श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)
Ganesha Purana Gita Press Special Edition
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
हमने] दूर्वाके उत्तम माहात्म्यका वर्णन किया, जो
सायं-प्रातः निरन्तर देवाधिदेव गणेशजीका ही पूजन
करते थे। यह जानकर परम दयालु भगवान् गजानन
गणेशजीने उन्हें अपने धाममें पहुँचा दिया॥ ३९१/२॥
[गणेशजीके] गण बोले- [हे मुनीश्वरो!
हमने] दूर्वाके उत्तम माहात्म्यका वर्णन किया, जो
अगाध है। जिसके एक पत्रकी तुलना तीनों लोक नहीं
कर सकते, उस दूर्वांकुरकी सम्पूर्ण महिमाका वर्णन
करनेमें न तो [सहस्र मुखवाले] शेषनाग समर्थ हैं, न
ही विष्णु और शिव ॥ ४०-४१॥
दूर्वाके स्मरणमात्रसे त्रिविध पाप नष्ट हो जाते हैं;
क्योंकि उसका स्मरण करनेपर भगवान् गजाननका भी
स्मरण हो जाता है। इस प्रकार चिन्तामणिक्षेत्रके
माहात्म्यका स्पष्ट रूपसे वर्णन किया गया, जिसके
श्रवण, कीर्तन और ध्यान करनेसे भोग और मोक्षरूपी
फलकी प्राप्ति होती है ॥ ४२-४३॥
इसी कारण उन तीनों (रासभ, वृषभ और
चाण्डाली)-के लिये सुन्दर विमान भेजा गया था। गधे
और बैलके मुखसे [निकलकर] दूर्वा भगवान् गणेशजी
[के मस्तक]-पर पहुँची थी। चाण्डालीद्वारा तृणोंका
भार शीतनाशके लिये लाया गया था। प्रबल वायुके
झोंकेसे [उड़कर उसमेंसे] एक दूर्वा गजानन गणेशजी
[के मस्तक]-पर पहुँच गयी; क्योंकि दूर्वा उनको प्रिय
है, इसलिये वे विनायक उससे प्रसन्न हो गये और उन
तीनोंके निष्पाप हो जानेके कारण उन्होंने उन्हें अपना
सान्निध्य प्रदान किया ॥ ४४-४६॥
दूर्वाके गन्धमात्रसे वे प्रभु प्रसन्न हो जाते हैं,
भक्तिपूर्वक उसकी चर्चा करनेसे प्रसन्न हो जाते हैं, तो
फिर मस्तकपर दूर्वाके अर्पणसे होनेवाली उनकी प्रसन्नताका
भला क्या कहना ? ॥ ४७ ॥
ब्रह्माजी बोले- [हे व्यासजी !] इस प्रकार
[गणेशजीके] गणोंद्वारा कही गयी दूर्वाकी महिमाका
राजा [कृतवीर्यके पिता]-ने श्रवण किया, जिसे मुनियोंने
भी [कभी] न देखा था, न सुना था ॥ ४८ ॥
तदनन्तर राजाने स्नानकर दूर्वांकुरोंको लेकर [उनसे]
भगवान् विनायकका पूजन किया, तत्पश्चात् उसके
सेवकोंने भी दूर्वांकुरोंसे श्रीगजाननका अर्चन किया ॥ ४९ ॥
[इससे] वे सभी दिव्य शरीरवाले और तेजसे
सूर्यसदृश कान्तिमान् हो गये। उन सबने दिव्य वस्त्र
धारण कर रखे थे और उनके अंगोंमें दिव्य चन्दनका
लेप लगा था। देवताओंद्वारा बजाये जा रहे वाद्योंकी
अनेक प्रकारकी ध्वनियोंका श्रवण करते हुए वे एक
श्रेष्ठ विमानपर आरूढ़ होकर गणेशजीके धामको चले
गये और उनमेंसे कुछने उनका रूप धारण कर लिया
अर्थात् उन्हें सारूप्य मुक्ति प्राप्त हो गयी ॥ ५०-५१ ॥
उस [गणेश]-महोत्सवको देखनेके लिये कुछ
