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श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

Ganesha Purana Gita Press Special Edition

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished656 पृष्ठ

चौथा अध्याय

२७८ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण-
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चौथा अध्याय
नरान्तककी भूलोक और नागलोकपर विजय

व्यासजी बोले—हे ब्रह्मन्! मैंने आपके मुखसे प्रकारकी मायाओंका ज्ञान रखनेवाले अत्यन्त बलवान्
देवान्तकके चरितका भक्तिपूर्वक श्रवण किया, अब आप दैत्योंको वहाँ भेजा। वे वहाँ गरुड़का रूप धारण करके
मुझे यह बतायें कि नरान्तकने क्या किया ? ॥ १ ॥ गये और उन श्रेष्ठ नागोंका भक्षण करने लगे ॥ १०-११ ॥
ब्रह्माजी बोले- हे ब्रह्मन् ! हे सत्यवतीपुत्र ! तुम्हारे उन दानवोंके द्वारा असंख्य नागोंका भक्षण कर
[गणेशजीसे सम्बन्धित कथाओंके प्रति] परम आदरभावको लिये जानेके उपरान्त मोतियों, रत्नों, अनेक प्रकारके
देखकर अब मैं तुमसे उसे कहूँगा, संयतचित्त होकर उसे सुन्दर दिव्य वस्त्र और दस हजार नागकन्याओंको साथ
श्रवण करो। अनेक दैत्यसमूहोंसे घिरे हुए नरान्तकने लिये शेषनाग उनके सम्मुख गये। उन्होंने वह सब
पृथ्वीपर जाकर विध्वंसका ताण्डव मचा दिया, उसने [उपहारके रूपमें] उन्हें देकर उन असुरोंसे सन्धि कर
कुछ राजाओंको मार डाला ॥ २-३ ॥ ली ॥ १२-१३ ॥
बहुत-से राजाओंको मारा गया देखकर [शेष] उन अनन्त सिरवाले शेषनागने नरन्तकके आदेशानुसार
सभी राजा उसकी शरणमें चले आये। जिस प्रकार उसका शासन स्वीकार कर लिया और वार्षिक कर देना
ज्ञानसे अज्ञान और सूर्योदयसे अन्धकार पलायमान हो भी स्वीकार कर लिया ॥ १४ ॥
जाता है, उसी प्रकार वह जिस-जिस [शत्रु] सेनाकी तब भी उस दैत्य (नरान्तक) -ने अनेक दैत्योंसहित
ओर देखता था, वह दसों दिशाओंमें भाग खड़ी होती एक श्रेष्ठ दैत्यको रसातलमें सर्वाध्यक्षके रूपमें नियुक्त
थी। इस प्रकार नरान्तकने सम्पूर्ण भूमण्डलको अपने करवाया और साथ ही वहाँ नियुक्त उस दैत्यको
वशमें कर लिया ॥ ४-५ ॥ नरान्तकने अपने इस आदेशकी सूचना भिजवायी कि
जो राजा उसकी शरणमें आ गये थे, उनको 'यदि तुम नागोंमें कोई विकृति (विद्रोहकी भावना)
अधीनता स्वीकार कर लेनेके कारण उसने उन्हें उनके देखो, तो दूतके मुखसे हमें सूचित करो। हम सम्पूर्ण
पदोंपर पुनः स्थापित कर दिया और जो मार डाले गये नागोंका वध कर डालेंगे' ॥ १५-१६१/२ ॥
थे, उनके पुत्रोंको करदाता [राजा]-के रूपमें नियुक्त कर उसे इस प्रकारकी शिक्षा देकर उन सभी दैत्योंने
दिया। जो राजा उससे युद्ध करनेको उद्यत हुए थे, उनको मृत्युलोकमें स्थित नरान्तकके पास जाकर सारा वृत्तान्त
भी उसने अपना सेवक बना लिया और अपने मनोनुकूल उससे कहा। मृत्युलोक और पाताललोकमें उत्पन्न
दैत्योंको उनके पदोंपर स्थापित कर दिया ॥ ६-७ ॥ होनेवाली वे सभी वस्तुएँ जो स्वर्गलोकमें दुर्लभ थीं, उन्हें
