गणितसारसंग्रह (महावीराचार्य - प्रो. लक्ष्मीचन्द्र जैन सविस्तार हिन्दी अनुवाद सटीक)
Ganitasarasangraha of Mahaviracharya with Hindi Translation
महावीराचार्य (अनुवादक: प्रो. एल. सी. जैन) द्वारा
पृष्ठ 177, कुल 421 में से
संदर्भ में पढ़ें-६. १३५½ ] मिश्रकव्यवहारः [ १२३
विषमकुट्टीकारः
इतः परं विषमकुट्टीकारं व्याख्यास्यामः । विषमकुट्टीकारस्य सूत्रम्—
मतिसंगुणितौ छेदौ योज्योनत्याज्यसंयुतौ राशिहृतौ ।
भिन्ने कुट्टीकारे गुणकारोऽयं समुद्दिष्टः ॥ १३४½ ॥
अत्रोद्देशकः
राशिः षट्केन हतो दशान्वितो नवहृतो निरवशेषः ।
दशभिर्हीनश्च तथा तद्गुणकौ १ कौ ममाशु संकथय ॥ १३५½ ॥
१. B गुणकारौ ।
विषम कुट्टीकार*
इसके पश्चात् हम विषम कुट्टीकार की व्याख्या करेंगे ।
विषम कुट्टीकार सम्बन्धी नियम :—
दिया हुआ भाजक दो स्थानों में लिख लिया जाता है, और प्रत्येक स्थान में मन से चुनी हुई
संख्या द्वारा गुणित किया जाता है । ( इस प्रश्न में ) जोड़ने के लिये दी गई ( ज्ञात ) राशि इन स्थानों
के किसी एक गुणनफल में से घटाई जाती है । घटाई जाने के लिये दी गई राशि अन्य स्थान में
लिखे हुए गुणनफल में जोड़ दी जाती है । इस प्रकार प्राप्त दोनों राशियाँ ( प्रश्नानुसार विभाजित की
जाने वाली अज्ञात राशियों के ) ज्ञात गुणांक ( गुणक ) द्वारा भाजित की जाती हैं । इस तरह
प्राप्त प्रत्येक भजनफल इष्ट राशि होती है, जो भिन्न कुट्टीकार की रीति में दिये गये गुणक द्वारा गुणित
की जाती है । ॥ १३४½ ॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
कोई राशि ६ द्वारा गुणित होकर, तब १० द्वारा बढ़ाई जाकर और तब ९ द्वारा भाजित होकर
कुछ भी शेष नहीं छोड़ती । इसी प्रकार, ( कोई दूसरी राशि ६ द्वारा गुणित होकर ), तब १० द्वारा
ह्रासित होकर ( और तब ९ द्वारा भाजित होकर ) कुछ शेष नहीं छोड़ती । उन दो राशियों को शीघ्र
बतलाओ ( जो दिये गये गुणक से यहाँ इस प्रकार गुणित की जाती हैं । ) ॥ १३५½ ॥
इस प्रकार, मिश्रक व्यवहार में, विषम कुट्टीकार नामक प्रकरण समाप्त हुआ ।
- विषम और भिन्न दोनों शब्द कुट्टीकार के संबंध में उपयोग में लाये गये हैं और दोनों के
स्पष्टतः एक से अर्थ हैं । ये इन नियमों के प्रश्नों में आने वाली भाज्य ( dividend ) राशियों के
भिन्नीय रूप को निर्देशित करते हैं ।