गणेश गीता (गणेश पुराण क्रीड़ाखण्ड - राजा वरेण्य-गजानन संवाद सटीक)
Ganesha Gita from Ganesha Purana with Hindi Commentary
भगवान् गणेश / महर्षि वेदव्यास द्वारा
भाषाटीकासमेत । ( ८३ )
यह जो कुछ भी करे सब मुझे निवेदन करदे मेरे आश्रय
करनेवाले स्त्री दुराचारी पापी क्षत्रिय वैश्य शूद्रादि ॥ २२ ॥
मदाश्रया विमुच्यंते किं मद्भक्त्या द्विजातयः ॥
न विनश्यति मद्भक्तो ज्ञात्वेमा मद्दिभूतयः २३॥
यह भी तो मेरा आश्रय करनेसे मुक्त होजाते हैं फिर मेरे
भक्तोंकी तौ बातही क्या है, मेरा भक्त यह मेरी विभूति
जानकर कभी नष्ट नहीं होता है ॥ २३ ॥
प्रभवं मे विभूतीश्च न देवा ऋषयो विदुः ॥
नानाविभूतिभिरहं व्याप्य विश्वं प्रतिष्ठितः २४
मेरे प्रभव ( उत्पत्ति ) और मेरी विभूतियों को देवता और
ऋषिभी नहीं जानते, मैं अनेक विभूतियोंसे विश्वमें व्याप्त
होकर स्थित हूं ॥ २४ ॥
यद्यच्छ्रेष्ठतमं लोके सा विभूतिर्निबोध मे ॥२५॥
ॐतत्सदिति श्रीमद्गणेशगीतासूपनिषदर्थगर्भासु योगामृ-
तार्थशास्त्रे उत्त० श्रीगजाननवरेण्यसंवादे उपास-
नायोगोनाम सप्तमोऽध्यायः ॥ ७ ॥
( ८४ ) गणेशगीता-अ० ८.
जो जो इस लोकमें तेजयुक्त और श्रेष्ठतम हैं वह सब
मेरी विभूति हैं ॥ २५ ॥
ॐ तत्सदिति श्रीमद्गणेश० योगामृतार्थशास्त्रे गजाननवरेण्य-
संवादे पंडितज्वालाप्रसादमिश्रकृतभाषाटीकायाम्
उपासनायोगो नाम सप्तमोऽध्यायः ॥ ७ ॥
वरेण्य उवाच ।
भगवन्नारदो मह्यं तव नाना विभूतयः ॥
उक्तवांस्ता अहं वेद न सर्वाः सोऽपि वेत्ति ताः १
वरेण्य बोले हे गणेशजी ! नारदजीके मुखसे मैंने तुम्हारी
अनेक विभूति श्रवण की हैं उन्हें मैं जानताहूं, सब नहीं जानता,
कारण कि सम्पूर्ण विभूति तो नारदजी भी नहीं जानते ॥ १॥
त्वमेव तत्त्वतः सर्वा वेत्सि ता द्विरदानन ॥
निजं रूपमिदानीं मे व्यापकं चारु दर्शय ॥ २ ॥
हे गजानन ! आपही उन सबको तत्त्वसे जानते हो, इस समय
मनोहर और व्यापक आप अपना रूप मुझे दिखाइये ॥ २ ॥
श्रीगजानन उवाच ।
एकस्मिन्मयि पश्य त्वं विश्वमेतच्चराचरम् ॥
नानाश्चर्याणि दिव्यानि पुरा दृष्टानि केनचित् ३
३. अध्याय ७-१०: क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ विवेक, त्रिगुण-विभेद, मोक्ष-योग व फलश्रुति
भाषाटीकासमेत । ( ८५ )
गणेशजी बोले राजन् ! इकले मुझहीमें तुम यह चराचर
संसार देखो, और अनेक प्रकारके दिव्य आश्चर्य देखो जो
पूर्वकालमें किसीनेही देखे हैं ॥ ३ ॥
ज्ञानचक्षुरहं तेऽद्य सृजामि स्वप्रभावतः ॥
चर्मचक्षुः कथं पश्येन्मां विभुं ह्यजमव्ययम् ॥४॥
मैं अपने प्रभावसे तुमको ज्ञाननेत्र देता हूं, कारण कि मुझ
सर्वव्यापक अज अव्ययको चर्मचक्षु नहीं देखसक्ते ॥ ४ ॥
ब्रह्मोवाच ।
ततो राजा वरेण्यः स दिव्यचक्षुरवैक्षत ॥
ईशितुः परमं रूपं गजास्यस्य महाद्भुतम् ॥५॥
ब्रह्माजी बोले ! तब वह वरेण्य राजा गणेशजीके महा-
अद्भुतरूप देखनेमें समर्थ दिव्य दृष्टिको प्राप्त होते हुए ॥ ५ ॥
असंख्यवक्त्रं ललितमसंख्यांघ्रिकरं महत् ॥
अनुलिप्तं सुगन्धेन दिव्यभूषाम्बरस्रजम् ॥ ६ ॥
असंख्य शोभायमान मुख, असंख्य हाथ, और सुगन्धिसे
लिप्त, दिव्य भूषण वसन और मालासे शोभित ॥ ६ ॥
असंख्यनयनं कोटिसूर्यरश्मिधृतायुधम् ॥
तद्वर्ष्मणि त्रयो लोका दृष्टास्तेन पृथग्विधाः॥७॥
( ८६ ) गणेशगीता-अ० ८.