उसने समुद्ररूपी वलयसे घिरी हुई [सम्पूर्ण] तथा [दोनों लोकोंके] सम्पूर्ण वृत्तान्त नरान्तक देवान्तकके
पृथ्वीका पालन किया। [उस समय] उसके आतंकस्पी लिये सदा भेजा करता था ॥ १७-१९ ॥
भारसे देवता, मनुष्य और किन्नर अत्यन्त पीड़ित हो उसी प्रकार देवान्तक भी उसके लिये वह सब कुछ
गये। यज्ञ और स्वाध्यायकर्मसे रहित मुनिजन [उस भेजा करता था, जो भूतलपर दुर्लभ है। इस प्रकार वे
समय] पर्वतोंकी गुफाओंमें चले गये। 'वेदका त्याग दोनों परम प्रसन्नतापूर्वक त्रैलोक्यका राज्य करते थे ॥ २० ॥
करना दोषयुक्त है'- ऐसा विचारकर वे मनमें ही वेदका [ राजा ] सोमकान्त बोले- [ हे मुने !] उन
अभ्यास करते थे। आतंकित मनवाले होनेके कारण दोनोंका वध किस रूपसे, किस अस्त्र-शस्त्रसे, किस
तपस्या भी नहीं कर पा रहे थे ॥ ८-९१/२ ॥ अवतारद्वारा और कैसे हुआ ? वह सब मुझे बतलाइये ॥ २१ ॥
तब नरान्तकने नागलोकको जीतनेकी इच्छासे अनेक भृगुजी बोले- [हे राजन् ! व्यासजीद्वारा] इसी

क्री०ख०-अ०५] * अदितिके तपसे प्रसन्न गणेशजीकी उनके पुत्ररूपमें अवतरित होनेकी स्वीकृति * २७९
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प्रकारका प्रश्न किये जानेपर चतुर्मुख ब्रह्माजीने व्यासजीके | जिस अस्त्र-शस्त्रसे मारा था तथा ब्रह्मा [आदि
प्रति परम प्रसन्नतापूर्वक जो कथा कही थी, उसे ही मैं | देवताओं]-ने अपने-अपने लोकोंको जिस प्रकार [पुनः]
तुमसे कहता हूँ॥ २२॥ | प्राप्त किया था और देवताओंको भी अपने अधिकारोंकी
ब्रह्माजी बोले- हे मुने! दुर्जय और वरगर्वित | प्राप्ति हुई, वह सब कहता हूँ। हे मुने! आदरपूर्वक
उन दोनोंको जिसने अवतार लेकर, जिस रूपसे और | सुनो॥ २३-२४॥
॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके अन्तर्गत क्रीडाखण्डमें 'व्यासप्रश्न' नामक चौथा अध्याय पूर्ण हुआ॥ ४॥
पाँचवाँ अध्याय
अदितिकी तपस्यासे प्रसन्न गणेशजीका उनके पुत्ररूपमें जन्म ग्रहण करनेकी स्वीकृति देना
ब्रह्माजी बोले- [हे व्यास!] कश्यप [ऋषि] | [प्रश्न] हो, उसे तुम सम्यक् रूपसे पूछो, मैं उसे
मेरे ही मानस पुत्र हैं, जो अत्यन्त बुद्धिमान्, पुण्यशाली, | बतलाऊँगा ॥ ९॥
धर्मशील, तपस्वी, जितेन्द्रिय, अत्यन्त दयावान्, संसारमें | अदिति बोली- इन्द्रादि देवगणोंको तो मैंने पुत्ररूपमें
सभीके दुःखों और शोकका शमन करनेवाले, ध्यानमें | प्राप्त किया है, किंतु जो परमात्मा चिदानन्द परात्पर
स्थित होकर भूत-भविष्य और वर्तमानको जान लेनेवाले, | ईश्वर हैं, वे जब मुझे पुत्ररूपमें प्राप्त हों, तो मेरा मन
मानसिक संकल्पसे सृष्टि और संहार कर सकनेवाले, | शान्त हो; मेरे मनमें उनकी सेवा करनेकी इच्छा है। आप
वेदान्तके पारगामी विद्वान्, सम्पूर्ण शास्त्रोंके तात्त्विक | उस उपायको बतलायें, जिससे वे [परम प्रभु] मेरे पुत्र
अर्थका ज्ञान रखनेवाले तथा मिट्टीके ढेले और सुवर्णमें | हों और मेरा मन कृतकृत्य हो ॥ १०-१११/२॥
