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श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

Ganesha Purana Gita Press Special Edition

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished656 पृष्ठ

एक सौ छियालीसवाँ अध्याय

क्री०ख०-अ०१४६] * सगुणोपासनाकी श्रेष्ठता; क्षेत्र, ज्ञान तथा ज्ञेयका वर्णन * ६२१
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एक सौ छियालीसवाँ अध्याय
सगुणोपासनाकी श्रेष्ठता; क्षेत्र, ज्ञान तथा ज्ञेयका वर्णन
वरेण्य बोले-[हे भगवन्!] मूर्तिमान् आपकी
जो अनन्यभावसे उपासना करते हैं और जो अक्षर एवं
परम अव्यक्त आपकी उपासना करते हैं, उनमें श्रेष्ठ कौन
है? हे विभो! आप सब जाननेवाले, सबके साक्षी,
भूतभावन ईश्वर हैं, इस कारण मैं आपसे पूछता हूँ, आप
कृपाकर कहिये ॥ १-२ ॥
श्रीगणेशजी बोले-जो भक्त मुझमें चित्त लगाकर
मूर्तिमान् मेरी भक्तिपूर्वक उपासना करता है, ऐसा वह
अनन्य भक्तिमान् मुझे [विशेष] मान्य है ॥ ३ ॥
सम्पूर्ण इन्द्रियोंको अपने वशमें करके सब प्राणियोंका
हित करता हुआ जो अक्षर, अव्यक्त, सर्वव्यापी और कूटस्थ
स्थिर ब्रह्मका ध्यान करता है तथा जो जाननेमें अशक्य
मेरी उपासना करता है, वह भी मुझे ही प्राप्त करता है,
उसका भी मैं संसारसागरसे उद्धार करता हूँ ॥ ४-५ ॥
अव्यक्त ब्रह्मकी उपासना करनेवाले जनोंको अधिक
क्लेश भोगना पड़ता है। जो व्यक्त स्वरूपकी भक्तिसे प्राप्त
होता है, वही अव्यक्तकी उपासनासे भी होता है। थोड़ा
जाननेवाला भी यदि भक्तिमान् हो तो वह सम्पूर्ण विद्वानोंमें
श्रेष्ठ है। इसमें मुख्य कारण भक्ति ही है ॥ ६-७ ॥
जो भक्तिविहीन होकर भजन करता है, वह
चाण्डाल है और जो जन्मसे चाण्डाल होकर भी मेरा
भक्तिपूर्वक भजन करता है, वह उस ब्राह्मणसे श्रेष्ठ है।
शुकादि तथा सनकादि ऋषिगण भक्तिसे ही मुक्त हुए हैं
और भक्तिसे ही नारद और चिरंजीवी मार्कण्डेयादि
मुझको प्राप्त हुए हैं ॥ ८-९ ॥
इस कारण भक्तिसे मन और बुद्धि मुझमें लगानी
चाहिये, हे राजन्! भक्तिपूर्वक मेरा यजन करोगे तो
मुझको ही प्राप्त होओगे। हे राजन्! यदि मुझमें अपना
मन न लगा सको, तो अभ्यासयोगसे मुझे प्राप्त करनेका
यत्न करो ॥ १०-११ ॥
और जो यह भी न हो सके, तो जो कुछ कर्म करो, उसे
मुझे अर्पित करो, मेरी कृपासे तुम परम शान्तिको प्राप्त
होओगे और यदि यह भी न कर सको तो यत्नपूर्वक तीनों
प्रकारके कर्मोंके फलका त्याग करो। प्रथमतः मुझमें बुद्धि
लगाना श्रेष्ठ है, उससे ध्यान श्रेष्ठ है, उससे सम्पूर्ण कर्मोंका
त्याग श्रेष्ठ है, इससे अत्यन्त श्रेष्ठ शान्ति है ॥ १२-१४ ॥
जो अहंकारका त्याग करनेवाला, ममताबुद्धिसे
रहित, द्वेष न करनेवाला, सबमें करुणा रखनेवाला और
लाभ-अलाभ, सुख-दुःख, मान-अपमानमें एक दृष्टि
रखनेवाला है, वह मेरा प्रिय है ॥ १५ ॥
जिसको देखकर किसीको भय नहीं होता और जो
किसीसे भययुक्त नहीं होता है; उद्वेग, भय, क्रोध और
हर्षसे जो रहित है, वही मेरा प्रिय है ॥ १६ ॥
शत्रु-मित्र, निन्दा-स्तुति, हर्ष-शोकमें जिसका चित्त
एक है, जो मौनी, स्थिरचित्त, भक्तिमान् और असंग है,
वह मेरा प्रिय है। जो मेरे इस उपदेशका पालन करता है,
वह त्रिलोकीमें नमस्कारके योग्य है और वह मुक्तात्मा मेरा
सदा प्रिय है। जो अनिष्टकी प्राप्तिमें द्वेष और इष्टकी
प्राप्तिमें हर्ष नहीं करता है तथा क्षेत्र और क्षेत्रज्ञको जानता
है, वही मेरा सबसे प्रिय है ॥ १७-१९ ॥
वरेण्य बोले-हे गजानन! क्षेत्र क्या है और उसको
जाननेवाला कौन है, उसका ज्ञान क्या है? हे करुणासागर !
