विक्रय की
दर हो जाता है । वही ( बेचने की दर ) जब शेष वस्तु की ( दी गई ) बेचने की कीमत द्वारा
गुणित होकर एक द्वारा हासित की जाती है तब खरीदने की दर उत्पन्न होती है। इस विधि को
विपर्यसित ( उल्टा ) करने पर कारबार में लगाया गया सबसे बड़ा धन निकाला जा सकता है ॥१०२½॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
तीन मनुष्यों ने क्रमशः २, ८ और ३६ रकमें लगाईं । ६ वह कीमत है जिस पर शेष वस्तुएं
बेची जाती हैं । उसी दर पर खरीद कर और बेच कर वे तुल्य धन वाले बन जाते हैं । खरीद और
बेचने की कीमतों को निकालो ॥ १०३½ ॥ उन्हीं तीन मनुष्यों ने क्रमशः १½, ½ और २½ धनों को
व्यापार में लगाया और उन्हीं कीमतों पर उसी वस्तु का क्रय और विक्रय किया । अंत में, शेष को
६ द्वारा निरूपित राशि में बेचने पर वे समान धन वाले बन गये । खरीदने और बेचने के दामों को
निकालो ॥ १०४½ ॥ समान धन वाली राशि ४१ है । जिस कीमत पर अन्त में शेष वस्तुएं बेची
१०२½ ) इस नियम पर किये जानेवाले प्रश्नों में, विभिन्न मूल रकमों से किसी साधारण दर पर कोई
वस्तु खरीदी हुई समझ ली जाती है । तब इस तरह खरीदी हुई वस्तु कोई अन्य साधारण दर पर बेची
जाती है । व्यापार में लगाये गये धन की इकाई में बेची जाने के लिये पर्याप्त न होने के कारण जितनी
वस्तु की मात्रा बच रहती है वह यहाँ पर 'शेष' कहलाती है । जिस कीमत पर यह 'शेष' बेची जाती है
उसे अवशिष्ट-मूल्य ( अंत्यार्घ ) कहते हैं । प्रतीक रूपसे, मानलो अ, अ + ब और अ + ब + स मूलधन
हैं । यहाँ अन्तिम ( अ + ब + स ) ज्येष्ठधन अर्थात् सबसे बड़ा धन है । मानलो प चरमार्घ ( अन्त्यार्घ )
अथवा अवशिष्ट-मूल्य है; तब, इस नियमानुसार अ + ब + स + १ = बेचने की दर; और ( अ + ब +
स + १ ) प - १ = खरीदने की दर होती हैं । यह सरलतापूर्वक दिखलाया जा सकता है कि वस्तु को
बेचने की दर पर और शेष को अवशिष्ट-मूल्य पर बेचने से जो रकमें प्राप्त होती हैं उनका योग प्रत्येक
दशा में एकसा होता है ।
यह आलोकनीय है कि खरीदने की दर, इस नियम पर आश्रित प्रश्नों में, समधन अथवा समान
विक्रयोदय ( बिक्री की रकमो ) के मान के समान होती है ।

-६. १०९½ ] मिश्रकव्यवहारः [ ११३
चत्वारिंशत् सैका समधनसंख्या भवेच्च चरमार्घः ।
आचक्ष्व गणक शीघ्रं ज्येष्ठधनं किं च कानि मूलानि ॥ १०५½ ॥
समधनसंख्या पञ्चत्रिंशद्भवन्ति यत्र दीनाराः ।
चत्वारश्चरमार्थो ज्येष्ठधनं किं च गणक कथय त्वम् ॥ १०६½ ॥
चरमार्घभिन्नजातौ समधनार्घानयनसूत्रम्—
तुल्यापच्छेदधनान्त्यार्घार्भ्यां विक्रयक्रयार्थी प्राग्वत् ।
छेदच्छेदकृतिघ्नावनुपातात् समधनानि भिन्नेऽन्त्यार्धे ॥ १०७½ ॥
अर्धत्रिपादभागा धनानि षट्पञ्चमांशकाश्चरमार्घः ।
एकार्घेण क्रीत्वा विक्रीय च समधना जाताः ॥ १०८½ ॥
पुनरपि अन्त्यार्धे भिन्ने सति समधनानयनसूत्रम्—
ज्येष्ठांशाद्विद्विरहतिः सान्त्यहरा विक्रयोऽन्त्यमूल्यघ्नः ।
नैकोद्वयखिलहरघ्नः स्यात्क्रयसंख्यानुपातोऽथ ॥ १०९½ ॥
जाती हैं वह ६ है । हे अंकगणितज्ञ ! मुझे शीघ्र बतलाओ कि कौन सी सबसे ऊंची लगाई गई रकम
है और विभिन्न अन्य रकमें कौन-कौन हैं ? ॥ १०५½ ॥ उस दशा में जब कि ३५ दीनार समान धन
राशि है, और ४ वह कीमत है जिस पर शेष वस्तुएं बेची जाती हैं, हे गणितज्ञ ! मुझे बतलाओ कि
सबसे ऊंची लगाई जाने वाली रकम क्या है ? ॥ १०६½ ॥
जब अवशिष्ट-कीमत ( अन्त्य अर्घ ) भिन्नीय रूप में हों तब समान बेचने की रकमें उत्पन्न
करने वालो कीमतों के मान निकालने के लिये नियम—
अवशिष्ट-कीमत ( अन्त्य अर्घ ) भिन्नीय होने पर बेचने और खरीदने की दरों को पहिले की
भाँति प्राप्त करते हैं जब कि लगाई गई रकमों और अवशिष्ट-कीमत को समान हर वाला बना कर
उपयोग में लाते हैं । यह हर इस समय उपेक्षित कर दिया जाता है । तब इष्ट बेचने और खरीदने
की दरों को प्राप्त करने के लिये इष्ट बेचने और खरीदने की दरों को इस हर और हर के वर्ग द्वारा
गुणित करते हैं । तब समान विक्रयोदय ( बेचने की रकमों ) को त्रैराशिक के नियम द्वारा प्राप्त
करते हैं ॥ १०७½ ॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
किसी व्यापार में ½, ¾, ⅚ तीन व्यक्तियों द्वारा लगाई गई रकमें हैं। अवशिष्ट-कीमत
( अन्त्यार्घ ) ६/५ है। उन्हीं कीमतों पर खरीदने और बेचने पर वे समान धन राशि वाले बन जाते हैं।
बेचने की कीमत और खरीदने की कीमत तथा समान विक्रय-धन निकालो ॥ १०८½ ॥
जब अवशिष्ट-कीमत ( अन्त्यार्घ ) भिन्नीय हो तब समान विक्रयोदय ( बेचने की रकमों ) को
निकालने के लिये दूसरा नियम—
सबसे बड़े अंश, दो और ( लगाई गई मूल रकमों के प्राप्य ) हरों का संतत गुणनफल जब अव-
शिष्ट-मूल्य के मान के हर में जोड़ा जाता है तब बेचने की दर उत्पन्न होती है । जब इसे अवशिष्ट-मूल्य
( अन्त्यार्घ ) से गुणित कर और १ द्वारा हासित कर और फिर उत्तरोत्तर दो तथा समस्त हरों द्वारा
गुणित किया जाता है, तब खरीदने की दर प्राप्त होती है। तत्पश्चात्, त्रैराशिक की सहायता से
बेचने की रकमों ( sale-proceeds ) का साधारण मान प्राप्त होता है ॥ १०९½ ॥
१०५½ ) यहाँ आलोचनीय है कि इस नियमानुसार केवल सबसे बड़ी रकम निकाली जाती है ।
अन्य रकमें मन से चुन ली जाती हैं, ताकि वे सबसे बड़ी रकम से छोटी हों ।
ग० सा० सं०-१५

