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श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

Ganesha Purana Gita Press Special Edition

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished656 पृष्ठ

भूमिपर गिर पड़े और उनके सैकड़ों खण्ड हो गये।

५९४ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण-
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अतिबलिष्ठ गन्धर्वोंको मैंने भगा दिया॥ १३-१४ १/२ ॥
उस समय उनमेंसे कुछ तो मर गये, कुछ भाग गये
और कुछ सिर फूट जाने तथा पैर टूट जानेके कारण
भूमिपर गिर पड़े और उनके सैकड़ों खण्ड हो गये।
तत्पश्चात् [मेरे ऊपर आकाशसे] पुष्पोंकी वर्षा हुई। हे
देव ! इसके बाद आपके द्वारा आदिष्ट कर्तव्यको पूर्ण
करके मैं [यहाँ] चला आया॥ १५-१६॥
हे देव! आपकी इच्छाके विषयको अर्थात् आप
जिसे चाहते हैं, उसे समस्त त्रिलोकीमें ऐसा कौन है, जो
मार सके। इसलिये आपके नामका ही आश्रय लेकर
बालकके साथ होनेपर भी मैंने विजय प्राप्त की॥ १७॥
तब हर्षसे भरे भगवान् शंकरने नन्दिकेश्वरका
आलिंगन किया और प्रसन्न मनसे कहने लगे- नन्दिकेश्वर !
मैंने तुम्हारा दृढ़ पौरुष जान लिया है। इस त्रैलोक्यमें
तुम्हारी बराबरी करनेवाला कोई भी नहीं है ॥ १८ १/२ ॥
ब्रह्माजी बोले- इसके उपरान्त (शिवजीसे मिल
लेनेके पश्चात्) वे नन्दी विश्वनाथ शिवजीको प्रणाम
करके पार्वतीजीके समीप गये और हाथ जोड़कर उन्हें
प्रणामकर मधुर वाणीमें कहने लगे- हे मातः ! शिवजीकी
आज्ञासे मैं बालकको माहिष्मतीपुरी ले गया और
वरेण्यपत्नी पुष्पिकाके समीपमें रख आया हूँ; क्योंकि उस
(बालरूप गणेश) -ने उस पुष्पिकाको पूर्वमें वर प्रदान
किया था कि मैं तुम्हारा पुत्र बनूँगा और ब्रह्मतत्त्वका
प्रतिपादन करूँगा॥ १९-२१ १/२ ॥
तब उन नन्दीश्वरके वचनोंको सुनकर सब कुछ
जाननेवाली पार्वतीदेवी प्रसन्न हो गयीं। वे शिशु (-रूप
गणपति)-के अन्तहीन पराक्रमको जानती थीं, [अतः
गणपतिदेवके प्रति] परम भक्तिभावसे युक्त हो पार्वतीजी
नन्दीश्वरसे कहने लगीं- 'हे पुत्र! मैं तुम्हारे पुरुषार्थको
जानती हूँ॥ २२-२३॥
तुमने भयंकर घोष करनेवाली अत्यन्त भीषण
राक्षसीका संहार किया है, दुरात्मा गन्धर्वोंको नष्ट किया
तथा शिशुकी रक्षा की। [इसके अतिरिक्त] बिना उस
प्रसूताको ज्ञात हुए, उसके बालकको वहाँ पहुँचा भी
दिया है-ये सब महान् कृत्य थे, जो तुमने सम्पन्न किये
हैं।' इस प्रकारसे [प्रीतिपूर्वक] नन्दीश्वरसे कहकर
पार्वतीजीने उनको विदा किया और विश्राम करने
लगीं ॥ २४-२५ ॥
॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डके अन्तर्गत 'गन्धर्वपराजयवर्णन' नामक
एक सौ इकतीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १३१ ॥
एक सौ बत्तीसवाँ अध्याय
सिन्दूरका गजाननको ले जाकर नर्मदामें फेंकना, गजाननके रक्तसे रंजित
शिलाओंकी 'नार्मद गणेश' संज्ञा, उमामहेश्वरका कैलास-गमन
ब्रह्माजी बोले- एक बारकी बात है, दैत्यराज
सिन्दूर सभामें बैठा और अपने उन्मद अहंकारमें भरकर
कहने लगा कि मेरा पराक्रम तो व्यर्थ ही है; क्योंकि जब
इन्द्रादि देवगण तथा ब्रह्मा, विष्णु एवं रुद्र भी मुझसे युद्ध
करनेमें अक्षम हैं, तब पृथ्वीपर रहनेवाले राजाओंकी तो
बात ही क्या है!॥ १-२॥
जिस प्रकार पतिके बिना कुलवती महिलाका यौवन
व्यर्थ होता है, वैसे ही योद्धाओंके अभावमें आज मेरा
