गणेश गीता (गणेश पुराण क्रीड़ाखण्ड - राजा वरेण्य-गजानन संवाद सटीक)
Ganesha Gita from Ganesha Purana with Hindi Commentary
भगवान् गणेश / महर्षि वेदव्यास द्वारा
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खगणं स्ववशं कृत्वाखिलभूतहितार्थकृत् ॥
ध्येयमक्षरमव्यक्तं सर्वगं कूटग स्थिरम् ॥ ४ ॥
सम्पूर्ण इन्द्रियोंको अपने वशमें कर सब प्राणियोंका हित
करता हुआ जो अक्षर और अव्यक्त, सर्वव्यापी कूटस्थ
(निश्चल) स्थिर ब्रह्मका ध्यान करता है ॥ ४ ॥
सोऽपि मामेत्यनिर्देश्यं मत्परो य उपासते ॥
संसारसागरादस्मादुद्धरामि तमप्यहम् ॥ ५ ॥
वहभी जो अनिर्देश्य (जाति गुण क्रियासे) जाननेको
अशक्य मेरी उपासना करता है उसको मैं संसारसागरसे
उद्धार करता हूं ॥ ५ ॥
अव्यक्तोपासनादुःखमधिकं तेन लभ्यते ॥
व्यक्तस्योपालनात्साध्यं तदेवाव्यक्तभक्तितः ६॥
अव्यक्त ब्रह्मकी उपासना करनेवाले जनोंको अधिक क्लेश
भोगना पडता है, जो व्यक्तस्वरूपकी उपासना भक्तिसे प्राप्त
होता है, वही अव्यक्तकी भक्तिसे होता है ॥ ६ ॥
भक्तिश्चैवादरश्चात्र कारणं परमं मतम् ॥
सर्वेषां विदुषां श्रेष्ठो ह्यकिंचिज्ज्ञोऽपिभक्तिमान् ७