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गणितसारसंग्रह (महावीराचार्य - प्रो. लक्ष्मीचन्द्र जैन सविस्तार हिन्दी अनुवाद सटीक)

गणितसारसंग्रह (महावीराचार्य - प्रो. लक्ष्मीचन्द्र जैन सविस्तार हिन्दी अनुवाद सटीक)

Ganitasarasangraha of Mahaviracharya with Hindi Translation

महावीराचार्य (अनुवादक: प्रो. एल. सी. जैन) द्वारा

DevanagariHindipublished421 पृष्ठ

पृष्ठ 170, कुल 421 में से

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पृष्ठ 170

११६ ] गणितसारसंग्रहः [ -६. ११५½
अन्तिम अयुग्म स्थिति क्रम वाले अल्पतम शेष में जोड़कर परिणामी योगफल को ऊपर की भाजन श्रृंखला
के अन्तिम भाजक द्वारा विभाजित करने के पश्चात् प्राप्त संख्या को रखना चाहिये । इस प्रकार 'इस बाद
वाचक मान' को निकालना इष्ट होता है । अब इस नियम के अनुसार हम पहिले राशि अथवा समूह-
वाचक संख्या ६३ को छेद अथवा भाजक २३ द्वारा भाजित करते हैं, और तब हम जिस प्रकार दो
संख्याओं का महत्तम समापवर्त्य निकालते हैं उसी प्रकार की भाग विधि को यहाँ जारी रखते हैं ।
२३ ) ६३ ( २ यहाँ प्रथम भजनफल २ को उपेक्षित कर दिया
४६ १ जाता है; अन्य भजनफल बाजू के स्तम्भ में एक पंक्ति में
१७ ) २३ ( १ २ एक के नीचे एक लिखे गये हैं । अब हमें एक ऐसी
१७ १ संख्या चुनना पड़ती है जो जब अन्तिम शेष १ के द्वारा
६ ) १७ ( २ ४ गुणित की जाती है, और फिर ७ में जोड़ी जाती है, तो
१२ वह अन्तिम भाजक १ के द्वारा भाजन योग्य होती है ।
५ ) ६ ( १ इसलिये, हम १ को चुनते हैं, जो श्रृंखला में अन्तिम अंक
५ के नीचे लिखा हुआ है । इस चुनी हुई संख्या के नीचे,
१ ) ५ । ४ फिरसे चुनी हुई संख्या की सहायता से, उपर्युक्त भाग में
४ प्राप्त भजनफल लिखा जाता है । इस प्रकार हमें बाजू में
१ प्रथम स्तम्भ के अंकों में श्रृंखला अथवा वल्लिका प्राप्त
यहाँ हम पाँचवें शेष के साथ ही हो जाती है । तब हम श्रृंखला के नीचे उप अन्तिम अंक
भाग रोक देते हैं, क्योंकि वह भाजन अर्थात् १ को लिखकर उसके ऊपर के अंक ४ द्वारा गुणित
की श्रेणियों में अयुग्म स्थिति क्रम वाला करते हैं, और ८ जोड़ते हैं । यह ८, श्रृंखला की अंतिम
अल्पतम शेष है । संख्या है । परिणामी १२ इस तरह लिख दिया जाता है
१ — ५१ ताकि वह ४ के संवादी स्थान में हो । तत्पश्चात् इस १२ को
२ — ३८ वल्लिका श्रृंखला में उसके ऊपर के अंक १ द्वारा गुणित करते
१ — १३ हैं और १ जोड़ने पर (जो कि उसके उसी प्रकार नीचे है)
४ — १२ हमें १३ एक के संवादी स्थान में प्राप्त होता है । इसी
१ प्रकार, क्रिया को जारी रखकर हमें ३८ और ५१ भी प्राप्त
८
होते हैं जो २ और १ के संवादी स्थान में प्राप्त किये जाते हैं। इस ५१ को २३ द्वारा भाजित किया
जाता है; और शेष ५ एक गुच्छे में फलों की अल्पतम संख्या दृष्टिगत होती है । निम्नलिखित बीजीय
निरूपण द्वारा इस नियम का मूलभूत सिद्धान्त ( rationale ) स्पष्ट हो जावेगा—
( वा क + ब ) / आ = ख ( जो एक पूर्णांक है ) = फ₁ क + प₁, जहाँ प₁ = [ ( वा - आफ₁ ) क + ब ] / आ
∴ क = ( आ प₁ - ब ) / र₁, ( जहाँ र₁ = वा - आफ, जो प्रथम शेष है ) = फ₂ प₁ + प₂, जहाँ प₂
= ( र₂ प₁ - ब ) / र₁, और फ₂ दूसरा भजनफल है तथा र₂ दूसरा शेष है ।
इसलिये, प₁ = ( र₁ प₂ + ब ) / र₂ = फ₃ प₂ + प₃, जहाँ प₃ = ( र₃ प₂ + ब ) / र₂ और फ₃ तीसरा
भजनफल तथा र₃ तीसरा शेष है ।