असंख्य नेत्र, करोडों सूर्यकी किरणोंकी समान प्रकाशीत
आयुध धारण किये, इस प्रकार उनके शरीरमें एक स्थानमें
राजाने तीनोंलोक देखे ॥ ७ ॥
वरेण्य उवाच ।
दृष्ट्वैश्र्वरं परं रूपं प्रणम्य स नृपोऽब्रवीत् ॥
वीक्षेऽहं तव देहेऽस्मिन्देवानृषिगणान्पितॄन् ॥८॥
यह ईश्वरसम्बन्धी परम रूप देख प्रणाम करके राजा
( वरेण्य ) बोला-हे भगवन् ! मैं आपके इस देहमें देवता
ऋषियोंके गण और पितरोंको देखता हूं ॥ ८ ॥
पातालानां समुद्राणां द्वीपानां चैव भूभृताम् ॥
महर्षीणां सप्तकं च नानार्थैः संकुलं विभो ॥९॥
हे विभो ! सात पाताल, सात समुद्र, सात द्वीप,सात पर्वत,
सात ऋषि, यह सब अनेक अर्थोंसे युक्त देखता हूं ॥ ९ ॥
भुवोऽन्तरिक्षं स्वर्गांश्च मनुष्योरगराक्षसान् ॥
ब्रह्मविष्णुमहेशेन्द्रान्देवाअन्तूननेकधा ॥ १० ॥
पृथ्वी, अन्तरिक्ष, स्वर्ग, मनुष्य, सर्प, राक्षस, ब्रह्मा, विष्णु,
महेश, इन्द्र,देवता और भी अनेकप्रकारके जन्तु देखता हूं १०॥
भाषाटीकासमेत । ( ८७ )
अनाद्यनन्तं लोकादिमनन्तभुजशीर्षकम् ॥
प्रदीप्तानलसंकाशमप्रमेयं पुरातनम् ॥ ११ ॥
अनादि, अनन्त लोकादि, अनन्त भुजा और शिरोंसे युक्त
जलती हुई अग्निकी समान प्रकाशमान अप्रमेय पुरातन तुमको
देखता हूं ॥ ११ ॥
किरीटकुण्डलधरं दुर्निरीक्ष्यं मुदावहम् ॥
एतादृशं च वीक्षे त्वां विशालवक्षसं प्रभुम् १२॥
किरीट कुंडल धारण किये सहजसे देखनेके अयोग्य
आनन्ददायक चौडी छातीयुक्त हे प्रभो ! इस प्रकारका
तुम्हारा रूप देखताहूं ॥ १२ ॥
सुरविद्याधरैर्यक्षैः किन्नरैर्मुनिमानुषैः ॥
नृत्यद्भिरप्सरोभिश्च गन्धर्वैर्गानतत्परैः ॥ १३ ॥
देवता, विद्याधर, यक्ष, किन्नर, मुनि, मनुष्य, नृत्य करती
हुई अप्सरा, गान करते हुए गंधर्वोंसे तुम्हारा स्वरूप सेवित है १३
वसुरुद्रादित्यगणैः सिद्धैः साध्यैर्मुदायुतैः ॥
सेव्यमानंमहाभक्त्या वीक्ष्यमाणं सुविस्मितैः १४
आठ वसु, बारह आदित्योंके गण, सिद्ध, साध्य यह सब
( ८८ ) गणेशगीता-अ० ८.
