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श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

Ganesha Purana Gita Press Special Edition

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished656 पृष्ठ

ब्रह्माजीके मुखसे मेरा माहात्म्य सुन लिया है, जिसके

क्री०ख०-अ०१५१ ] * गणेशपुराणके श्रवणसे राजाकी रोगनिवृत्ति * ६२९
आप अठारह पुराणों तथा उतने ही उपपुराणोंके प्रणेता
बनेंगे। आपने पूर्वकालमें दम्भवश मेरा स्मरण-पूजन नहीं
किया था, यही कारण है कि आपकी वाणी आश्चर्यजनक
रीतिसे स्तम्भित हो गयी। हे अनघ! अब आपने
ब्रह्माजीके मुखसे मेरा माहात्म्य सुन लिया है, जिसके
कारण इस समय आपका समस्त [दम्भजनित] पाप
विलीन हो चुका है। अब मैं तुम्हारे अन्तःकरणमें [निर्मल
बोधके रूपमें] प्रविष्ट हो रहा हूँ॥ १२-१६१/२ ॥
भृगुजी बोले-ऐसा कहकर वे विभु व्यासमुनिके
अन्तःकरणमें प्रविष्ट हो गये। [गणपतिके प्रवेश करते
ही] मुनिवर व्यासजीने करोड़ों सूर्योंके जैसा अतुलनीय
तेज प्राप्त कर लिया। वह [गणपतिका] तेज सभी
दिशाओंको उद्भासित करने लगा। तदुपरान्त व्यासजीने
गजाननकी एक विशाल मूर्ति बनवायी और उसे देवप्रासाद
(देवमन्दिर)-में स्थापित कर दिया तथा उसका विविध
उपचारोंसे पृथक्-पृथक् (उपचारोंके क्रमभेदसे) पूजन
किया॥ १७-१९॥
यह सिद्धिक्षेत्र सभी लोगोंके नेत्रोंको पवित्र करनेवाला,
शुभावह तथा मन्त्रानुष्ठानमें तत्पर जनोंको अनेकविध
सिद्धियाँ देनेवाला होगा- ऐसा कहकर तथा उन
गणपतिदेवसे अनुज्ञा प्राप्तकर नारायणस्वरूप व्यासदेवने
[वहाँसे प्रस्थान किया और अपने आश्रममें आकर]
ब्रह्माजीके मुखसे सुने गये उस गणेशपुराणका महर्षि
वैशम्पायनको श्रवण कराया। इसके अनन्तर वह पुराण
भूतलपर विख्यात हुआ॥ २०-२११/२ ॥
हे नृप! उसी पुराणको समग्ररूपमें आज मैंने तुम्हें
सुनाया है। हे नृपसत्तम! इसके सदृश पवित्र करनेवाला
कोई अन्य साधन तीनों लोकोंमें नहीं है। यह सभी
लोगोंको परमानन्दकी प्राप्ति करानेवाला है॥ २२-२३ ॥
हे सोमकान्त! तुम्हें इस पुराणका प्रवचन कभी
दुष्टोंसे नहीं करना चाहिये और विनयशील भक्तोंको
प्रयत्नपूर्वक अवश्य ही सुनाना चाहिये। मैं तो इसका
निरन्तर स्मरण और पारायण किया करता हूँ। हे
राजसत्तम! तुमपर करुणा होनेके कारण मैंने इसे सुनाया
है। तुमको गजाननदेवका निरन्तर ध्यान, स्मरण तथा
[उनके मन्त्रका] जप करते रहना चाहिये॥ २४-२५ ॥
॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डके अन्तर्गत 'व्यासानुग्रह-सिद्धिक्षेत्रवर्णन' नामक
एक सौ पचासवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ १५०॥
एक सौ इक्यावनवाँ अध्याय
गणेशपुराणके श्रवणसे राजाकी रोगनिवृत्ति और गणपतिके
द्वारा प्रेषित विमानपर आरूढ़ होकर परमधामगमन
सूतजी बोले-राजा सोमकान्त मुनीश्वर भृगुसे
इस प्रकार नित्यप्रति कथाश्रवण करते और कथाश्रवणके
पुण्यकी भावना करके सूखे आम्रके मूलमें जल डाल
देते। जब ऐसा करते हुए उनको एक वर्ष व्यतीत हो
गया, तब वह आम्रवृक्ष पुराणश्रवणजनित पुण्यके प्रभावसे
[नूतन] पल्लव, मंजरी और फलोंके कारण अतीव
कान्तिमय तथा शोभासम्पन्न हो गया॥ १-२॥
वे सोमकान्त कुष्ठ व्याधिसे मुक्त और दिव्य
कान्तिसम्पन्न हो गये। उनका शरीर व्रणरहित हो गया,
शरीरसे निकलनेवाली दुर्गन्ध समाप्त हो गयी और उत्तम
गन्ध आने लगी। राजा सोमकान्तको दसों दिशाओंमें
फैलती हुई उत्तम गन्धसे युक्त, दिव्यदेह, कोटि-कोटि
चन्द्रमाओंके सदृश आह्लादक, सूर्यतुल्य तेजस्वी और
विषादशून्य देखकर लोग विस्मयमें पड़ गये कि अरे!
यह तो वैसा अर्थात् गलित कुष्ठके कारण विकृत
शरीरवाला था, फिर यह गणेशपुराणकी दोषहारिणी
महिमाके प्रभावसे कैसे ऐसा अर्थात् नीरोग और सुदर्शन
हो गया है?॥ ३-५॥
भृगुजी बोले-हे नृपशार्दूल! यह उपलब्धि
तो तुम्हें पुराणश्रवणके कारण ही हुई है। अब तुम
जाओ, जब वर्षभरकी लम्बी अवधिसे उत्कण्ठित
अपने पुत्र, मन्त्रिगण और प्रजाजनोंको देखोगे तो

