श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)
Ganesha Purana Gita Press Special Edition
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
देव गजाननद्वारा उच्चरित वाणीको सुनकर महर्षि
३५६ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण-
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मन्थन) करते हैं॥ ३२१/२॥
देव गजाननद्वारा उच्चरित वाणीको सुनकर महर्षि
शौनकने भी मन्दारवृक्षके मूलसे गजाननकी एक सुन्दर
मूर्ति बनवाकर प्रसन्नतापूर्वक मन्दारपुष्पों, शमीपत्रों तथा
दूर्वादलोंके द्वारा उसका पूजन किया॥ ३३-३४॥
भगवान् गजाननने प्रसन्न होकर महर्षि शौनकको अनेक वर प्रदान किये। तदनन्तर वे अपने आश्रममें चले
आये और सर्वदा उस (मूर्ति)-का पूजन करने लगे॥ ३५॥
गृत्समद बोले—तबसे लेकर शमी भगवान्
गणेशजीको अत्यन्त प्रिय हो गयी। इस प्रकार मैंने
सम्पूर्ण वृत्तान्त आपको बतलाया, पुनः आपसे कुछ और
कहता हूँ॥ ३६॥
॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डमें 'गजाननकृत शमीमन्दार-प्रशंसावर्णन'
नामक पैंतीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ ३५॥
छत्तीसवाँ अध्याय
गजाननकी पूजा किये बिना यज्ञारम्भ करनेपर विघ्नस्वरूप देवी सावित्रीका रुष्ट होना और
उन देवों तथा मुनियोंको जलरूप (नदीरूप) प्राप्त करनेका शाप देना, पुनः
ब्रह्माजीके कहनेपर देवपत्नियोंका शमीपत्रद्वारा गणेशजीका पूजन
करना, प्रसन्न होकर गजाननका उन्हें दर्शन देना
गृत्समद बोले—सह्याद्रिपर्वतके महाप्रभावसम्पन्न
पुण्यक्षेत्रमें भगवान् शंकर देवी गिरिजा और अपने गणों
तथा मुनियोंके साथ निवास करते थे॥ १॥
एक बारकी बात है, देवताओं, गन्धर्वों तथा
किन्नरोंको साथ लेकर लोकपितामह ब्रह्माजी अपनी
दोनों पत्नियोंसहित भगवान् शिवका दर्शन करनेके लिये
वहाँ आये॥ २॥
भगवान् शंकरका दर्शनकर तथा उनकी पूजा करके
ब्रह्माजीने अपने आगमनका कारण उन्हें बताया। तब
भगवान् सदाशिवने जमदग्नि, वसिष्ठ, मार्कण्डेय, नारद,
कपिल, पुलह, कण्व, विश्वामित्र, त्रित तथा द्वित—इन
प्रधान ऋषियोंको वहाँ बुलाया॥ ३-४॥
भगवान् शिवके द्वारा बुलाये गये वे सभी ऋषि-
महर्षि तथा अन्य भी सभी उनके दर्शनकी अभिलाषासे
वहाँ आये। उन्होंने उषाकालमें शुभ मुहूर्त निकालकर
यज्ञका समारम्भ किया॥ ५॥
शीघ्रतावश यज्ञारम्भ करते समय वे ऋषि-महर्षि
मंगलमयी विनायकपूजाको करना भूल गये। उस समय
ब्रह्माजीकी पत्नी देवी सावित्री गृहके कामोंमें लगी थीं,
अतः उन मुनीश्वरोंने सावित्रीको छोड़कर ब्रह्माजीकी
दूसरी पत्नी गायत्रीको ही बैठाकर पुण्याहवाचन किया। तदनन्तर मातृकापूजन करनेके पश्चात् आभ्युदयिक श्राद्ध
सम्पन्न किया॥ ६-७॥
इसके पश्चात् वे मुनिगण ज्योंही अग्निकुण्डमें
अग्निकी स्थापना करने लगे, त्योंही देवी सावित्री वहाँ
उपस्थित हो गयीं और यज्ञका आरम्भ देखकर अत्यन्त
क्रोधमें भर गयीं। क्रोधसे रक्त नेत्रवाली वे सभी
सभासदोंको देखकर कहने लगीं॥ ८१/२॥
क्री०ख०-अ० ३६ ] * गजाननकी पूजा किये बिना यज्ञारम्भ करनेपर सावित्रीका रुष्ट होना * ३५७
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सावित्री बोलीं- मेरा तिरस्कार करके प्रारम्भ
किया गया यह यज्ञ सफल नहीं होगा ॥ ९ ॥
ऋषि बोले- चराचर जगत्को जला डालनेकी
इच्छासे अपने मुखसे अग्निकी ज्वालाको छोड़ते हुए
उन्होंने देवताओं तथा मुनियोंको शाप दे डाला कि तुम
सब जड़ हो जाओगे; क्योंकि तुम सबने यज्ञकी
अनधिकारिणी उस गायत्रीको यज्ञमें नियुक्त किया ॥ १० ॥
तब देवता अत्यन्त दुखीमन होते हुए उन्हें प्रणाम
करके सबकी जननी उन सावित्रीसे उच्च स्वरसे प्रार्थना
करने लगे। हे शुभे ! ड और ल-में भेद न होनेके कारण
हम जडरूप नहीं, अपितु जलरूप अर्थात् नदी-नदके
रूपमें हो जायँगे ॥ ११-१२ ॥
उन देवी सावित्रीके द्वारा 'ऐसा ही हो' यह कहे