तुल्यबुद्धि रखनेवाले हैं॥ १-३॥ | मुनि बोले- हे महाभाग्यशालिनि! तुमने बहुत
अदिति उनकी ज्येष्ठ पत्नी थी, जो उन्हें अत्यन्त | उचित प्रश्न किया है, तुम्हारी बात मुझे अत्यन्त सन्तुष्टि
प्रिय थी। वह सम्पूर्ण [शुभ] लक्षणोंसे सम्पन्न थी, तीनों | देनेवाली है॥ १२॥
लोकोंमें उसका सौन्दर्य अनुपमेय था। वह अपने | जैसे प्यासे व्यक्तिको जल और भूखेको भोजन
पातिव्रतके तेजसे तीनों लोकोंको भस्म कर सकनेमें सक्षम | सन्तुष्टिकारक होता है, वैसे ही हे देवि! तुम्हारी [यह]
थी। शेषनाग भी अपने सहस्र मुखोंसे जिसके गुणोंका | बात मुझे अत्यन्त सन्तुष्टि देनेवाली है॥ १३॥
वर्णन करनेमें समर्थ नहीं हैं। [श्रेष्ठ] गुणोंकी प्राप्तिके | किंतु हे देवि! बिना पुण्यके परमात्मा कैसे अपने
लिये अष्ट नायिकाएँ भी जिसकी सेवा करती थीं। | पुत्र बनेंगे, अतः मैं तुमको उपाय बताता हूँ, उसे हृदयमें
इन्द्रादि देवगणोंको जिस पापरहिताने जन्म दिया था, वह | स्थिर करो॥ १४॥
मूलप्रकृतिरूपा [देवी] वहाँ उस रूपमें (मुनिपत्नीके | हे प्रिये! जो इन्द्रियातीत [परमात्मा] श्रुतियों और
रूपमें) निवास करती थी। उसने किसी समय अपने | ब्रह्मादि देवताओंके लिये भी अगोचर, निर्गुण, निरहंकार,
प्रसन्न मनवाले पतिसे प्रसन्नतापूर्वक कहा- ॥ ४-७॥ | निष्काम और अद्वितीय है, जो मायाका विषय नहीं है,
हे स्वामिन्! मैं कुछ पूछना चाहती हूँ, कृपा करके | मायाको नचानेवाला है, मायावियोंको भी मोहित करनेवाला
उसे बतलायें; क्योंकि हे प्रभो! किसी सदाचारिणी | है, मायासे परे होते हुए भी मायाका आधार है,
स्त्रीकी पतिके अतिरिक्त कोई अन्य गति नहीं होती ॥ ८॥ | कारणातीत है, मायाका विस्तार करनेवाला है, जगत्प्रपंचके
कश्यपजी बोले- हे कल्याणकारिणि! हे निष्पाप | कारणका भी कारण है- वह अनुष्ठानके बिना साकार
प्रिये! तुमने उचित ही कहा है; तुम्हारे मनमें जो भी | स्वरूपमें कैसे आ सकता है? ॥ १५-१७॥

२८० * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम्* [ श्रीगणेशपुराण-
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अदिति बोली—हे महामुने! मुझे इस समय
किसका ध्यान करना चाहिये, कौन-सा अनुष्ठान करना
चाहिये और किस मन्त्रसे करना चाहिये? वह मुझे
बताइये ॥ १८ ॥
ब्रह्माजी बोले— [हे व्यास !] अदितिके इस
प्रकार पूछनेपर कश्यपमुनिने उसे [गणेशजीके] पंचाक्षर
नाममन्त्रका उपदेश दिया, जो प्रारम्भमें 'ॐ'काररूप
पल्लवसे युक्त, चतुर्थी विभक्तिसे समन्वित और अन्तमें
'नमः' पदवाला था। उन्होंने ध्यानसहित एवं न्यास और
देवतासे युक्त पुरश्चरणकी सम्पूर्ण विधिको उसे
बतलाया ॥ १९-२० ॥
हे ब्रह्मन् ! तब उसने परम प्रसन्नतापूर्वक अपने पति
कश्यपजीको प्रणाम किया और आदरपूर्वक उनका पूजन
किया। तदनन्तर उनसे आज्ञा लेकर वृक्षों और लताओंसे
संयुक्त तथा वायु एवं अन्य उपद्रवोंसे रहित स्थानवाले
वनमें तपस्याके लिये चली गयी ॥ २१-२२॥
