गणितसारसंग्रह (महावीराचार्य - प्रो. लक्ष्मीचन्द्र जैन सविस्तार हिन्दी अनुवाद सटीक)
Ganitasarasangraha of Mahaviracharya with Hindi Translation
महावीराचार्य (अनुवादक: प्रो. एल. सी. जैन) द्वारा
पृष्ठ 179, कुल 421 में से
संदर्भ में पढ़ें-६. १३७½ ] मिश्रकव्यवहारः [ १२५
अत्रोद्देशकः
सप्तोत्तरसप्तत्या युतं शतं योज्यमानमष्टत्रिंशत् । सैकशतद्वयभक्तं को गुणकारो भवेदत्र ॥ १३७½ ॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
अज्ञात गुणनखंड का भाज्य ( dividend ) गुणक १७७ है । २४०, स्व में जोड़े जानेवाले
अथवा घटाये जाने वाले गुणनफल से सम्बन्धित ज्ञात राशि है; पूरी राशि को २०१ द्वारा भाजित
करने पर शेष कुछ नहीं रहता । यहाँ अज्ञात गुणनखण्ड कौन सा है, जिससे की दिया गया भाज्यगुणक
गुणित किया जाना है ? ॥ १३७½ ॥ ३५ और अन्य राशियाँ, जो संख्या में १६ हैं, और उत्तरोत्तर मान
प्रश्न है कि जब (१७७ क ± २४०)/२०१ पूर्णांक है तो क के मान क्या होंगे ? साधारण गुणन खंडों को निरसित
करने पर हमें (५९ क ± ८०)/६७ पूर्णांक प्राप्त होता है । लगातार किये जाने वाले भाग की इष्ट विधि को
निम्नलिखित रूप में कार्यान्वित करते हैं—
६७)५९(० प्रथम भजनफल को अलग कर, अन्य
० १ भजनफल, श्रृंखला में इस प्रकार लिखे जाते हैं—
५९)६७(१ ७ इसके नीचे १ और १ को अग्रिम
५९ २ लिखा जाता है । ये अन्तिम भाजक और शेष
८)५९(७ १ समान होते हैं । यहाँ भी जैसा कि वल्लिका
५६ १ कुट्टीकार में होता है, यह देखने योग्य है कि
३)८(२ १ अन्तिम भाजन में कोई शेष नहीं रहता क्योंकि
६ १ + १३ = १४ २ में १ का पूरा-पूरा भाग चला जाता है । परन्तु
२)३(१ चूँकि, अन्तिम शेष, श्रृंखला के लिये चाहिये,
२ इसलिये वह अन्तिम भजनफल छोटा से छोटा
१)२(१ बनाकर रख दिया जाता है, और अन्तिम
१ संख्या १ में यहाँ, १३ जोड़ते हैं, जो कि ८० में
१
से ६७ का भाग देने पर प्राप्त होता है । इस प्रकार १४ प्राप्त कर, उसे श्रृंखला के अन्त में नीचे
लिख दिया जाता है । इस प्रकार श्रृंखला पूरी हो जाती है । इस श्रृंखला के अंकों के लगातार किये
गये गुणन और जोड़ द्वारा, ( जैसा कि गाथा ११५½ के नोट में पहिले ही समझाया जा चुका है, ) हमें
३९२ प्राप्त होता है । इसे ६७ द्वारा विभाजित किया जाता है । शेष ५७ क का एक मान होता है,
जब कि ८० को श्रृंखला में अंकों की संख्या अयुग्म होने के कारण ऋणात्मक ले लिया जाता है । परन्तु
जब ८० को धनात्मक लिया जाता है, तब क का मान ( ६७-५७ ) अथवा १०
१ — ३९२ होता है । यदि श्रृंखला में अंकों की संख्या युग्म होती है, तो क का प्रथम
७ — ३४५ निकाला हुआ मान धनात्मक अग्र सम्बन्धी होता है । यदि यह मान भाजक में से
२ — ४७ घटाया जाता है तो क का ऋणात्मक अग्र सम्बन्धी मान प्राप्त होता है ।
१ — १६
१ — १५ इस विधि का सिद्धान्त उसी प्रकार है जैसा कि वल्लिका कुट्टीकार के सम्बन्ध
१ में है । परन्तु, उनमें अन्तर यही है कि यहाँ श्रृंखला में दो अन्तिम अंक दूसरी
१४ विधि द्वारा प्राप्त किये जाते हैं । अध्याय ६ की ११५½ वीं गाथा के नियम के नोट