यहाँ प्रस्तुत पृष्ठ का संपूर्ण पाठ्य (Text) दिया गया है:

६३० * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण-
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[बायाँ कॉलम]

बड़ी प्रसन्नता होगी ॥ ६१/२ ॥
सूतजी बोले—महर्षि भृगुकी ऐसी बातें सुनकर
राजा सोमकान्त उनके चरणोंमें गिर पड़े और मानो
आनन्दसागरमें डूबे हुए-से वे कहने लगे ॥ ७१/२ ॥
राजा बोले—हे मुने! मैंने आज आपके तपकी
अद्भुत महिमाका दर्शन किया और पुराणश्रवणके महत्त्वका
भी अनुभव किया, जिसके कारण कुष्ठसे गलती
देहवाला मैं पतित व्यक्ति भी दिव्य शरीरवाला हो गया।
हे मुनिसत्तम! इस [दिव्य] देहका निर्माण करनेवाले
[सच्चे] माता-पिता तो आप ही हैं। [आपकी कथाका
प्रभाव कुछ ऐसा है कि] रसहीन आम्रवृक्ष भी फल-
पुष्पादिसे युक्त हो गया। इसलिये मैं आपको छोड़कर
जाना ही नहीं चाहता, अब मुझे पुत्र (आदि बन्धु-
बान्धवों) तथा प्रजाजनोंसे क्या प्रयोजन है? राजाके इस
कथनको सुनकर महर्षि भृगु पुनः कहने लगे ॥ ८-११ ॥
भृगुजी बोले—हे जनेश्वर! जन्मान्तरीय पुण्योंके
प्रभावसे तुमने मेरे द्वारा वर्णित इस श्लाघनीय पुराणका
श्रवण किया, जिसके कारण तुम्हारा पाप नष्ट हो गया।
[वास्तवमें] इस गणेशपुराणकी महिमाका वर्णन कर ही
कौन सकता है? अब तुम अपने नगरको प्रस्थान करो
और मेरा स्मरण करते रहना ॥ १२-१३ ॥
जब वे लोग इस प्रकार संवाद कर रहे थे, तभी
उन्होंने एक विशाल विमान देखा, जो करोड़ों सूर्योंके
समान तेजोमय था ॥ १४ ॥
भृगुजी बोले—हे नृप! तुम्हारे लिये ही यह
अद्भुत विमान आया है। अब तुम इसपर आरूढ़ हो
जाओ और गणपतिका सान्निध्य पानेके लिये प्रस्थान
करो। हे राजन्! जिस विमानको मुनीश्वर साधनानुष्ठानादिके
द्वारा भी नहीं प्राप्त कर पाते, उसे तुमने पुराणश्रवणके
कारण हुए गणपतिके अनुग्रहसे पा लिया है ॥ १५-१६ ॥
जब वे लोग इस प्रकार वार्तालाप कर रहे थे, तभी
विमान क्षणभरमें भूतलपर आ पहुँचा। उसमें विनायकके
गण विद्यमान थे। चार भुजाओंसे युक्त वे गण मुकुट,
बाजूबन्द, हार आदि आभूषणोंसे अलंकृत थे। उन्होंने
दिव्य चन्दनानुलेपन तथा दिव्याम्बर धारण किया था।