पराक्रम व्यर्थ हो गया है। तब (उसके ऐसा कहते ही)
आश्चर्यमयी आकाशवाणी उसे सुनायी पड़ी ॥ ३ १/२ ॥
आकाशवाणी बोली-अरे मूढ ! किसलिये तू
चपलता दिखा रहा है, तुझसे लड़नेवाला तो जन्म ले
चुका है। पार्वतीके उदरसे समुद्भूत वह गर्भ (शिशु)
इस समय वरेण्यके भवनमें स्थित है और अनन्त लीलाएँ
करनेवाला वह शिशु वहाँपर शुक्लपक्षके चन्द्रमाकी
भाँति बढ़ रहा है॥ ४-५॥
ब्रह्माजी बोले- एकाएक इस प्रकारकी
आकाशवाणीको सुनकर सिन्दूर मूर्च्छित हो गया और
[चेतना प्राप्त करके] वह शोकसे व्याकुल हो उठा और
सोचने लगा कि यह क्या है तथा किसने कहा है ? ॥ ६ ॥

क्री०ख०-अ० १३२ ] * सिन्दूरका गजाननको ले जाकर नर्मदामें फेंकना * ५९५
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[बायाँ स्तम्भ]

यदि [ऐसी बात कहनेवाला] आँखोंके सामने आ
जाय तो मैं उसे पूरा-का-पूरा चबा डालूँ। मैं तो स्वयं
ही सबका काल हूँ, पश्चिम दिशामें हुए सूर्योदयके
समान मेरी कैसे मृत्यु हो सकती है? ॥ ७॥
ऐसा कहकर वह उठ खड़ा हुआ और दिशा-
विदिशाओंको [अपनी गर्जनासे] ध्वनित करता हुआ
सहसा उड़ने लगा और भगवान् शंकरके निवासस्थान
कैलासपर्वतकी ओर चल पड़ा ॥ ८ ॥
उस समय वह अपने शरीर (के उड़नेसे उत्पन्न
हुई)-वायुसे पर्वतोंको चूर्ण करता और वृक्षोंको उखाड़ता
हुआ जा रहा था। उसके कारण [भूतलके आधार
देवता] कूर्म तथा शेषनाग चलायमान हो गये और
पृथिवी काँपने लगी। [कैलास पहुँचकर जब] उसने
वहाँ शिवको नहीं देखा तो पुन: पृथ्वीलोकमें आ गया
और शिवको खोजता हुआ वेगपूर्वक समस्त भूतलपर
भटकने लगा। क्रोधमें भरा हुआ [वह भटकते-भटकते]
'पर्यली' नामक विशाल जंगलमें आ पहुँचा और तब
वहाँ उसने दूरसे ही पार्वतीजीके साथ स्थित भगवान्
शंकरको देखा ॥ ९-११॥
उसने वहाँ आवासमण्डप, सरोवर, उनमें खिले
कमल और शिवगणोंको देखा। इसके बाद वह सहसा
पार्वतीजीके लिये बनाये गये सूतिकागृहकी ओर चल
पड़ा। जब वहाँ उसने बालकको नहीं देखा तो जलती
हुई अग्निके समान कुपित हो उठा। इसके बाद वह
सोचने लगा कि आकाशवाणी असत्य नहीं हो सकती।
[आकाशवाणीने कहा है कि] इसका पुत्र मुझे मारेगा,
किंतु हो सकता है कि अभी वह उत्पन्न ही न हुआ हो।
अतः इस समय मैं इसी (पार्वती)-को मार डालता हूँ,
जिससे [शत्रुका] मूल ही नष्ट हो जायगा ॥ १२-१४॥
ब्रह्माजी बोले- इस प्रकारका मनमें सोच-विचार
करके उसने [पार्वतीको] मारनेके लिये शस्त्र उठाया
और जबतक कि वह उमाकी हत्या कर पाता, तबतक
उस दुष्टको अपने समक्ष एक शिशु दिखायी पड़ा ॥ १५ ॥
चार भुजाओंसे युक्त वह मनोहर शिशु मुकुट तथा
बाजूबन्दसे विभूषित था। उस बालकने परशु, कमल

[दायाँ स्तम्भ]

तथा मालाको धारण कर रखा था। उसके कटिदेशमें
शेषनाग [लिपटे थे] और कण्ठमें हार तथा चरणोंमें
नूपुर [शोभायमान] थे। यह आश्चर्यजनक दृश्य देखकर
और पार्वतीजीको सोयी हुई जानकर वह तत्काल ही
पार्वतीके वधसे विरत हो गया ॥ १६-१७॥
उसने बालकको हाथमें उठा लिया और उसे महासागरमें
फेंकनेकी कामना करने लगा। इस प्रकारका निश्चित संकल्प
करके वह आगे चल पड़ा। तभी वह बालक अपने आपको
बढ़ाने लगा और मानो दूसरे हिमालयकी भाँति [भारवाला]
हो गया। तब क्षणभरमें ही उसके अतिशय भारसे व्याकुल
सिन्दूर काँप उठा ॥ १८-१९॥
उसकी साँसें बढ़ने लगीं तथा वह अपनी शक्तिसे
[तनिक भी] आगे चल पानेमें सक्षम नहीं रहा, तब
व्याकुल होकर दैत्यने उस बालकको छोड़ दिया ॥ २० ॥