तुम्हारी सेवा करते, और महाभक्तिसे विस्मयको प्राप्त होकर
आपको देखते हैं ॥ १४ ॥
वेत्तारमक्षरं वेद्यं धर्मगोप्तारमीश्वरम् ॥
पातालानिदिशःस्वर्गान्भुवंव्याप्याखिलंस्थितम्
यह तुम्हें रूपके ज्ञाता, अक्षर, वेद्य ( जानने योग्य )
धर्मके रक्षक, ईश्वर, पाताल, दिशा, स्वर्ग, पृथ्वी इन
सबमें व्यापक और ईश्वर जानते हैं ॥ १५ ॥
भीता लोकास्तथा चाहमेवं त्वां वीक्ष्य रूपिणम् ।
नानादंष्ट्राकरालं च नानाविद्याविशारदम् १६॥
हे भगवन् ! इस तुम्हारे रूपको देखकर सम्पूर्ण लोक तथा
मैं भी डरगया हूं, यह आपका मुख अनेक तीक्ष्ण दाढोंसे
भयंकर है आप अनेक विद्याओंके पार गन्ता हो ॥ १६ ॥
प्रलयानलदीप्तास्यं जटिलं च नभःस्पृशम् ॥
दृष्ट्वागणेश ते रूपमहं भ्रान्त इवाभवम् ॥ १७ ॥
प्रलयकी अग्निकी समान दीप्तिमान् तुम्हारा मुख है,
जिसकी जटा आकाशको छूती है, हे गणेशजी ! आपका
यह रूप देखकर मैं भ्रान्त हुआ हूं ॥ १७ ॥
भाषाटीकासमेत । (८९)
देवा मनुष्या नागाद्याः खलास्त्वदुदरेशयाः ॥
नानायोनिभुजश्चान्ते त्वय्येव विशंति च १८
देवता मनुष्य नागादि और खल (दुष्ट) तुम्हारे उदरमें
शयन करते हैं जो अनेक योनियोंको भोगकर अन्तमें तुममें
प्रवेश करते हैं ॥ १८ ॥
अब्धेरुत्पद्यमानास्ते यथा जीमूतबिन्दवः ॥
त्वमिन्द्रोऽग्निर्यमश्चैव निर्ऋतिर्वरुणो मरुत् १९॥
जैसे सागरसे उत्पन्न हुए मेघके जलबिन्दु फिर उसीमें
लीन होते हैं इसी कारण इन्द्र, अग्नि, यम, निर्ऋति, वरुण,
वायु, तुमही हो ॥ १९ ॥
गुह्यकेशस्तथेशानः सोमः सूर्योऽखिलं जगत् ॥
नमामि त्वामतः स्वामिन्प्रसादं कुरु मेऽधुना २०
कुबेर, ईशान, सोम (चंद्र) और सम्पूर्ण जगत् सब
तुमही हो, हे स्वामी ! मैं तुमको नमस्कार करता हूं, अब
आप मेरे ऊपर कृपा करो ॥ २० ॥
दर्शयस्व निजं रूपं सौम्यं यत्पूर्वमीक्षितम् ॥
को वेद लीलास्ते भूमन् क्रियमाणा निजेच्छया २१
( ९० ) गणेशगीता-अ० ८.