[दायाँ कॉलम]

उनके हाथोंमें कमल तथा परशु शोभायमान थे। [उस
विमानमें गणोंके साथ] नृत्य करती हुई किन्नरकन्याएँ
थीं और मृदंग, ताल (एक विशिष्ट वाद्य) तथा करताल
बजाते हुए किन्नर थे, जो गायन कर रहे थे। यह देखकर
राजा सोमकान्त पुनः कहने लगे ॥ १७-१९ ॥
राजा बोले—हे मुनीश्वर! हे ब्रह्मन्! मैंने यद्यपि
विमानोंकी चर्चा तो अनेक बार सुनी थी, किन्तु उसे प्रत्यक्ष
देख पानेका सौभाग्य तो आज आपके तपोबलके कारण
ही मुझे मिला है। आपकी महिमाका वर्णन बारम्बार
बहुत-से मुखोंसे होता रहा है, जिसे मैं अपने कानोंसे
सुनता आया हूँ, किंतु आपसे पुराणश्रवण करके मैंने
उसका आज स्वयं अनुभव भी कर लिया है ॥ २०-२१ ॥
जब राजा इस प्रकार कह रहे थे, तभी वे दूत
विमानसे उतरे और प्रणाम करके राजा सोमकान्तसे
कहने लगे कि हे शुद्धात्मन्! तुमने पुराणश्रवणादिसे जो
पुण्य अर्जित किया है, उसके कारण परात्पर गजाननदेवने
तुम्हारा स्मरण किया है। उन्हींकी आज्ञासे हम दूत लोग
पवित्र कीर्तिवाले तुमको ले जानेके लिये विमान लेकर
आये हैं। अब तुम उस उत्तमोत्तम गणपतिलोकके लिये
प्रस्थान करो। उन गजाननका दर्शन करके तुम जन्म-
मरणसे मुक्त हो जाओगे और वहाँ गणपतिदेवके समीप
जाकर उनके अनुग्रहसे तुम आत्यन्तिक सुख प्राप्त
करोगे ॥ २२-२५ ॥
दूतोंकी वे बातें सुनकर राजाको देहका भान न रहा
और सारा शरीर रोमांचित हो गया। वे गद्गद वाणीमें
बोले—'हे निष्पाप दूतो! चराचर विश्वकी सृष्टि करनेवाले,
निर्गुण, गुणोंको [सृष्टिहेतु] क्षुब्ध करनेवाले, विश्वके
प्रधान कारण, दीनरक्षक, परात्पर उन गजाननदेवने
कृपापूर्वक मेरा स्मरण किया है। ब्रह्मा आदि देवगण
तथा सनक आदि परमर्षिगण ध्यानावस्थित होकर भी
जिनका स्वरूपसाक्षात्कार नहीं कर पाते और जो अनन्त
गुणोंसे परिपूर्ण हैं, उन्होंने मेरे लिये यह उत्तम विमान
भेजा है ॥ २६-२८१/२ ॥
जो परम मायावी, नानाविध अवतार धारण करनेवाले
तथा अनेकानेक रूपोंवाले हैं, उन गजाननदेवने मेरा