जानेपर वे सभी देवता नदीरूपको प्राप्त हो गये। भगवान्
महेश्वर वेणी नामक नदी बन गये तथा कृष्ण कृष्णा
नामक नदी हो गये। इस प्रकार वे सभी देवता तत्तद्
नामवाले नदी बन गये ॥ १३ १/२ ॥
जहाँपर अज्ञानियोंके द्वारा सर्वप्रथम विघ्नराज
गणेशजीकी पूजा नहीं होती, वहाँ निश्चित ही विघ्न
उपस्थित होते हैं, जैसे कि पूर्वकालमें त्रिपुरासुरके वधके
समय गणेशजीका पूजन न करनेसे शंकरजीको विघ्न
उपस्थित हुए थे ॥ १४-१५ ॥
यज्ञमें विघ्न उपस्थित हो जानेपर ब्रह्माजीको
यह महान् चिन्ता हुई कि मेरे ही प्रयोजनके कारण
सभी देवताओंको नदीरूप होना पड़ा। न जाने किस
कर्मके कारण सभी लोकोंमें मेरा अपमान हो गया।
मेरे संकल्पमें यह अत्यन्त कठिन बाधा आज कैसे
उपस्थित हुई ? ॥ १६-१७ ॥
इस यज्ञके प्रारम्भमें विघ्नोंका हरण करनेवाले जगन्नाथ
गणेशजीका न तो स्मरण किया गया और न उनकी पूजा
ही हुई, इसी कारण सभी देवता मोहमें पड़ गये। अब मैं
उन गणेशजीको प्रसन्न करूँगा, तदनन्तर यज्ञ सम्पन्न
होगा। ब्रह्माजी जब इस प्रकारसे विचार कर ही रहे थे कि
उसी समय सभी देवांगनाएँ देवताओंको नदीरूपमें परिवर्तित
जानकर ब्रह्माजीके समीपमें आयीं ॥ १८-१९ १/२ ॥
पुलोमाकी पुत्री शची इन्द्राणी, पार्वती, छाया,
कमला तथा अन्य भी देवपत्नयाँ उन कमलासन
ब्रह्माजीसे कहने लगीं- आपने यज्ञ कैसे आरम्भ किया ?
जो मान्य थे, उनकी पूजा क्यों नहीं की? आपने
सर्वप्रथम विघ्नोंका हरण करनेवाले गजाननकी पूजा क्यों
नहीं की? आप यदि भूल गये थे तो देवोंने क्यों नहीं
आपको स्मरण दिलाया ? ॥ २०-२२ ॥
अब हमारे द्वारा क्या किया जाना चाहिये अथवा
जलरूपधारी देवोंको क्या करना चाहिये ? हे कमलोद्भव
ब्रह्माजी ! हे देव ! आपको छोड़कर अब हम किसकी
शरणमें जायँ ? उनके इस प्रकारके वचनोंको सुनकर
ब्रह्माजी उनसे बोले-आपलोग भयभीत न हों, मैं ऐसा
यज्ञ करूँगा, जिससे आप सभी लोगोंका कल्याण
होगा ॥ २३-२४ ॥
भगवान् गजाननके प्रसन्न हो जानेपर उनके भक्तोंके
लिये क्या असाध्य रहता है! आप सब लोग उनकी
आराधना कीजिये, वे गणेश आप सभीका प्रिय करेंगे ॥ २५ ॥
मैं भी जगत्के ईश्वर, सभी कारणोंके भी परम
कारण तथा आदि-अन्तसे रहित, उन भगवान् विनायकको
प्रसन्न करूँगा। इस प्रकारसे कही गयीं वे सभी देवियाँ
ब्रह्माजीके निर्देशानुसार दूरस्थित कल्याणकारी कर्नाटक
देशको गयीं और वे वहाँ मन्दारवृक्षके मूलमें स्थित
विघ्नेशका ध्यान करने लगीं ॥ २६-२७ ॥
उन विघ्नेश विनायककी पूर्वकालमें भगवान् श्रीरामने
वक्रतुण्डनामसे स्थापना की थी और उनसे विविध
वरोंको प्राप्तकर वे भगवान् श्रीराम प्रधान राक्षसोंको
मारकर विजयी हुए थे। साथ ही विख्यात राक्षसराज
रावणका वधकर अपनी पत्नी सीताको प्राप्तकर उन्होंने
अपना धाम प्राप्त किया था। वहींपर उन सभी देवांगनाओंने
कठोर तप किया ॥ २८-२९ ॥
कोई देवी गणेशजीके नाममन्त्रका जप करने लगी,
कोई उनका मन्त्र जपने लगी और कोई पद्मासनमें स्थित
होकर उन परमेश्वर गणेशका ध्यान करने लगी ॥ ३० ॥
कोई वीरासनमें स्थित हो गयी, कोई निराहार व्रतमें
स्थित हो गयी। कोई-कोई मन्दिरके दरवाजोंकी, चौराहोंकी
३५८ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण-
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तथा घरोंकी सफाई करने लगी ॥ ३१ ॥
कोई-कोई प्रदक्षिणा तथा बार-बार नमस्कार करती
हुई श्रेष्ठ आराधना करने लगी, कोई पैरके एक अँगूठेमें
खड़ी होकर विनायकके ध्यानमें निमग्न हो गयी ॥ ३२ ॥
कोई नेत्रोंको बन्द करके उनके स्तोत्रोंका पाठ करने
लगी। इस प्रकार आराधना करते हुए बहुत-सा समय
व्यतीत हो जानेपर भी वे विनायक प्रसन्न नहीं हुए ॥ ३३ ॥
तब वे अत्यन्त चिन्तित हो उठीं और अब हम क्या
करें, ऐसा सोचते हुए व्याकुल हो गयीं। तदनन्तर कुछ
देवियोंने पुष्पोंकी विशाल राशिको, दूसरी देवियोंने बहुतसे
