सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
गणेश गीता (गणेश पुराण क्रीड़ाखण्ड - राजा वरेण्य-गजानन संवाद सटीक)

गणेश गीता (गणेश पुराण क्रीड़ाखण्ड - राजा वरेण्य-गजानन संवाद सटीक)

Ganesha Gita from Ganesha Purana with Hindi Commentary

भगवान् गणेश / महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished130 पृष्ठ

पृष्ठ 93, कुल 130 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 93

( ९२ ) गणेशगीता-अ० ९.
वरेण्य उवाच ।
अनन्यभावास्त्वां सम्यङ्मूर्तिमन्तमुपासते ॥
योऽक्षरं परमं व्यक्तं तयोः कस्ते मतोऽधिकः १॥
वरेण्य बोले हे भगवन् ! जो मूर्तिमान् तुमको अनन्यभा-
वसे भजन करते हैं और जो अक्षर परम और व्यक्तरूपसे
तुम्हारी उपासना करते हैं, उनमें अधिक कौन हैं ॥ १ ॥
असि त्वं सर्ववित्साक्षी भूतभावन ईश्वरः ॥
अतस्त्वां परिपृच्छामि वद मे कृपया विभो २॥
हे ईश्वर तुम सब जाननेवाले सबके साक्षी भूतभावन(जग-
त्के उत्पन्न कर्त्ता ) ईश्वर हो इस कारण मैं तुमसे पूछताहूं.
आप कृपाकर कहिये ॥ २ ॥
श्रीगजानन उवाच ।
यो मां मूर्तिधरं भक्त्या मद्भक्तः परिषेवते ॥
स मे मान्योऽनन्यभक्तिर्नियुज्य हृदयं मयि ३॥
श्रीगणेशजी बोले जो भक्तिपूर्वक मूर्तिधारी मेरी उपासना
करता है, वह अनन्य भक्तिमान् हृदयमें मुझे धारण करनेवाला
मेरा मान्य है ॥ ३ ॥