जब तीव्र रव करता हुआ वह बालक भूतलपर
गिरा तो पर्वत हिलने लगे और उस घोषके कारण पृथिवी
काँप उठी। नाना प्रकारसे चीत्कार करते हुए पक्षीगण
आकाशमें घूमने लगे, सातों महासागर क्षुब्ध हो गये तथा
ब्रह्माण्ड भी मानो विदीर्ण-सा होने लगा ॥ २१-२२॥
वह बालक मुनिजनोंके समीप, नर्मदाके जलमें जा
गिरा, तब वहाँ एक श्रेष्ठ तीर्थ प्रकट हुआ, जिसे
गणेशकुण्ड कहा जाता है ॥ २३ ॥
इस तीर्थका स्मरण करते ही जीवनभरमें किया
गया पाप क्षणमात्रमें नष्ट हो जाता है तथा इसका दर्शन
करनेसे दस जन्मोंका और स्नान करनेसे सौ जन्मोंका
पाप नष्ट होता है। अनुष्ठानपरायण होकर अर्थात्
क्षेत्रसंन्यास लेकर इस तीर्थका जो लोग सेवन करते हैं,
यह उन्हें मोक्ष प्रदान करता है॥ २४ १/२॥
[उस तीर्थमें गिरे हुए] बालक गणपतिके देहसे
जो रुधिर निकला, उसके कारण वहाँकी शिलाएँ रक्तवर्ण
हो गयीं और वे ही पापनाशक शिलाएँ 'नार्मद गणेश' के
नामसे प्रसिद्ध हुईं। वे शिलाएँ दर्शन-पूजन आदिके द्वारा
आराधित होनेपर भक्तोंकी समस्त कामनाओंको पूर्ण
करती हैं। इन नार्मद गणपतिशिलाओंकी समग्र महिमाका
वर्णन हो पाना सम्भव नहीं है ॥ २५-२६ १/२ ॥

५९६ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण-
तब अर्थात् उन गौरीनन्दनको फेंक देनेके पश्चात् | करेगा। इस प्रकारसे कहनेके उपरान्त वह भयानक पुरुष
वह दैत्य हर्षित हो उठा कि मेरा शत्रु तो विनष्ट हो गया | अन्तर्धान हो गया ॥ ३१-३३ ॥
है। तभी उस कुण्डसे विशाल और भयानक एक पुरुष | तब अत्यन्त क्रोधके कारण उस दैत्यने सेवकोंसे
प्रकट हुआ, जो अपनी जटाओंसे आच्छादित होनेके | कहा कि [अरे!] उसे पकड़ लो, पकड़ लो, जिसने ऐसे
कारण ऐसा जान पड़ता था कि मानो लताओंसे आवृत | कठोर वाक्य कहे हैं ॥ ३४ ॥
कोई वटवृक्ष हो ॥ २७-२८ ॥ | [इसके उपरान्त] जब वह दैत्य उस पुरुषको कहीं
दाढ़ोंके कारण उसका मुख अत्यन्त भयानक प्रतीत | भी न देख सका तो अपने स्थानपर लौट आया और मनमें
हो रहा था और नागिनके जैसी उसकी जिह्वा थी। उसके | सोचने लगा कि जब उसे देखूँगा, तब जीत लूँगा। उस
हाथ-पैर बड़े ही लम्बे थे तथा [वेगपूर्वक] श्वास | (बालक)-का यह जो इतना चरित्र था, उसे पार्वतीजी
लेनेके कारण उस पुरुषके नेत्र चलायमान थे ॥ २९ ॥ | जान नहीं सकीं; क्योंकि उसकी मोहकारिणी मायाके
वैसे आकार-प्रकारवाले पुरुषको देखकर क्रोधसे | कारण वे अत्यधिक मोहित हो चुकी थीं ॥ ३५-३६ ॥
विह्वल नेत्रोंवाला वह सिन्दूर दैत्य कहने लगा कि यह | तदुपरान्त पार्वतीजीने भगवान् शिवसे विनयपूर्वक
मेरी किस गिनतीमें है ! ॥ ३० ॥ | कहा कि हे जगदीश्वर ! इस स्थानपर दैत्यकृत उपद्रव आरम्भ
क्रोधपूर्वक ऐसा कहकर हाथमें खड्ग ले वह दैत्य | हो गये हैं, अतएव अब मैं कैलास जाना चाहती हूँ, यदि
उस पुरुषको मारने चला और जबतक वह खड्ग-प्रहार | आपकी इच्छा हो तो मुझे वहीं ले चलिये ॥ ३७१/२ ॥
करता, तबतक वह पुरुष [वहाँसे अदृश्य होकर] | उनकी ऐसी बात सुनकर शंकरजीको भी प्रसन्नता
आकाशमें दीख पड़ा तथा उस दैत्यसे बोला कि अरे | हुई और वे नन्दीपर तत्काल आरूढ़ होकर, सात करोड़
दैत्य ! तूने तो मुझे व्यर्थ ही भूतळपर फेंका है। रे मूढ़ ! | गणोंसे घिरे हुए, उसी क्षण पार्वतीसहित कैलास जा
तुझे मारनेवाला तो कहीं और ही वृद्धिको प्राप्त कर रहा | पहुँचे। अपने भवनमें प्रविष्ट होकर पार्वतीजीको [उस
