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सर्वकोश
गणेश गीता (गणेश पुराण क्रीड़ाखण्ड - राजा वरेण्य-गजानन संवाद सटीक)

गणेश गीता (गणेश पुराण क्रीड़ाखण्ड - राजा वरेण्य-गजानन संवाद सटीक)

Ganesha Gita from Ganesha Purana with Hindi Commentary

भगवान् गणेश / महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished130 पृष्ठ

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पृष्ठ 97

( ९६ ) गणेशगीता-अ० ९.
अहंकारका त्याग, ममता बुद्धिका न होना, द्वेष न करना,
सबमें समान दृष्टि, लाभ अलाभ, सुख दुःख, मान अपमानमें
एक दृष्टि रहे, सो मेरा प्यारा है ॥ १५ ॥
यं वीक्ष्य न भयं याति जनस्तस्मान्न च स्वयम् ॥
उद्वेगभीःकोपमुद्दीरहितो यः स मे प्रियः॥१६॥
जिसको देखकर किसी प्राणीका भय नहीं होता, और जो
मनुष्योंसे शंकायुक्त नहीं होता है, उद्वेग और क्रोधके भयसे
जो रहित हो वही मेरा प्रिय है ॥ १६ ॥
रिपौ मित्रेऽथ गर्हायां स्तुतौ शोके समः समुत्॥
मौनी निश्चलधीर्भक्तिरसंगः स च मे प्रियः १७
शत्रु मित्र निन्दा स्तुति शोकमें जिसका चित्त एक है
मौनी, स्थिरचित्त, भक्तिमान्, असंग, ऐसाही प्राणी मेरा
प्रिय है ॥ १७ ॥
संशीलयति यश्चैनमुपदेशं मया कृतम् ॥
स वंद्यःसर्वलोकेषु मुक्तात्मा मे प्रियःसदा १८॥
जो मेरे किये उपदेशको विचार करता है, वह त्रिलोकीमें
नमस्कारके योग्य है और मेरा प्रिय है ॥ १८ ॥