श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)
Ganesha Purana Gita Press Special Edition
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
तैंतीसवाँ अध्याय
क्री०ख०-अ०३३ ] * प्रियव्रतकी पत्नी कीर्तिद्वारा शमीपत्रोंसे विनायकका पूजन * ३४९
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तैंतीसवाँ अध्याय
प्रियव्रतकी पत्नी कीर्तिद्वारा शमीपत्रोंसे विनायकका पूजन, स्वप्नमें कीर्तिको अनेक वरदानोंकी
प्राप्ति, वरदानके प्रभावसे राजा प्रियव्रतका कीर्तिको धर्मपत्नीरूपमें स्वीकार कर लेना,
यथासमय कीर्तिको 'क्षिप्रप्रसादन' नामक पुत्रकी प्राप्ति और सपत्नीद्वारा उसे
विष देना, महर्षि गृत्समदद्वारा पुत्रको जिला देना, शमीका माहात्म्य
ब्रह्माजी बोले—इस प्रकारसे राजा प्रियव्रतकी
वह ज्येष्ठ भार्या कीर्ति प्रतिदिन उन विनायककी पूजाकर
उनकी स्तुति करने लगी। एक दिनकी बात है, उसकी
सखियाँ दूर्वा लेनेके लिये वहाँ आयीं ॥ १ ॥
ज्येष्ठमास होनेके कारण उन्होंने कहीं भी शुभ
दूर्वांकुरोंको प्राप्त नहीं किया। अतः वे बहुत-से शमीपत्रोंको
लेकर उसके पास आयीं। वे बहुत थककर लौटी थीं,
उन्होंने कीर्तिको बतलाया कि दूर्वा कहीं भी नहीं मिल
पायी, अतः तुम सभी उपचारोंके साथ इन शमीपत्रोंसे
विनायककी पूजा करो ॥ २-३ ॥
दूर्वा न मिलनेसे उस दिन वह निराहार रहकर
अपने नियम-परायण रही। शमीपत्रोंके अर्पण करनेसे
उन विनायकको परम सन्तुष्टि प्राप्त हुई ॥ ४ ॥
उस दिन वह कीर्ति विनायकदेवके समक्ष ही सो
गयी। इसी प्रकार पूजन करते हुए जब उसे एक वर्ष
व्यतीत हो चुका तो वर्षके पूरा होनेपर उसने एक
अत्यन्त अद्भुत स्वप्न देखा कि वही विनायककी मूर्ति
उससे इस प्रकार बोली—हे सुभ्रू ! तुम्हारे द्वारा शमीपत्रोंसे
पूजित होनेके कारण मैं अत्यन्त सन्तुष्ट हूँ, मैं तुम्हें वर
प्रदान करती हूँ। जब वह कीर्ति कुछ नहीं बोली तो वही
विनायकमूर्ति पुनः उससे बोली— ॥ ५-६ ॥
मूर्ति बोली—तुम्हारा पति तुम्हारे अनुकूल हो
जायगा, तुम अत्यन्त शुभ भोगोंको प्राप्त करोगी। तुम्हारा
एक महाबलशाली पुत्र होगा, जो मुझमें भक्ति रखनेवाला
होगा। तुम उसका 'क्षिप्रप्रसादन' यह सुन्दर नाम रखना।
चौथे वर्षमें विषके द्वारा उसकी मृत्यु हो जायगी, किंतु
तत्क्षण ही गृत्समद नामक द्विज वहाँ उपस्थित होकर
उसे पुनः जीवित कर देंगे। क्षिप्रप्रसादन नामक वह पुत्र
राज्यकर्ता, धर्मपरायण तथा चिरायु होगा। मुझे सन्तोष
प्रदान करनेवाले इस (तुम्हारे द्वारा किये गये) स्तोत्रका
जो पाठ करेगा, राजा भी उसके वशमें हो जायगा, फिर
दूसरे किसी सामान्य जनकी क्या बात है ! ॥ ७-१० ॥
इस स्तोत्रका पाठ करनेवाला पुत्रवान्, धनसम्पन्न
और वेद-वेदांगका पारगामी विद्वान् हो जायगा। उसकी
