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गणेश गीता (गणेश पुराण क्रीड़ाखण्ड - राजा वरेण्य-गजानन संवाद सटीक)

गणेश गीता (गणेश पुराण क्रीड़ाखण्ड - राजा वरेण्य-गजानन संवाद सटीक)

Ganesha Gita from Ganesha Purana with Hindi Commentary

भगवान् गणेश / महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished130 पृष्ठ

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पृष्ठ 95

( ९४ ) गणेशगीता-अ० ९.
इसमें मुख्य कारण भक्ति ही है, सम्पूर्ण विद्वानोंमें थोडा
जाननेवालाभी यदि भक्तिमान हो तो वह उनसे श्रेष्ठ है ॥७॥
भजन्भक्त्या विहीनो यः स चाण्डालोऽभिधीयते ।
चाण्डालोऽपि भजन्भक्त्या ब्राह्मणेभ्योऽधिकोमम॥
जो भक्तिविहीन होकर भजन करता है, वह चाण्डाल है
और चाण्डाल होकर मेरी भक्तिसे भजन करे और ब्राह्मण
मेरा भक्त न हो तो वह उस ब्राह्मणसे श्रेष्ठ है ॥ ८ ॥
शुकाद्याः सनकाद्याश्च पुरा मुक्ता हि भक्तितः ॥
भक्त्यैव मामनुप्राप्ता नारदाद्याश्चिरायुषः ॥ ९ ॥
शुकादि सनकादिक भक्तिसे ही मुक्त हुए हैं, और भक्ति
सेही नारद और मार्कण्डेयादि मुझको प्राप्त हुए हैं ॥ ९ ॥
अतो भक्त्या मयि मनो निधेहि बुद्धिमेव च ॥
भक्त्या यजस्व मां राजंस्ततो मामेव यास्यसि १०
इस कारण भक्तिसे मन और बुद्धि मुझमें लगानी, हे राजन् !
भक्तिसे मेरा यजन करो तो मुझको प्राप्त होगे ॥ १० ॥
असमर्थोऽर्पितुं स्वान्तमेवं मयि नराधिप ॥
अभ्यासेन च योगेन ततो गन्तुं यतस्व माम् ११