पहले देखाहुआ आप अपना सौम्यरूप मुझे दिखाइये, हे
भगवन् ! अपनी इच्छासे क्रीडाकरनेवाले आपकी लीलाको
कौन जान सक्ता है ॥ २१ ॥
अनुग्रहान्मयादृष्टमैश्वरं रूपमीदृशम् ॥
ज्ञानचक्षुर्यतो दत्तं प्रसन्नेन त्वया मम ॥ २२ ॥
आपकी कृपासे मैंने यह इस प्रकारका ईश्वर सम्बन्धी
रूप देखा, जो आपने प्रसन्न होकर मुझे ज्ञानचक्षु दिये॥२२॥
श्रीगजानन उवाच ।
नेदं रूपं महाबाहो मम पश्यन्त्ययोगिनः ॥
सनकाद्या नारदाद्याःपश्यन्ति मदनुग्रहात् २३
श्रीगणेशजी बोले,हे महाभुज ! योग न करनेवाले इस मेरे
रूपका कभी भी दर्शन नहीं पाते, सनकादि नारदादि मेरे
अनुग्रहसे इस रूपका दर्शन करते हैं ॥ २३ ॥
चतुर्वेदार्थतत्त्वज्ञाश्चतुःशास्त्रविशारदाः ॥
यज्ञदानतपोनिष्ठा न मे रूपं विदन्ति ते ॥२४॥
चारों वेदोंके अर्थके तत्त्व जाननेवाले सम्पूर्ण शास्त्रोंमें
कुशल, यज्ञ, दान और तप करनेहारे भी मेरे रूपको नहीं
जानते ॥ २४ ॥
भाषाटीकासमेत । (९१)
शक्योऽहं वीक्षितुं ज्ञातुं प्रवेष्टुं भक्तिभावतः ॥
त्यज भीतिं च मोहं च पश्यमां सौम्यरूपिणम् २५
मैं भक्तिभावसे जाननेकूं दीखनेकूं प्राप्त होनेकूं समर्थ हूं अब
तू भय और मोहको त्याग कर मेरे योग्य रूपको देख ॥२५॥
मद्भक्तो मत्परः सर्वसंगहीनो मदर्थकृत् ॥
निष्क्रोधःसर्वभूतेषु समो मामेति भूभुज ॥२६॥
ॐ तत्सदिति श्रीमद्गणेशगीतासूपनिषदर्थगर्भासु यो-
गामृतार्थशास्त्रे श्रीगणेशपुराण उत्तरखण्डे
श्रीगजानवरेण्यसंवादे विश्वरूपदर्शनो
नामाष्टमोऽध्यायः ॥ ८ ॥
हे राजन् ! जो भक्त मेरे परायण सर्व संगत्यागी सब कर्म-
हीमें समर्पण करते हैं, और क्रोध त्यागन कर सर्व प्राणियोंमें
समान दृष्टि करते हैं, वह मुझको प्राप्त होते हैं ॥ २६ ॥
ॐ तत्सदिति श्रीमद्गणेश० योगामृतार्षशास्त्रे श्रीगणेशपु०
पण्डितज्वालाप्रसादमिश्रकृतभाषाटीकायां विश्वरूपदर्शनो
नामाष्टमोऽध्यायः ॥ ८ ॥
( ९२ ) गणेशगीता-अ० ९.
वरेण्य उवाच ।
अनन्यभावास्त्वां सम्यङ्मूर्तिमन्तमुपासते ॥
योऽक्षरं परमं व्यक्तं तयोः कस्ते मतोऽधिकः १॥
वरेण्य बोले हे भगवन् ! जो मूर्तिमान् तुमको अनन्यभा-
वसे भजन करते हैं और जो अक्षर परम और व्यक्तरूपसे
तुम्हारी उपासना करते हैं, उनमें अधिक कौन हैं ॥ १ ॥
असि त्वं सर्ववित्साक्षी भूतभावन ईश्वरः ॥
अतस्त्वां परिपृच्छामि वद मे कृपया विभो २॥
हे ईश्वर तुम सब जाननेवाले सबके साक्षी भूतभावन(जग-
त्के उत्पन्न कर्त्ता ) ईश्वर हो इस कारण मैं तुमसे पूछताहूं.
