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गणितसारसंग्रह (महावीराचार्य - प्रो. लक्ष्मीचन्द्र जैन सविस्तार हिन्दी अनुवाद सटीक)

गणितसारसंग्रह (महावीराचार्य - प्रो. लक्ष्मीचन्द्र जैन सविस्तार हिन्दी अनुवाद सटीक)

Ganitasarasangraha of Mahaviracharya with Hindi Translation

महावीराचार्य (अनुवादक: प्रो. एल. सी. जैन) द्वारा

DevanagariHindipublished421 पृष्ठ

पृष्ठ 172, कुल 421 में से

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पृष्ठ 172

११८ ] गणितसारसंग्रहः [ ६. ११५½-
अन्तिम भाजन शृङ्खला के प्रथम भाजक द्वारा विभाजित करते हैं । ( इस क्रिया में प्राप्त ) शेष को
(अधिक बड़े समूह वाचक मान सम्बन्धी) भाजक द्वारा गुणित करते हैं, और परिणामी गुणनफल में इस
अधिकबड़े समूह वाचक मान को जोड़ देते हैं । ( इस प्रकार दी गई समूह संख्या के इष्ट गुणक का
मान प्राप्त किया जाता है, जो दो विचाराधीन विशिष्ट विभाजनों का समाधान करता है ) ॥११५½॥
इस विधि का मूल भूत सिद्धान्त ( rationale ) निम्नलिखित विमर्श से स्पष्ट हो जावेगा—
( १ ) (बा₁क + व₁) / आ₁ पूर्णांक है; ( २ ) (बा₂क + व₂) / आ₂ पूर्णांक है; और ( ३ ) (बा₃क + व₃) / आ₃ पूर्णांक है ।
( १ ) में मानलो क का अल्पतम मान = स₁ है ।
( २ ) में मानलो क का अल्पतम मान = स₂ है ।
( ३ ) में मानलो क का अल्पतम मान = स₃ है ।
( ४ ) जब (१) और (२) दोनों का समाधान करना पड़ता है, तब दआ₁ + स₁ को क्षआ₂

  • स₂ के तुल्य होना पड़ता है, ताकि स₁ - स₂ = क्षआ₂ - दआ₁ हो; अर्थात्, [आ₁द + (स₁ - स₂)] / आ₂
    = क्ष, हो ।
    अज्ञात मानवाली राशियों द और क्ष सहित होने से अनिर्धृत ( indeterminate )
    समीकरण ( ४ ) से, जैसा कि पहले ही सिद्ध किया जा चुका है उसके अनुसार, द के अल्पतम धनात्मक
    पूर्णांक को प्राप्त कर सकते हैं । द के इस मान को आ₁ द्वारा गुणित करने, और तब स₁ में जोड़ने पर
    क का मान प्राप्त होता है जो ( १ ) और ( २ ) का समाधान करता है ।
    मानलो यह त₁ है, और इन दोनों समीकारों का समाधान करने वाला क का और अधिक बड़ा
    मान मानलो त₂ है ।
    ( ५ ) अब, त₁ + नआ₁ = त₂ है,
    ( ६ ) और, त₁ + मआ₂ = त₂ है ।
    ∴ आ₁ / आ₂ = म / न . इस प्रकार, आ₁ = म . प, और आ₂ = न . प, जहाँ आ₁ और आ₂ का
    सबसे बड़ा साधारण गुणनखंड ( मह. समा. ) प है । ∴ म = आ₁ / प , और न = आ₂ / प .
    ( ५ ) अथवा ( ६ ) में इनका मान रखने पर, त₁ + (आ₁ आ₂) / प = त₂ होता है ।
    इससे स्पष्ट है कि क का दूसरा उच्चतर मान जो दो समीकरणों का समाधान करता है वह आ₁
    और आ₂ के लघुत्तम समापवर्त्य को निम्नतर मान में जोड़ने पर प्राप्त होता है ।
    फिर से, मानलो तीनों सभी समीकारों का समाधान करने वाले क का मान व है ।
    तब, व = त₁ + (आ₁ आ₂) / प × र, ( जहाँ र धनात्मक पूर्णांक है ) = ( मानलो ) त₁ + लर और
    व = स₂ + ष आ₃ = त₁ + ल र , ∴ र = (ष आ₃ + स₃ - त₁) / ल होगा ।
    पिछले समीकार में वल्लिका कुट्टीकार के सिद्धान्त का प्रयोग करने पर ष का मान प्राप्त हो जाता