गणेश गीता (गणेश पुराण क्रीड़ाखण्ड - राजा वरेण्य-गजानन संवाद सटीक)
Ganesha Gita from Ganesha Purana with Hindi Commentary
भगवान् गणेश / महर्षि वेदव्यास द्वारा
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गणेशजी बोले राजन् ! इकले मुझहीमें तुम यह चराचर
संसार देखो, और अनेक प्रकारके दिव्य आश्चर्य देखो जो
पूर्वकालमें किसीनेही देखे हैं ॥ ३ ॥
ज्ञानचक्षुरहं तेऽद्य सृजामि स्वप्रभावतः ॥
चर्मचक्षुः कथं पश्येन्मां विभुं ह्यजमव्ययम् ॥४॥
मैं अपने प्रभावसे तुमको ज्ञाननेत्र देता हूं, कारण कि मुझ
सर्वव्यापक अज अव्ययको चर्मचक्षु नहीं देखसक्ते ॥ ४ ॥
ब्रह्मोवाच ।
ततो राजा वरेण्यः स दिव्यचक्षुरवैक्षत ॥
ईशितुः परमं रूपं गजास्यस्य महाद्भुतम् ॥५॥
ब्रह्माजी बोले ! तब वह वरेण्य राजा गणेशजीके महा-
अद्भुतरूप देखनेमें समर्थ दिव्य दृष्टिको प्राप्त होते हुए ॥ ५ ॥
असंख्यवक्त्रं ललितमसंख्यांघ्रिकरं महत् ॥
अनुलिप्तं सुगन्धेन दिव्यभूषाम्बरस्रजम् ॥ ६ ॥
असंख्य शोभायमान मुख, असंख्य हाथ, और सुगन्धिसे
लिप्त, दिव्य भूषण वसन और मालासे शोभित ॥ ६ ॥
असंख्यनयनं कोटिसूर्यरश्मिधृतायुधम् ॥
तद्वर्ष्मणि त्रयो लोका दृष्टास्तेन पृथग्विधाः॥७॥