आप कृपाकर कहिये ॥ २ ॥
श्रीगजानन उवाच ।
यो मां मूर्तिधरं भक्त्या मद्भक्तः परिषेवते ॥
स मे मान्योऽनन्यभक्तिर्नियुज्य हृदयं मयि ३॥
श्रीगणेशजी बोले जो भक्तिपूर्वक मूर्तिधारी मेरी उपासना
करता है, वह अनन्य भक्तिमान् हृदयमें मुझे धारण करनेवाला
मेरा मान्य है ॥ ३ ॥
भाषाटीकासमेत । (९३)
खगणं स्ववशं कृत्वाखिलभूतहितार्थकृत् ॥
ध्येयमक्षरमव्यक्तं सर्वगं कूटग स्थिरम् ॥ ४ ॥
सम्पूर्ण इन्द्रियोंको अपने वशमें कर सब प्राणियोंका हित
करता हुआ जो अक्षर और अव्यक्त, सर्वव्यापी कूटस्थ
(निश्चल) स्थिर ब्रह्मका ध्यान करता है ॥ ४ ॥
सोऽपि मामेत्यनिर्देश्यं मत्परो य उपासते ॥
संसारसागरादस्मादुद्धरामि तमप्यहम् ॥ ५ ॥
वहभी जो अनिर्देश्य (जाति गुण क्रियासे) जाननेको
अशक्य मेरी उपासना करता है उसको मैं संसारसागरसे
उद्धार करता हूं ॥ ५ ॥
अव्यक्तोपासनादुःखमधिकं तेन लभ्यते ॥
व्यक्तस्योपालनात्साध्यं तदेवाव्यक्तभक्तितः ६॥
अव्यक्त ब्रह्मकी उपासना करनेवाले जनोंको अधिक क्लेश
भोगना पडता है, जो व्यक्तस्वरूपकी उपासना भक्तिसे प्राप्त
होता है, वही अव्यक्तकी भक्तिसे होता है ॥ ६ ॥
भक्तिश्चैवादरश्चात्र कारणं परमं मतम् ॥
सर्वेषां विदुषां श्रेष्ठो ह्यकिंचिज्ज्ञोऽपिभक्तिमान् ७
( ९४ ) गणेशगीता-अ० ९.
इसमें मुख्य कारण भक्ति ही है, सम्पूर्ण विद्वानोंमें थोडा
जाननेवालाभी यदि भक्तिमान हो तो वह उनसे श्रेष्ठ है ॥७॥
भजन्भक्त्या विहीनो यः स चाण्डालोऽभिधीयते ।
चाण्डालोऽपि भजन्भक्त्या ब्राह्मणेभ्योऽधिकोमम॥
जो भक्तिविहीन होकर भजन करता है, वह चाण्डाल है
और चाण्डाल होकर मेरी भक्तिसे भजन करे और ब्राह्मण
मेरा भक्त न हो तो वह उस ब्राह्मणसे श्रेष्ठ है ॥ ८ ॥
शुकाद्याः सनकाद्याश्च पुरा मुक्ता हि भक्तितः ॥
भक्त्यैव मामनुप्राप्ता नारदाद्याश्चिरायुषः ॥ ९ ॥
शुकादि सनकादिक भक्तिसे ही मुक्त हुए हैं, और भक्ति
सेही नारद और मार्कण्डेयादि मुझको प्राप्त हुए हैं ॥ ९ ॥
अतो भक्त्या मयि मनो निधेहि बुद्धिमेव च ॥
भक्त्या यजस्व मां राजंस्ततो मामेव यास्यसि १०
इस कारण भक्तिसे मन और बुद्धि मुझमें लगानी, हे राजन् !
भक्तिसे मेरा यजन करो तो मुझको प्राप्त होगे ॥ १० ॥
असमर्थोऽर्पितुं स्वान्तमेवं मयि नराधिप ॥
अभ्यासेन च योगेन ततो गन्तुं यतस्व माम् ११
भाषाटीकासमेत । ( ९५ )
हे राजन् ! जो मुझमें एक संग अपना मन न लगासको
तो अभ्यासयोगसे मुझे प्राप्त होनेका यत्न करो ॥ ११ ॥
तत्रापि त्वमशक्तश्चेत्कुरु कर्म मदर्पणम् ॥
ममानुग्रहतश्चैवं परां निर्वृतिमेष्यसि ॥ १२ ॥
और जो यहभी न हो सके तो जो कुछ कर्म करो सो मेरे
अर्पण करो, मेरी कृपासेही परम शान्तिको प्राप्त होगे ॥१२॥
अथैतदप्यनुष्ठातुं न शक्तोऽसि तदा कुरु ॥
प्रयत्नतःफलत्यागं त्रिविधानां हि कर्मणाम् १३
और जो यहभी अनुष्ठान न करसको तो यत्नपूर्वक तीनों
प्रकारके कर्मोंका फल त्यागन करो ॥ १३ ॥
श्रेयसी बुद्धिरावृत्तेस्ततो ध्यानं परं मतम् ॥
ततोऽखिलपरित्यागस्ततःशान्तिर्गरीयसी १४॥
प्रथम मेरेमें बुद्धि लगनी श्रेष्ठ है,उससे ध्यान श्रेष्ठ है,उससे
सम्पूर्ण कर्मोंका त्याग श्रेष्ठ है, इससे अत्यन्त श्रेष्ठ शान्ति
प्राप्त होती है ॥ १४ ॥
निरहंममताबुद्धिरद्वेषः करुणासमः ॥
लाभालाभे सुखेदुःखे मानामाने समे प्रियः १५
( ९६ ) गणेशगीता-अ० ९.