क्री०ख०-अ०१५२] * अमात्योंका राजसभामें जाकर हेमकण्ठको राजाके आगमनकी सूचना देना * ६३१
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किसलिये स्मरण किया, यह बात आश्चर्यजनक है?' ॥ २९१/२ ॥
राजाने इस प्रकार [दूतोंसे] कहकर महर्षि भृगुको नमस्कार किया और उनसे कहा—[हे मुनीश्वर!] आपके अनुग्रहके कारण और आपकी आज्ञासे अब मैं गजाननके विमानपर आरूढ़ होकर दूतोंके साथ प्रस्थान कर रहा हूँ, आप [कभी] मेरा विस्मरण नहीं कीजियेगा ॥ ३०-३१ ॥
सूतजी बोले-राजाके कथनको सुनकर सम्भ्रमविह्वल महर्षि भृगुके नेत्र आनन्दाश्रुपूरित हो गये, उनका शरीर रोमांचित हो उठा। भृगुजीने राजाको कण्ठसे लगा लिया और कहने लगे- 'हे नृपते! मैं बड़ा ही भाग्यहीन ब्राह्मण हूँ। तुमने उत्तम पुण्यफल प्राप्त किया है। गणेशलोकमें पहुँचकर मुझको कभी भूल मत जाना' ॥ ३२-३३ ॥
इस प्रकार [अपने-अपने मनोभावोंको एक-दूसरेसे] कहकर राजा सोमकान्त और महर्षि भृगु एक-दूसरेका हाथ पकड़े हुए [आश्रमसे] बाहर निकले। [तदुपरान्त] परमप्रसन्न राजाने उन मुनिवर भृगुको नमस्कार किया और दूतोंके कथनके कारण उतावले-से होकर उस विमानमें आरूढ़ हो गये। [राजाकी पत्नी] सुधर्मा तथा [राजाके अनुगामी] दोनों अमात्य भी उस उत्तम विमानपर आरूढ़ हुए। इसके बाद वे दूत भी विमानमें आरूढ़ हो गये। [विमानमें बज रहे] वाद्योंके घोषने दिग्दिगन्तको व्याप्त कर लिया। विमानकी शोभाको देखकर राजा सोमकान्त आनन्दमग्न हो गये ॥ ३४-३६ ॥
राजा सोचने लगे कि यह अवसर मुझे जन्मान्तरीय पुण्यके ही कारण प्राप्त हुआ है। इसके अनन्तर महर्षि भृगुके देखते-देखते विमान आकाशमें उड़ चला ॥ ३७ ॥
इस पार्थिव शरीरसे सर्वोत्कृष्ट पदकी प्राप्तिको देखकर राजा अत्यन्त विस्मित हुए और दूतोंको प्रणाम करके उस परम-धामकी ओर चल पड़े ॥ ३८ ॥
॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डके अन्तर्गत 'सोमकान्तको विमानप्राप्तिका वर्णन' नामक एक सौ इक्यावनवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १५१ ॥

एक सौ बावनवाँ अध्याय
अमात्योंका राजसभामें जाकर हेमकण्ठको राजाके आगमनकी सूचना देना और उसी प्रसंगमें राजा सोमकान्तके ऊपर हुए गणपति-अनुग्रह आदिका वर्णन करना

सूतजी बोले-[विमानमें बैठे हुए] राजा सोमकान्तने ऊपरसे ही अपनी राजधानी देवपुरका अवलोकन किया और वहाँके मुख्यद्वार, अट्टालिका आदिकी स्वर्णिम कान्तिको देखकर बड़े प्रसन्न हुए ॥ १ ॥
तदुपरान्त [महारानी] सुधर्माने रमणीय सभाभवनको देखकर अपने पुत्रका स्मरण किया और स्नेहके कारण गद्गद वाणीसे कहने लगीं- 'मेरा पुत्र हेमकण्ठ भद्रासन-पर बैठा होगा और आज वर्षभरकी अवधि पूर्ण होनेसे वह हम माता-पिताकी प्रतीक्षा कर रहा होगा। हे स्वामिन्! हे कृपानिधे! आपको [वहाँ जाकर] उसे अवश्य ही दर्शन देना चाहिये।' तब पत्नीकी ऐसी बातको सुनकर राजा चिन्तित हो उठे ॥ २-४ ॥
राजा बोले-मेरा पुत्र हेमकण्ठ पता नहीं इस समय जीवित होगा या मर चुका होगा। मैंने उससे कहा था कि वर्षभरके बाद तुम मुझे देख सकोगे। मैंने कभी असत्य भाषण नहीं किया, किन्तु इस असत्यसे बचकर अब कैसे निकलूँ? इस समय न तो मैं [पुत्रके पास] जा पा रहा हूँ और न ही परमपद (गणपतिधाम)-को त्यागनेमें ही सक्षम हो पा रहा हूँ। ये दोनों बातें अर्थात् परमधामगमन और पुत्रसे भेंट-परस्पर विरोधी हैं, अतः इन दोनोंका साथ-साथ पूर्ण होना कठिन है-ऐसा [कहते हुए] राजा फूट-फूटकर रोने लगे ॥ ५-६१/२ ॥
उन दोनों (राजा-रानी)-को शोकाकुल देखकर दूत उन नृपश्रेष्ठसे कहने लगे- [राजन्!] आप दोनोंका