मुझ प्रश्न करनेवालेको यह सब आप बताइये ॥ २० ॥
श्रीगणेशजी बोले- [पृथ्वी, जल आदि] पाँच
महाभूत और उनकी [गन्ध, रस आदि] तन्मात्राएँ, पाँच
कर्मेन्द्रियाँ, अहंकार, मन, बुद्धि और पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ,
अव्यक्त (मूल प्रकृति), इच्छा, धैर्य, द्वेष, सुख-दुःख और
चेतनासहित यह सारा समूह क्षेत्र कहलाता है ॥ २१-२२ ॥
हे राजन्! उसको जाननेवाला सर्वान्तर्यामी सर्वव्यापक
तुम मुझको जानो। मैं और यह समूह-ये दोनों ज्ञानके
विषय हैं ॥ २३ ॥
सरलता, गुरुशुश्रूषा, इन्द्रियोंके विषयोंसे वैराग्य,
पवित्रता, सहनशीलता, पाखण्डका त्याग, जन्ममरणादिमें
दोषदृष्टि, समदृष्टि, दृढ़भक्ति, एकान्तता तथा शम-

६२२ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण-
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दमसहित जो ज्ञान है, हे राजन्! उसीको यथार्थ ज्ञान | अधिक होनेसे कर्मकी और तमोगुण अधिक होनेसे
समझो। हे राजन्! इस ज्ञानके विषयको मैं कहता हूँ, | सुखसे इतर निद्रा और आलस्यकी प्राप्ति होती है ॥ ३३ ॥
तुम श्रवण करो, जिसको जाननेसे संसारसागरसे छूटकर | इन तीनोंकी वृद्धिमें क्रमसे मुक्ति, संसार और
मुक्त हो जाओगे ॥ २४-२६ ॥ | दुर्गंतिकी प्राप्ति मनुष्योंको होती है, इस कारण हे राजन्!