] जो कि इस दी गई उपांतिम राशि से संयवित (associated) है । सब विभिन्न दी गई राशियों -> wait, "संयवित" or "संयुत"?
Look at line 25: संयवित -> wait, letter is सं, then य, then वि or चि? No, सं य वि त? Wait, let's zoom in on line 25:
"संयवित" -> wait, सं य वि त? Or संबंधित?
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स with anusvara: सं
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स + anusvara (सं)
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स with anusvara (सं)
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११५३or११५ १/२? Let's look at the header: -६. ११५३ ]or-६. ११५ १/२ ]? Ah, it's -६. ११५३ ]or-६. ११५ १/२ ]? Let's look at the fraction: ११५with a horizontal line and२below. Yes,११५ १/२` (115 1/2).

  • Let's look at the verse number: ११५३ or ११५ १/२? It's ११५३ or ११५ १/२? It's ११५३ or ११५ १/२? Let's write ११५३ or ११५ १/२? Let's write ११५३ or ११५ १/२? Let's write ११५३ or ११५ १/२? Let's write ११५३ or ११५ १/२? Let's write ११५३ or ११५ १/२? Let's write ११५३ or ११५ १/२? Let's write ११५३ or ११५ १/२? Let's write `१

११६ ] गणितसारसंग्रहः [ -६. ११५½
अन्तिम अयुग्म स्थिति क्रम वाले अल्पतम शेष में जोड़कर परिणामी योगफल को ऊपर की भाजन श्रृंखला
के अन्तिम भाजक द्वारा विभाजित करने के पश्चात् प्राप्त संख्या को रखना चाहिये । इस प्रकार 'इस बाद
वाचक मान' को निकालना इष्ट होता है । अब इस नियम के अनुसार हम पहिले राशि अथवा समूह-
वाचक संख्या ६३ को छेद अथवा भाजक २३ द्वारा भाजित करते हैं, और तब हम जिस प्रकार दो
संख्याओं का महत्तम समापवर्त्य निकालते हैं उसी प्रकार की भाग विधि को यहाँ जारी रखते हैं ।
२३ ) ६३ ( २ यहाँ प्रथम भजनफल २ को उपेक्षित कर दिया
४६ १ जाता है; अन्य भजनफल बाजू के स्तम्भ में एक पंक्ति में
१७ ) २३ ( १ २ एक के नीचे एक लिखे गये हैं । अब हमें एक ऐसी
१७ १ संख्या चुनना पड़ती है जो जब अन्तिम शेष १ के द्वारा
६ ) १७ ( २ ४ गुणित की जाती है, और फिर ७ में जोड़ी जाती है, तो
१२ वह अन्तिम भाजक १ के द्वारा भाजन योग्य होती है ।
५ ) ६ ( १ इसलिये, हम १ को चुनते हैं, जो श्रृंखला में अन्तिम अंक
५ के नीचे लिखा हुआ है । इस चुनी हुई संख्या के नीचे,
१ ) ५ । ४ फिरसे चुनी हुई संख्या की सहायता से, उपर्युक्त भाग में
४ प्राप्त भजनफल लिखा जाता है । इस प्रकार हमें बाजू में
१ प्रथम स्तम्भ के अंकों में श्रृंखला अथवा वल्लिका प्राप्त
यहाँ हम पाँचवें शेष के साथ ही हो जाती है । तब हम श्रृंखला के नीचे उप अन्तिम अंक
भाग रोक देते हैं, क्योंकि वह भाजन अर्थात् १ को लिखकर उसके ऊपर के अंक ४ द्वारा गुणित
की श्रेणियों में अयुग्म स्थिति क्रम वाला करते हैं, और ८ जोड़ते हैं । यह ८, श्रृंखला की अंतिम
अल्पतम शेष है । संख्या है । परिणामी १२ इस तरह लिख दिया जाता है
१ — ५१ ताकि वह ४ के संवादी स्थान में हो । तत्पश्चात् इस १२ को
२ — ३८ वल्लिका श्रृंखला में उसके ऊपर के अंक १ द्वारा गुणित करते
१ — १३ हैं और १ जोड़ने पर (जो कि उसके उसी प्रकार नीचे है)
४ — १२ हमें १३ एक के संवादी स्थान में प्राप्त होता है । इसी
१ प्रकार, क्रिया को जारी रखकर हमें ३८ और ५१ भी प्राप्त
८
होते हैं जो २ और १ के संवादी स्थान में प्राप्त किये जाते हैं। इस ५१ को २३ द्वारा भाजित किया
जाता है; और शेष ५ एक गुच्छे में फलों की अल्पतम संख्या दृष्टिगत होती है । निम्नलिखित बीजीय
निरूपण द्वारा इस नियम का मूलभूत सिद्धान्त ( rationale ) स्पष्ट हो जावेगा—
( वा क + ब ) / आ = ख ( जो एक पूर्णांक है ) = फ₁ क + प₁, जहाँ प₁ = [ ( वा - आफ₁ ) क + ब ] / आ
∴ क = ( आ प₁ - ब ) / र₁, ( जहाँ र₁ = वा - आफ, जो प्रथम शेष है ) = फ₂ प₁ + प₂, जहाँ प₂
= ( र₂ प₁ - ब ) / र₁, और फ₂ दूसरा भजनफल है तथा र₂ दूसरा शेष है ।
इसलिये, प₁ = ( र₁ प₂ + ब ) / र₂ = फ₃ प₂ + प₃, जहाँ प₃ = ( र₃ प₂ + ब ) / र₂ और फ₃ तीसरा
भजनफल तथा र₃ तीसरा शेष है ।

