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सर्वकोश
गणेश गीता (गणेश पुराण क्रीड़ाखण्ड - राजा वरेण्य-गजानन संवाद सटीक)

गणेश गीता (गणेश पुराण क्रीड़ाखण्ड - राजा वरेण्य-गजानन संवाद सटीक)

Ganesha Gita from Ganesha Purana with Hindi Commentary

भगवान् गणेश / महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished130 पृष्ठ

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पृष्ठ 101

( १०० ) गणेशगीता-अ० ९.
एतदेव परं ब्रह्म ज्ञेयमात्मा परोऽव्ययः ॥
गुणान्प्रकृतिजान्भुङ्क्ते पुरुषः प्रकृतेः परः ॥३०॥
यही परब्रह्म ज्ञेय है, यही आत्मा पर अव्यय प्रकृतिसे
परे पुरुष कहाता है, तथा प्रकृतिसे उत्पन्न हुए गुणोंको
भोगता है ॥ ३० ॥
गुणैस्त्रिभिरियं देहे बध्नाति पुरुषं दृढम् ॥
यदा प्रकाशः क्षांतिश्च वृद्धे सत्त्वे तदाधिकम् ३१॥
प्रकृतिके तीन गुणही इस पुरुषको देहमें बांधते हैं, जिस
समय देहमें शांति और प्रकाशकी वृद्धि हो तब सतोगुणकी
वृद्धि होती है ॥ ३१ ॥
लोभोऽशमः स्पृहारंभः कर्मणां रजसो गुणः ॥
मोहोऽप्रवृत्तिश्चाज्ञानं प्रमादस्तमसो गुणः ॥३२॥
लोभ, अशांति, स्पृहा, यह रजोगुणके धर्म हैं, मोह,
अप्रवृत्ति, अज्ञान, प्रमाद यही तमोगुण जानना ॥ ३२ ॥
सत्त्वाधिकः सुखं ज्ञानं कर्मसंगं रजोऽधिकः ॥
तमोऽधिकश्च लभते निद्रालस्यं सुखेतरत् ॥३३॥
सतोगुण अधिक होनेसे सुख ज्ञानकी , रजोगुण अधिक
होनेसे कर्मकी प्राप्ति,और तमोगुण अधिक होनेसे सुखसे इतर
निद्रा और आलस्यकी प्राप्ति होती है ॥ ३३ ॥