गणितसारसंग्रह (महावीराचार्य - प्रो. लक्ष्मीचन्द्र जैन सविस्तार हिन्दी अनुवाद सटीक)
Ganitasarasangraha of Mahaviracharya with Hindi Translation
महावीराचार्य (अनुवादक: प्रो. एल. सी. जैन) द्वारा
पृष्ठ 167, कुल 421 में से
संदर्भ में पढ़ें-६. १०९½ ] मिश्रकव्यवहारः [ ११३
चत्वारिंशत् सैका समधनसंख्या भवेच्च चरमार्घः ।
आचक्ष्व गणक शीघ्रं ज्येष्ठधनं किं च कानि मूलानि ॥ १०५½ ॥
समधनसंख्या पञ्चत्रिंशद्भवन्ति यत्र दीनाराः ।
चत्वारश्चरमार्थो ज्येष्ठधनं किं च गणक कथय त्वम् ॥ १०६½ ॥
चरमार्घभिन्नजातौ समधनार्घानयनसूत्रम्—
तुल्यापच्छेदधनान्त्यार्घार्भ्यां विक्रयक्रयार्थी प्राग्वत् ।
छेदच्छेदकृतिघ्नावनुपातात् समधनानि भिन्नेऽन्त्यार्धे ॥ १०७½ ॥
अर्धत्रिपादभागा धनानि षट्पञ्चमांशकाश्चरमार्घः ।
एकार्घेण क्रीत्वा विक्रीय च समधना जाताः ॥ १०८½ ॥
पुनरपि अन्त्यार्धे भिन्ने सति समधनानयनसूत्रम्—
ज्येष्ठांशाद्विद्विरहतिः सान्त्यहरा विक्रयोऽन्त्यमूल्यघ्नः ।
नैकोद्वयखिलहरघ्नः स्यात्क्रयसंख्यानुपातोऽथ ॥ १०९½ ॥
जाती हैं वह ६ है । हे अंकगणितज्ञ ! मुझे शीघ्र बतलाओ कि कौन सी सबसे ऊंची लगाई गई रकम
है और विभिन्न अन्य रकमें कौन-कौन हैं ? ॥ १०५½ ॥ उस दशा में जब कि ३५ दीनार समान धन
राशि है, और ४ वह कीमत है जिस पर शेष वस्तुएं बेची जाती हैं, हे गणितज्ञ ! मुझे बतलाओ कि
सबसे ऊंची लगाई जाने वाली रकम क्या है ? ॥ १०६½ ॥
जब अवशिष्ट-कीमत ( अन्त्य अर्घ ) भिन्नीय रूप में हों तब समान बेचने की रकमें उत्पन्न
करने वालो कीमतों के मान निकालने के लिये नियम—
अवशिष्ट-कीमत ( अन्त्य अर्घ ) भिन्नीय होने पर बेचने और खरीदने की दरों को पहिले की
भाँति प्राप्त करते हैं जब कि लगाई गई रकमों और अवशिष्ट-कीमत को समान हर वाला बना कर
उपयोग में लाते हैं । यह हर इस समय उपेक्षित कर दिया जाता है । तब इष्ट बेचने और खरीदने
की दरों को प्राप्त करने के लिये इष्ट बेचने और खरीदने की दरों को इस हर और हर के वर्ग द्वारा
गुणित करते हैं । तब समान विक्रयोदय ( बेचने की रकमों ) को त्रैराशिक के नियम द्वारा प्राप्त
करते हैं ॥ १०७½ ॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
किसी व्यापार में ½, ¾, ⅚ तीन व्यक्तियों द्वारा लगाई गई रकमें हैं। अवशिष्ट-कीमत
( अन्त्यार्घ ) ६/५ है। उन्हीं कीमतों पर खरीदने और बेचने पर वे समान धन राशि वाले बन जाते हैं।
बेचने की कीमत और खरीदने की कीमत तथा समान विक्रय-धन निकालो ॥ १०८½ ॥
जब अवशिष्ट-कीमत ( अन्त्यार्घ ) भिन्नीय हो तब समान विक्रयोदय ( बेचने की रकमों ) को
निकालने के लिये दूसरा नियम—
सबसे बड़े अंश, दो और ( लगाई गई मूल रकमों के प्राप्य ) हरों का संतत गुणनफल जब अव-
शिष्ट-मूल्य के मान के हर में जोड़ा जाता है तब बेचने की दर उत्पन्न होती है । जब इसे अवशिष्ट-मूल्य
( अन्त्यार्घ ) से गुणित कर और १ द्वारा हासित कर और फिर उत्तरोत्तर दो तथा समस्त हरों द्वारा
गुणित किया जाता है, तब खरीदने की दर प्राप्त होती है। तत्पश्चात्, त्रैराशिक की सहायता से
बेचने की रकमों ( sale-proceeds ) का साधारण मान प्राप्त होता है ॥ १०९½ ॥
१०५½ ) यहाँ आलोचनीय है कि इस नियमानुसार केवल सबसे बड़ी रकम निकाली जाती है ।
अन्य रकमें मन से चुन ली जाती हैं, ताकि वे सबसे बड़ी रकम से छोटी हों ।
ग० सा० सं०-१५