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-६. ११५३] मिश्रकव्यवहारः [ ११७
के मिश्रित प्रश्न के हल के लिये इष्ट लता समान अंकों की शृङ्खला प्राप्त की जाती है । यह शृङ्खला
पहिले की भाँति नीचे से ऊपर की ओर बर्त्ती जाती है और, पहिले की तरह, परिणामी संख्या को इस
इसी तरह, प₂ = (र₂ प₃ - ब) / र₃ = फ४ प₃ + प४, जहाँ प४ = (र४ प₃ - ब) / र₃ है ; प₃ = (र₃ प४ + ब) / र४
= फ५ प४ + प५, जहाँ प५ = (र५ प४ + ब) / र४ है । इस प्रकार हमें निम्नलिखित सम्बन्ध प्राप्त होते हैं -
क = फ₂ प₁ + प₂ ; प₁ = फ₃ प₂ + प₃ ; प₂ = फ४ प₃ + प४ ; प₃ = फ५ प४ + प५ ;
प४ का मान इस तरह चुनते हैं ताकि (र५ प४ + ब) / र४ ( जो कि ऊपर बतलाए अनुसार प५ का मान
है ), एक पूर्णांक बन जावे । इस प्रकार, शृंखला फ₂, फ₃, फ४, प

११८ ] गणितसारसंग्रहः [ ६. ११५½-
अन्तिम भाजन शृङ्खला के प्रथम भाजक द्वारा विभाजित करते हैं । ( इस क्रिया में प्राप्त ) शेष को
(अधिक बड़े समूह वाचक मान सम्बन्धी) भाजक द्वारा गुणित करते हैं, और परिणामी गुणनफल में इस
अधिकबड़े समूह वाचक मान को जोड़ देते हैं । ( इस प्रकार दी गई समूह संख्या के इष्ट गुणक का
मान प्राप्त किया जाता है, जो दो विचाराधीन विशिष्ट विभाजनों का समाधान करता है ) ॥११५½॥
इस विधि का मूल भूत सिद्धान्त ( rationale ) निम्नलिखित विमर्श से स्पष्ट हो जावेगा—
( १ ) (बा₁क + व₁) / आ₁ पूर्णांक है; ( २ ) (बा₂क + व₂) / आ₂ पूर्णांक है; और ( ३ ) (बा₃क + व₃) / आ₃ पूर्णांक है ।
( १ ) में मानलो क का अल्पतम मान = स₁ है ।
( २ ) में मानलो क का अल्पतम मान = स₂ है ।
( ३ ) में मानलो क का अल्पतम मान = स₃ है ।
( ४ ) जब (१) और (२) दोनों का समाधान करना पड़ता है, तब दआ₁ + स₁ को क्षआ₂

  • स₂ के तुल्य होना पड़ता है, ताकि स₁ - स₂ = क्षआ₂ - दआ₁ हो; अर्थात्, [आ₁द + (स₁ - स₂)] / आ₂
    = क्ष, हो ।
    अज्ञात मानवाली राशियों द और क्ष सहित होने से अनिर्धृत ( indeterminate )
    समीकरण ( ४ ) से, जैसा कि पहले ही सिद्ध किया जा चुका है उसके अनुसार, द के अल्पतम धनात्मक
    पूर्णांक को प्राप्त कर सकते हैं । द के इस मान को आ₁ द्वारा गुणित करने, और तब स₁ में जोड़ने पर
    क का मान प्राप्त होता है जो ( १ ) और ( २ ) का समाधान करता है ।
    मानलो यह त₁ है, और इन दोनों समीकारों का समाधान करने वाला क का और अधिक बड़ा
    मान मानलो त₂ है ।
    ( ५ ) अब, त₁ + नआ₁ = त₂ है,
    ( ६ ) और, त₁ + मआ₂ = त₂ है ।
    ∴ आ₁ / आ₂ = म / न . इस प्रकार, आ₁ = म . प, और आ₂ = न . प, जहाँ आ₁ और आ₂ का
    सबसे बड़ा साधारण गुणनखंड ( मह. समा. ) प है । ∴ म = आ₁ / प , और न = आ₂ / प .
    ( ५ ) अथवा ( ६ ) में इनका मान रखने पर, त₁ + (आ₁ आ₂) / प = त₂ होता है ।
    इससे स्पष्ट है कि क का दूसरा उच्चतर मान जो दो समीकरणों का समाधान करता है वह आ₁
    और आ₂ के लघुत्तम समापवर्त्य को निम्नतर मान में जोड़ने पर प्राप्त होता है ।
    फिर से, मानलो तीनों सभी समीकारों का समाधान करने वाले क का मान व है ।
    तब, व = त₁ + (आ₁ आ₂) / प × र, ( जहाँ र धनात्मक पूर्णांक है ) = ( मानलो ) त₁ + लर और
    व = स₂ + ष आ₃ = त₁ + ल र , ∴ र = (ष आ₃ + स₃ - त₁) / ल होगा ।
    पिछले समीकार में वल्लिका कुट्टीकार के सिद्धान्त का प्रयोग करने पर ष का मान प्राप्त हो जाता