जो अनादि, इन्द्रियरहित, सत्त्व-रज-तम आदि | सत्त्वगुणयुक्त होओ ॥ ३४ ॥
गुणोंका भोक्ता, किंतु गुणवर्जित, अव्यक्त, सत्-असत्से | हे नरेश्वर! इसलिये तुम सर्वत्र भलीभाँति विद्यमान
परे तथा इन्द्रियोंके विषयोंका प्रकाशक है। जो विश्वको | मुझ परमात्माका निश्चल भक्तिपूर्वक सर्वभावसे भजन
धारण करनेवाला, सर्वत्र व्यापक, एक होकर भी अनेक | करो। हे राजन्! अग्नि, सूर्य, चन्द्रमा, तारागण और विद्वान्
रूपसे भासता है, वह बाहर-भीतरसे पूर्ण, असंग और | ब्राह्मणमें जो तेज है, उसे मेरा ही तेज जानो ॥ ३५-३६ ॥
अन्धकारसे परे है ॥ २७-२८ ॥ | मैं ही सम्पूर्ण संसारको उत्पन्नकर उसका संहार
अत्यन्त सूक्ष्म होनेसे वह जाना नहीं जाता, वह | करता हूँ और अपने तेजसे ओषधि और जगत्को मैं ही
ज्योतियोंको भी प्रकाशित करनेवाला है, इस प्रकार | पुष्ट करता हूँ। इन्द्रियाधिष्ठातृ देवताओंके रूपमें इन्द्रियोंको
ज्ञानसे जाननेयोग्य पुरातन पुरुषको ज्ञेय ब्रह्म जानो ॥ २९ ॥ | अधिष्ठित करके इन्द्रियविषयोंको और जठराग्निके रूपमें
यही परब्रह्म ज्ञेय है, यही आत्मा, पर, अव्यय तथा | भुक्त-पीत अन्न-जलादिको मैं ही पुण्य-पापलेशशून्य
प्रकृतिसे परे पुरुष कहलाता है। यह प्रकृतिसे उत्पन्न हुए | होकर भोगता हूँ। मैं ही विष्णु, रुद्र, ब्रह्मा, गौरी और
गुणोंको भोगता है। प्रकृतिके तीन गुण ही इस पुरुषको देहमें | गणपति हूँ, इन्द्रादि देवता तथा लोकपाल मेरे ही अंशसे
बाँधते हैं, जिस समय देहमें शान्ति और प्रकाशकी वृद्धि | उत्पन्न हुए हैं ॥ ३७-३९ ॥
हो, तब सत्त्वगुणकी अधिकता ज्ञात होती है ॥ ३०-३१ ॥ | जिस-जिस रूपसे प्राणी मेरी भक्तिपूर्वक उपासना
लोभ, अशान्ति, स्पृहा और कर्मारम्भ—ये रजोगुणके | करते हैं, उनकी भक्तिके अनुसार मैं उन्हें वैसा ही रूप
धर्म हैं। मोह, आलस्य, अज्ञान और प्रमाद—इन्हें ही | दिखाता हूँ। हे राजन्! इस प्रकार क्षेत्र, ज्ञाता, ज्ञान तथा
तमोगुण जानना चाहिये ॥ ३२ ॥ | ज्ञेयका विषय तुमसे मैंने वर्णन किया, जो तुमने पूछा था,
सत्त्वगुण अधिक होनेसे सुख और ज्ञानकी, रजोगुण | वह सब मैंने बता दिया ॥ ४०-४१ ॥
॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डमें 'क्षेत्र-ज्ञातृ-ज्ञेय-विवेक' नामक
एक सौ छियालीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १४६ ॥
एक सौ सैंतालीसवाँ अध्याय
दैवी, आसुरी और राक्षसी प्रकृति
श्रीगणेशजी बोले—दैवी, आसुरी, राक्षसी— | इत्यादि चिह्न दैवी प्रकृतिके समझने चाहिये। अब
तीन प्रकारकी मनुष्योंकी प्रकृति होती है, उनके फल और | आसुरीके चिह्न सुनो ॥ ३ ॥
चिह्न संक्षेपसे अब तुम्हारे लिये वर्णन करता हूँ ॥ १ ॥ | हे राजन्! अतिवाद, अभिमान, दर्प, अज्ञान और
दैवी प्रकृति मुक्तिको सिद्ध करती है, आगेकी दोनों | क्रोध—ये आसुरी प्रकृतिके चिह्न हैं ॥ ४ ॥
