श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
ग्यारहवाँ अध्याय २७९
समाप्त हो जाता है। वहाँ मुलायम और कठोर का भेद कैसा ? शीतलता और उष्णता कैसी ? वह सब में सबका
आत्मा होकर रहता है इसलिये उसे द्वंद्व का भान ही नहीं होता। जिस प्रकार ग्रीष्म आग को नहीं जलाता, ठंडक
हिमालय को बाधा नहीं पहुँचाती, उसी प्रकार द्वंद्व की यह माला मुक्तों के गले में नहीं पड़ती। सुवर्ण के सुन्दर
अलंकार सुवर्ण की पेटी में ढँक कर रखने से वे ढँके हुए हैं यह कहने की अपेक्षा वे खुले रखें हैं यह कहना ही
उपयुक्त होगा। उसी प्रकार उसे सारे द्वंद्व परब्रह्म की तरह रहते हैं। उसके शरीर से जो भी चीज आकर लगती है
उसके शरीर का ही अंग बन जाती है। अलग कुछ नहीं रह जाता। अर्थात् सारे द्वंद्व टूट जाते हैं। हाथ में यदि कोई
ललिया कमल पकड़े तो उस कमल का कमलत्व ही समाप्त हो जाता है। इसमें कमल से उत्पन्न ब्रह्मदेव भी डूब
जाता है और परब्रह्मस्वरूप बन जाता है। स्पर्श, स्पर्श करने वाला तथा स्पर्श का विषय यह त्रिपुट ही समाप्त हो
जाता है। बल्कि वह अपने स्वभाव के अनुसार सब कुछ स्वयं ही बन जाता है। पूजा के लिये वह मूर्ति को हाथ
में लेता है तो उसे लगता है कि वह मूर्ति मैं स्वयं हूँ या वह पत्थरों से खेलता है तो उसे उसमें मेरा ही आभास
होता है। दीवार पर अलग-अलग रंग के चित्र बने रहते हैं। उस पर कहीं भी हाथ लगाने पर दीवार का ही स्पर्श
होता है, उसी प्रकार मुक्तों का स्पर्श करना पूर्ण रूप से अद्वैतरूपी तथा आत्मानात्मक ही होता है। इस प्रकार मुक्तों
का स्पर्शलक्षण प्रतीत होता रहता है। अब उनका बोलना कैसा होता है यह सुनो। वह बड़े प्रेम से जब कोई सरस
कथा सुनाता है, अथवा कोई लौकिक बात करने लगता है तो उसकी समाधि खण्डित नहीं होती। बोलते समय भी
मौन नहीं टूटता यही उसकी पहचान होती है। शब्दों की निःशब्दता ज्ञाता की ही समझ में आ पाती है। पति-पत्नी
घर में लोगों के सामने बातें किये बिना ही आचरण करते रहते हैं। क्या वे अबोल हैं या उनमें अटूट प्रेम है ? उसी
प्रकार मुक्तों के बोलने की स्थिति रहती है। शब्दार्थ में से शब्द निःशब्द होते रहते हैं। वह मुँह से जो अक्षर
निकालता है वह सचमुच अक्षररूप ही रहते हैं। उसकी वाणी सुनकर मन आश्चर्यचकित हो उठता है। मैं एक
कुशल वक्ता हूँ इस बात का उसे अभिमान ही नहीं होता अथवा मुझे लोगों का मनोरंजन करना है इसका भी उसे
स्मरण नहीं होता। निःशब्दों में से शब्द निकलते रहते हैं, उन शब्दों में भी निःशब्द रूप ही रहता है। इस प्रकार
वह बोलता है इसलिये बोलते रहने पर भी वह मौन रहता है। जल में लहरें उत्पन्न होती हैं तो भी लहरों का
स्वरूप जल ही रहता है। उसी प्रकार सभी शब्द निःशब्द से ही निकलते रहने के कारण शब्दों का सारा रूप