है। सत्पुरुषोंकी रक्षामें तत्पर वह अवश्य ही तेरा वध | समय] अति प्रसन्नता हुई ॥ ३८-३९ ॥
॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डके अन्तर्गत 'कैलासाभिगमनका वर्णन' नामक
एक सौ बत्तीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १३२ ॥
एक सौ तैंतीसवाँ अध्याय
राजा वरेण्यके द्वारा गजमुखाकृति शिशुका भयभीत होकर वनमें परित्याग और
पाराशरमुनिके द्वारा शिशु गजाननका पालन
व्यासजी बोले- हे विधे! राजा वरेण्यके भवनमें | रानी पुष्पिकाने पुत्रको देखा। वह अलंकारोंसे समन्वित,
[उनकी भार्या] पुष्पिकाके समीप [नन्दीके द्वारा] | चार भुजाओंसे युक्त तथा हाथीके जैसे मुखवाला था।
पहुँचाये गये उन बालरूप गणपतिने कौन-सी लीला की, | उसका वर्ण अरुण था। कस्तूरी-तिलक और मोतियोंकी
इसे मुझको सविस्तार बतलाइये ॥ १ ॥ | मालाओंसे वह शोभायमान था। उसने उत्तम अंगराग
ब्रह्माजी बोले- हे वत्स! तुमने उचित प्रश्न | और पीताम्बर धारण किया था। नानाविध आभूषणोंसे
किया है, जो हृदयको आनन्दित करनेवाला है। मैं वह | युक्त वह बालक तेजोमय शरीरवाला था ॥ ३-४१/२ ॥
समस्त पापनाशक वृत्तान्त विहित रीतिसे तुम्हें | वह पुष्पिका उस समय वैसे रूपवाले बालकको
बतलाऊँगा ॥ २ ॥ | देखकर विस्मित तथा दुखी हो गयी और उसे भय लगने
उस रात्रिके अर्थात् प्रसवकी रात्रि बीतनेके उपरान्त | लगा। तब शोकाकुल वह रानी हाथोंसे वक्षःस्थलपर

क्री०ख०-अ०१३३] * राजा वरेण्यके द्वारा गजमुखाकृति शिशुका परित्याग * ५९७
आघात करती हुई बाहरकी ओर भाग चली। रानीके
क्रन्दनको सुनकर दासियाँ वहाँ आयीं और उन्होंने भी उस
अद्भुत आकार-प्रकारवाले बालकको देखा ॥ ५-७॥
इस वृत्तान्तका पता लगनेपर राजा वरेण्य भी अपने
गणों (मन्त्री, पुरोहित आदि)-के साथ प्रसूतिकागृहमें
आ पहुँचे। जब उन राजा आदिने वैसे अद्भुत बालकको
देखा तो वे भी भयके कारण विचलित हो गये। वहाँ
कुछ लोग अधीर होकर भाग खड़े हुए और कुछ
मूर्च्छित हो गये तथा कुछ लोग राजासे कहने लगे कि
इस प्रकारका बालक तो आजतक न जनमा है, न आगे
ही जन्म लेगा। मनुष्योंके बीचमें न कभी कोई ऐसा
बालक कहींपर देखा अथवा सुना ही गया है। इसे
आपको अपने घरमें नहीं रखना चाहिये, यह तो वंशका
नाश ही कर देगा ॥ ८-१०॥
सभी लोगोंकी ऐसी बातें सुनकर वे नरेश भयाकुल
हो उठे और उन्होंने दूतों (सेवकों)-से कहा कि 'इस
बालकको घने जंगलमें ले जाकर छोड़ दो' ॥ ११ ॥
तब वे सेवक बालकको लेकर ऐसे घने जंगलके
बीचमें जा पहुँचे, जहाँ वायुका भी प्रवेश नहीं था। वहाँ
उन्हें एक सरोवर दिखायी पड़ा, जिसके तटपर सेवकोंने
बालकको फेंक दिया और उसे पत्तोंके द्वारा ढँककर
तत्काल राजा वरेण्यके पास लौट आये ॥ १२-१३॥
वहाँ सभाके मध्यमें स्थित राजाको देखकर उन
सेवकोंने प्रणाम किया, तदुपरान्त राजासे कहने लगे कि
हे राजेन्द्र! हम लोग आपके आदेशानुसार सिंह-
व्याघ्रादिसे भरे हुए वनमें उस बालकको छोड़कर लौट
आये हैं। अबतक तो सम्भवतः वन्य पशुओंने उसका
भक्षण भी कर लिया होगा ॥ १४१/२ ॥
ब्रह्माजी बोले- [हे व्यासजी!] जबतक उस
बालकका भक्षण करनेके लिये शृगाल [आदि वन्य
जीव] आते, तबतक उसे करुणानिधि महर्षि पराशरने
देख लिया। चार भुजाओंसे युक्त, हाथीके-से मुखवाले,
दिव्य वस्त्रोंसे विभूषित, नानाविध आभूषणोंसे समन्वित,
चिन्तामणिसे अलंकृत, सर्पसे आवेष्टित उत्तम नाभिदेशवाले
अर्थात् सर्पकी करधनी धारण किये हुए तथा करोड़ों