-६. १२०$\frac{१}{२}$ ] मिश्रकव्यवहारः [ ११९
अत्रोद्देशकः
जम्बूजम्बीररम्भाक्रमुकपनसखर्जूरहिन्तालताली-
पुन्नागाम्राद्यनेकद्रुमकुसुमफलैर्नम्रशाखाधिरूढम् ।
भ्राम्यद्भृङ्गाब्जवापीशुकपिककुलनानाध्वनिव्याप्तदिकं
पान्थाः श्रान्ता वनान्तं श्रमनुदममलं ते प्रविष्टाः प्रहृष्टाः ॥ ११६$\frac{१}{२}$ ॥
राशित्रिषष्टिः कदलीफलानां संपीड्य संक्षिप्य च सप्तभिस्तैः ।
पान्थैस्त्रयोविंशतिभिर्विशुद्धा राशेस्त्वमेकस्य वद प्रमाणम् ॥ ११७$\frac{१}{२}$ ॥
राशीन् पुनर्द्वादश दाडिमानां समस्य संक्षिप्य च पञ्चभिस्तैः ।
पान्थैर्नैरैर्विंशतिभिर्निरैकैर्भक्तांस्तथैकस्य वद प्रमाणम् ॥ ११८$\frac{१}{२}$ ॥
दृष्ट्वाम्राशीन् पथिको यथैकत्रि

१२० ] गणितसारसंग्रहः [ ६. १२१½-
दृष्ट्वाम्राशिमपहाय च सप्त पञ्चाष्टकेऽष्टभिः पुनरपि प्रविहाय तस्मात् ।
त्रीणि त्रयोदशभिरुद्धलिते विशुद्धः पान्यैर्वने गणक मे कथयैकराशिम् ॥ १२१½ ॥
द्वाभ्यां त्रिभिश्चतुर्भिः पञ्चभिरेकः कपित्थफलराशिः ।
भक्तो रूपाग्रस्तत्प्रमाणमाचक्ष्व गणितज्ञ ॥ १२२½ ॥
द्वाभ्यामेकस्त्रिभिर्द्वौ च चतुर्भिर्भाजिते त्रयः । चत्वारि पञ्चभिः शेषः को राशिर्वद मे प्रिय ॥१२३½॥
द्वाभ्यामेकस्त्रिभिशुद्धश्चतुर्भिर्भाजिते त्रयः । चत्वारि पञ्चभिः शेषः को राशिर्वद मे प्रिय ॥१२४½॥
द्वाभ्यां निरग्र एकाग्रस्त्रिभिर्नाग्रो विभाजितः । चतुर्भिः पञ्चभिर्भक्तो रूपाग्रो राशिरेष कः ॥१२५½॥
द्वाभ्यामेकस्त्रिभिः शुद्धश्चतुर्भाजिते त्रयः । निरग्रः पञ्चभिर्भक्तः को राशिः कथयाधुना ॥१२६½॥
दृष्ट्वा जम्बूफलानां पथि पथिकजनै राशयस्तत्र राशी
द्वौ त्र्यग्रौ तौ नवानां त्रय इति पुनरेकादशानां विभक्ताः ।
पञ्चाग्रास्ते यतीनां चतुरधिकतराः पञ्च ते सप्तकानां
कुट्टीकारार्थविन्मे कथय गणक संचिन्त्य राशिप्रमाणम् ॥ १२७½ ॥
वनान्तरे दाडिमराशयस्ते पान्यैस्त्रयः सप्तभिरेकशेषाः ।
सप्त त्रिशेषा नवभिर्विभक्ताः पञ्चाष्टभिः के गणक द्विरग्राः ॥ १२८½ ॥
वन में आमों की ढेरियाँ देखने के बाद और उनमें ७ फल निकालने के पश्चात् उन्हें ८ यात्रियों
में बराबर-बराबर बाँट दिया गया । और जब, फिर से, उन्हीं ढेरियों में से ३ फल निकाल लिये गये
तब उन्हें १३ यात्रियों में बाँट दिया गया । दोनों दशाओं में कुछ भी शेष न रहा । हे गणितज्ञ ! इस
केवल एक ढेरी का संख्यात्मक मान (फलों की संख्या) बतलाओ ॥ १२१½ ॥
कपित्थ फलों की केवल एक ढेरी के फलों को २, ३, ४ अथवा ५ मनुष्यों में विभाजित करने
पर प्रत्येक दशा में शेष १ बचता है । हे गणितवेत्ता ! उस ढेरी में फलों की संख्या बतलाओ ॥१२२½॥
जब २ द्वारा भाजित हो तब शेष १ रहता है, जब ३ द्वारा भाजित हो तब शेष २, जब ४ द्वारा
तब शेष ३, जब ५ द्वारा तब शेष ४ है । हे मित्र ! ऐसी ढेरी में कितने फल हैं ? ॥ १२३½ ॥
जब २ द्वारा भाजित हो तब शेष १ है, जब ३ द्वारा तब शेष कुछ नहीं है, जब ४ द्वारा तब
शेष ३ है, जब ५ द्वारा तब शेष ४ है । ढेरी का संख्यात्मक मान बतलाओ ॥ १२४½ ॥
जब २ द्वारा भाजित हो तब शेष कुछ नहीं है, जब ३ द्वारा तब शेष १, जब ४ द्वारा तब शेष
कुछ नहीं है; और जब ५ द्वारा भाजित हो तब शेष १ रहता है । यह राशि क्या है ? ॥ १२५½ ॥
जब २ द्वारा भाजित हो तब शेष १ है, जब ३ द्वारा तब शेष कुछ नहीं है, जब ४ द्वारा तब
शेष ३, और जब ५ द्वारा भाजित हो तब शेष कुछ नहीं है । यह राशि कौन है ? ॥ १२६½ ॥
रास्ते में यात्रियों ने जम्बू फलों की कुछ बराबर ढेरियाँ देखीं । उनमें से २ ढेरियाँ ९ साधुओं
में बराबर-बराबर बाँटने पर ३ फल शेष रहे । फिर से, ३ ढेरियाँ इसी प्रकार ११ व्यक्तियों में बाँटने
पर ५ फल शेष बचे, पुनः ५ ढेरियों को ७ व्यक्तियों में बराबर बाँटने पर शेष ४ फल बचे । हे विभाजन
की कुट्टीकार विधि को जानने वाले अंकगणितज्ञ ! ठीक तरह सोचकर ढेरी का संख्यात्मक मान
बतलाओ ॥ १२७½ ॥

