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गणितसारसंग्रह (महावीराचार्य - प्रो. लक्ष्मीचन्द्र जैन सविस्तार हिन्दी अनुवाद सटीक)

गणितसारसंग्रह (महावीराचार्य - प्रो. लक्ष्मीचन्द्र जैन सविस्तार हिन्दी अनुवाद सटीक)

Ganitasarasangraha of Mahaviracharya with Hindi Translation

महावीराचार्य (अनुवादक: प्रो. एल. सी. जैन) द्वारा

DevanagariHindipublished421 पृष्ठ

पृष्ठ 162, कुल 421 में से

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पृष्ठ 162

१०८ ] गणितसारसंग्रहः [ ६. ७९½-
प्रक्षेपकुट्टीकारः
इतः परं मिश्रकव्यवहारे प्रक्षेपकुट्टीकारगणितं व्याख्यास्यामः ।
प्रक्षेपकरणमिदं सवर्गविच्छेदनाशयुतिहृतमिश्रः ।
प्रक्षेपगुणकारः कुट्टीकारो बुधैः समुद्दिष्टम् ॥ ७९½ ॥
अत्रोद्देशकः
द्वित्रिचतुष्षड्भागैर्विभाज्यते द्विगुणषष्टिरिह हेम्नाम् ।
भृत्येभ्यो हि चतुर्भ्यो गणकाचक्ष्वाशु मे भागान् ॥ ८०½ ॥
प्रथमस्यांशत्रितयं त्रिगुणोत्तरतश्च पञ्चभिर्भक्तम् ।
दीनाराणां त्रिशतं त्रिषष्टिसहितं क एकांशः ॥ ८१½ ॥
आदाय चाम्बुजानि प्रविश्य सच्छावकोऽथ जिननिलयम् ।
पूजां चकार भक्त्या पूजार्हेभ्यो जिनेन्द्रेभ्यः ॥ ८२½ ॥
वृषभाय चतुर्थांशं षष्ठांशं शिष्टपार्श्वाय । द्वादशमथ जिनपतये त्र्यंशं मुनिसुव्रताय ददौ ॥ ८३½॥
नष्टाष्टकर्मणे जगदिष्टायारिष्टनेमयेऽष्टांशम् । षष्ठघ्नचतुर्भागं भक्त्या जिनशान्तये प्रददौ ॥ ८४½ ॥
कमलान्यशीतिमिश्राण्यायातान्यथ शतानि चत्वारि ।
कुसुमानां भागार्थं कथय प्रक्षेपकाख्यकरणेन ॥ ८५½ ॥
प्रक्षेप कुट्टीकार ( समानुपाती भाग )
इसके पश्चात् हम इस मिश्रक व्यवहार में समानुपाती भाग के गणित का प्रतिपादन करेंगे—
समानुपाती भाग की क्रिया वह है जिसमें दी गई ( समूह वाचक ) राशि पहिले ( विभिन्न
समानुपाती भागों का निरूपण करने वाले ) समान ( साधारण ) हर वाले भिन्नों के अंशों के योग द्वारा
विभाजित की जाती है । ऐसे समान हर वाले भिन्नों के हरों को उच्छेदित कर विचारते नहीं हैं ।
प्राप्त फल को प्रत्येक दशा में क्रमशः इन समानुपाती अंशों द्वारा गुणित करते हैं । इसे बुधजन (विद्वज्जन)
'कुट्टीकार' कहते हैं ॥ ७९½ ॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
इस प्रश्न में १२० स्वर्ण मुद्राएँ ४ नौकरों में क्रमशः १/२, १/३, १/४ और १/६ के भिन्नीय भागों में
बाँटी जाती हैं । हे अंकगणितज्ञ ! मुझे शीघ्र बतलाओ कि उन्हें क्या मिला ? ॥ ८०½ ॥ ३६३ दीनारों
को पाँच व्यक्तियों में बाँटा गया । उनमें से प्रथम को ३ भाग मिले और शेष भाग को उत्तरोत्तर ३
की साधारण निष्पत्ति में बाँटा गया । प्रत्येक का हिस्सा बतलाओ ॥ ८१½ ॥ एक सच्चे श्रावक ने
किसी संख्या के कमल के फूल लिये और जिन मंदिर में जाकर पूज्यनीय जिनेन्द्रों की भक्तिभाव से
पूजा की । उसने वृषभ भगवान् को १/४, १/६ पूज्य पार्श्व भगवान् को, १/१२ जिन पति को, १/३ मुनि सुव्रत
भगवान् को भेंट किये; १/८ भाग आठों कर्मों का नाश करने वाले जगदिष्ट अरिष्टनेमि भगवान् को और
१/६ का १/४ शांति जिन भगवान् को भेंट किये । यदि वह ४८० कमल के फूल इस पूजा के लिये लाया हो
तो इस प्रक्षेप नामक क्रिया द्वारा फूलों का समानुपाती वितरण प्राप्त करो ॥ ८२½-८५½ ॥ ४८० की
( ७९½ ) ८०½ वीं गाथा के प्रश्न को इस नियमानुसार हल करने में हमें १/२, १/३, १/४, १/६ से
६/१२, ४/१२, ३/१२, २/१२ प्राप्त होते हैं । हरों को हटाने के पश्चात्, हमें ६, ४, ३, २ प्राप्त होते हैं । ये
प्रक्षेप अथवा समानुपाती अंश भी कहलाते हैं । इनका योग १५ है, जिसके द्वारा बाँटी जानेवाली रकम