सूर्यके सदृश देहकान्तिवाले उस शिशुको देखकर वे
मोहित हो गये। वे मुनिवर समस्त ज्ञान-विज्ञानके
आश्रय थे, तथापि उस बालककी मायाके कारण वे
चिन्तित हो उठे और सोचने लगे कि 'क्या यह विघ्न
मेरे विनाशके लिये इन्द्रने स्वार्थवश निर्मित किया है;
क्योंकि उन्हें मेरी तपस्याका विनाश ही अभीष्ट है।
सर्वदा पापसे डरनेवाले मैंने तो अल्पमात्र भी दुष्कृत्य
नहीं किया। हे चन्द्रचूड ! हे दीनरक्षक ! इस महान्
भयसे मेरी रक्षा कीजिये' ॥ १५-१९१/२ ॥
मुनिको इस प्रकार शोकाकुल देखकर भगवान्
गजाननको बड़ी दया आयी और उन्होंने उनके
मोहजालको नष्ट कर दिया, तब वे मुनिवर भक्तोंके
रक्षणार्थ इस प्रकारका वेष बनाकर अपने समक्ष विद्यमान
साक्षात् परब्रह्म परमात्मा उन गजाननको देख
सके ॥ २०-२११/२ ॥
पराशरजी बोले- आज मेरा जन्म लेना सार्थक
हो गया, मेरे माता-पिता तथा मेरी महान् तपश्चर्या भी
धन्य हो गयी। आज मैंने आवागमनके चक्रसे अपनेको
मुक्त कर लिया तथा अभीष्ट फल पा लिया। न जाने
किस भाग्यहीनने इन बालरूप गजाननको वनके मध्यमें
लाकर छोड़ दिया ॥ २२-२३ ॥
ब्रह्माजी बोले- ऐसा कहकर वे मुनि उस बालकको
अपने आश्रममें ले गये। वहाँपर वात्सल्यमयी मुनिपत्नीने
वैसे (विलक्षण रूपवाले) बालकको देखा और यह
जानकर कि इसे मेरे पतिदेव लेकर आये हैं, वह
स्नेहशीला [स्त्री] प्रसन्नतासे भर गयी ॥ २४१/२ ॥
तदुपरान्त उसने बालकको हृदयसे लगा लिया
और प्राणेश्वर पतिदेवसे कहने लगी- हे स्वामिन् !
सुदीर्घकालसे की जानेवाली आपकी उत्कट तपश्चर्या
आज सफल हो गयी। जिसके स्वरूपको ब्रह्मा, शिव,
लक्ष्मीपति विष्णु तथा मुनिजन भी जान नहीं सके, उन
(गजाननदेव)-का आज हम लोग प्रत्यक्ष अवलोकन
कर रहे हैं ॥ २५-२६१/२ ॥
हे स्वामिन् ! जो प्रभु समस्त जगत्प्रपंचके स्रष्टा,
रक्षक तथा संहारक हैं तथा नानाविध अवतार ग्रहण

५९८ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण-
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करनेवाले हैं, जो भूभारका हरण करनेके लिये अवतीर्ण | पालन-पोषण किया जा रहा है, तो वे अतिशय हर्षित
हुए हैं, जिनका साक्षात्कार कर पानेमें इन्द्रियोंके सहित | हो गये और उन्होंने खूब बाजे बजवाये तथा प्रत्येक घरमें
मन भी कभी समर्थ नहीं होता, वे विश्वभर्ता प्रभु आज | शर्करा (मिठाई) बँटवायी। राजाने ब्राह्मणों तथा बन्धु-
बिना प्रयत्नके अनायास ही दृष्टिगोचर हुए हैं, यह | बान्धवोंको [इस अवसरपर] सुवर्ण, रत्नराशि तथा
हमलोगोंका महान् सौभाग्य है ॥ २७-२८ १/२ ॥ | वस्त्रादिके द्वारा सन्तुष्ट किया ॥ ३०-३२ ॥
ब्रह्माजी बोले- बालकका स्पर्श होते ही [नारी- | [उन बाल गजाननके आ जानेसे] गायें कामधेनुके
सुलभ स्नेहके कारण] मुनिपत्नीके स्तन पुष्ट तथा | सदृश [प्रचुर दुग्ध देनेवाली] हो गयीं, सूखी बावडियाँ
दुग्धयुक्त हो गये। बालक जब स्तनपान करने लगा तो | जलपूर्ण हो गयीं और उन पराशरमुनिके आश्रमके सूखे
इससे मुनिपत्नी आनन्दविभोर हो उठीं ॥ २९ १/२ ॥ | वृक्ष भी फलोंसे लद गये। जो मनुष्य इस [गजाननलीलारूप
तदुपरान्त जब उन राजा वरेण्यको यह सूचना मिली | वृत्तान्त] -का श्रवण करेगा, वह पुत्र तथा धन-वैभवसे
कि दिव्य दृष्टिसम्पन्न महर्षि पराशरके द्वारा बालकका | सम्पन्न हो जायगा ॥ ३३-३४ ॥
॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डके अन्तर्गत 'पराशरदर्शन' नामक एक सौ तैंतीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १३३ ॥