  • वन के अन्तर में अनार की ३ बराबर ढेरियाँ ७ यात्रियों में बराबर बाँट देने पर १ फल शेषफल
    है; ७ ऐसी ढेरियाँ उसो प्रकार ९ में बाँटने पर शेष ३ फल, और पुनः ५ ऐसो ढेरियाँ ८ में बाँट देने
    पर २ फल बचते हैं । हे अंकगणितज्ञ ! प्रत्येक का संख्यात्मक मान बतलाओ ॥ १२८½ ॥

-६. १३०½ ] मिश्रकव्यवहारः [ १२१

भक्ता द्वियुक्ता नवभिस्तु पञ्च युक्ताश्चतुर्भिंश्च षडष्टभिस्तैः ।
पान्थैर्जनैः सप्तभिरेकयुक्ताश्चत्वार एते कथय प्रमाणम् ॥ १२९½ ॥
अग्रशेषविभागमूलानयनसूत्रम्—
शेषांशाग्रवधो युक् स्वाग्रेणान्यस्तदंशकेन गुणः । यावद्भागास्तावद्विच्छेदाः स्युस्तदग्रगुणाः॥१३०½॥
समान फलों की संख्या वाली ५ ढेरियाँ थीं, जिनमें २ फल मिलाने के पश्चात् ९ यात्रियों में
बाँटने पर कुछ न रहा । ६ ऐसी ढेरियों में ४ फल मिलाने के पश्चात् उसी प्रकार ८ में बाँटने पर,
और ४ ढेरियों में १ फल मिलाकर उसी प्रकार ७ में बाँटने पर शेष कुछ न रहा । ढेरी का संख्यात्मक
मान बतलाओ ॥ १२९½ ॥
इच्छानुसार वितरित मूल राशि को निकालने के लिये नियम, जब कि कुछ विशिष्ट ज्ञात राशियों
को हटाने पर शेष को प्राप्त किया जाता है :—
हटाई जाने वाली ( दी गई ) ज्ञात राशि और ( दी गई ज्ञात राशि को दे चुकने पर ) जो
शेष विशिष्ट भिन्नीय भाग बच रहता है उसका भिन्नीय समानुपात—इन दोनों का गुणनफल प्राप्त करो ।
इसके बाद की राशि, इस गुणनफल में पिछले शेष में से निकाली जाने वाली विशिष्ट ज्ञात राशि को
जोड़कर प्राप्त की जाती है । और, इस परिणामी योग को उसी प्रकार के ऊपर कथित शेष के शेष रहने
वाले भिन्नीय समानुपात द्वारा गुणित किया जाता है । यह उतने बार करना पड़ता है जितने कि वितरण
करने पड़ते हैं । तत्पश्चात् इस तरह प्राप्त राशियों के हरों को अलग कर देना चाहिये । हर रहित
राशियों और शेष के ऊपर कथित शेष रहने वाले भिन्नीय समानुपात के उत्तरोत्तर गुणनफलों को ज्ञात
राशि और ( अन्य तत्व, जैसे, अज्ञात राशि का गुणांक ) अपवर्त्य ( तथा भाजक के नाम से वल्लिका
कुट्टीकार के प्रश्न में ) उपयोग में लाते हैं ॥ १३०½ ॥
( १३०½ ) यहाँ हटाई जाने वाली ज्ञात राशि अग्र कहलाती है । अग्र के हटाने के पश्चात् जो
बच रहता है वह 'शेष' कहलाता है । जो दिया अथवा लिया जाता है ऐसे शेष के भिन्न को अग्रांश
कहते हैं, और अग्रांश के दिये अथवा लिये जानेपर जो शेष बच रहता है वह शेषांश अथवा शेष
का शेष रहनेवाला भिन्नीय समानुपात कहलाता है, जैसे, जहाँ क का मान निकालना पड़ता है, और 'अ'
विभाजित हुए भिन्नीय समानुपात ⅓ को लेकर प्रथम विभाजन सम्बन्धी अग्र है, वहाँ (क - अ)/३ अग्रांश है और
( क - अ ) - (क - अ)/३ शेषांश है । १३२½ - १३३½ वीं गाथा के प्रश्न को हल करने पर यह नियम
स्पष्ट हो जावेगा—
यहाँ १ पहिला अग्र है, और ⅓ पहिला अग्रांश है; इसलिये ( १ - ⅓ ) या ⅔ शेषांश है । अब,
अग्र और शेषांश का गुणनफल १ × ⅔ या ⅔ है । इसे दो स्थानों में लिखो, यथा—
⎧ २/३ ⎫
⎩ २/३ ⎭ .................................................( १ )
अब राशियों, ⎧ २/३ ⎫ की पुनरावृत्ति करो; किसी एक राशि में दूसरे अग्र १ को जोड़ दो ।
⎩ २/३ ⎭
तब हमें ⎧ ५/३ ⎫ प्राप्त होता है । दोनों को दूसरे शेषांश अर्थात् १ - ⅓ या ⅔ द्वारागुणित करो, ताकि
⎩ २/३ ⎭
⎧ १०/९ ⎫ प्राप्त हो ।................................................( २ )
⎩ ४/९ ⎭
इन अंकों को लेकर पहिले की तरह तीसरे अग्र १ को जोड़ो जिससे ⎧ १९/९ ⎫ प्राप्त होगा ।
⎩ ४/९ ⎭
ग० सा० सं०-१६