६३२ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण-
रोदन सुनकर हमको बड़ी दया आ रही है। हम लोग
अभी क्षणभरमें यहीं विमानको उतार देते हैं, आप अपने
पुत्रको देखकर शीघ्रतासे चले आइये। आप लोगों (की
समस्या)-का समाधान करके हमें भी अत्यन्त सन्तुष्टि
होगी॥ ७-८१/२॥
तदुपरान्त दूतोंने देवपुरके उत्तरी भूभागमें विमानको
उतार दिया। गणेशपुराणश्रवणरूप पुण्यके कारण आये
उस विमानने अपनी प्रभासे नगरको आच्छादित कर
लिया तथा वाद्यध्वनियोंसे उसे गुँजा दिया॥ ९-१०॥
तदुपरान्त [राजाके अमात्य] सुबल और ज्ञानगम्यने
राजा तथा दूतोंको नमस्कार किया और [उनसे अनुमति
लेकर] उस हेमकण्ठको समस्त वृत्तान्त बतलानेके लिये
वहाँ जा पहुँचे॥ ११॥
उन्होंने क्षणभरमें भद्रासनपर विराजमान हेमकण्ठको
देखा, जो अमात्यों, नागरिकों एवं सन्नद्ध [अस्त्र-
शस्त्रादिसे संयुक्त] महाबली वीरशिरोमणियोंसे घिरा हुआ
उत्तम नृत्यका अवलोकन कर रहा था॥ १२१/२॥
तभी हेमकण्ठके मन्त्रियोंकी दृष्टि [सहसा] सुबल
और ज्ञानगम्यपर पड़ी। [मन्त्रियोंके संकेतपर] सभी वीर
और मन्त्रिगंणसहित हेमकण्ठ उठ खड़ा हुआ। वे सब
लोग ज्ञानगम्य और सुबलका आलिंगन करनेके लिये
संभ्रमपूर्वक वहाँ जा पहुँचे॥ १३-१४॥
जब उन सभीकी आपसी भेंट-मुलाकात हो गयी,
तब परमहर्षित राजपुत्र हेमकण्ठ उनके पास गया और
रोमांचित होता हुआ उनसे कहने लगा-'मन्त्रियो ! मेरे
माता-पिता सकुशल हैं या नहीं। उन दोनोंको छोड़कर
आपलोग अकेले ही यहाँ कैसे चले आये ?' ऐसा
कहकर हेमकण्ठने उन दोनोंको उत्तम आसनपर बैठाया
और वस्त्र, चन्दन, आभूषण, फल, ताम्बूल, सुवर्ण
आदिसे पूजन किया ॥ १५-१७॥
[पूजनके उपरान्त वह पुनः कहने लगा कि] उन
दोनों (माता-पिता)-के न होनेके कारण मेरे प्राण सर्वदा
कण्ठमें ही अटके रहते हैं। मैं रातों-दिन उन्हींके बारेमें
सोचा करता हूँ, उनके अतिरिक्त और कोई बात मेरे मनमें
आती ही नहीं है। मेरे पिताश्रीने मुझसे पहले ऐसा कहा
था कि एक बार दर्शन देने अवश्य आऊँगा, अतः वे