बुद्धि बढ़ेगी और मेधाशक्ति भी वृद्धिको प्राप्त होकर
अत्यन्त दृढ़ हो जायगी। जो तीनों सन्ध्याकालोंमें इस
स्तोत्रका पाठ करेगा, वह अपने सभी अभिलषित
पदार्थोंको प्राप्त कर लेगा, उसकी मुझमें दृढ़भक्ति हो
जायगी और वह अन्तमें मोक्षको प्राप्त करेगा ॥ ११-१२ ॥
स्वप्नमें इस प्रकारके वरोंको प्रदान करके देव विनायक
क्षणभरमें अन्तर्धान हो गये। कीर्ति जग पड़ी और उसकी
आँखोंमें आँसू भर गये। आश्चर्यचकित हो वह मन-ही-
मन कहने लगी कि दीनानाथ भगवान् विनायकने मेरे
ऊपर महान् कृपा की है। उन्होंने जो मुझे साक्षात् दर्शन
दिया, यह मुझपर महान् अनुग्रह है ॥ १३-१४ ॥
सभी प्राणियोंपर कृपा करनेवाले उन देव विनायकने
अत्यन्त आदरके साथ आज मेरी रक्षा की है ॥ १५ ॥
यही परम सिद्धि है, यही परम तप है, यही परम
लाभ है, जो कि उन देवने मेरे साथ वार्ता की है ॥ १६ ॥
ब्रह्माजी बोले—तदनन्तर प्रभातकालमें उसने स्नान
किया। वह परम आनन्दमें भरी हुई थी। उसने अत्यन्त
श्रद्धाभक्तिके साथ वरदायी शुभ भगवान् गणेशका पूजन
किया। उसने अपना व्रत पूर्णकर गणेशजीकी मूर्तिको
पूर्ववाले स्थानपर स्थापित किया और पुरोहितको बुलाकर
भक्तिपूर्वक गणेशजीका पूजन किया ॥ १७-१८ ॥
गणेशजीका मनसे ध्यान करते हुए कीर्ति उनके
नाममन्त्रका जप करने लगी और वह उनके द्वारा प्रदत्त
वरोंका स्मरण करते हुए समयकी प्रतीक्षा करने लगी ॥ १९ ॥
तदनन्तर बहुत समय बीत जानेपर प्रारब्धानुसार एवं
ईश्वरकी इच्छासे प्रभा नामवाली राजाकी वह छोटी रानी
३५० * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण-
प्रथम स्तम्भ (बायाँ स्तम्भ):
कान्तिहीन तथा रक्त-पित्तके विकारसे ग्रस्त हो गयी॥ २०॥
उसके हाथों, पैरों तथा नाकसे नित्य रक्त निकलने
लगा। वह अत्यन्त बीभत्स स्वरूपवाली हो गयी, तब
पति राजा प्रियव्रतने मनसे उसका परित्याग कर दिया॥ २१॥
बहुत प्रयत्न करनेपर भी चिकित्सा-सम्बन्धी सभी
उपायोंके विफल हो जानेपर अब राजा न तो उससे बोलते
थे और न ही उसकी ओर देखते ही थे। तत्पश्चात् तपस्याके
द्वारा अत्यन्त सुन्दर आकृतिवाली हो गयी कीर्तिके भवनमें
[किसी समय] राजा गये। भगवान् गणेशकी कृपासे राजा
प्रियव्रत स्वयं ही उसके वशीभूत हो गये। वे उसका हाथ
पकड़कर उसे शय्यापर ले गये॥ २२-२३॥
वे कीर्तिमें एकनिष्ठावान् होकर उसके साथ
स्वेच्छानुसार क्रीड़ा करने लगे। नृपश्रेष्ठ प्रियव्रत क्षणभरके
लिये भी उसका वियोग सहन नहीं कर पाते थे॥ २४॥
उस पतिपरायणा कीर्तिने भी अनेक प्रकारके भोगों
तथा अलंकारोंका उपभोग किया। वह गर्भवती हुई और
यथासमय उसने एक पुत्रको जन्म दिया। पुत्रके जन्मसे
हर्षित होकर राजा प्रियव्रतने ब्राह्मणोंको [उस] शुभ मुहूर्तमें
यथायोग्य अनेक प्रकारके दानोंको दिया॥ २५-२६॥