१२२ ] गणितसारसंग्रहः [ ६. १३१½-
अत्रोद्देशकः
आनीतवत्याम्रफलानि पुंसि प्रागेकमादाय पुनस्तदर्धम् ।
गतेऽग्रपुत्रे च तथा जघन्यस्तत्रावशेषार्धमथो तमन्यः ॥ १३१½ ॥
प्रविश्य जैनं भवनं त्रिपूरुषं प्रागेकमभ्यर्च्य जिनस्य पादे¹ ।
शेषत्रिभागं प्रथमेऽनुमाने तथा द्वितीये च तृतीयके तथा ॥ १३२½ ॥
शेषत्रिभागद्वयतश्च शेषत्र्यंशद्वयं चापि ततस्त्रिभागान् ।
कृत्वा चतुर्विंशतितीर्थनाथान् समर्च्चयित्वा गतवान् विशुद्धः ॥ १३३½ ॥
इति मिश्रकव्यवहारे साधारणकुट्टीकारः समाप्तः ।
१. हस्तलिपि में पादौ शब्द है जो यहाँ शुद्ध प्रतीत नहीं होता है । B में पादे के लिये के ज्ञान्
पाठ है ।
उदाहरणार्थ प्रश्न
किसी मनुष्य द्वारा घर पर आम्र फलों को लाने पर उसके बड़े पुत्र ने पहिले एक फल लिया
और तब शेष के आधे लिये । बड़े लड़के के जाने पर, छोटे लड़के ने भी शेष में से उसी प्रकार फल
लिये । ( उसने, तत्पश्चात् , जो शेष रहा उसका आधा लिया ); और अन्य पुत्र ने शेष आधे लिये ।
पिता के द्वारा लाये हुए फलों की संख्या निकालो । ॥ १३१½ ॥ कोई मनुष्य फूल लेकर ऐसे जिन-
मंदिर में गया जो मनुष्य की ऊँचाई से तिगुना ऊँचा था । पहिले उसने इन फूलों में से पूजन में जिन
भगवान् के चरणों में एक फूल चढ़ाया, और तब पूजन में शेष फूलों के एक तिहाई जिन भगवान् की
प्रथम ऊँचाई-माप वाली प्रतिमा के चरणों में भेंट किये । शेष दो तिहाई फूलों में से उसने उसी प्रकार
द्वितीय ऊँचाई-माप वाली प्रतिमा के चरणों में भेंट किये, और तब उसी प्रकार तीसरी ऊँचाई-माप
वाली प्रतिमा के चरणों में भेंट किये । अंत में जो दो तिहाई बचे वे भी तीन बराबर भागों में बाँटे
गये; और इन भागों में से एक-एक भाग आठ-आठ तीर्थंकरों को ( इस प्रकार कुल २४ तीर्थंकरों को )
भेंट करने पर उसके पास एक भी फूल न बचा । बतलाओ उसके पास कितने फूल थे ?
॥ १३२½-१३३½ ॥
इस प्रकार, मिश्रक व्यवहार में, साधारण कुट्टीकार नामक प्रकरण समाप्त हुआ ।
दूसरे शेषांश १ - १/३ या २/३ द्वारा और अन्तिम अंश या १/३ द्वारा गुणित करो जिससे { ३८/८१, ८/८१ } प्राप्त
होगा ।...........................................................( ३)
( १ ), ( २ ), ( ३ ) द्वारा दर्शाये गये भिन्नों की इन तीन राशियों में प्रथम भिन्नों के हरों को
अलग कर देते हैं, और अंश वल्लिका कुट्टीकार में ऋणात्मक अग्र निरूपित करते हैं जहाँ उन राशियों में
दूसरे भिन्नों में से प्रत्येक अंश और हर क्रमशः भाज्य, गुणक और भाजक का निरूपण करते हैं । इस
प्रकार, (२ क - २)/३ पूर्णांक; (४ क - १०)/९ पूर्णांक, और (८ क - ३८)/८१ पूर्णांक प्राप्त होते हैं । इन तीन दशाओं
को समाधानिक करनेवाला क का मान, फूलों की संख्या होती है ।