दूर्वादलोंको समर्पित करके धूप, दीप, नैवेद्य तथा स्वर्णद्वारा
देव विनायकका पूजन किया। किसी देवीने मन्दारके पुष्पोंसे
तथा किसीने स्वर्णकमलोंद्वारा उनकी पूजा की ॥ ३४-३५॥
तभी उन्होंने आकाशवाणी सुनी कि 'शमीपत्रके
बिना की गयी पूजासे विभु गणेश प्रसन्न नहीं होते'।
तदनन्तर उन सभी देवियोंने शमीपत्रोंके द्वारा परम भक्तिभावसे
उन देवाधिदेव गजाननकी पूजा की। शमीदलोंके द्वारा
पूजित होनेपर दयार्द्रहृदय होकर वे भगवान् गणेश उनके
सामने प्रत्यक्ष प्रकट हो गये। उस समय वे चार भुजाओंके
द्वारा अत्यन्त सुशोभित हो रहे थे। उन्होंने किरीट तथा
बाजूबन्द धारण कर रखा था। माला तथा कुण्डलोंसे वे
मण्डित थे ॥ ३६-३८ ॥
उनके कान लम्बे थे। उनका गण्डस्थल सुशोभित
हो रहा था। वे दो दाँतोंसे मण्डित थे। वे सिद्धि तथा
बुद्धि नामक दो पत्नियोंसे समन्वित थे। उनका वाहन
मूषक भी साथमें था। वे पीले वस्त्रोंको धारण किये हुए
थे। उन सभी देवियोंने करोड़ों सूर्योंके समान कान्तिवाले
उन भगवान् गणेशका दर्शन किया। उन्होंने अपनी
आँखोंको बन्द करके भूमिपर गिरकर उनको दण्डवत्
प्रणाम किया ॥ ३९-४० ॥
उनका दर्शनकर उनका मुखमण्डल अत्यन्त प्रसन्न
हो गया, वे परम आनन्दमें निमग्न हो गयीं, तब उन्होंने
सौम्य तेजसे आच्छन्न विग्रहवाले उन भगवान् गजाननकी
स्तुति करनी प्रारम्भ की ॥ ४१ ॥
॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डमें 'शमी और मन्दारकी प्रशंसाका वर्णन'
नामक छत्तीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ३६ ॥
सैंतीसवाँ अध्याय
देवपत्नियोंद्वारा की गयी गजाननस्तुति, गजाननसे वर प्राप्तकर देवोंको पुनः अपने पूर्ववत्
स्वरूपकी प्राप्ति, देवताओंद्वारा हेरम्ब गणपति की मूर्तिका शमीपत्रोंद्वारा पूजन,
ब्रह्माजीद्वारा मन्दारकाष्ठसे निर्मित गणेशप्रतिमाका शमीपत्रोंद्वारा पूजन,
मन्दार तथा शमीके माहात्म्यका वर्णन
कीर्ति बोली- हे महामुने! उन देवियोंने किस
प्रकारसे उन गजाननकी स्तुति की, उसे मुझे बतलाइये ॥ १ ॥
मुनि बोले- हे कीर्ते ! उस स्तुतिको मैं बताता हूँ,
तुम ध्यान देकर उसे सुनो ॥ १ १/२ ॥
वे बोलीं- हे सर्वरूप ! आपको नमस्कार है, आप
सर्वान्तर्यामीको नमस्कार है। सब कुछ करनेवाले आपको
नमस्कार है। सब कुछ प्रदान करनेवाले कृपालु गणेशजीको
नमस्कार है। सबका संहार करनेवालेको नमस्कार है।
अनन्त शक्तिसे सम्पन्न आपको नमस्कार है। सबको
ज्ञान प्रदान करनेवालेको नमस्कार है। सबकी रक्षा
करनेवाले तथा सबके आदिमें विद्यमान रहनेवाले आपको
नमस्कार है ॥ २-३ ॥
आप परब्रह्मस्वरूप हैं तथा निर्गुण हैं, आपको
बारंबार नमस्कार है। चिदानन्दस्वरूप आपको नमस्कार
है, वेदोंसे भी अगोचर आपको नमस्कार है। आप मायाके
आश्रय हैं, अपरिमेय हैं, गुणातीत हैं, आपको नमस्कार
है। सत्यस्वरूप, अनन्तरूप और सत्त्वादि गुणोंमें विक्षोभ
उत्पन्न करनेवालेको नमस्कार है ॥ ४-५ ॥
शरणागतोंका पालन करनेवाले तथा दैत्यों और
दानवोंका भेदन करनेवाले आप गणेशजीको नमस्कार
क्री०ख०-अ०३७ ] * देवपत्नियोंद्वारा की गयी गजाननस्तुति * ३५९
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[बायाँ स्तम्भ]
है। आप विश्वकी रक्षा करनेमें तत्पर रहते हैं, नाना प्रकारके
अवतार धारण करनेवाले आपको नमस्कार है ॥ ६ ॥
अपने हाथोंमें अनेक आयुध धारण करनेवालेको
नमस्कार है। सभी शत्रुओंका विनाश करनेवालेको
नमस्कार है। हे भक्तोंके हितकारक ! अनेक वर प्रदान
करनेवाले आपको नमस्कार है१॥ ७ ॥
ब्रह्माजी बोले—इस प्रकार उनकी स्तुति करके
पुनः उन्हें प्रणाम करके उन्होंने बहुत-से वरोंकी याचना
की ॥ ७१/२ ॥
वे बोलीं—हे देव ! जलरूपताको प्राप्त देवताओंको
आप उनका पूर्व स्वरूप प्रदान करें तथा आप ऐसी कृपा
करें कि हम कभी भी आपका विस्मरण न करें, सर्वदा
स्मरण करते रहें ! ॥ ८१/२ ॥