एक सौ चौंतीसवाँ अध्याय
पराशराश्रममें मूषकका प्रबल उपद्रव और गजाननका उसे दमितकर अपना वाहन बनाना
ब्रह्माजी बोले- वह बालक अपनी लीलाओंके | प्राचीन कालकी बात है, इन्द्रकी सभामें क्रौंच नामक
द्वारा माता-पिताको आनन्दित करता हुआ [महर्षि | श्रेष्ठ गन्धर्वने शीघ्रतावश वामदेवमुनिको चरणोंके अग्रभागसे
पराशरके आश्रममें] दिन-अनुदिन वैसे ही बढ़ने लगा, | ठोकर मार दी, इससे [कुपित हुए] मुनिने उसे शाप दे
जैसे [शुक्लपक्षमें] चन्द्रमा बढ़ता है ॥ १ ॥ | दिया कि हे गन्धर्व ! तू मूषक बन जायगा ॥ ७ १/२ ॥
व्यासजीने कहा- हे ब्रह्मन् ! हे प्रभो ! आप | क्रौंचने मुनिसे शापमुक्तिके लिये आदरपूर्वक प्रार्थना
गुणेशके द्वापरयुगीन चरित्रोंका वर्णन कीजिये, उनके | की, तो वे उससे बोले कि तुम मृत्युलोकमें [जाकर]
पूर्वकालिक चरित्रोंको सुनकर मैं तृप्त नहीं हो सका हूँ। | सभीके लिये अत्यन्त दुर्धर्ष मूषक बनोगे तथा तुमको
हे चतुरानन ! इन [गौरीनन्दन]-का 'गजानन' यह नाम | नियन्त्रित करके भगवान् गुणेश्वर अपना वाहन बना
कैसे हुआ और वाहन मूषक क्यों बना- यह सब मुझे | लेंगे। वे विश्वस्रष्टा गुणेश ही तुम्हारे प्रति सदय होकर
विस्तारपूर्वक बतलाइये ॥ २-३ ॥ | मोक्ष प्रदान करेंगे। तब वह गन्धर्व मूषकके-से रूपवाला
ब्रह्माजी बोले- इस विषयमें एक पुरातन इतिहास | हो गया और [स्वर्गसे च्युत होकर] महर्षि पराशरके
[विद्वज्जन] बतलाते हैं, जिसमें भृगुवंशी कवि अर्थात् | आश्रम-परिसरमें आ गिरा ॥ ८-१० ॥
महर्षि शुक्रके साथ प्रह्लादका संवाद हुआ था ॥ ४ ॥ | वह पर्वतशिखरके सदृश विशाल तथा भयानक
प्राचीन कालमें प्रह्लादजीने इसी प्रकार महामुनि शुक्रसे | आकृतिवाला और महान् पराक्रमसे सम्पन्न था। उसके
पूछा था, तब उन्हें भगवान् कवि (शुक्राचार्य) -ने जो | रोम, नख तथा दाढ़ें- ये सभी अतीव दीर्घकार थे और
बतलाया था, उसे इस समय [मुझसे] श्रवण करो ॥ ५ ॥ | वह प्रबल गर्जना कर रहा था ॥ ११ ॥
शुक्राचार्यने कहा- हे प्रह्लाद ! जिस कारणसे | उसने पराशरजीके आश्रममें घनघोर उपद्रव प्रारम्भ
मूषक इन गजाननका वाहन बना, उसे मैं तुम्हें बता रहा | कर दिया। वहाँ जो अनाज रखा था, उसने सबका
हूँ, उस [वृत्तान्त]-का तुम श्रवण करो, [क्योंकि] वह | भक्षण कर डाला और मिट्टीके बरतनोंको तोड़-फोड़
सुननेमात्रसे समस्त कामनाओंको सिद्ध करनेवाला है ॥ ६ ॥ | दिया। [आश्रममें रखी हुई] पुस्तकें, कपड़े, उत्तम

क्री०ख०-अ०१३४] * पराशराश्रममें मूषकका प्रबल उपद्रव * ५९९
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वल्कल तथा और भी जो कुछ सामग्री थी, उस मूषकने
सबका भक्षण कर लिया ॥ १२-१३ ॥
उसने अपनी पूँछके आघातसे वृक्षोंको भूतलसे उखाड़
फेंका और अपनी 'चूँ-चूँ' इस ध्वनिसे पूरे संसारको
प्रतिध्वनित कर दिया। उस मूषकके वैसे कार्यकलापोंको
जानकर मुनीश्वर पराशरजी चिन्तित हो गये और सोचने
लगे कि दुरात्मा [जनों]-के उपद्रवोंसे युक्त स्थान तो
निस्सन्देह त्याग देनेयोग्य ही होता है॥ १४-१५ ॥
इस समय कहाँ जाया जाय, किस स्थानपर रहनेसे
सुख होगा और [यदि यहीं रहकर] प्राणोत्सर्ग करूँ तो
[वह भी ठीक नहीं है; क्योंकि] शास्त्रचिन्तकोंने प्राण-
त्यागको महान् अपराध बतलाया है। इस सुखद आश्रममें
न जाने किस कर्मविपाकवश दुःख प्राप्त हो रहा है?