-६. १३५½ ] मिश्रकव्यवहारः [ १२३
विषमकुट्टीकारः
इतः परं विषमकुट्टीकारं व्याख्यास्यामः । विषमकुट्टीकारस्य सूत्रम्—
मतिसंगुणितौ छेदौ योज्योनत्याज्यसंयुतौ राशिहृतौ ।
भिन्ने कुट्टीकारे गुणकारोऽयं समुद्दिष्टः ॥ १३४½ ॥
अत्रोद्देशकः
राशिः षट्केन हतो दशान्वितो नवहृतो निरवशेषः ।
दशभिर्हीनश्च तथा तद्गुणकौ १ कौ ममाशु संकथय ॥ १३५½ ॥
१. B गुणकारौ ।
विषम कुट्टीकार*
इसके पश्चात् हम विषम कुट्टीकार की व्याख्या करेंगे ।
विषम कुट्टीकार सम्बन्धी नियम :—
दिया हुआ भाजक दो स्थानों में लिख लिया जाता है, और प्रत्येक स्थान में मन से चुनी हुई
संख्या द्वारा गुणित किया जाता है । ( इस प्रश्न में ) जोड़ने के लिये दी गई ( ज्ञात ) राशि इन स्थानों
के किसी एक गुणनफल में से घटाई जाती है । घटाई जाने के लिये दी गई राशि अन्य स्थान में
लिखे हुए गुणनफल में जोड़ दी जाती है । इस प्रकार प्राप्त दोनों राशियाँ ( प्रश्नानुसार विभाजित की
जाने वाली अज्ञात राशियों के ) ज्ञात गुणांक ( गुणक ) द्वारा भाजित की जाती हैं । इस तरह
प्राप्त प्रत्येक भजनफल इष्ट राशि होती है, जो भिन्न कुट्टीकार की रीति में दिये गये गुणक द्वारा गुणित
की जाती है । ॥ १३४½ ॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
कोई राशि ६ द्वारा गुणित होकर, तब १० द्वारा बढ़ाई जाकर और तब ९ द्वारा भाजित होकर
कुछ भी शेष नहीं छोड़ती । इसी प्रकार, ( कोई दूसरी राशि ६ द्वारा गुणित होकर ), तब १० द्वारा
ह्रासित होकर ( और तब ९ द्वारा भाजित होकर ) कुछ शेष नहीं छोड़ती । उन दो राशियों को शीघ्र
बतलाओ ( जो दिये गये गुणक से यहाँ इस प्रकार गुणित की जाती हैं । ) ॥ १३५½ ॥
इस प्रकार, मिश्रक व्यवहार में, विषम कुट्टीकार नामक प्रकरण समाप्त हुआ ।

  • विषम और भिन्न दोनों शब्द कुट्टीकार के संबंध में उपयोग में लाये गये हैं और दोनों के
    स्पष्टतः एक से अर्थ हैं । ये इन नियमों के प्रश्नों में आने वाली भाज्य ( dividend ) राशियों के
    भिन्नीय रूप को निर्देशित करते हैं ।

१२४ ] गणितसारसंग्रहः [ ६०१३६½-
सकलकुट्टीकारः
सकलकुट्टीकारस्य सूत्रम्—
भाज्यच्छेदाग्रशेषैः प्रथमहृतिफलं त्याज्यमन्योन्यभक्तं
न्यस्यान्ते साग्रमूर्ध्वैरुपरिगुणयुतं तैः समानासमाने ।
स्वर्णघ्नं व्याप्तहारौ गुणधनमृणयोश्चाधिकाग्रस्य हारं
हृत्वा हृत्वा तु साग्रान्तरधनमधिकाग्रान्वितं हारघातम् ॥ १३६½ ॥
सकल कुट्टीकार
सकल कुट्टीकार सम्बन्धी नियम :—
विभाजित की जाने वाली अज्ञात राशि के भाज्य गुणक द्वारा अग्रनयनित (carried on) तथा
भाजक और उत्तरोत्तर परिणामी शेषों द्वारा अग्रनयनित भाजनों में प्रथम के भजनफल को
अलग कर दिया जाता है। इस पारस्परिक भाजन द्वारा, जो कि भाजक और शेष के समान हो जाने
तक किया जाता है, अन्य भजनफल प्राप्त किये जाते हैं, जो ऊर्ध्वाधर श्रृंखला में अन्तिम तुल्य शेष और
भाजक के साथ लिखे जाते हैं। इस श्रृंखला के निम्नतम अंक में भाजक द्वारा विभाजित की गई ज्ञात
राशि से प्राप्त शेष को जोड़ना पड़ता है । ( तब, श्रृंखला में इन संख्याओं द्वारा, ) वह योग प्राप्त
करते हैं, जो उत्तरोत्तर निम्नतम संख्या में उसके ठीक ऊपर की दो संख्याओं का गुणनफल जोड़ने पर
प्राप्त होता है । ( यह विधि तब तक की जाती है जब तक कि श्रृंखला का उच्चतम अंक भी क्रिया में
शामिल नहीं हो जाता । ) उसके बाद यह परिणामी योग और प्रश्न में दिया गया भाजक, दो शेषों के
रूप में, अज्ञात राशि के दो मानों को उत्पन्न करता है। इस राशि के मानों को प्रश्न में दिये गये
भाज्य गुणक द्वारा गुणित किया जाता है। इस प्रकार प्राप्त होने वाले दो मान या तो जोड़ी जाने
वाली दी गई ज्ञात राशि से सम्बन्धित रहते हैं अथवा घटाई जाने वाली दी गई ज्ञात राशि से
सम्बन्धित रहते हैं, जब कि ऊपर कथित भजनफलों की श्रृंखला की अंक पंक्ति की संख्या क्रमशः युग्म
अथवा अयुग्म होती है। ( जहाँ दिये गये समूह एक से अधिक प्रकार से बढ़ाये जाने पर अथवा
घटाये जाने पर एक से अधिक अनुपात में वितरित किये जाना होते हैं वहाँ ) अधिक बड़े समूहमान से
सम्बन्धित भाजक ( जिसे ऊपर समझाये अनुसार दो विशिष्ट विभाजनों में से किसी एक के सम्बन्ध में
प्राप्त किया जाता है ) को ऊपर के अनुसार बार-बार छोटे समूह मान से संबंधित भाजक द्वारा भाजित
किया जाता है, ताकि उत्तरोत्तर भजनफलों की लता समान श्रृंखला इस दशा में भी प्राप्त हो सके । इस
श्रृंखला के निम्नतम भजनफल के नीचे इस अंतिम उत्तरोत्तर भाग में अयुग्म स्थिति क्रमवाले अल्पतम
शेष के मन से चुने हुए गुणक को रखा जाता है। फिर इसके नीचे वह संख्या रखी जाती है, जो दो
समूह-मानों के अंतर को ऊपर कथित मन से चुने हुए गुणक से गुणित अयुग्म स्थिति क्रमवाले अल्पतम
शेष के गुणनफल में जोड़नेपर, और तब इस परिणामी योग को ऊपर की भाजन श्रृंखला के अंतिम
भाजक द्वारा भाजित करने पर प्राप्त होती है। इस प्रकार लता सदृश अंकों की श्रृंखला प्राप्त होती है,
जिसकी आवश्यकता इस पिछले प्रकार के प्रश्न के साधन के लिये होती है। यह श्रृंखला नीचे से ऊपर
तक पहिले की भाँति बर्त्ती जाती है, और परिणामी संख्या पहिले को तरह इस अंतिम भाजन श्रृंखला में
प्रथम भाजक द्वारा भाजित की जाती है। इस क्रिया से प्राप्त शेष को अधिक बड़े समूह-मान से सम्ब-
न्धित भाजक द्वारा गुणित किया जाना चाहिये। परिणामी गुणनफल में यह अधिक बड़ा समूहमान जोड़
देना चाहिये । ( इस प्रकार, दिये गये समूहमान के इष्ट गुणक का मान प्राप्त करते हैं ताकि वह
विचाराधीन दो उल्लिखित विभाजनों का समाधान करे ) ॥ १३६½ ॥
( १३६½ ) यह नियम १३७½ वीं गाथा में दिये गये प्रश्न को हल करने पर स्पष्ट हो जावेगा—