बन्धनमें डालती हैं। इनमें पहले दैवी प्रकृतिके चिह्न | [राक्षसी प्रकृतिके ये चिह्न हैं-] निष्ठुरता, मद,
कहता हूँ, उन्हें तुम सुनो ॥ २ ॥ | मोह, अहंकार, गर्व, द्वेष, हिंसा, क्रूरता, क्रोध, उद्धतता,
चुगली न करना, दया, अक्रोध, अचपलता, धैर्य, | विनयहीनता, दूसरोंके नाशके निमित्त अभिचारकर्म, क्रूर
सरलता, तेज, अभय, अहिंसा, क्षमा, शौच, निरभिमानिता | कर्मोंमें प्रीति। श्रेष्ठ पुरुषोंके वाक्यमें अविश्वास, अपवित्रता,
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क्री०ख०-अ०१४८ ] * तप, दान, ज्ञान आदि एवं गणेशगीताकी महिमा * ६२३
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कर्मोंका न करना, वेद, भक्त, देवता, मुनि, श्रोत्रिय, | मुझमें भक्ति होना दुर्लभ है ॥ १५ ॥
ब्राह्मण तथा स्मृति और पुराणकी निन्दा करना, पाखण्ड- | मूर्ख लोग मोहजाल तथा अपने कर्मोंसे बन्धनमें
वाक्योंमें विश्वास, दुष्टों तथा मलिन पुरुषोंकी संगति | पड़ते हैं, वे मैं ही हन्ता, मैं ही कर्ता, मैं ही भोक्ता हूँ—
करना ॥ ५-८ ॥ | ऐसा कहा करते हैं। मैं ही ईश्वर, मैं शासक, मैं
पाखण्डसहित कर्म करना, दूसरेकी वस्तुओंको | जाननेवाला, मैं सुखी हूँ—इस प्रकारकी मति मनुष्योंको
पानेकी इच्छा, अनेक कामनाओंसे युक्त होना, सदा | नरकमें ले जाती है ॥ १६-१७ ॥
झूठ बोलना, दूसरेका उत्कर्ष न सहना, दूसरेके कृत्यको | इस कारण तुम इस (तामसी प्रकृति)-को छोड़कर
नष्ट करना इत्यादि बहुत सारे दूसरे भी राक्षसी प्रकृतिके | दैवी प्रकृतिका आश्रय करो और दृढ़ चित्तसे मेरी निरन्तर
गुण हैं ॥ ९-१० ॥ | भक्ति करो ॥ १८ ॥
पृथ्वी और स्वर्गलोकमें ये सब गुण रहते हैं। जो | हे राजन्! वह भक्ति भी सात्त्विकी, राजसी और
लोग मेरी भक्तिसे रहित हैं, वे ही राक्षसी प्रकृतिको प्राप्त | तामसी—इन भेदोंसे तीन प्रकारकी है। जिस भक्तिसे
होते हैं। हे राजन्! जो इस तामसी प्रकृतिका आश्रय लेते | देवताओंका भजन किया जाता है, वह कल्याणकारिणी
हैं, वे रौरव नरकको प्राप्त होते हैं और वहाँ अकथनीय | सात्त्विकी भक्ति कही गयी है। जन्म-मृत्यु देनेवाली
दुःखको भोगते हैं ॥ ११-१२ ॥ | भक्ति राजसी कही गयी है, जिसमें सर्वभावसे यक्ष और
हे राजन्! वे तमोगुणी लोग दैववश नरकसे | राक्षसोंकी ही पूजा होती है ॥ १९-२० ॥
निकलकर भूलोकमें हीन जातियोंमें जन्मान्ध, पंगु, कुबड़े | जो लोग वेदविधानसे रहित, क्रूरता, अहंकार तथा
और दीन होकर जन्म लेते हैं ॥ १३ ॥ | दम्भसहित हैं, जो प्रेतभूतादिकोंको भजते हैं और कामुक
पापाचरणवाले तथा मुझमें भक्ति न करनेवाले | कर्म करते हैं तथा दुराग्रहपूर्वक अपने शरीर और उसमें
पतित होते हैं, परंतु मेरे भक्त चाहे किसी भी योनिमें जन्म | स्थित मुझे भी क्लेश पहुँचाते हैं, उनकी यह तामसी
लें, नष्ट नहीं होते, उनका उद्धार हो जाता है ॥ १४ ॥ | भक्ति नरक देनेवाली है ॥ २१-२२ ॥