उन्होंने पाँच ब्राह्मणोंको विभिन्न दिशाओंमें बैठाकर
पुत्रका जातकर्म-संस्कार कराया और फिर उस बालकका
‘क्षिप्रप्रसादन’ यह नाम रखा। नाना प्रकारके अलंकारोंसे
सुसज्जित अपने पुत्रको देखकर राजाको अत्यन्त प्रसन्नता
हुई। ऐसे ही पुत्रका दर्शन करके रानी कीर्ति भी अत्यन्त
आनन्दको प्राप्त हुई॥ २७-२८॥
सपत्नी कीर्तिके सुन्दर पुत्रको देखकर प्रभा अत्यन्त
दुखी हो गयी। वह यह सोचने लगी कि ज्येष्ठा रानी
कीर्तिका यह पुत्र ही आगे चलकर राजा होगा॥ २९॥
तब उसने दही-भातमें विष मिलाकर कीर्तिके
पुत्रको खिला दिया। तब क्षणभरमें ही वह विह्वलताको
प्राप्त हो गया और उसके नेत्र उलटे हो गये॥ ३०॥
तदनन्तर वह प्रभा स्वयं भी अत्यन्त आतुर होकर
बड़े जोरसे शब्द करती हुई रोने लगी। प्रभाका वह कातर
शब्द सुनकर कीर्ति उस बालकके पास वेगपूर्वक आयी।
उसने उस सम्पूर्ण वृत्तान्तको बड़े आदरके साथ राजाको
बतलाया। तब राजाकी आज्ञासे वैद्योंने भी अनेक
द्वितीय स्तम्भ (दायाँ स्तम्भ):
प्रकारकी औषधियाँ उस बालकको दीं॥ ३१-३२॥
उन्होंने विषके दोषका परीक्षण करके राजाको
बताया कि नाना प्रकारके मन्त्रों तथा औषधियोंसे कोई
भी लाभ नहीं हो पा रहा है। राजाने प्रभाको धिक्कारा
और उसे घरसे दूर कर दिया। तदनन्तर कीर्ति उस बालकको
लेकर सखियोंके साथ वनमें चली आयी॥ ३३-३४॥
जब वह नगरसे एक योजन दूर पहुँची थी कि उसी
बीच उस बालककी मृत्यु हो गयी। अपनी गोदमें
बालकको लेकर शोकसे विह्वल हुई वह कीर्ति रोने
लगी। जिस प्रकार वायुके झोंकेसे लता भूमिपर गिर
पड़ती है, वैसे ही वह भी मूर्च्छित होकर भूमिपर गिर
पड़ी। उसके आभूषण गिर गये। हाथका कंकण टूट
गया और मस्तकपरसे आँचल खिसक गया॥ ३५-३६॥
क्षणभरके बाद जब उसे कुछ होश आया तो वह
द्विरदानन भगवान् गणेशका स्मरण करने लगी। वह
अपने नवजात शिशुकी उत्पत्ति तथा बालचेष्टाओंका
स्मरण करते हुए अपनी छाती पीटने लगी॥ ३७॥
दैवयोगसे उसी समय उस मार्गसे गृत्समद नामवाले
मुनिश्रेष्ठ महात्मा आ पड़े, वे साक्षात् सूर्यके समान तेजसे
सम्पन्न थे। वे गणेशजीके भक्तोंमें सबसे अग्रणी तथा
तपस्याकी परम निधि थे। दयार्द्र होकर वे वहीं रुक
गये। तब उस कीर्तिने उन्हें प्रणाम किया॥ ३८-३९॥
वह लम्बी साँस लेते हुए बोली-गणेशजीकी
कृपासे मुझे यह पुत्र प्राप्त हुआ, किंतु अब यह बालक
मृत्युको प्राप्त हो गया है, इसे आप अपनी तपस्याके
बलसे जीवित करनेकी कृपा करें॥ ४०॥
मैंने उन्हीं गणेश भगवान्की आज्ञासे इसका
‘क्षिप्रप्रसादन’ यह नाम रखा। किंतु मेरी सपत्नीने दुष्ट
भावसे भावित होकर इसे विष दे दिया॥ ४१॥
हे मुने! उसी कारण इसने ऐसी मृत्यु प्राप्त की है।
हे तपोधन! सत्पुरुषोंका दर्शन विफल नहीं होता है,
इसलिये मैं [आपसे इसका जीवन] माँग रही हूँ॥ ४२॥
साधुपुरुष शरणमें आये हुएके परित्यागकी इच्छा