इस समय मैं किसका स्मरण करूँ और कौन इस दुःखसे
हमें छुड़ायेगा? इस आश्रममें ऐसा कौन है, जो इसका
नाश कर सकेगा, इसका वध कर पानेमें कौन समर्थ हो
सकेगा ? आज मैं किसकी शरणमें जाऊँ और कौन हमें
बचायेगा ? ॥ १६-१८ ॥
ब्रह्माजी बोले-अपने [धर्मतः] पिता पराशरजीकी
ऐसी बातें सुनकर अनन्तपराक्रमी बालक गजाननने मधुर
वाणीमें कहा कि महान् प्रभावसम्पन्न तथा दुष्टोंका संहार
करनेवाले मेरे होते हुए आप तनिक भी चिन्तित न होइये।
मैं जब आपका पुत्र बना हूँ तो जो कुछ भी आपको प्रिय
होगा, वह अवश्य ही सम्पन्न करूँगा ॥ १९-२० ॥
हे मुने ! मेरे गर्जनसे यह पृथिवी फटने लगती है
और मेरे चरणोंके आघातसे पर्वत चूर-चूर हो जाते हैं।
'हे तात ! मेरा कौतुक देखिये, अभी मैं इस मूषकको अपना
वाहन बनाता हूँ।' ऐसा कहकर शिशु गजाननने करोड़ों
सूर्योंके सदृश प्रकाशमान अपना पाश फेंका ॥ २१-२२ ॥
वह पाश [नीले] आकाशमें जाकर वैसे ही शोभित
हो रहा था, जैसे बादलोंके बीचमें बिजली शोभायमान
होती है। तब देवताओंने भयके कारण उसी क्षण अपने-
अपने निवासस्थान त्याग दिये अर्थात् भागने लगे ॥ २३ ॥
वह [मूर्तिमान्] पाश मुखसे मानो अग्निका वमन
करता हुआ और दसों दिशाओंमें भ्रमण करता हुआ पाताल
[-तक पहुँच गया और वहाँ]-से मूषकका कंठ बाँधकर
उसे बाहर ले आया। मूषक पाशकी शक्तिसे व्यथित होकर
गम्भीररूपसे मूर्च्छित हो गया और [कुछ कालके उपरान्त
चैतन्यलाभ करके] अतिशय क्रुद्ध हो गया। मूषकका
[कंठ बँध जानेके कारण] श्वास अवरुद्ध हो रहा था,
इससे वह शोकसे व्याकुल हो उठा ॥ २४-२५ ॥
वह [मन-ही-मन] कहने लगा कि [मैं तो स्वयं
सबका अन्त करनेमें समर्थ हूँ, तब मुझ] कालका मरण
क्या सम्भव है, [अतः प्रतीत होता है कि यह]
प्रारब्धकी ही रचना है। जो कुछ होना होता है, वह
होकर रहता है, पुरुषार्थ तो निरर्थक ही है ॥ २६ ॥
जिसने केवल अपनी दाढ़ोंके अग्रभागसे बहुत सारे
पर्वतोंको विदीर्ण कर दिया था, वह मैं कभी देवताओं,
असुरों, राक्षसों अथवा मनुष्योंको [अपने समक्ष] गिनता
ही नहीं था। ऐसे पराक्रमवाले मुझको कौन पाशके द्वारा
आक्रान्तकर मरणोन्मुख कर रहा है ! ॥ २७१/२ ॥
ब्रह्माजी बोले-वह मूषक जब इस प्रकार बोल
रहा था, तभी गजाननने संकल्पबलसे पाशको खींचा तो
जैसे गारुड़ी विद्याको जाननेवाला सर्पको तत्काल खींच
लेता है, वैसे ही मूषकके सहित वह पाश खिंचा चला
आया ॥ २८-२९ ॥
पाशबद्ध कंठवाला वह मूषक गजाननको देखते ही
तत्काल उनके वास्तविक स्वरूपको जान गया और उन
अनामय, विभु गजाननदेवको नमस्कार करके परम भक्ति-
भावसे चिदानन्दघन प्रभुका स्तवन करने लगा ॥ ३०१/२ ॥
मूषक बोला- [हे देव!] आप ही समस्त विश्वके
स्वामी, निर्माता, पालक एवं संहारक हैं। आप गुणत्रयसे
परे होकर भी गुणत्रयको [सृष्टि आदि प्रयोजनोंसे] अंगीकार
करते हैं। आप मायासे अतीत हो करके भी मायाके प्रवर्तक
एवं मायावियोंको भी मोहग्रस्त करनेवाले हैं। मुनिजनोंके
हृदयकमलमें अधिष्ठित होनेवाले आपको ब्रह्मा आदि भी
नहीं जान पाते। आप ही कारण, करण (साधन), कर्ता
तथा कारणोंके भी कारण हैं ॥ ३१-३३ ॥
हे विभो ! मेरा परम सौभाग्य है कि जो श्रुतियोंके
द्वारा भी अगोचर हैं, उन [आप]-को मैंने आज अपनी

६०० * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण-
आँखोंसे देखा है, अतएव मेरा जन्म लेना तो सार्थक हो | तो वह [अत्यन्त पीड़ित हो गया और] उन देवदेवसे
गया। मेरे माता-पिता, नेत्रयुगल, विद्या, तपस्या, व्रत | बोला कि प्रभो! मैं तो आपका वाहन हूँ, अतः [मुझपर