वहाँ वह अदिति स्नान करके पवित्र वस्त्र धारणकर
सुन्दर आसनपर बैठ गयी और चित्तवृत्तियोंका निरोधकर
संयत मनसे देवाधिदेव गणेशजीका ध्यान करती हुई,
यथाविधि न्यास करके गणेशजीका स्मरण करती हुई
उनके परम मन्त्रका जप करने लगी ॥ २३-२४ ॥
अपनी मानसिक वृत्तियोंको गणेशजीके अतिरिक्त
अन्य किसीमें न ले जानेवाली वह उनके दर्शनकी
अभिलाषासे निराहार रहते हुए तथा वायुमात्रका भक्षण
करते हुए उनके ध्यान और मन्त्रजपमें संलग्न रहती थी।
उसके तपके प्रभावसे सभी प्राणी वैररहित हो गये थे।
[उसके तपसे] पराभूत सभी देवता यही चिन्ता करते थे
कि ये न जाने क्या प्राप्त करेंगी! ॥ २५-२६ ॥
अदितिने इस प्रकार सौ वर्षोंतक महान् तपस्या
की। उसके अनेक प्रकारके कष्टों तथा स्त्री होते हुए
भी उस प्रकारके धैर्यको देखकर करोड़ों सूर्योंके समान
प्रभाववाले तेजःपुंज गणाधिपति भगवान् विनायक उसके
सम्मुख प्रकट हो गये ॥ २७-२८ ॥
वे हाथीके सदृश मुखवाले, दस भुजाओंसे युक्त
और कुण्डलोंसे सुशोभित थे। कामदेवसे भी अधिक
सुन्दर शरीरवाले वे सिद्धि और बुद्धिसे समायुक्त थे। वे
[कण्ठमें] वर्षाजलसे उत्पन्न मोतियोंकी माला, [हाथमें]
परशु, [कमरमें] सोनेकी करधनी धारण किये हुए थे
और उनके [ललाटपर] कस्तूरीका तिलक लगा हुआ
था। उन्होंने नाभिदेशपर सर्प धारण कर रखा था और
उन [मंगलमय प्रभु]-के [श्रीविग्रहपर] दिव्य वस्त्र
सुशोभित थे ॥ २९-३० १/२॥
उस महान् तेजोरशिको अपने सम्मुख देखकर
अदिति भयभीत हो काँपने लगीं, उन्होंने अपने नेत्र मूँद
लिये और वे मूर्च्छित होकर पृथ्वीपर गिर पड़ीं ॥ ३११/२॥
जप और ध्यान भूलकर वे अपने मनमें यह चिन्ता
करने लगीं कि मेरे सम्मुख यह कौन आ गया? यह क्या
अद्भुत घटना घटी है ! मैं अपना जप और ध्यान भी भूल
गयी हूँ! कहीं ये वही परमेश्वर तो नहीं हैं, [जिनका
मैं ध्यान करती हूँ] अपने महान् तेजसे दिशाओंको
आलोकित करते हुए मुझे वर देनेके लिये आये हैं—इस
प्रकार जब वे व्याकुल थीं, तभी भगवान् गणेश उनसे
बोले— ॥ ३२-३४॥
विनायक बोले- हे देवि ! तुम दिन-रात मनमें
जिसका ध्यान करती हो, मैं वही हूँ। तुम्हारी निष्ठा और
दुष्कर तपस्या देखकर तुम्हें वर देनेके लिये आया हूँ।
हे सुव्रते ! तुम्हारे इस तपसे मैं सन्तुष्ट हूँ, तुम्हारे हृदयमें
जिन-जिन वरोंकी कामना हो, वे मुझसे माँग लो, मैं उन्हें
दूँगा ॥ ३५-३६ ॥
ब्रह्माजी कहते हैं- [ हे व्यास !] तब उन
गणेशजीके वचन सुनकर अदिति स्वस्थ हुई। विनम्र
भाववाली उसने दोनों हाथ जोड़कर विनायकको प्रणाम
किया और जो मनसे अतर्क्य हैं, ऐसे उन देवाधिदेव
गणेशजीसे वह कहने लगी - ॥ ३७१/२॥
अदिति बोली- हे अखिलेश्वर! आप ही इस
विश्वकी संरचना करते हैं, इसका पालन करते हैं और इसका
संहार करनेवाले भी आप ही हैं। आप नित्य हैं, निरंजन हैं,
भगवान् हैं, निर्गुण हैं, अहंकारसे रहित हैं, विविध रूप
धारण करनेवाले हैं, शाश्वत हैं, योगद्वारा जाननेयोग्य हैं,