नहीं करते। कीर्तिका उस प्रकारका वचन सुनकर
मुनिश्रेष्ठ वे गृत्समद क्षणभरके लिये ध्यानमें स्थित हो
गये, तदनन्तर बोले-हे देवि! सुनो, मैं इस पुत्रको जीवित
क्री०ख०-अ०३४ ] * भृशुण्डीके शापसे औरव-पुत्रीका शमीवृक्षकी योनि-प्राप्तिका आख्यान * ३५१
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करनेका उपाय बताता हूँ। तुमने अज्ञानमें शमीपत्रोंके द्वारा | जिस पुण्यके प्रभावसे मेरा बालक विषके प्रभावका
विनायककी जो पूजा की है, उससे प्राप्त पुण्यफलको तुम | परित्यागकर पुनः सुखी हो गया और शीघ्र ही जीवन
मेरी आज्ञासे इसके हाथमें अर्पित करो ॥ ४३-४५ ॥ | प्राप्तकर उसी प्रकार उठ खड़ा हुआ, जैसे कि कोई सोया
उस पुण्यके प्रभावसे इस समय शीघ्र ही तुम्हारा | हुआ उठ खड़ा होता है। इसी कारण मैं शमीपत्रके द्वारा
पुत्र उठ खड़ा होगा। मुनि गृत्समदजीके इस प्रकारके | की गयी पूजाकी महिमाको आपसे पूछती हूँ ॥ ५२१/२ ॥
वचन सुनते ही वह कीर्ति आनन्दमें निमग्न हो गयी ॥ ४६ ॥ | ब्रह्माजी बोले—उसका वह वचन सुनकर महर्षि
उसने शमीपत्रोंद्वारा की गयी गणेशपूजाका उत्कट | गृत्समद उससे बोले— ॥ ५३ ॥
पुण्यफल अपने पुत्रको समर्पित कर दिया। उसी समय | गृत्समद बोले—जिसके नामका उच्चारण
वह कीर्तिका पुत्र वैसे ही उठ खड़ा हो गया, जैसे कि | करनेमात्रसे करोड़ों पातक विनष्ट हो जाते हैं, उस
उसपर अमृतकी वर्षा की गयी हो ॥ ४७ ॥ | शमीकी महिमाको सम्पूर्ण रूपसे बतानेमें इस पृथ्वीपर
कीर्तिने अत्यन्त हर्षित होकर मुनिके चरणोंमें | कौन समर्थ है ? ॥ ५४ ॥
बार-बार सिर रखकर प्रणाम किया। वह उन मुनि | मैं अपनी बुद्धिके अनुसार संक्षेपमें उसे बताता हूँ।
गृत्समदसे कहने लगी कि आपने यह कैसे जाना कि मैंने | व्रत, दान, तपस्या, विविध तीर्थोंके सेवन, ग्रीष्ममें
शमीपत्रोंद्वारा गणेशजीका पूजन किया है ? ॥ ४८ ॥ | पंचाग्निसाधना और हेमन्त ऋतुमें जलमें निवास करनेसे
हे मुने! शमीपत्रद्वारा किये गये गणेशजीके पूजनके | वह फल प्राप्त नहीं होता, जो कि शमीपत्रोंके द्वारा
उस पुण्य प्रभाव तथा उसकी महिमाको बतलानेकी कृपा | गणेशजीका पूजन करनेसे प्राप्त होता है ॥ ५५-५६ ॥
करें, जिसके प्रभावसे मेरा बालक जी उठा और | प्रातःकालमें अथवा तीनों सन्ध्याकालोंमें जो भगवान्
यमकिंकरोंद्वारा मुक्त हो गया ॥ ४९ ॥ | गणेशजीका ध्यान करके भक्तिभावपूर्वक शमीका स्मरण
ताकि शमीपत्रद्वारा की गयी गणेश-पूजाकी महिमाको | करता है, उसकी वन्दना करता है अथवा पूजन करता
जानकर मैं नित्य उनका शमीपत्रोंद्वारा पूजन किया | है, भगवान् विनायक उसपर प्रसन्न हो जाते हैं, उसे
करूँगी। जिस शमीपूजनके प्रभावसे अत्यन्त क्रूर, न रोके | मनोभिलषित पदार्थोंको देते हैं और अन्तमें मोक्ष प्राप्त करा