और जप—ये सभी धन्य [और सफल] हो गये ॥ ३४ ॥ | कृपा करके आप] अल्प भारवाले हो जाइये ॥ ४० ॥
ब्रह्माजी बोले—मूषकके ऐसे स्तुतिवाक्य सुनकर | उसके याचनापूर्ण वचनोंके कारण विभु गजानन
गजानन प्रसन्न हो गये और उसका अपने प्रति अविचल | अल्प भारवाले हो गये। इस महान् आश्चर्यको देखकर
भक्तिभाव जानकर वे विभु मूषकसे कहने लगे— ॥ ३५ ॥ | महर्षि पराशरने [गजाननको] प्रणाम करके कहा—मैंने
हे निष्पाप मूषक ! देवताओं और ब्राह्मणोंसे द्रोह | तीनों लोकोंमें कहीं भी [किसी] बालकमें [ऐसा] पौरुष
करनेवाले तुम्हारे ही पुरुषार्थके कारण मैं निर्गुण होकर | नहीं देखा, [जैसा कि तुमने प्रकट किया है।] जिसके
भी दुष्टोंका नाश तथा सत्पुरुषोंकी रक्षा करनेके लिये | घोषसे पर्वत विदीर्ण हो गये और लोकपाल [तक] अपने-
सगुण बन गया हूँ। तुमने जो मेरी शरण ग्रहण कर ली | अपने स्थानोंसे पतित हो गये, उस मूषकको तुमने बलपूर्वक
है, इसलिये मैंने तुम्हें अभय दे दिया, अब तुमको जिस | क्षणमात्रमें अपना वाहन बना लिया ॥ ४१-४२१/२ ॥
वरकी आकांक्षा हो, उसे माँग लो ॥ ३६-३७ ॥ | इसी बीचमें बालककी ममतामयी माता अर्थात्
मूषक बोला—हे गजानन ! मुझे आपसे कोई वर | मुनिपत्नी वहाँपर आयीं और उन शिशुरूप गजाननको
नहीं चाहिये, यदि आप चाहें तो मुझसे वांछित वर माँग | प्रीतिपूर्वक गोदमें लेकर झरते हुए दूधवाले स्तनोंसे
लीजिये ॥ ३७१/२ ॥ | दुग्धपान कराने लगीं। माताने शिशुसे कहा कि मैं तुम्हारा
ब्रह्माजी बोले—उस घमण्डी चूहेके ऐसा कहनेपर | न तो वास्तविक स्वरूप जानती हूँ और न तुम्हारे
गजानन उससे बोले कि [हे मूषक !] यदि तुम सचमें | पराक्रमका ही मुझे ज्ञान है। हम लोगोंके जन्म-
वर देनेकी बात कह रहे हो, तो मेरे वाहन बन जाओ। | जन्मान्तरके पुण्योंके कारण ही तुम हमारे घर आये हो।
जब मूषकने कहा कि 'ऐसा ही .हो', तो पिंगलनेत्र | इसके उपरान्त वे गजानन मूषकको बाँधकर साधारण
गजानन तत्काल उसे आक्रान्त करके उस मूषकपर | बालककी भाँति क्रीडा करने लगे। [ब्रह्माजीने व्यासजीसे
आरूढ़ हो गये ॥ ३८-३९ ॥ | कहा कि ब्रह्मन् !] इस प्रकारसे मैंने गणपति के मूषकवाहन
जब गजानन उसे अपने भारसे चूर-चूर करने लगे | होनेकी कथा आपको सुनायी ॥ ४३-४५॥
॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डके अन्तर्गत 'क्रौंचाक्रमण' नामक एक सौ चौंतीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १३४ ॥
एक सौ पैंतीसवाँ अध्याय
गजाननके वाहन मूषकके पूर्वजन्मका वर्णन
व्यासजीने कहा—हे पद्मज ! उस मूषकने पूर्वमें | एकाग्र चित्तसे सुनो। सुमेरुपर्वतके शिखरपर महर्षि
ऐसा क्या पाप और पुण्य किया था, जिसके कारण उसे | सौभरिका विशाल तथा रमणीक आश्रम था। वह वृक्षोंसे
मूषकयोनि तथा गजाननदेवके वाहकत्वकी प्राप्ति हुई? | परिपूर्ण और नाना प्रकारके पक्षियोंसे भरा था। उसमें
हे ब्रह्मन् ! मेरे इस कौतूहलका आप समग्रतः समाधान | अनेक बावड़ियाँ और सरोवर थे तथा बहुत-से मुनिजन
कर सकते हैं, अतः यह बात विस्तारसे बतलाइये कि | वहाँ रहा करते थे ॥ ३-४ ॥
वह पूर्वजन्ममें कौन था ? ॥ १-२ ॥ | वहाँ महर्षि सौभरिके दर्शनार्थ दिनानुदिन वसिष्ठ
ब्रह्माजी बोले—हे वत्स ! तुमने उचित प्रश्न | आदि मुनिजन एवं इन्द्रप्रभृति देवगण आया करते थे।
किया है। यह तो मेरे मनको भी प्रिय जान पड़ता है। | महर्षि सौभरि परमात्माके अनुचिन्तनमें निरत और विपुल
इस प्रसंगमें वह समस्त वृत्तान्त मैं तुम्हें बता रहा हूँ, उसे | तपके कारण बढ़े हुए तेजसे सूर्य तथा अग्निसे अधिक