गणेशजी बोले—तुम सबने अपनी पूजा-
आराधनाके द्वारा मुझे अपने वशमें कर लिया है। अतः
मैं तुम सबकी मनोभिलषित वाञ्छाको अवश्य पूर्ण
करूँगा। तुम्हारे द्वारा की गयी इस स्तुतिसे शीघ्र ही
प्रसन्न होकर 'तुम्हारी अभिलाषा पूर्ण होगी।' ऐसा
वचन मैं देता हूँ ॥ ९१/२ ॥
देवी सावित्रीके कथनानुसार सभी देवता मंगलमय
जलरूपमें परिणत हुए हैं। उन देवीके वचनको अन्यथा
करनेमें पितामह ब्रह्माजी भी समर्थ नहीं हैं, अतः सभी
देवता एक अंशसे जलस्वरूप (नदीरूप) - को प्राप्त
करनेपर भी अपने पूर्व स्वरूपको प्राप्त करेंगे और अपने-
अपने अधिकारोंको प्राप्त करेंगे। मेरा कहा हुआ मिथ्या
नहीं होगा। तुम सभी देवांगनाएं एवं देवगण यहाँपर
शमीपत्रोंके द्वारा मेरा पूजन करो ॥ १०-१२ ॥
जिसने मुझे शमीपत्र अर्पित कर दिया, उसने मानो
सम्पूर्ण भुवन ही मुझे प्रदान कर दिया, उसे सौ भार सुवर्ण२
[दायाँ स्तम्भ]
दान करनेका फल प्राप्त होगा। इसमें कोई संशय नहीं ॥ १३ ॥
ब्रह्माजी बोले—विघ्नेश्वर गणेशजीके इस प्रकारसे
कहनेपर सभी देवता अपने-अपने स्वरूपमें स्थित हो गये
और अंशरूपसे वे नदीरूपमें भी स्थित रहे। तब उन्होंने
विनायकका दर्शन किया ॥ १४ ॥
वे देवता भगवान् गजाननको प्रणाम करके तथा उनकी
स्तुति करके प्रार्थना करने लगे कि हे देव ! आप हमारे
अपराधको क्षमा करें। हमने बुद्धिमें मोह उत्पन्न हो जानेके
कारण बिना आपका पूजन किये और पितामह ब्रह्माजीकी
ज्येष्ठ पत्नी देवी सावित्रीकी उपेक्षाकर यज्ञ प्रारम्भ कर
दिया था और उसका फल भी तत्काल हमने देख लिया,
अब आपकी कृपासे हमने अपना पुनः नवीन रूप प्राप्त
किया है। आपकी कृपासे हम परमानन्दको प्राप्त हुए हैं।
ऐसा कहकर उन्होंने शमीपत्रोंके द्वारा विनायकका पूजन
किया ॥ १५-१७ ॥
वे विघ्ननाशन विनायक भी उन देवताओंको
आनन्दित करके अन्तर्धान हो गये। तब उन देवताओंने
गणेशजीकी पत्थरकी एक शुभ मूर्ति बनायी, जो चार
भुजाओंवाली थी और हाथीके सूँडयुक्त मुखवाली थी,
उस मूर्तिको उन्होंने 'हेरम्ब' यह नाम रखा। साथ ही
एक श्रेष्ठ मन्दिर बनवाकर उसमें उस मूर्तिको बड़े ही
आदरपूर्वक स्थापित किया ॥ १८-१९ ॥
तदनन्तर सभी लोगोंपर उपकार करनेकी दृष्टिसे वे
देवता बोले—जो व्यक्ति विद्याके अधीश्वर इन हेरम्ब
गणपतिका इस उत्तम नगरमें भक्तिपूर्वक पूजन करेगा, उसके
ऊपर प्रसन्न होकर भगवान् हेरम्ब उसकी समस्त कामनाओंको
पूर्ण करेंगे। इन हेरम्बका वन्दन करनेसे, स्मरण करनेसे
अथवा प्रणाम करनेसे गजानन पूर्वोक्त फल प्रदान करेंगे,
इसमें कोई संशय नहीं ॥ २०-२१ ॥
[पाद-टिप्पणी / Footnotes]
१-नमस्ते सर्वरूपाय सर्वान्तर्यामिणे नमः । नमः सर्वकृते तुभ्यं सर्वदात्रे कृपालवे ॥
नमः सर्वविनाशाय नमस्तेऽनन्तशक्तये । नमः सर्वप्रबोधाय सर्वपात्रेऽखिलादये ॥
परब्रह्मस्वरूपाय निर्गुणाय नमो नमः । चिदानन्दस्वरूपाय वेदानामप्यगोचर ॥
मायाश्रयायामेयाय गुणातीताय ते नमः । सत्यायानन्तरूपाय गुणविक्षोभकारिणे ॥
शरणागतपालाय दैत्यदानवभेदिने । नमो नानावताराय विश्वरक्षणतत्पर ॥
अनेकायुधहस्ताय सर्वशत्रुनिबर्हण । अनेकवरदात्रे ते भक्तानां हितकारक ॥ (श्रीगणेशपुराण, क्रीडाखण्ड ३७। २-७)
२-दो हजार पल सुवर्णका मान एक भारके बराबर होता है।
३६० * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण-
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वहाँपर पूर्वमें मन्दारवृक्षके काष्ठसे निर्मित जो | बतायी है। इस महिमाका श्रवण करनेसे सभी पाप
विनायकजीकी विशाल मूर्ति थी, उसे ग्रहणकर इन्द्र परम | विनष्ट हो जाते हैं ॥ २८ ॥
ऋद्धिशाली अपनी पुरी अमरावतीमें ले गये ॥ २२ ॥ | तभीसे लेकर मंगलमयी शमी भगवान् गणेशको
वे प्रभु इन्द्र आज भी सपत्नीक उस मूर्तिकी | अत्यन्त प्रिय हो गयी। तुम्हारे द्वारा अनजानमें भी