अहंकारका त्याग, ममता बुद्धिका न होना, द्वेष न करना,
सबमें समान दृष्टि, लाभ अलाभ, सुख दुःख, मान अपमानमें
एक दृष्टि रहे, सो मेरा प्यारा है ॥ १५ ॥
यं वीक्ष्य न भयं याति जनस्तस्मान्न च स्वयम् ॥
उद्वेगभीःकोपमुद्दीरहितो यः स मे प्रियः॥१६॥
जिसको देखकर किसी प्राणीका भय नहीं होता, और जो
मनुष्योंसे शंकायुक्त नहीं होता है, उद्वेग और क्रोधके भयसे
जो रहित हो वही मेरा प्रिय है ॥ १६ ॥
रिपौ मित्रेऽथ गर्हायां स्तुतौ शोके समः समुत्॥
मौनी निश्चलधीर्भक्तिरसंगः स च मे प्रियः १७
शत्रु मित्र निन्दा स्तुति शोकमें जिसका चित्त एक है
मौनी, स्थिरचित्त, भक्तिमान्, असंग, ऐसाही प्राणी मेरा
प्रिय है ॥ १७ ॥
संशीलयति यश्चैनमुपदेशं मया कृतम् ॥
स वंद्यःसर्वलोकेषु मुक्तात्मा मे प्रियःसदा १८॥
जो मेरे किये उपदेशको विचार करता है, वह त्रिलोकीमें
नमस्कारके योग्य है और मेरा प्रिय है ॥ १८ ॥
भाषाटीकासमेत । ( ९७ )
अनिष्टाप्तौ च न द्वेष्टीष्टप्राप्तौ न च तुष्यति ॥
क्षेत्रतज्ज्ञौ च यो वेत्ति स मे प्रियतमो भवेत् १९
जो अनिष्टकी प्राप्तिमें द्वेष और इष्टकी प्राप्तिमें हर्ष नहीं करता
है क्षेत्र और क्षेत्रज्ञको जो जानता है, वही मेरा प्यारा है॥१९॥
वरेण्य उवाच ।
किं क्षेत्रं कश्च तद्वेत्ति किं तज्ज्ञानं गजानन ॥
एतदाचक्ष्व मह्यं त्वं पृच्छते करुणाम्बुधे ॥२०॥
वरेण्य बोले भगवन् ! क्षेत्र क्या है और उसका जानने-
वाला कौन है, उसका ज्ञान क्या है, हे करुणासागर मुझ
प्रश्न करनेवालेसे यह सब आप वर्णन कीजिये ॥ २० ॥
श्रीगजानन उवाच ॥
पञ्च भूतानि तन्मात्राः पञ्च कर्मेन्द्रियाणि च ॥
अहंकारो मनो बुद्धिः पञ्चज्ञानेन्द्रियाणि च२१॥
श्रीगणेशजी बोले पांच भूत और उनकी तन्मात्रा, पंच कर्में-
न्द्रिय, अहंकार, मन, बुद्धि और पांच ज्ञानेंद्रिय ॥ २१ ॥
इच्छाव्यक्तं धृतिद्वेषौ सुखदुःखे तथैव च ॥
चेतनासहितश्चायं समूहः क्षेत्रमुच्यते ॥ २२ ॥
( ९८ ) गणेशगीता अ० ९.