नागरिक जन भी आये थे, उन्होंने भी गणेशजीके पृथक्-
पृथक् इक्कीस नामों* से दूर्वांकुरार्चन किया ॥ ५२ ॥
वे सभी समस्त भोगोंका भोगकर गणेशजीके
धामको चले गये और उनके पुण्यसमूहके प्रभावसे
विमान भी ऊर्ध्वगामी हो गया ॥ ५३॥
इसलिये गणेशजीके भक्तको दूर्वांकुरोंसे उनका
अर्चन करना चाहिये। जो मनुष्य प्रमादवश दूर्वांकुरोंसे
उनका अर्चन नहीं करता, उसे चाण्डाल जानना चाहिये।
वह अनेक नरकोंमें जाता है। मनुष्यको कभी भी उसका
मुख नहीं देखना चाहिये ॥ ५४-५५ ॥
उन देवदेव गजाननका जो व्यक्ति दूर्वांकुरोंसे अर्चन
करता है, उसके दर्शनसे अन्य पापी व्यक्ति भी शुद्धिको
प्राप्त कर लेते हैं ॥ ५६ ॥
यदि बहुत-से दूर्वांकुरोंकी प्राप्ति न हो सके तो
एक दूर्वासे ही पूजन करे, उस एक दूर्वासे भी की गयी
पूजा [बिना दूर्वाके की गयी पूजासे] करोड़ों गुना फल
देती है, इसमें संशय नहीं है ॥ ५७॥
पाद-टिप्पणी (Footnote):
* १. गणाधिपाय नमः, २. उमापुत्राय नमः, ३. अघनाशनाय नमः, ४. एकदन्ताय नमः, ५. इभवक्त्राय नमः, ६. मूषकवाहनाय नमः, ७.
विनायकाय नमः, ८. ईशपुत्राय नमः, ९. सर्वसिद्धिप्रदाय नमः, १०. लम्बोदराय नमः, ११. वक्रतुण्डाय नमः, १२. मोदकप्रियाय नमः, १३. विघ्नविध्वंसकर्त्रे
नमः, १४. विश्ववन्द्याय नमः, १५. अमरेशाय नमः, १६. गजकर्णाय नमः, १७. नागयज्ञोपवीतिने नमः, १८. भालचन्द्राय नमः, १९. परशुधारिणे
नमः, २०. विघ्नाधिपाय नमः, २१. विद्याप्रदाय नमः। (श्रीगणेशपुराण, उपासनाखण्ड ६९। ३५)
उ०ख०-अ०६८ ] * कृतवीर्यके पिताका कृतवीर्यको स्वप्नमें दर्शन देना * २०९
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यहाँ प्रस्तुत पृष्ठ का संपूर्ण पाठ्य रूप (Transcription) है:
२१० * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण-
कीजिये और हमसे बताइये कि शोक करनेका क्या
कारण है ? आपको [इस प्रकार] शोकग्रस्त देखकर हमें
भी तीव्र शोक हो रहा है ॥ १५-१६ ॥
इन्द्र बोले—[हे राजा शूरसेन!] मन्त्रियोंकी बात
सुनकर कृतवीर्यने उनसे कहा कि मैंने स्वप्नमें पिताजीको
देखा, इसीलिये मेरा मन विह्वल है ॥ १७ ॥
संकटचतुर्थीव्रतका बोध करानेवाली पुस्तक मेरे
हाथमें देकर वे उसी क्षण अन्तर्धान हो गये ॥ १८ ॥
उनके वियोगमें मैं वैसे ही शोकाकुल हूँ, जैसे
हाथमें आये हुए धनके चले जानेपर निर्धन व्यक्ति
शोकाकुल होता है। उन्होंने मुझसे यह वचन कहा कि
पुत्रकी कामनासे तुम यह व्रत करो ॥ १९ ॥
हे मन्त्रिगण ! जब मैं प्रबुद्ध हुआ (जगा), तब मैंने
[अपने] हाथमें पुस्तक देखी। उसी समयसे मैं आश्चर्य,
हर्ष और शोकसे आँसू बहा रहा हूँ, इसके अतिरिक्त
अन्य कोई कारण नहीं है ॥ २० ॥
मन्त्री बोले—[हे राजन्!] जो मनुष्य, सर्प और
