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गणितसारसंग्रह (महावीराचार्य - प्रो. लक्ष्मीचन्द्र जैन सविस्तार हिन्दी अनुवाद सटीक)

गणितसारसंग्रह (महावीराचार्य - प्रो. लक्ष्मीचन्द्र जैन सविस्तार हिन्दी अनुवाद सटीक)

Ganitasarasangraha of Mahaviracharya with Hindi Translation

महावीराचार्य (अनुवादक: प्रो. एल. सी. जैन) द्वारा

DevanagariHindipublished421 पृष्ठ

पृष्ठ 166, कुल 421 में से

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पृष्ठ 166

११२ ] गणितसारसंग्रहः [ ६. १०२½-
समधनार्घानयनतज्ज्येष्ठधनसंख्यानयनसूत्रम्—
ज्येष्ठधनं सैकं स्यात् स्वविक्रयेऽन्त्यार्घगुणमपैकं तत् ।
क्रयणे ज्येष्ठानयनं समानयेत् करणविपरीतात् ॥ १०२½ ॥
अत्रोद्देशकः
द्वावष्टौ षट्त्रिंशन्मूलं नृणां षडेव चरमार्घः । एकार्घेण क्रीत्वा विक्रीय च समधना जाताः ॥१०३½॥
सार्धैकमर्धमर्धद्वयं च संगृह्य ते त्रयः पुरुषाः ।
क्रयविक्रयौ च कृत्वा षड्भिःपश्चार्घात्समधना जाताः ॥ १०४½ ॥
( व्यापार में लगाई गई ) सबसे ऊँची रकम ज्येष्ठ धन का मान तथा बेचने की तुल्य रकमें
उत्पन्न करने वाली कीमतों के मान को निकालने के लिये नियम—
लगाया गया सबसे बड़ा धन, १ में मिलाने पर ( बेची जाने वाली ) वस्तु के विक्रय की
दर हो जाता है । वही ( बेचने की दर ) जब शेष वस्तु की ( दी गई ) बेचने की कीमत द्वारा
गुणित होकर एक द्वारा हासित की जाती है तब खरीदने की दर उत्पन्न होती है। इस विधि को
विपर्यसित ( उल्टा ) करने पर कारबार में लगाया गया सबसे बड़ा धन निकाला जा सकता है ॥१०२½॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
तीन मनुष्यों ने क्रमशः २, ८ और ३६ रकमें लगाईं । ६ वह कीमत है जिस पर शेष वस्तुएं
बेची जाती हैं । उसी दर पर खरीद कर और बेच कर वे तुल्य धन वाले बन जाते हैं । खरीद और
बेचने की कीमतों को निकालो ॥ १०३½ ॥ उन्हीं तीन मनुष्यों ने क्रमशः १½, ½ और २½ धनों को
व्यापार में लगाया और उन्हीं कीमतों पर उसी वस्तु का क्रय और विक्रय किया । अंत में, शेष को
६ द्वारा निरूपित राशि में बेचने पर वे समान धन वाले बन गये । खरीदने और बेचने के दामों को
निकालो ॥ १०४½ ॥ समान धन वाली राशि ४१ है । जिस कीमत पर अन्त में शेष वस्तुएं बेची
१०२½ ) इस नियम पर किये जानेवाले प्रश्नों में, विभिन्न मूल रकमों से किसी साधारण दर पर कोई
वस्तु खरीदी हुई समझ ली जाती है । तब इस तरह खरीदी हुई वस्तु कोई अन्य साधारण दर पर बेची
जाती है । व्यापार में लगाये गये धन की इकाई में बेची जाने के लिये पर्याप्त न होने के कारण जितनी
वस्तु की मात्रा बच रहती है वह यहाँ पर 'शेष' कहलाती है । जिस कीमत पर यह 'शेष' बेची जाती है
उसे अवशिष्ट-मूल्य ( अंत्यार्घ ) कहते हैं । प्रतीक रूपसे, मानलो अ, अ + ब और अ + ब + स मूलधन
हैं । यहाँ अन्तिम ( अ + ब + स ) ज्येष्ठधन अर्थात् सबसे बड़ा धन है । मानलो प चरमार्घ ( अन्त्यार्घ )
अथवा अवशिष्ट-मूल्य है; तब, इस नियमानुसार अ + ब + स + १ = बेचने की दर; और ( अ + ब +
स + १ ) प - १ = खरीदने की दर होती हैं । यह सरलतापूर्वक दिखलाया जा सकता है कि वस्तु को
बेचने की दर पर और शेष को अवशिष्ट-मूल्य पर बेचने से जो रकमें प्राप्त होती हैं उनका योग प्रत्येक
दशा में एकसा होता है ।
यह आलोकनीय है कि खरीदने की दर, इस नियम पर आश्रित प्रश्नों में, समधन अथवा समान
विक्रयोदय ( बिक्री की रकमो ) के मान के समान होती है ।