जानेयोग्य भी यमदूतोंको गणनायके दूतोंने रणांगणमें बहुत | देते हैं, इसमें कोई संशय नहीं है। इस विषयमें भी इस
युद्ध करके परास्त कर दिया और फिर वे दूत मेरे पुत्रको | प्राचीन इतिहासका दृष्टान्त दिया जाता है, जो देवर्षि नारदजी
जीवित करके गजाननके धामको चले गये ॥ ५०-५१ ॥ | और महात्मा इन्द्रके बीच हुआ था ॥ ५७–५९ ॥
॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डमें 'बालकके पुनः जीवित होनेका वर्णन'
नामक तैंतीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ३३ ॥
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चौंतीसवाँ अध्याय
महर्षि भृशुण्डीके शापसे ब्राह्मण औरवकी पुत्री शमीकाका शमीवृक्षकी तथा महर्षि शौनकके
शिष्य धौम्यपुत्र मन्दारका मन्दारवृक्षकी योनि प्राप्त करनेका आख्यान
कीर्ति बोली—हे ब्रह्मन् ! देवर्षि नारदजी और | ब्रह्माजी बोले—उसका इस प्रकारका वचन
देवराज इन्द्रके बीच जो संवाद हुआ था, उसे आप | सुनकर वे मुनि गृत्समद देवर्षि नारद तथा इन्द्रके बीच
पूर्णरूपसे बताइये, उसे सुनकर मैं समस्त संशयोंको | जो संवाद हुआ था, उस इतिहासका वर्णन करने
भुलाकर वैसे ही सन्तुप्त हो जाऊँगी, जैसी तृप्ति अमृत | लगे ॥ २ ॥
पीनेसे होती है ॥ १ ॥ | गृत्समद बोले—हे सुभ्रू ! एक बारकी बात है,
३५२ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण-
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तीनों लोकोंके भ्रमणमें निरत दिव्यदर्शन देवर्षि नारदजी
स्वेच्छानुसार पर्यटन करते हुए इन्द्रके पास पहुँचे ॥ ३ ॥
हे शुभानने ! इन्द्रने उनकी पूजा की और [लोकोंके]
विशेष समाचारके विषयमें पूछा। तब बुद्धिमान् नारदजीने
जो कुछ कहा, उसे तुम सुनो ॥ ४ ॥
नारदजी बोले- मालव नामक देशमें औरव
नामके एक ब्राह्मण निवास करते थे। वे वेद-वेदांगोंके
ज्ञाता तथा साक्षात् प्रकाशमान सूर्यके समान तेजस्वी थे।
वे अपने मनकी शक्तिसे इस सम्पूर्ण चराचर जगत्की
रचना करने, उसका पालन करने तथा विनाश करनेमें
समर्थ थे। वे अपनी धर्मपत्नीमें ही निष्ठा रखते थे। मिट्टीके
ढेले, पत्थर तथा सोनेमें उनकी समान दृष्टि थी ॥ ५-६ ॥
वे अत्यन्त मेधावी, तपश्चर्यामें श्रेष्ठ तथा साक्षात्
दूसरी अग्निके समान तेजस्वी थे। उनकी पत्नीका नाम
सुमेधा था, जो परम धार्मिक थी। वह अत्यन्त लावण्यसम्पन्न,
पतिको प्रिय तथा विविध प्रकारके अलंकारोंसे विभूषित
रहती थी, उसने अपने रूप-सौन्दर्यसे कामदेवपत्नी रतिको
भी तुच्छ बना दिया था और अप्सराओंके समूहोंको भी
तिरस्कृत कर दिया था ॥ ७-८ ॥
वह अपने पतिकी सेवा-शुश्रूषामें लगी रहती थी।
पतिके द्वारा भी अत्यन्त आदरके साथ उसका पालन-
पोषण होता था। उन दोनोंके एक कन्या हुई, उसका भी