तथा अखिल मनोरथोंकी पूर्ति करनेवाले हैं ॥ ३८-३९ ॥

क्री०ख०-अ०६ ] * दैत्योंके भारसे पीड़ित पृथ्वीका ब्रह्माजीके पास जाना * २८१
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हे विनायक! इस समय आप सौम्य स्वरूप करनेके लिये वनमें गयी और मैंने वहाँ महान् तप किया।
धारणकर वर प्रदान करें। हे देवेश्वर! यदि आप तदनन्तर वे भगवान् गजानन महान् प्रकाशपुंजके रूपमें
मुझपर प्रसन्न हैं और यदि आप वर देना चाहते हैं, मुझे वर प्रदान करनेके लिये आये। उनका वह स्वरूप
तो हे भगवन्! आप मेरी पुत्रताको प्राप्त करें, इसीसे देखकर मैं भयभीत हो गयी, तब मैंने उन विनायकदेवकी
मैं कृतकृत्य होऊँगी। तभी मैं आपकी सेवा कर प्रार्थना की॥ ४४-४५॥
पाऊँगी, तभी सज्जनोंकी रक्षा होगी और तभी दुष्टजन हे मुनिश्रेष्ठ! उन्होंने मुझे विविध प्रकारके वर
विनाशको प्राप्त करेंगे। साथ ही लोगोंकी कृतकृत्यता प्रदान किये। तदनन्तर वे गजानन 'तुम्हारे पुत्रके रूपमें
भी होगी॥ ४०-४१ १/२॥ जन्म ग्रहण करूँगा'-ऐसा कहकर अन्तर्धान हो गये।
विनायक बोले-मैं तुम्हारे पुत्ररूपमें जन्म ग्रहण हे मुने! तब मैं आपके प्रभावसे सफल मनोरथवाली
करूँगा, साधुजनोंकी रक्षा करूँगा, दुष्टोंका संहार करूँगा होकर अपने आश्रममें आ गयी॥ ४६ १/२॥
और तुम्हारी भी सम्पूर्ण मनोकामनाओंको पूर्ण ब्रह्माजी बोले-हे मुनीश्वर! इस प्रकार उसके
करूँगा॥ ४२ १/२॥ द्वारा कथित वरदान-सम्बन्धी अमृतमय वचनोंको सुनकर
ब्रह्माजी बोले-ऐसा कहकर देवाधिदेव वे विनायक वे मुनिश्रेष्ठ कश्यपजी अत्यन्त प्रसन्न हुए और अत्यन्त
अन्तर्धान हो गये और वह अदिति महर्षि कश्यपके पास प्रीतिके साथ उन्होंने देवी अदितिके साथ रमण किया।
गयी और सारा वृत्तान्त उन्हें बताया॥ ४३ १/२॥ उस समय वे दोनों वैसे ही आनन्दित हुए जैसे कि
अदिति बोली-आपकी आज्ञासे मैं तपस्या अमृतपानसे आनन्दकी प्राप्ति होती है॥ ४७-४८॥
॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके अन्तर्गत क्रीडाखण्डमें 'आश्रमाभिगम' नामक पाँचवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ ५॥
छठा अध्याय
दैत्योंके भारसे पीड़ित पृथ्वीका ब्रह्माजीके पास जाकर अपनी व्यथा बताना, ब्रह्मादि
देवताओंद्वारा परमात्मा गणेशसे अवतार धारण करनेकी प्रार्थना करना, देवी
अदिति और कश्यपके पुत्ररूपमें गणेशजीका अवतरण, कश्यपद्वारा उनके
जातकर्मादि संस्कार करना और 'महोत्कट' यह नाम रखना
भृगु बोले-दुष्टोंके अत्याचारसे अत्यन्त पीड़ित वैसा आप करें। अन्यथा पर्वतों तथा वनोंसे समन्वित मैं
वह पृथ्वी वेश बदलकर कमलके आसनपर विराजमान पृथ्वी रसातलको चली जाऊँगी॥ ४॥
रहनेवाले ब्रह्माजीके पास गयी और दोनों हाथ जोड़कर भृगु बोले-पृथ्वीका यह कथन सुनकर ब्रह्माजी
दयनीय अवस्थावाली वह पृथ्वी पद्मोद्भव ब्रह्माजीसे उससे बोले-'मैं, सभी लोकपाल, इन्द्र आदि देवता तथा
बोली॥ १ १/२॥ ऋषिगण भी स्वधाकार-स्वाहाकारसे रहित होकर अत्यन्त