भक्तिपूर्वक पूजा करते हैं। तदनन्तर उन सभी देवताओंने | [शमीदलोंके द्वारा] जो विनायककी पूजा हो गयी थी,
भी अपने-अपने लोकमें मन्दारकाष्ठकी गणेशमूर्ति बनाकर | उसीके फलस्वरूप तुम्हारा पुत्र जीवित होकर उठ खड़ा
शमीपत्रोंके द्वारा उनकी पूजा की। इसके फलस्वरूप वे | हुआ है। मन्दारकी भी महिमा मैंने भलीभाँति निरूपित
सभी अपनी-अपनी स्त्रियोंके साथ परम आनन्दको प्राप्त | कर दी। [हे कीर्ते!] अब अनुमति दो, मैं अपने
हुए और उन्होंने उत्तम भोगोंको प्राप्त किया ॥ २३-२४ ॥ | आश्रमको जाऊँगा ॥ २९-३० ॥
ब्रह्माजीने बारह वर्षोंतक परम तप करके भगवान् | ब्रह्माजी बोले-शमी तथा मन्दारकी महिमाको
विघ्नेश्वरको प्रसन्न करनेके अनन्तर पुनः यज्ञ किया ॥ २५ ॥ | सुननेके अनन्तर रानी कीर्तिने अपने पुत्रके कल्याणके
उन ब्रह्माजीने भी मन्दारकाष्ठसे विघ्नराज गणपतिकी | लिये गणपतिमन्त्रके विषयमें पूछा ॥ ३१ ॥
एक वरदायिनी मूर्ति बनवाकर अत्यन्त आदरके साथ | गणेशजीकी प्रीतिको बढ़ानेवाले इस श्रेष्ठ आख्यानका
शमीपत्रोंके द्वारा अनेक बार उसका पूजन किया। उन्होंने | जो श्रवण करता है, वह व्यक्ति कभी भी संकटको प्राप्त
स्वर्णपत्रों, दूर्वा, मन्दारपुष्पों, केतकीके पुष्पों तथा श्वेत | नहीं होता और अपनी समस्त कामनाओंको प्राप्त कर
दूर्वांकुरोंके द्वारा सभी कामनाओंको पूर्ण करनेवाली उस | लेता है। जो व्यक्ति सर्वदा प्रातःकाल उठकर शमी,
मूर्त्तिका पूजन किया ॥ २६-२७ ॥ | मन्दार तथा गणेशजीका श्रद्धाभक्तिपूर्वक स्मरण करता
गृत्समद बोले-हे मातः ! हे शुभे ! इस प्रकार | है, वह सभी पापोंसे रहित हो जाता है और सुखी होता
मैंने अत्यन्त संक्षेपमें मन्दार तथा शमीकी महिमा तुम्हें | है ॥ ३२-३३ ॥
॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डमें 'शमी तथा मन्दारके माहात्म्यका वर्णन'
नामक सैंतीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ३७ ॥
अड़तीसवाँ अध्याय
रानी कीर्तिके पुत्रको महर्षि गृत्समदद्वारा गणेशजीके 'ढुण्ढिराज' नामक चतुरक्षर मन्त्रका
उपदेश, ढुण्ढिराज गणेशका माहात्म्य, काशीविश्वनाथ तथा गंगाजीकी महिमा, भस्मासुरपुत्र
दुरासदद्वारा शंकरजीकी आराधना और वरप्राप्ति
कीर्ति बोली-हे ब्रह्मन् ! आपने शमीकी महिमाका | कीजिये, जो सरलतासे उच्चारण किये जानेयोग्य हो,
भलीभाँति बड़े आदरके साथ वर्णन किया और मन्दारके | गणेशजीको भलीभाँति प्रसन्न करनेवाला हो और अपने
माहात्म्यको भी बतलाया, उससे मेरे मनमें बड़ी प्रसन्नता हो | राज्यको प्राप्त करानेवाला हो, साथ ही वह मन्त्र ऐसा
रही है। हे मुनीश्वर ! आपने मेरे इस पुत्रको जीवन प्रदान | हो कि जिसका जप करनेमें बालक भी समर्थ हो ॥ ३ ॥
किया है और इसे गणेशजीके षडक्षरमन्त्रका उपदेश भी | गृत्समद बोले-[हे देवि!] भगवान् गजाननके
दिया है, किंतु अभी छोटा बालक होनेके कारण यह उस | चरणकमलोंमें लगी हुई तुम्हारी बुद्धिको मैंने भलीभाँति
मन्त्रका उच्चारण करनेमें समर्थ नहीं हो पायेगा ॥ १-२ ॥ | समझ लिया है, अतः मैं गणेशजीका सुख प्रदान
अतः हे मुने ! आप इसे इस समय ऐसा मन्त्र प्रदान | करनेवाला स्वयं का मन्त्र इसे प्रदान करूँगा ॥ ४ ॥
क्री०ख०-अ०३८ ] * रानी कीर्तिके पुत्रको महर्षि गृत्समदद्वारा चतुरक्षर मन्त्रका उपदेश * ३६१
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[बायाँ स्तम्भ]
जिन भगवान् विनायकका चार अक्षरोंवाला
[ढुण्ढिराज] नाम सम्पूर्ण जगत्का कारणभूत है, जो
[ढुण्ढिराज] शुभ तथा अशुभ कर्मोंके साक्षी हैं, दुष्ट
दैत्योंका विनाश करनेवाले हैं, सभी धर्मोंकी रक्षा
करनेवाले हैं, काशीके राजा दिवोदासका उपकार करनेवाले
हैं, जो वाराणसीमें द्विजका रूप धारण करके विराजमान
हैं, जिन्होंने भगवान् विश्वनाथके लिये अविमुक्तक्षेत्रमें
निवास करनेके लिये प्रयत्न किया था, जो सर्वान्तर्यामी