अपनी उस बातको मिथ्या कैसे होने देंगे ?॥ १८-१९॥
वे दोनों (मन्त्री) बोले-हे नृप ! व्यर्थमें चिन्ता
मत करो, तुम्हारे माता-पिता सकुशल हैं। उन दोनोंके
पुण्यप्रभावको तीनों लोकोंमें कौन जान सकता है ? ॥ २० ॥
जब आपसे अनुमति लेकर हम चारों लोग (दो
मन्त्री, राजा और रानी) नगरसे निकले तो सुकुमार होनेके
कारण आपके पिताको अत्यन्त कष्टका अनुभव होने
लगा। उनके कमलतुल्य चरण रक्तरंजित हो गये। वे
क्षुधासे अत्यधिक पीड़ित रहने लगे, उन महाराजको कन्द,
मूल, फलादिसे सन्तुष्टि नहीं होती थी ॥ २१-२२ ॥
आपकी माताकी भी वैसी ही दशा हो गयी। वे दोनों
उस समय [सुखपूर्वक] एक डग भी नहीं चल पाते थे।
हम सभी बहुत समयतक भटकते रहे, तब हमें एक
विशाल और मनोरम सरोवर दिखायी पड़ा। [वहाँका
परिसर] वृक्षों तथा लताओंके कारण [अत्यन्त] शीतल
था। अतः महाराज वहीं विश्राम करने लगे और रानी
सुधर्मा थकी होनेपर भी उनके पैर दबाती रहीं ॥ २३-२४ ॥
[इधर जब] हम लोग कन्द-मूल आदि लेनेके
लिये निकले हुए थे, इसी बीचमें वहाँपर मुनीश्वर च्यवन
जल लेनेके लिये आये और उन्होंने दोनों (महाराज एवं
महारानी)-को देखा। मुनीश्वरने [बातचीतके द्वारा] उन
दोनोंकें हार्दिक अभिप्रायको जाना और अपने आश्रमकी
ओर चले गये। तबतक बहुत-से कन्द-मूल-फलादिको
लेकर हमलोग भी लौट आये ॥ २५-२६ ॥
[इसके उपरान्त च्यवनमुनिके पिता महर्षि भृगुकी
आज्ञासे] हम सभी लोग उनके आश्रममें गये, जहाँ
मुनिने हमारा प्रचुर सत्कार किया। [उन लोगोंने] हमें
षड्रसयुक्त भोजन कराया, जिससे हमें अत्यधिक विश्राम
मिला। इसके उपरान्त महर्षि भृगु और महाराज सोमकान्त
परस्पर बातचीत करने लगे। तब महाराजने अपना समस्त
वृत्तान्त उन मुनिवरको सुना दिया ॥ २७-२८ ॥
तदुपरान्त मुनिवर ध्यानके द्वारा [जान करके]
उनका पूर्वजन्म बतलाने लगे और करुणावश होकर
[पूर्वजन्मके] पाप तथा उसकी शान्तिका उपाय भी
उन्होंने बतलाया। हे नृप ! राजाके [पूर्वजन्मके] पापको
सुनकर हम लोग भयभीत हो उठे और महाराज