-६. १३७½ ] मिश्रकव्यवहारः [ १२५
अत्रोद्देशकः
सप्तोत्तरसप्तत्या युतं शतं योज्यमानमष्टत्रिंशत् । सैकशतद्वयभक्तं को गुणकारो भवेदत्र ॥ १३७½ ॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
अज्ञात गुणनखंड का भाज्य ( dividend ) गुणक १७७ है । २४०, स्व में जोड़े जानेवाले
अथवा घटाये जाने वाले गुणनफल से सम्बन्धित ज्ञात राशि है; पूरी राशि को २०१ द्वारा भाजित
करने पर शेष कुछ नहीं रहता । यहाँ अज्ञात गुणनखण्ड कौन सा है, जिससे की दिया गया भाज्यगुणक
गुणित किया जाना है ? ॥ १३७½ ॥ ३५ और अन्य राशियाँ, जो संख्या में १६ हैं, और उत्तरोत्तर मान
प्रश्न है कि जब (१७७ क ± २४०)/२०१ पूर्णांक है तो क के मान क्या होंगे ? साधारण गुणन खंडों को निरसित
करने पर हमें (५९ क ± ८०)/६७ पूर्णांक प्राप्त होता है । लगातार किये जाने वाले भाग की इष्ट विधि को
निम्नलिखित रूप में कार्यान्वित करते हैं—
६७)५९(० प्रथम भजनफल को अलग कर, अन्य
० १ भजनफल, श्रृंखला में इस प्रकार लिखे जाते हैं—
५९)६७(१ ७ इसके नीचे १ और १ को अग्रिम
५९ २ लिखा जाता है । ये अन्तिम भाजक और शेष
८)५९(७ १ समान होते हैं । यहाँ भी जैसा कि वल्लिका
५६ १ कुट्टीकार में होता है, यह देखने योग्य है कि
३)८(२ १ अन्तिम भाजन में कोई शेष नहीं रहता क्योंकि
६ १ + १३ = १४ २ में १ का पूरा-पूरा भाग चला जाता है । परन्तु
२)३(१ चूँकि, अन्तिम शेष, श्रृंखला के लिये चाहिये,
२ इसलिये वह अन्तिम भजनफल छोटा से छोटा
१)२(१ बनाकर रख दिया जाता है, और अन्तिम
१ संख्या १ में यहाँ, १३ जोड़ते हैं, जो कि ८० में
१
से ६७ का भाग देने पर प्राप्त होता है । इस प्रकार १४ प्राप्त कर, उसे श्रृंखला के अन्त में नीचे
लिख दिया जाता है । इस प्रकार श्रृंखला पूरी हो जाती है । इस श्रृंखला के अंकों के लगातार किये
गये गुणन और जोड़ द्वारा, ( जैसा कि गाथा ११५½ के नोट में पहिले ही समझाया जा चुका है, ) हमें
३९२ प्राप्त होता है । इसे ६७ द्वारा विभाजित किया जाता है । शेष ५७ क का एक मान होता है,
जब कि ८० को श्रृंखला में अंकों की संख्या अयुग्म होने के कारण ऋणात्मक ले लिया जाता है । परन्तु
जब ८० को धनात्मक लिया जाता है, तब क का मान ( ६७-५७ ) अथवा १०
१ — ३९२ होता है । यदि श्रृंखला में अंकों की संख्या युग्म होती है, तो क का प्रथम
७ — ३४५ निकाला हुआ मान धनात्मक अग्र सम्बन्धी होता है । यदि यह मान भाजक में से
२ — ४७ घटाया जाता है तो क का ऋणात्मक अग्र सम्बन्धी मान प्राप्त होता है ।
१ — १६
१ — १५ इस विधि का सिद्धान्त उसी प्रकार है जैसा कि वल्लिका कुट्टीकार के सम्बन्ध
१ में है । परन्तु, उनमें अन्तर यही है कि यहाँ श्रृंखला में दो अन्तिम अंक दूसरी
१४ विधि द्वारा प्राप्त किये जाते हैं । अध्याय ६ की ११५½ वीं गाथा के नियम के नोट