इच्छा, व्यक्त, धैर्य, द्वेष, सुख, दुःख और चेतना सहित
यह समूह, सब क्षेत्र कहाता है ॥ २२ ॥
तज्ज्ञं त्वं विद्धि मां भूप सर्वान्तर्यामिणं विभुम्॥
अयं समूहोऽहं चापि यज्ज्ञानविषयौ नृप ॥२३॥
हे राजन् ! उसका, जाननेवाला सर्वान्तर्यामी तुम मुझको
( क्षेत्रज्ञ ) जानो, मैं और यह समूह यह दोनों ज्ञेय अर्थात्
ज्ञानके विषय हैं ॥ २३ ॥
आर्जवं गुरुशुश्रूषाविरक्तिश्चेन्द्रियार्थतः ॥
शौचं क्षान्तिरदंभश्च जन्मादिदोषवीक्षणम्॥२४॥
सरलता, गुरुशुश्रूषा, इन्द्रियोंका विषयोंसे वैराग्य, पवि-
त्रता, सहनशीलता, पाखण्डका त्याग, जन्ममरणादि दोषोंमें
दृष्टि ॥ २४ ॥
समदृष्टिर्दृढा भक्तिरेकान्तित्वं शमो दमः ॥
एतैर्यच्च युतं ज्ञानं तज्ज्ञानं विद्धि बाहुज ॥२५॥
समदृष्टिता, दृढभक्ति, एकान्तता, शम, दम, हे राजन् !
इनके सहित जो ज्ञान है, उसीको ज्ञान कहते हैं ॥ २५ ॥
तज्ज्ञानविषयं राजन्ब्रवीमि त्वं शृणुष्व मे ॥
यज्ज्ञात्वेति च निर्वाणं मुक्त्वा संसृतिसागरम् २६
भाषाटीकासमेत । (९९)
हे राजन्!इस ज्ञानके विषयको मैं कहता हूं तुम श्रवण करो
जिसके जाननेसे संसारसागरसे छूटकर मुक्त होजाओगे॥२६॥
यदनादीन्द्रियैर्हीनं गुणभुग्गुणवर्जितम् ॥
अव्यक्तं सदसद्भिन्नमिन्द्रियार्थावभासकम्॥२७॥
जो अनादि इन्द्रियरहित सतरजतमके गुणोंका भोक्ता,
गुणवर्जित, अव्यक्त, सत्असत्से परे, इन्द्रियोंके विषयोंका
प्रकाशक ॥ २७ ॥
विश्वभृच्चाखिलव्यापि त्वेकं नानेव भासते ॥
बाह्याभ्यन्तरतः पूर्णमसंगं तमसः परम् ॥२८॥
विश्वका धारण करनेहारा, सम्पूर्णमें व्यापक, एकही ब्रह्म
अनेकरूपसे भासता है, वह बाह्य भीतरसे पूर्ण, असंग और
अंधकारसे परे हैं ॥ २८ ॥
दुर्ज्ञेयं चादिसूक्ष्मत्वादीप्तानामपि भासकम् ॥
ज्ञेयमेतादृशं विद्धि ज्ञानगम्यं पुरातनम् ॥२९॥
अत्यन्त सूक्ष्म होनेसे वह जाना नहीं जाता, ज्योतियोंका
भी प्रकाश करनेवाला है, इस प्रकार ज्ञानसे जानने योग्य
पुरातन पुरुषको ज्ञेय ब्रह्म जानो ॥ २९ ॥
( १०० ) गणेशगीता-अ० ९.