हैं, विश्वेश्वरद्वारा जिनकी स्तुति की गयी हैं, संसारका
पालन करनेके लिये जो जनार्दन भगवान् विष्णुद्वारा स्तुत
हैं, सृष्टि करनेके लिये पितामह ब्रह्माजीद्वारा जिनकी पूजा
की जाती है और जिनका ध्यान किया जाता है, सम्पूर्ण
जगत्के विनाशके लिये जो भगवान् शिवद्वारा पूजित होते
हैं, पुलोमाकी पुत्री शचीके स्वामी देवराज इन्द्रके द्वारा
दैत्योंका संहार करनेके लिये तथा देवताओंके राज्यसुखकी
प्राप्तिके लिये अत्यन्त भक्तिपूर्वक जिनका पूजन किया
गया है; सूर्य, वरुण, चन्द्रमा, यम, अग्नि तथा वायुदेवने
भी अपने-अपने अभ्युदयकी प्राप्तिके लिये जिनका पूजन
किया है, साथ ही देवगुरु बृहस्पति तथा दैत्यगुरु
शुक्राचार्यने भी अपने उत्कर्षके लिये जिनकी पूजा की
है, जिन ढुण्ढिराज गणेशकी आराधना शेषनागने पृथ्वीको
धारण करनेकी शक्ति प्राप्त करनेके लिये की है। साथ
ही गन्धर्व, किन्नर, यक्ष, सिद्ध, चारण, राक्षस, ऋषिगण,
पशु तथा सभी शुभ स्थावर तथा जंगम प्राणी अपने-अपने
कार्योंकी सिद्धिके लिये जिन विश्वके स्वामी भगवान्
गणेशजीकी आराधना करते हैं, वे अखिल जगत्के स्वामी
ही ढुण्ढिराज कहलाते हैं, वे अपार गुणोंसे भी परे हैं।
ब्रह्मा, विष्णु तथा शिव आदि देवोंने जिनके गुणोंका पार
नहीं पाया है। उन भगवान् ढुण्ढिराजका तुम्हारे द्वारा
भक्तिभावपूर्वक शमीपत्रोंसे पूजन होनेपर निश्चित ही
तुम्हारा पुत्र शत्रुओंका नाश करनेवाला और राज्यका
अधिकारी बनेगा ॥ ५-१५॥
कीर्ति बोली—हे ब्रह्मन्! मैंने ढुण्ढिराजसम्बन्धी
सम्पूर्ण महिमाका श्रवण किया। वे ढुण्ढिराज कौन-सा
कर्म करनेवाले हैं, किस प्रकार उनका प्रादुर्भाव हुआ, वे
[दायाँ स्तम्भ]
किसके अंश हैं, उनका पराक्रम कैसा है? किसने उनका
'ढुण्ढिराज' यह नाम रखा, पूर्वकालमें वे किसके द्वारा
पूजित हुए? हे ब्रह्मन्! मेरे इस संशयका आप पूर्णतः
निराकरण करनेकी कृपा करें ॥ १६-१७॥
मुनि बोले—हे भद्रे! हे शुभे! तुमने और भी
अधिक जाननेकी इच्छासे बहुत अच्छी बात पूछी है।
तुमने भक्तिभावसे इस विषयमें पूछा है, अतः मैं तुम्हारे
संशयको दूर करता हूँ ॥ १८॥
जिस प्रकारसे उन ढुण्ढिराजने दुरासद नामक दैत्य
तथा अनेक राक्षसोंका वध किया, जिस प्रकारसे वे
मायासे रूप धारणकर श्रेष्ठ राजा दिवोदासको मोहित
करने गये थे, जिस उपायसे वे विश्वेश्वर भगवान्
शिवको अविमुक्तक्षेत्र काशीमें लाये थे और हे नृपांगना !
जैसे उनका 'ढुण्ढिराज' यह नाम पड़ा था, वह सब मैं
उसी प्रकार बताता हूँ, जिस प्रकारसे कि मैंने स्कन्दजीके
द्वारा महर्षि अगस्त्यजीके प्रति कहते हुए सुना था। हे
शुभे! उसीको तुम एकाग्रमन होकर सुनो ॥ १९-२१॥
स्कन्द बोले—हे ब्रह्मन् अगस्त्यजी! आप अविमुक्त-
क्षेत्रसम्बन्धी उस कथाको ध्यानपूर्वक सुनिये, जिसके
सुननेमात्रसे व्यक्ति सभी पापोंसे मुक्त हो जाता है ॥ २२ ॥
एक बारकी बात है, भगवान् श्रीहरिने महर्षि
कश्यपजीसे कहा था कि आप विविध प्रकारकी प्रजाओंकी
सृष्टि कीजिये। तब उन्होंने तपस्या करके उसके प्रभावसे
प्राणियोंकी मैथुनी सृष्टि की। उन्होंने इक्कीस हजार
योनियोंवाले अण्डज, उतने ही स्वेदज तथा उतने ही
उद्भिज्ज प्राणियोंकी सृष्टि की। इन चार प्रकारकी
योनियोंमें मनुष्ययोनि अत्यन्त दुर्लभ है ॥ २३-२४॥
वह मनुष्यजन्म बड़े ही पुण्यसे प्राप्त होता है, उसमें
भी ब्राह्मणकुलमें जन्म और भी विशेष पुण्यसे प्राप्त होता
है। सम्यक् रूपसे धर्मका पालन और अधर्मका परित्याग
करते हुए यदि उस ब्राह्मणत्वकी रक्षा की जाय तो वह
उस परम धामको प्राप्त कराता है, जहाँसे फिर यहाँ
पुनरागमन नहीं होता। यदि ऐसा नहीं हुआ तो प्राणी
चौरासी लाख योनियोंमें भटकता ही रहता है ॥ २५-२६॥
दुराचरण करनेवाले प्राणी नारकीय यातनाओंका
३६२ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण-
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[बायाँ स्तम्भ]