राक्षसोंसहित समस्त लोकोंके पिता हैं, उन्हीं गजानन
गणेशजीने पितृरूपमें तुमसे सन्तानप्राप्तिका उपाय कहा
है; अन्यथा हे नृपश्रेष्ठ ! स्वप्नकालिक उपलब्धि वास्तविक
कैसे होती और स्वप्नमें देखी हुई पुस्तक प्रत्यक्ष कैसे
उपस्थित हो जाती ! बिना उनकी कृपाके स्वप्न भी
विपरीत फल ही देनेवाले होते हैं ॥ २१-२२१/२ ॥
इन्द्र बोले—[हे राजा शूरसेन !] मन्त्रियोंके इस
प्रकारके वचन सुनकर सावधानचित्त होकर राजाने
पण्डितों और सुहृज्जनोंको बुलाकर उनसे पूछा कि हे
द्विजगण ! गणेशजीकी कृपासे प्राप्त इस पुस्तकका अर्थ
बतलाइये। तब उन सबने उस पुस्तकको देखकर सम्पूर्ण
सभाको उसका अर्थ बतलाया ॥ २३-२४१/२ ॥
द्विज बोले—हे राजन् ! इसमें आप कृतवीर्यके
पिता और ब्रह्माजीका महान् संवाद वर्णित है ॥ २५ ॥
इसमें सम्पूर्ण संकटोंका नाश करनेवाले [गणेश]
चतुर्थीव्रतका निरूपण हुआ है। चन्द्रमाके उदय होनेपर
की जानेवाली गणेशजीकी पूजा इसमें विस्तारपूर्वक कही
गयी है ॥ २६ ॥
इसमें अंगारकचतुर्थीकी महिमाका बार-बार वर्णन
हुआ है तथा चतुर्थी तिथि, भगवान् गणेश और
चन्द्रमाको दिये जानेवाले अर्घ्यका मन्त्रसहित वर्णन है।
इक्कीस ब्राह्मणोंको भोजन कराने, उनका पूजन करने
और उन्हें अनेक प्रकारके दान देनेका इसमें निरूपण
है ॥ २७-२८ ॥
गणेशजीको दूर्वा समर्पण करनेके फलका तथा
श्वेत दूर्वा समर्पित करनेके फलका इसमें पृथक् रूपसे
वर्णन है। हे निष्पाप महाभाग ! यह व्रत बड़े ही भाग्यसे
आपको प्राप्त हुआ है ॥ २९ ॥
इससे पहले संसारमें इस व्रतको करते न तो
किसीको देखा गया था, न ही इसके विषयमें सुना गया
था। यह भविष्यमें लोगोंके लिये उपकारी होगा। इसके
[माहात्म्यके] श्रवण और स्मरणसे भी मनुष्योंके संकटोंका
हरण होगा ॥ ३० ॥
इन्द्र बोले—[हे राजा शूरसेन!] पण्डितोंके मुखसे
[संकटचतुर्थीविषयक] वह वर्णन सुनकर राजा कृतवीर्य
और अन्य सभी लोग आश्चर्यमिश्रित हर्षसे भर गये।
तदनन्तर राजाने उन श्रेष्ठ ब्राह्मणोंका पूजन किया
तथा उन्हें बहुत-से वस्त्र, अलंकरण, रत्न और धन-
धान्य प्रदान किये। तत्पश्चात् राजा कृतवीर्यने अपने
कुलगुरु अत्रिको बुलाकर उनका तथा भगवान् विनायक
गणेशजीका यथाविधि पूजनकर शुभ मुहूर्तमें
[गणेशजीके] शुभ फलदाता एकाक्षर मन्त्रको ग्रहण
किया ॥ ३१-३३ ॥
तदनन्तर राजाने जितेन्द्रियतापूर्वक गणेशजीका ध्यान
करते हुए अनन्य भक्तिसे उनके मन्त्रका जप किया और
गणाधिपति गणेशजीकी प्रसन्नता एवं पुत्र-प्राप्तिके लिये
उस संकटनाशनव्रतको सम्पन्न किया ॥ ३४ ॥
॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके अन्तर्गत उपासनाखण्डमें 'व्रतनिरूपण' नामक अड़सठवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ६८ ॥