हे राजन्! यज्ञसे अथवा दूसरे कर्मोंसे स्वर्गकी | काम, लोभ, क्रोध, दम्भ—ये नरकके चार महाद्वार
प्राप्ति होती है, जो सकाम पुरुषोंको सुलभ है, परंतु | हैं, इस कारण इनको त्यागना चाहिये ॥ २३ ॥
॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डमें 'योगोपदेशवर्णन' नामक एक सौ सैंतालीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १४७ ॥
एक सौ अड़तालीसवाँ अध्याय
तप, दान, ज्ञान, कर्म, कर्ता, सुख-दुःख, ब्रह्म एवं वर्णानुसार
कर्मोंके भेद तथा गणेशगीताकी महिमा
श्रीगणेशजी बोले—हे राजन्! कायिक, वाचिक | अन्तःकरणमें प्रसन्नता, शान्ति, मौन, जितेन्द्रियता,
और मानसिक—इन तीन भेदोंसे तप भी तीन प्रकारका | सदा निर्मल भाव रखना—यह मानसिक तप है ॥ ४ ॥
है। ऋजुता, आर्जव, पवित्रता, ब्रह्मचर्य, अहिंसा, गुरु- | निष्काम भाव और श्रद्धासे जो तप किया जाता है,
पण्डित-ब्राह्मण एवं देवताका पूजन करना तथा नित्य | वह सात्त्विक है। ऐश्वर्य और सत्कार-पूजाके निमित्त
स्वधर्मका पालन करना—यह कायिक तप है ॥ १-२ ॥ | तथा दम्भसहित जो तप किया जाता है, वह राजसी तप
जो मर्मस्पर्शी न हों, ऐसे प्रिय वचन बोलना, | है। राजसी तप निश्चय ही जन्म-मृत्यु और अस्थिरताको
उद्वेगरहित, हितकारी और सत्य भाषण करना, वेद- | देनेवाला है। जिसमें दूसरेको तथा अपनेको पीड़ा हो, वह
शास्त्रोंका पढ़ना—यह वाचिक तप है ॥ ३ ॥ | तामस तप कहा गया है ॥ ५-६ ॥

६२४ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण-

[बायाँ स्तम्भ]
विधियुक्त, उत्तम देश-कालमें सत्पात्रको श्रद्धापूर्वक
जो दान दिया जाता है, वह सात्त्विक दान कहा गया
है। उपकार या फलकी कामनासे मनुष्य जो दान करते
हैं तथा ऐसा दान जो क्लेशपूर्वक अथवा भक्तिके कारण
दिया जाय, वह राजसी दान कहलाता है॥७-८॥
जो देश-कालरहित, अपात्रमें अवज्ञापूर्वक दिया
जाता है और जो दान अपमानपूर्वक दिया जाता है, वह
तमोगुणी दान कहा गया है। हे राजन्! मन लगाकर
सुनो, ज्ञान भी तीन प्रकारका है, कर्म और कर्ता भी
तीन प्रकारके हैं, वह मैं प्रसंगसे कहता हूँ॥९-१०॥
जो अनेक प्रकारके प्राणियोंमें एक मुझको ही
देखता है तथा नाशवान् भूतोंमें मुझ नित्यको जानता है,
हे राजन्! वह सात्त्विक ज्ञान है। जो उन अनेक भूतोंसे
मुझे पृथक् स्वरूपवाला और अव्यय जानते हैं, इस
ज्ञानका नाम राजस है॥ ११-१२ ॥
हेतुरहित, असत्य तथा देह और मनके सुखके लिये
असत् और अल्प अर्थयुक्त विषयोंमें लगना—इस ज्ञानका
नाम तामस है। हे राजन्! सत्, रज, तम—इन भेदोंसे
कर्म भी तीन प्रकारका है, जिसे मैं बताता हूँ; सुनो,
कामना, द्वेष और दम्भसे रहित जो नित्य कर्म है और
फलकी इच्छासे रहित जो कर्म किया जाता है, वह
सात्त्विक कहलाता है॥ १३-१४॥
जो बहुत क्लेशपूर्वक तथा फलकी इच्छासे किया
