गणेश गीता (गणेश पुराण क्रीड़ाखण्ड - राजा वरेण्य-गजानन संवाद सटीक)
Ganesha Gita from Ganesha Purana with Hindi Commentary
भगवान् गणेश / महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभाषाटीकासमेत । ( ८७ )
अनाद्यनन्तं लोकादिमनन्तभुजशीर्षकम् ॥
प्रदीप्तानलसंकाशमप्रमेयं पुरातनम् ॥ ११ ॥
अनादि, अनन्त लोकादि, अनन्त भुजा और शिरोंसे युक्त
जलती हुई अग्निकी समान प्रकाशमान अप्रमेय पुरातन तुमको
देखता हूं ॥ ११ ॥
किरीटकुण्डलधरं दुर्निरीक्ष्यं मुदावहम् ॥
एतादृशं च वीक्षे त्वां विशालवक्षसं प्रभुम् १२॥
किरीट कुंडल धारण किये सहजसे देखनेके अयोग्य
आनन्ददायक चौडी छातीयुक्त हे प्रभो ! इस प्रकारका
तुम्हारा रूप देखताहूं ॥ १२ ॥
सुरविद्याधरैर्यक्षैः किन्नरैर्मुनिमानुषैः ॥
नृत्यद्भिरप्सरोभिश्च गन्धर्वैर्गानतत्परैः ॥ १३ ॥
देवता, विद्याधर, यक्ष, किन्नर, मुनि, मनुष्य, नृत्य करती
हुई अप्सरा, गान करते हुए गंधर्वोंसे तुम्हारा स्वरूप सेवित है १३
वसुरुद्रादित्यगणैः सिद्धैः साध्यैर्मुदायुतैः ॥
सेव्यमानंमहाभक्त्या वीक्ष्यमाणं सुविस्मितैः १४
आठ वसु, बारह आदित्योंके गण, सिद्ध, साध्य यह सब