भूमि बोली-मैं अत्यन्त दीन और यज्ञ, व्रत दुखी हैं। हम सभी उसी प्रकार अपने स्थानसे भ्रष्ट,
आदिसे रहित हो गयी हूँ। हे ब्रह्मन्! ऋषिगणोंके साथ मन्त्रोंसे रहित तथा अपने आचार-विचारसे रहित हो गये
इन्द्र आदि सभी देवता अपने-अपने स्थानसे च्युत हो गये हैं, जैसे कि प्रलयके समय हो जाते हैं॥ ५-६॥
हैं। दैत्योंके भारसे अत्यन्त संतप्त मैं आप ब्रह्माजीकी इसलिये हम सभी मिलकर देवाधिदेव भगवान्
शरणमें आयी हूँ॥ २-३॥ गणेशकी प्रार्थना करें। वे ब्रह्मरूप हैं, निराकार हैं तथा
जिस किसी उपायसे उन दुष्ट दैत्योंका विनाश हो, जगत्के कारणका भी कारण हैं। सौभाग्यसे यदि वे

२८२ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण-

लोगोंके समक्ष साकाररूप धारणकर प्रकट होंगे तो हे
वसुन्धरे! तभी सब लोगोंका और तुम्हारा भी कल्याण
होगा' ॥ ७-८ ॥
भृगु बोले-ऐसा कहकर ब्रह्मा आदि देवताओं और
ऋषिगणोंने बड़ी ही प्रसन्नतापूर्वक हाथ जोड़कर निराकार
तथा साकाररूप उन भगवान् गणेशका स्तवन किया ॥ ९ ॥
देवता तथा ऋषि बोले-सम्पूर्ण लोकोंके स्वामिन्
हे गणपति! आपको नमस्कार है, नमस्कार है। सम्पूर्ण
लोकोंके धाम! आपको नमस्कार है, नमस्कार है, समस्त
लोकोंकी सृष्टि करनेवाले! आपको नमस्कार है, नमस्कार
है। सम्पूर्ण लोकोंका विनाश करनेवाले! आपको नमस्कार
है, नमस्कार है ॥ १० ॥
देवताओंके शत्रुओंका विनाश करनेवाले! आपको
नमस्कार है, नमस्कार है। भक्तोंके बन्धनको काटनेवाले!
आपको नमस्कार है, नमस्कार है। अपने भक्तोंका
पालन-पोषण करनेवाले! आपको नमस्कार है, नमस्कार
है। स्वल्प भक्तिसे भी सन्तुष्ट हो जानेवाले! आपको
नमस्कार है, नमस्कार है ॥ ११ ॥
हे भगवन्! आप निराकार हैं, नित्य मायासे रहित
हैं, परात्पर ब्रह्ममय स्वरूपवाले हैं, क्षर तथा अक्षरसे
अतीत हैं, गुणोंसे रहित हैं और दीनोंपर अनुकम्पा
करनेवाले हैं, आपको नमस्कार है ॥ १२ ॥
सम्पूर्ण कामनाओंको पूर्ण करनेवाले आप निरामयको
नमस्कार है। सम्पूर्ण दैत्योंका विदारण करनेवाले निरंजनको
नमस्कार है। हे परोपकार करनेवाले! आप नित्य, सत्य
स्वरूपको नमस्कार है। सर्वत्र समान भाव रखनेवाले!
आपको नमस्कार है, नमस्कार है* ॥ १३ ॥
अत्यन्त दुःखसे दुखित तथा व्याकुल वे सभी
मुनिगण तथा देवता इस प्रकार स्तुति करके उन
देवाधिदेव भगवान् विनायकसे पुनः बोले- ॥ १४ ॥
[हे भगवन्!] सम्पूर्ण जगत्में हाहाकार हो रहा
है। सभी स्वधाकार तथा स्वाहाकारसे रहित हो गये हैं।
हम लोग मेरुपर्वतकी गुफामें उसी प्रकार रह रहे हैं, जैसे
वन्य पशु वहाँ रहते हैं ॥ १५ ॥
अतः हे विश्वम्भर! इस समय आप उस महादैत्यका
विनाश करें। इस प्रकारसे जब वे स्तुति कर रहे थे, उसी
समय आकाशवाणीने कहा- ॥ १६ ॥
'इस समय महर्षि कश्यपजीके घरमें भगवान्
गणेशजी अवतार ग्रहण करेंगे। वे अद्भुत कर्म करेंगे
और आप लोगोंको अपना-अपना पद प्रदान करेंगे। वे
दुष्टोंका विनाश तथा सज्जनोंकी रक्षा करेंगे' ॥ १७१/२ ॥
भृगु बोले-उस आकाशवाणीको सुनकर ब्रह्माजी