क्री०ख०-अ०१५२ ]* अमात्योंका राजसभामें जाकर हेमकण्ठको राजाके आगमनकी सूचना देना * ६३३
सत्यताके विषयमें] सन्देह करने लगे। वे उसपर
सन्देहपूर्वक विचार कर ही रहे थे कि तभी उनके
शरीरसे श्वेत वर्णके पक्षी निकले और वे राजाको नोचने
लगे। उनके चंचुप्रहारसे महाराज व्याकुल होकर गिर
पड़े तथा 'रक्षा कीजिये, रक्षा कीजिये'-इस प्रकार
मुनिसे प्रार्थना करने लगे। राजाकी प्रार्थनाको सुनकर
मुनिने कृपापूर्वक उनकी ओर देखा। मुनिके अवलोकनमात्रसे
क्षणभरमें वे पक्षी अन्तर्धान हो गये॥ २९-३२॥
तदुपरान्त महाराज अंजलि बाँधकर मुनिके समक्ष
बैठ गये और कृपानिधि भृगुमुनिने राजाके महापापको
जान लेनेके उपरान्त उनको भक्तिभावसे एक वर्षपर्यन्त
गणेशपुराणका श्रवण कराया ॥ ३३१/२॥
मुनिने सर्वप्रथम गणपतिके एक सौ आठ नामोंसे
अभिमन्त्रित जल राजाके ऊपर छिड़ककर अपनी तपस्याके
प्रभावसे राजाके शरीरसे एक ऐसे भयानक पुरुषको बाहर
निकाला, जिसके केश आकाशतक लम्बे थे, जिह्वा लटक
रही थी और जो भूखसे अत्यन्त पीड़ित था॥ ३४-३५॥
उसने भृगुमुनिसे भोजनकी याचना की, तो मुनिने
कहा कि यह जो सामने सूखा हुआ विशाल आम्रवृक्ष
है, तुम उसीका भक्षण करो। तब जैसे ही उस पुरुषने
आम्रवृक्षका स्पर्श किया, वैसे ही वह क्षणभरमें भस्म हो
गया। उसके बाद [जब धीवररूपधारी पापपुरुषने पुनः
भोजन माँगा तो] मुनिने धीवरसे कहा कि इसे (भस्मको)
ही खाओ। तब वह पुरुष मुनिके भयके कारण उसी
भस्ममें विलीन हो गया ॥ ३६-३७॥
इसके बाद मुनिने राजासे कहा- हे भूमिपाल !
पुराणश्रवणके इस महान् पुण्यको [जलरूप प्रतीकके
माध्यमसे] तुम वृक्षकी भस्ममें तबतक प्रतिदिन डालते
रहो, जबतक कि भस्मके स्थानपर पहलेके जैसा दूसरा
आम्रवृक्ष उत्पन्न न हो जाय। हे राजेन्द्र! ऐसा होते ही
तुम दिव्य शरीरवाले हो जाओगे॥ ३८-३९॥
दोनों मन्त्रियोंने कहा- हे नृप! [मुनिने जैसा
कहा था,] महाराजने वैसा ही किया। वे प्रतिदिन स्नान
करके बहुत देरतक कथाश्रवण करते और इसके बाद
भक्तिपूर्वक वह पुण्यफल उस भस्ममें डाल देते। जब
ऐसा करते-करते एक वर्ष बीत गया और गणेशपुराणकी
कथा भी पूर्ण हो गयी, तो वहाँ पहलेकी भाँति फूलों-
फलोंसे लदा हुआ एक वृक्ष उत्पन्न हो गया तथा
महाराज भी दिव्य कान्तिसे समन्वित और सूर्य-चन्द्रमाके
समान तेजोमय हो गये॥ ४०-४११/२॥
[इस प्रकारके दिव्य नैरोग्यलाभके कारण
कृतज्ञतावश] जबतक महाराज मुनिका स्तवन करते
अर्थात् उनके प्रति कृतज्ञता ज्ञापन करते, तबतक एक
विमान वहाँपर आया। उसमें नृत्य-गान हो रहा था और
वह वाद्योंकी ध्वनिसे गूँज रहा था। गणेशजीके दूतोंसे
युक्त वह विमान आश्रमके निकट आ पहुँचा। हे नाथ!
उस विमानकी शोभाका अवलोकन करके हम दोनोंके
नेत्र सफल हो गये॥ ४२-४३१/२ ॥
आपके पिताके पुण्योंकी अधिकताके कारण
गजाननदेवकी आज्ञासे उन दूतोंने आपके पिता महाराज
सोमकान्तको विमानमें बैठा लिया और महाराजके
संकेतसे दूतोंने हमलोगोंको भी प्रसन्नतापूर्वक विमानमें
बैठाया। महारानी सुधर्मा भी भृगुमुनिसे आज्ञा प्राप्तकर
विमानमें आरूढ़ हो गयीं ॥ ४४-४५॥
[गणपतिधामको जाते समय मार्गमें] जैसे ही देवपुर
दिखायी पड़ा, [आपके माता-पिताको] वैसे ही आपका
स्मरण हो आया। हे नृप! इसीलिये नगरके उत्तरी भूभागमें
विमानको उतारा गया है। आपके माता-पिता आपको
देखना चाहते हैं, इसीलिये हमलोग आपको बतानेके
लिये यहाँ आये हैं। उनके दर्शनार्थ आप शीघ्र चलिये,
अन्यथा वे लोग चले जायँगे ॥ ४६-४७॥
उन (मन्त्रियों)-की ऐसी बातें पूर्णरूपसे सुनकर
राजाको रोमांच हो आया, वह रोने लगा और अपने
माता-पिताको देखनेकी उत्कण्ठाके कारण मन्त्रियोंको
आगे करके त्वरापूर्वक वह दौड़ने लगा। नागरिकों और
सेवकोंसे घिरा, आँसू बहाता हुआ तथा गिरते हुए
आभूषणोंवाला वह हेमकण्ठ गणेशजीके दूतोंसे युक्त
विमानके समीप क्षणभरमें जा पहुँचा ॥ ४८-४९॥
॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डके अन्तर्गत 'हेमकण्ठदर्शन' नामक एक सौ बावनवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ १५२॥