गया है और जिसको मनुष्य दम्भपूर्वक करते हैं, वह
राजस कर्म कहलाता है और जो अपनी शक्तिके बाहर
तथा अर्थका क्षय करनेवाला कर्म अज्ञानपूर्वक किया
जाता है, वह तामस कर्म कहा गया है॥ १५-१६॥
इसी प्रकार हे राजन्! तीन प्रकारके कर्ता होते हैं,
जिन्हें मैं बताता हूँ। हे राजन्! धैर्य और उत्साहयुक्त,
सिद्धि-असिद्धिमें समान दृष्टिवाला, विकार और अहंकारसे
रहित सात्त्विक कर्ता कहलाता है॥ १७-१८॥
जो हर्ष-शोकसहित कर्म करता है, हिंसामें प्रवृत्ति
और फलकी इच्छा रखता है, जिसमें अपवित्रता और
लोभ है, वह राजसी कर्ता कहा जाता है। प्रमाद और
अज्ञानयुक्त, दूसरोंका नाश करनेवाला, दुष्ट, आलसी
और जो कुतर्क करनेवाला है, वह तामसी कर्ता कहा

[दायाँ स्तम्भ]
जाता है। हे राजन्! इसी प्रकार सुख-दुःख भी तीन
प्रकारके हैं, वह तुम क्रमसे सुनो, इनके भी सात्त्विक,
राजस, तामस भेद हैं, उन्हें मैं कहता हूँ॥ १९–२१ ॥
जो पहले तो विषके समान प्रतीत हो, किंतु
दुःखका अन्त करनेवाला हो और परमार्थोन्मुख बुद्धिसे
जिसकी कामना की जाती हो, जो अन्तमें अमृतके समान
हो तथा जो अपनी बुद्धिको आनन्द देनेवाला हो, वह
सात्त्विक सुख कहा गया है। विषयोंका जो सुख प्रथम
तो अमृतके समान विदित हो और अन्तमें विषके समान
फल दे, उसे राजसी सुख कहते हैं॥ २२-२३॥
जो तन्द्रा तथा प्रमादसे उत्पन्न हुआ हो, आलस्यसे
भरा हुआ हो तथा अपनेमें सदा मोह उत्पन्न करता हो,
उसका नाम तामसी सुख है। ऐसा कोई भी प्राणी नहीं
है, जो इन तीनों गुणोंसे मुक्त हो॥ २४-२५॥
हे राजन्! ब्रह्म भी ओम्, तत्, सत्—इस भेदसे तीन
प्रकारका है और हे राजन्! इस त्रिलोकीमें सब कुछ तीन
होकर ही व्याप्त हैं। ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र—
ये स्वभावसे ही भिन्न कर्म करनेवाले हैं, इनके कर्म
संक्षेपसे मैं तुमसे कहता हूँ॥ २६-२७॥
बाह्य और अन्तः इन्द्रियोंको वशमें करना, सरलता,
क्षमा, अनेक प्रकारके तप, पवित्रता, दोनों प्रकार (अन्वय-
व्यतिरेक)-से आत्माका ज्ञान, वेद, शास्त्र, पुराण और
स्मृतियोंका ज्ञान होना तथा उनके अर्थोंका अनुष्ठान
करना—ये ब्राह्मणके कर्म हैं॥ २८-२९॥
दृढ़ता, शूरता, चतुरता, युद्धसे पलायन न करना,
शरणागतकी रक्षा, दान, धैर्य, स्वाभाविक तेज, प्रभुता,
मनकी उदारता, अच्छी नीति, लोकपालन (तथा
राज्यपालन)-के पाँच कर्मोंमें अधिकार—ये क्षत्रियोंके
स्वाभाविक कर्म हैं। अनेक प्रकारकी वस्तुओंका क्रय-
विक्रय, पृथ्वीकर्षण अर्थात् खेती आदि करना, गायोंकी
रक्षा करना—ये तीन प्रकारके वैश्यके कर्म कहे गये हैं।
हे राजन्! दान, ब्राह्मणोंकी सेवा तथा सदा शिवजीकी
उपासना—यह शूद्रोंका कर्म कहा गया है॥ ३०-३३॥
हे राजन्! ये सब वर्ण अपने-अपने कर्म यथावत्
करते हुए और सम्पूर्ण कर्म मुझे अर्पण करते हुए मेरी
कृपासे निश्चल परम स्थानको प्राप्त करते हैं॥ ३४॥