उन दोनोंने बड़े ही स्नेहसे लालन-पालन किया ॥ ९ ॥
उन दोनोंने अपनी इच्छाके अनुसार उसका 'शमीका'
यह नाम रखा। वह कन्या जिस-जिस वस्तुकी अभिलाषा
करती थी, उसके सामर्थ्यवान् पिता वह-वह वस्तु उसे
दे देते थे। वह रूपवती कन्या जब सात वर्षकी हो गयी,
तो उसके पिता औरव उसके विवाहके लिये वरके
विषयमें सोचने लगे ॥ १०-११ ॥
उन्होंने सुना कि महर्षि धौम्यका एक पुत्र है, वह
मुनि वेद-शास्त्रोंमें पारंगत है, तेजकी परमराशि है और
महर्षि शौनकका शिष्य है ॥ १२ ॥
वह गुरुकी आज्ञाका पालन करनेवाला, महान् संयमी,
गुरुकी सेवामें तत्पर रहनेवाला, शान्त स्वभाववाला तथा
श्रेष्ठ था, उस मन्दार नामवाले ब्रह्मचारीको उन्होंने एक
शुभ दिनमें बुलाकर अपनी गृहोक्त विधिके अनुसार उसे
अपनी कन्या समर्पित कर दी और बहुत सारा दहेज भी
दिया। विवाह हो जानेके अनन्तर मन्दार अपने आश्रममें
चला आया ॥ १३-१४ ॥
शमीकाको युवावस्थासे सम्पन्न जानकर वह मन्दार
पुनः वहाँ आया। औरवने अत्यन्त मान-सम्मानपूर्वक
उसका पूजन किया। उसे भोजन कराकर, वस्त्र आदि
तथा सुवर्ण प्रदानकर शुभ मुहूर्तमें उन दोनों कन्या तथा
जामाताको विदा किया। उस समय ब्राह्मण औरवने
अपने जामातासे कहा- ॥ १५-१६ ॥
हे ब्रह्मन् ! यह पुत्री मैंने आपको विधानपूर्वक सौंपी
है, इसका आप बहुत स्नेहपूर्वक पालन करें, जैसा कि
मैंने आजतक किया है। श्वशुरको प्रणामकर 'ऐसा ही
होगा' यह कहकर मन्दार चल पड़ा और अपने
आश्रमस्थलपर आकर वह अपनी भार्या शमीकाके साथ
आनन्द-विहार करने लगा ॥ १७-१८ ॥
एक समयकी बात है, भृशुण्डी नामक श्रेष्ठ ऋषि
उस मन्दारके आश्रममें आये। वे गणेशजीके महान् भक्त
थे। रुष्ट होनेपर वे साक्षात् देदीप्यमान अग्निके समान
और प्रसन्न होनेपर ईश्वरके समान हो जाते थे। तपस्या
करते रहनेसे उनकी भ्रू (भौंह)-से शुण्डा (सूँड़)
निकल आयी थी, इसीलिये वे भृशुण्डी नामसे विख्यात
हो गये ॥ १९-२० ॥
उनका उदरदेश बहुत बड़ा था, शरीरकी आकृति
विशाल थी। वे विविध प्रकारके अलंकरणोंसे मण्डित
थे। मन्दार तथा शमीकाने उन्हें देखा। उनका वैसा विकृत
रूप देखकर आनन्दित होकर उस समय वे दोनों हँसने
लगे। तब वे अपने अपमानके भयसे दुखी होकर क्रुद्ध
हो गये, उनकी आँखें लाल-लाल हो गयीं ॥ २१-२२ ॥
वे बोले-अरे मन्दबुद्धि! तुम मतवाले होकर मुझे
नहीं जान रहे हो, इसी कारण दाँत खोलकर पत्नीसहित
तुम मुझपर हँस रहे हो, अतः तुम दोनों सभी प्राणियोंद्वारा
वर्जित वृक्षकी योनिको प्राप्त करो ॥ २३ ॥
ब्रह्माजी बोले-शाप सुनकर वे दोनों अत्यन्त दुखी
हो गये। प्रणाम करके वे दोनों बोले- हे ब्रह्मन् ! शापसे
क्री०ख०-अ०३४] * भृशुण्डीके शापसे औरव-पुत्रीका शमीवृक्षकी योनि-प्राप्तिका आख्यान * ३५३
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