भोग करते हैं। बहुत समयतक इसी प्रकार यातनाओंको
भोगते हुए पापकर्मोंके क्षीण हो जानेपर वे पुनः
मृत्युलोकमें आते हैं और काने, बौने तथा दरिद्री होते हैं।
उन प्राणियोंपर दया करनेके लिये ब्रह्मा, शिव आदि
देवोंने तथा महाभाग ऋषियोंने विविध प्रकारके तीर्थों
तथा अत्यन्त पवित्र क्षेत्रोंको बनाया है, जो प्राणियोंके
पापोंका हरण कर लेनेवाले हैं॥ २७-२८॥
उन तीर्थस्थलों तथा पुण्यक्षेत्रोंमें देवता तथा ऋषिगण
जीवोंके पापोंको विनष्ट करते हुए विराजमान रहते हैं, उन
तीर्थोंमें निवास करनेवाले प्राणियोंके पाप नष्ट हो जाते हैं।
पापोंसे प्राणियोंकी रक्षा करनेके लिये देवता तथा ऋषि
सदा ही उन तीर्थोंमें निवास करते हैं॥ २९-३०१/२॥
भगवान् विश्वनाथने सर्वगुणसम्पन्न, सबसे श्रेष्ठ, भुक्ति
तथा मुक्ति प्रदान करनेवाली, मंगलमयी वाराणसी नामकी
पुरीका निर्माण किया था, वह पुरी ध्यान करनेवाले तथा
ज्ञानी जनोंको मोक्ष प्रदान करनेवाली है तथा सर्वतीर्थमयी
और अत्यन्त रमणीय है॥ ३१-३२॥
जहाँपर तपस्या करते समय सर्वसामर्थ्यसम्पन्न
भगवान् विष्णुने [अपने चक्रसे] प्रसिद्ध चक्र-सरोवरका
निर्माण किया था, जो अत्यन्त सुन्दर है और स्नानमात्र
कर लेनेसे मुक्ति प्रदान करनेवाला है। जिसका दर्शनकर
[दायाँ स्तम्भ]
भगवान् शिवजीके कन्धोंमें कम्पन होनेसे उनके कानोंमें
पहने हुए कुण्डलोंसे [निकलकर] मणि उस चक्रसरोवरमें
गिर पड़ी थी, तभीसे वह चक्रसरोवर तीर्थ 'मणिकर्णिका'
नामसे प्रख्यात हो गया॥ ३३-३४॥
तदनन्तर राजर्षि भगीरथद्वारा आहूत की गयी
भागीरथी गंगा नदी वहाँ आयीं। यहाँ मृत्युके प्राप्त
होनेपर कीट-पतंगोंतककी मुक्ति होती है॥ ३५॥
गंगाजीका तीन बार मात्र नाम ले लेनेसे वे काशीवासका
फल प्रदान करनेवाली हो जाती हैं। [वास्तवमें] वहाँकी
लताएँ, झाड़ियाँ, तृण तथा वृक्ष भी धन्य ही हैं, अन्य
स्थानोंके नहीं। गंगामें रहनेवाले कछुए तथा मत्स्य भी
मृत्युके पश्चात् [रूपवान्] पृथ्वीके कैलास (काशी)-
को छोड़कर उस धाममें जाते हैं, जहाँ रूपातीत भगवान्
शिव नाना रूप धारणकर स्थित रहते हैं॥ ३६-३७॥
वे गिरिजापति भगवान् शंकर ही सूर्य, चन्द्रमा,
विष्णु, ब्रह्मा, विनायक तथा शक्तिस्वरूपा दुर्गा हैं और
वे ही इस जगत्के कारणस्वरूप हैं॥ ३८॥
प्रलयकालमें वे काशीपुरीको अपने त्रिशूलके
अग्रभागमें धारण किये रहते हैं। वे एक ही परमेश्वर
शिव लोगोंपर अनुग्रह करनेके लिये पाँच स्वरूपों (शिव,
विष्णु, दुर्गा, गणेश तथा सूर्य)-में हो जाते हैं॥ ३९॥
भक्तगण जिस-जिस स्वरूपका ध्यान करते हैं,
भगवान् शंकर तत्क्षण ही वैसा स्वरूप धारण कर लेते
हैं। इन पाँचों देवोंमें जो भेद मानता है, वह मनुष्य
अवीची नामवाले नरकोंको प्राप्त होता है॥ ४०॥
जो व्यक्ति एक ओर तो इन पंचदेवोंमेंसे किसी
एककी स्तुति करता है और दूसरी ओर किसी देवकी
निन्दा करता है, वह बहुत वर्षोंतक इक्कीस नरकोंमें पड़ा
रहता है। भस्मासुर नामक राक्षसका दुरासद नामका एक
प्रसिद्ध पुत्र था। उसने शुक्राचार्यजीके पास जाकर
भगवान् शंकरकी पंचाक्षरी विद्या ('नमः शिवाय'
मन्त्र) प्राप्त किया॥ ४१-४२॥
एक हजार दिव्य वर्षोंतक वह एक पैरके अँगूठेपर
निराहार रहकर खड़ा रहा। वह सूखे काष्ठके समान हो
गया था। उसके सारे शरीरमें दीमकोंने बाँबी बना ली थी,
क्री०ख०-अ०३८ ] * रानी कीर्तिके पुत्रको महर्षि गृत्समदद्वारा चतुरक्षर मन्त्रका उपदेश * ३६३
उसका शरीर अस्थिमात्र ही शेष रह गया था। उसके केवल
नेत्रमात्र ही दीखते थे। इसी अवस्थामें वह मन्त्रजप किया
करता था। उसकी कठिन साधनासे प्रसन्न होकर भगवान्
शंकर उसे दर्शन देनेके लिये वहाँ आये ॥ ४३-४४॥
उनकी दस भुजाएँ थीं। पाँच मुख थे। वे रुण्डोंकी
मालासे सुशोभित थे। हाथमें डमरू तथा त्रिशूल धारण
किये हुए थे। जटाजूटसे विभूषित थे। उन्होंने सिरपर