एतदेव परं ब्रह्म ज्ञेयमात्मा परोऽव्ययः ॥
गुणान्प्रकृतिजान्भुङ्क्ते पुरुषः प्रकृतेः परः ॥३०॥
यही परब्रह्म ज्ञेय है, यही आत्मा पर अव्यय प्रकृतिसे
परे पुरुष कहाता है, तथा प्रकृतिसे उत्पन्न हुए गुणोंको
भोगता है ॥ ३० ॥
गुणैस्त्रिभिरियं देहे बध्नाति पुरुषं दृढम् ॥
यदा प्रकाशः क्षांतिश्च वृद्धे सत्त्वे तदाधिकम् ३१॥
प्रकृतिके तीन गुणही इस पुरुषको देहमें बांधते हैं, जिस
समय देहमें शांति और प्रकाशकी वृद्धि हो तब सतोगुणकी
वृद्धि होती है ॥ ३१ ॥
लोभोऽशमः स्पृहारंभः कर्मणां रजसो गुणः ॥
मोहोऽप्रवृत्तिश्चाज्ञानं प्रमादस्तमसो गुणः ॥३२॥
लोभ, अशांति, स्पृहा, यह रजोगुणके धर्म हैं, मोह,
अप्रवृत्ति, अज्ञान, प्रमाद यही तमोगुण जानना ॥ ३२ ॥
सत्त्वाधिकः सुखं ज्ञानं कर्मसंगं रजोऽधिकः ॥
तमोऽधिकश्च लभते निद्रालस्यं सुखेतरत् ॥३३॥
सतोगुण अधिक होनेसे सुख ज्ञानकी , रजोगुण अधिक
होनेसे कर्मकी प्राप्ति,और तमोगुण अधिक होनेसे सुखसे इतर
निद्रा और आलस्यकी प्राप्ति होती है ॥ ३३ ॥
भाषाटीकासमेत । ( १०१ )
एषु त्रिषु प्रवृद्धेषु मुक्तिसंसृतिदुर्गतीः ॥
प्रयान्ति मानवा राजंस्तस्मात्सत्त्वयुतोभव ३४
इन तीनोंकी वृद्धिमें क्रमसे मुक्ति, संसार और दुर्गतिकी
मनुष्योंको प्राप्ति होती है इस कारण हे राजन् ! सतोगुणयुक्त
हूजिये ॥ ३४ ॥
ततश्च सर्वभावेन भज त्वं मां नरेश्वर ॥
भक्त्या चाव्यभिचारिण्यासर्वत्रैवचसंस्थितम् ३५
हे नरेश्वर ! तदनन्तर सर्वभावसे तुम मेरा भजन करो, और
निश्चल भक्तिसे सब स्थानमें मुझे स्थित जानो ॥ ३५ ॥
अग्नौ सूर्ये तथा सोमे यच्च तारासु संस्थितम् ॥
विदुषि ब्राह्मणे तेजो विद्धि तन्मामकं नृप॥३६॥
अग्नि, सूर्य, चंद्रमा, तारागण, विद्वान्, ब्राह्मणमें, जो तेज
है वह मेराही तेज जानो ॥ ३६ ॥
अहमेवाखिलं विश्वं सृजामि विसृजामि च ॥
औषधीस्तेजसासर्वा विश्वंचाप्याययाम्यहम् ३७
मैंही सम्पूर्ण संसारको उत्पन्न कर संहार करता हूं और
अपने तेजसे औषधी और जगतको मैंही युक्त करता हूं॥३७॥
( १०२ ) गणेशगीता-अ० ९.
सर्वेन्द्रियाण्यधिष्ठाय जाठरं च धनंजयम् ॥
भुनज्मिचाखिलान्भोगान्पुण्यपापविवर्जितः ३८
और सम्पूर्ण इन्द्रियोंमें तथा उदरमें स्थित होकर धनञ्जय-
नामक प्राण और जाठराग्नीरूपसे पापपुण्य रहित होकर
सम्पूर्ण भोगोंको भोगता हूं ॥ ३८ ॥
अहं विष्णुश्च रुद्रश्च ब्रह्मा गौरी गणेश्वरः ॥
इन्द्राद्या लोकपालाश्च ममैवांशसमुद्भवाः ॥३९॥
मैंही विष्णु, ब्रह्मदेव, रुद्र, गौरी, गणपति हूं, इन्द्रादिक
लोकपालें, मेरेही अंशसे उत्पन्न हुए हैं ॥ ३९ ॥
येनयेनहि रूपेण जनो मां पर्युपासते ॥
तथातथा दर्शयामि तस्मै रूपं सुभक्तितः ॥४०॥
जिस जिस रूपसे प्राणी मेरी, उपासना करते हैं, उनकी
भक्तिके अनुसार उन्हें वैसा वैसाही रूप दिखाता हूं ॥ ४० ॥
इति क्षेत्रं तथा ज्ञाता ज्ञानं ज्ञेयं मयेरितम् ॥
अखिलं भूपते सम्यगुपपन्नाय पृच्छते ॥ ४१ ॥
ॐतत्सादिति श्रीमद्गणेशगीतासूपनिषदर्थगर्भासुयोगामृता-
र्थशास्त्रे श्रीगणेशपुराणे उत्त० गजाननवरेण्यसंवादे
क्षेत्रज्ञातृज्ञेयविवेकयोगोनाम नवमोऽध्यायः ॥९॥