पृथ्वीसे बोले ॥ १८ ॥
ब्रह्माजी बोले-हे देवि! हे धरे! तुम
आकाशवाणीपर विश्वास करके स्वस्थ हो जाओ।
तुम्हारे लिये सभी देवता मृत्युलोकमें अवतार ग्रहण
करेंगे। वे गणेशजी अवतार धारणकर तुम्हारे महान्
भारको दूर करेंगे ॥ १९१/२ ॥
भृगु बोले-उन ब्रह्माजीद्वारा इस प्रकार कही
गयी वह पृथ्वी अत्यन्त स्वस्थ तथा प्रसन्न मनवाली हो
गयी और अपने स्थानको चली गयी ॥ २०१/२ ॥
तदनन्तर बहुत समय बीत जानेपर देवी अदितिने
गर्भ धारण किया। उसका वह गर्भ उसी प्रकार वृद्धिको
प्राप्त होने लगा, जैसे चन्द्रमा प्रतिदिन वृद्धिको प्राप्त
होता है। नौ मास पूर्ण हो जानेपर उसने श्रेष्ठ पुत्रको
जन्म दिया ॥ २१-२२ ॥
ब्रह्माजीके पूर्वकथनानुसार वह बालक कश्यपनन्दन
नामसे प्रसिद्ध हुआ। [जन्मके समय] वह दस
भुजाओंवाला था, महान् बलसे सम्पन्न था, उसके
कानोंमें कुण्डल सुशोभित हो रहे थे, ललाटपर कस्तूरीका


  • देवर्षय ऊचुः
    नमो नमस्तेऽखिललोकनाथ नमो नमस्तेऽखिललोकधामन्। नमो नमस्तेऽखिललोककारिन् नमो नमस्तेऽखिललोकहारिन्॥
    नमो नमस्ते सुरशत्रुनाश नमो नमस्ते हतभक्तपाश। नमो नमस्ते निजभक्तपोष नमो नमस्ते लघुभक्तितोष॥
    निराकृते नित्यनिरस्तमाय परात्परब्रह्ममयस्वरूप। क्षराक्षरातीत गुणैर्विहीन दीनानुकम्पिन् भगवन्नमस्ते॥
    निरामयायाखिलकामपूर निरञ्जनायाखिलदैत्यदारिन्। नित्याय सत्याय परोपकारिन् समाय सर्वत्र नमो नमस्ते॥
    (श्रीगणेशपुराण, क्रीडाखण्ड ६।१०-१३)

Here is the complete and accurate transcription of the Devanagari text from the image, line by line with line markers.

क्री०ख०-अ०६ ] * दैत्योंके भारसे पीड़ित पृथ्वीका ब्रह्माजीके पास जाना * २८३
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तिलक लगा हुआ था। मस्तक मुकुटसे शोभायमान था,
वह सिद्धि तथा बुद्धि नामक पत्नियोंसे समन्वित था,
कण्ठमें धारण की हुई रत्नमालासे मण्डित हो रहा था,
चिन्तामणिसे वक्षःस्थल सुशोभित हो रहा था, उसके
अधर जपापुष्पके समान अरुणवर्णके थे, नासिका उन्नत
थी, वह सुन्दर भृकुटी तथा ललाटवाला था, दीप्तिमान्
दाँतोंसे प्रकाशमान था, उसने अपने देहकी आभासे
समस्त अन्धकारको दूर कर दिया था, दिव्य वस्त्रोंको
धारण किये था और उसका स्वरूप अत्यन्त मंगलमय
था। इस प्रकारके बालकको देखकर दोनों माता-पिता—
अदिति और कश्यप उस समय उसके तेजसे अभिभूत
दृष्टिवाले हो गये और कुछ भी देखनेमें समर्थ न हो
सके। तब उन्होंने बलपूर्वक आँखोंको खोलकर उस
उत्तम रूपको देखा। उस समय वे दोनों अत्यन्त
आनन्दित हुए। तदनन्तर वह बालरूप गणपति उनसे इस
प्रकार बोला— ॥ २३–२७१/२॥
बालक बोला—हे मातः ! चूँकि आपने पूर्वकालमें
एक हजार वर्षतक तपस्या करते हुए जिस स्वरूपमें मेरा
ध्यान किया और मुझे पुत्ररूपमें प्राप्त करनेका वरदान
माँगा था, तब उस समय मैंने आपको विविध वर प्रदान
किये थे, और अब इस समय मैंने ही आपके पुत्ररूपमें