गंगाको धारण कर रखा था। उनके तीन नेत्र थे। सम्पूर्ण
शरीरमें चिताभस्मका लेपन किया हुआ था, वे नन्दी
वृषभपर आरूढ़ थे, उनकी ध्वजामें वृषका चिह्न अंकित
था। माथेपर विराजमान चन्द्ररेखासे वे सुशोभित थे।
उन्होंने अपर्णा पार्वतीजीको अपनी गोदमें बिठा रखा था।
इस प्रकारके स्वरूपवाले वे भगवान् शंकर कृपा करते
हुए उस दैत्यश्रेष्ठ दुरासदसे बोले ॥ ४५-४६ १/२ ॥
शिवजी बोले- उठो, उठो, तुम्हारा कल्याण
हो। तपस्याके द्वारा तुमने महान् कष्ट सहन किया है।
मैं तुम्हें तुम्हारा अभीष्ट मनोरथ प्रदान करूँगा। जो भी
बात तुम्हारे मनमें स्थित हो, उसे माँग लो ॥ ४७ १/२ ॥
ब्रह्माजी बोले- तब अपनी आँखोंको खोलकर
उस दैत्य दुरासदने हाथ जोड़कर उन्हें प्रणाम किया
और वह उन वरदायी भगवान् महेश्वरकी स्तुति करने
लगा। हे देव! आप सम्पूर्ण जगत्के कारणस्वरूप हैं,
आप परम आनन्दस्वरूप हैं। आप क्षर तथा अक्षरसे
अतीत शरीरवाले, सत्त्वादि तीनों गुणोंमें विकार उत्पन्न
करनेवाले, गुणातीत, ज्ञानमय और व्यक्त तथा अव्यक्तके
विधानके ज्ञाता हैं ॥ ४८-५० ॥
आपका विग्रह मुनियोंके द्वारा ध्यान किये जाने
योग्य है, आप सभी भक्तोंपर अनुग्रह करनेवाले हैं। आप
अनन्त ब्रह्माण्डोंके कारणभूत हैं, सत्पुरुषोंको श्रेय प्रदान
करनेवाले हैं। आप अखण्ड आनन्दसे परिपूर्ण, अमोघ
फल प्रदान करनेवाले, सर्वाधार, सब कुछ सहन करनेवाले
और सभी शक्तियोंसे सम्पन्न हैं ॥ ५१-५२ ॥
आप पृथिवी, वायु, जल, अग्नि तथा आकाश-
स्वरूप हैं। आज मेरी तपस्या धन्य हो गयी, मेरे नेत्र धन्य
हो गये, मेरे माता-पिता धन्य हो गये, मेरा जन्म लेना
सफल हो गया, जो कि मुझे आपका साक्षात् दर्शन प्राप्त
हुआ है। आज मेरे सम्पूर्ण पाप नितान्त रूपसे लयको प्राप्त
हो गये हैं। योगियोंके हृदयके लिये भी अगम्य और वेद-
वाणीके लिये भी सर्वथा अगोचर आपके स्वरूपका आज
मुझे दर्शन प्राप्त हुआ है। हे भगवन्! इस समय मैं आपसे
वर माँगता हूँ, उसे आप देनेकी कृपा करें ॥ ५३-५४ ॥
शिवजी बोले- मैं तुम्हारे द्वारा की गयी स्तुति,
तपस्या और प्रेमसे अत्यन्त प्रसन्न हूँ। तुम निःसंकोच
होकर वर माँगो, मैं तुम्हें वह सब अत्यन्त दुर्लभ वर
शीघ्र ही प्रदान करूँगा ॥ ५५ ॥
मुनि बोले- तब उस दुरासद दैत्यने प्रसन्न हुए
भगवान् सदाशिवसे निर्भय होनेका वरदान माँगा और उसने
कहा- जरायुज, अण्डज, स्वेदज तथा उद्भिज्ज- इन चारों
प्रकारकी योनियोंवाले प्राणियोंके द्वारा मेरी मृत्यु न हो।
इसीके साथ ही यक्ष, राक्षस, पिशाच, देव, दानव, किन्नर,
मुनि, मानव, गन्धर्व, सर्प, वनेचर प्राणियोंसे भी मेरी मृत्यु
न हो। हे महाभाग! युद्धस्थलमें मेरे स्वरूपको देखकर
सभी देवता भयभीत हो जायँ और मुझे देवलोकका राज्य
प्राप्त हो। मुझे आपके चरणोंका नित्य स्मरण रहे और
आपमें मेरी अखण्ड भक्ति बनी रहे ॥ ५६-५९ ॥
शिवजी बोले- एकमात्र शक्तिको छोड़कर मैं तुम्हें
सभी देवताओंसे अभय प्रदान करता हूँ। शक्तिके तेजसे
उत्पन्न कोई वीर तुम्हें जीतकर पुनः जीवित कर देगा ॥ ६० ॥
वह तुम्हारे सिरपर अपना चरण नित्य रखा रहेगा।
जब वह तुम्हारे सिरपर रखा हुआ अपना पैर हटा लेगा,
तब तुम अपने पराक्रमसे तथा अपने तेजसे पुनः
त्रिलोकीको जीत लोगे। तुम्हें मेरी दृढ़ भक्ति प्राप्त होगी
और तुम्हें निरन्तर मेरा स्मरण बना रहेगा ॥ ६१-६२ ॥
गृत्समद बोले- दुरासदको इस प्रकारके वर्रोंको
प्रदानकर भगवान् शिव अन्तर्धान हो गये। प्रसन्नतासे
भरा हुआ वह दुरासद भी अपने घर चला आया। जो
इस स्तोत्रका पाठ करता है, वह अपनी समस्त कामनाओंको
प्राप्त कर लेता है ॥ ६३ ॥
॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डमें '[दुरासदकी] शिवाराधनाका वर्णन'
नामक अड़तीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ३८ ॥
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