जन्म लिया है। वही अब मैं पृथ्वीके भारका हरण
करूँगा, आप दोनोंकी सेवा करूँगा, ब्रह्मा आदि देवताओंको
पुनः उनके पदपर प्रतिष्ठित कराऊँगा और दुष्ट दैत्योंका
वध करूँगा ॥ २८–३०॥
भृगु बोले—इस प्रकारके उसके वचनोंको सुनकर
उन दोनोंके नेत्र आनन्दाश्रुओंसे भर गये। जिस प्रकार
चकवा-चकवी आकाशमें सूर्यको देखकर आनन्दित हो
उठते हैं, वैसे ही वे दोनों अति प्रसन्न हो गये ॥ ३१ ॥
तब वे दोनों बोल उठे—‘निश्चित ही हम दोनोंके
अद्भुत पुण्यका उदय हुआ है, जिसके फलस्वरूप आप
परमात्मा विनायक हमारे पुत्ररूपमें उत्पन्न हुए हैं ॥ ३२ ॥
हमारा कुल धन्य हो गया, हमारे माता-पिता धन्य
हो गये, हमारा जन्म लेना सफल हो गया और हमारा ज्ञान
धन्य हो गया, जो कि सम्पूर्ण चराचरके गुरु, सबके साक्षी,
निराकार, नित्य आनन्दमय तथा सत्यस्वरूप भगवान् गणेश
हमारे मंगलमय पुत्रके रूपमें उत्पन्न हुए हैं ॥ ३३१/२ ॥
जिसमें यह सम्पूर्ण चराचर जगत् सूत्रमें पिरोये गये
मणिगणोंकी भाँति व्याप्त है, जो सर्वत्र व्याप्त तथा सब
कुछ जाननेवाला है, वही आप हैं, इसमें कोई सन्देह नहीं
है। आपका यह रूप अत्यन्त दिव्य है, इस समय इसको
ऐन्द्रजालिककी भाँति आप छिपा लें और सामान्य प्राकृत
स्वरूप धारण करें। आगे जिस रूपके द्वारा आपको जैसा कर्म
करना होगा, वैसा रूप आप धारण करें' ॥ ३४–३६ ॥
ऐसा वचन सुनकर गणेशजीने अपना वह दिव्य
रूप छिपा लिया और दो हाथोंवाले होकर वे सामान्य
बालककी भाँति भूमिपर लोटकर रुदन करने लगे ॥ ३७ ॥
उनके रुदनकी ध्वनिसे उस समय रसातल, आकाश,
दिशाएँ, विदिशाएँ निनादित हो उठीं। उस रुदनके
शब्दको सुनकर वन्ध्या स्त्रियाँ गर्भवती हो गयीं, शुष्क
वृक्ष हरे-भरे हो गये, देवताओंके साथ इन्द्र अत्यन्त हर्षित
हो उठे और दैत्योंको अत्यन्त भय हो गया, उस समय
धरतीकी वृद्धि होने लगी। उस समय महर्षि कश्यपजीने
ब्राह्मणोंके साथ बालकका जातकर्म-संस्कार सम्पन्न
किया। उस बालकको मधु तथा घृतका प्राशन कराके
मन्त्रोच्चारणपूर्वक उसका स्पर्श किया ॥ ३८–४० ॥
मन्त्रोच्चारपूर्वक महर्षि कश्यपने बालकको माता
अदितिके स्तनोंका पान कराया। बालकका नालच्छेदन
करके उसे नहलाकर अदितिने बालकको सुला दिया ॥ ४१ ॥
उस समय कश्यपमुनिने ब्राह्मणोंको विविध प्रकारके
दान दिये। देवी अदितिने बड़ी प्रसन्नताके साथ सातवें दिन
प्रत्येक घरमें इक्षुसार (गुड़ आदि) और पाँचवें दिन भेंट
भिजवायी। ग्यारहवें दिन पिता कश्यपने ‘महोत्कट' यह
नाम उस बालकका रखा। वह बालक प्रतिदिन उसी प्रकार
बढ़ने लगा, जैसे शुक्लपक्षमें चन्द्रमा प्रतिदिन वृद्धिको
प्राप्त होता है। चूँकि वह सभीसे अत्यन्त उत्कट
(पराक्रमशाली) था, इसीलिये वह बालक गणेश महोत्कट—
इस नामसे प्रसिद्धिको प्राप्त हुआ ॥ ४२–४४ ॥
॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके अन्तर्गत क्रीडाखण्डमें 'विनायकका आविर्भाव' नामक छठा अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ६ ॥