निःशब्द ही रहता है। वाच्य, वाचा और वाचकता इस त्रिगुट को छोड़ कर ही वह मधुर बातें करता है। यदि वह
ऊटपटांग बातें भी करता है तो भी उसका मौन का दामन नहीं छूटता। अरे ! सच बोलना है इसका भी उसे स्मरण
नहीं होता अथवा स्वार्थवश झूठ बोला जाय ऐसा भी उसे नहीं लगता। सत्य तथा मिथ्या इन दोनों को उसने झट
निगल लिया होता है इसलिये अलग तरह का भाषण करने पर भी वह मूल के मौन के कारण मौनी ही बना रहता
है। वह जोर से हाँक लगाये अथवा सिंह जैसी गर्जना करे तो भी शब्दों में निःशब्दता ही भरी होने के कारण
उसका मौन नहीं टूटता। वह यदि मेरी स्तुति करने लगता है तो उसमें मैं ही रहता हूँ और यदि वह
बेतुकी बातें करता है तो उसमें भी उसे मैं ही दिखायी देता हूँ। यदि वैसा ही प्रसंग उपस्थित होता है तो वह
झगड़ा भी करता है लेकिन उस कलह में भी उसे आगे-पीछे मैं ही दिखाई देता हूँ। उसका ऊटपटांग या
व्यंग्य भाषण भी शुद्ध परब्रह्म ही रहता है। उसमें और मुझमें कोई अन्तर न होने के कारण मैं और वह
सदा एक ही स्थान पर रहते हैं। 'तुम्हें भगवान तारेगा' ऐसा यदि कोई अकस्मात् कहता है तो मैं उसे अपने
मस्तक पर बिठाकर ब्रह्मसाक्षात्कार कराता हूँ। इसके लिये मैं सदा उसके वचन का पालन करता हूँ और उसके
वचन को प्रामाणिक मानता हूँ। अब 'वह' और 'मैं' का जो वाक्प्रचार है वह केवल बाह्यदृष्टि से है। वैसे मैं
२८० श्रीमद् एकनाथी भागवत
वही हूँ यह रहस्य मेरे भक्तगण अच्छी तरह जानते हैं। इसीलिये वह मेरा जीवश्चकंठश्च है और मैं भी उसका
आत्मजीवन हूँ। वह और मैं कल्पांत में भी भिन्न नहीं हैं इसे ध्यान में रखो। सारांश वह समग्र मुझमें रहता है और.
उसके अन्दर और बाहर मैं रहता हूँ। ऐसी अभिन्नता से वह संसार में सुख से रमता रहता है। उसके मुख से जो
शब्द निकलते हैं उनका उच्चार मैं ही करता हूँ। मुक्तों के बोलने के बारे में मैंने तुम्हें इस प्रकार विस्तार से बताया।
अब उसके हाथ की क्रियाओं के बारे में बताता हूँ। वह हाथ में कुछ लेने जाता है तो वह लेना ही भगवान बन
जाता है अथवा वह कुछ देने लगता है तो वह देना ही तद्रूप हो जाता है। इस प्रकार दान तथा उसे देने वाला और
लेनेवाला इन तीनों को वह अलग-अलग नहीं देखता। इस प्रकार करते हुए भी वह अकर्ता के रूप में हाथों से
क्रियाएँ कराता है। उसके हाथ अपने स्वभाव के अनुसार जो भी क्रियाएँ करते हैं उसमें उसके सूत्रधार होने की
छाप सहज ही दिखायी देती है। उसके हाथ में शस्त्र आ जाए तो उसका उपयोग करना उसे आता है किन्तु 'मैं
कर्ता हूँ' यह अहंकार उसके मन को नहीं छूता। वैसा ही प्रसंग आ जाय तो वह द्यूत भी खेल लेता है किन्तु उसमें
हारना या जीतना इनका उसे स्मरण भी नहीं होता। वह अपने स्वभाव से खेलता है, बस इतना ही। अथवा ब्राह्मण
की पूजा करने का अवसर हो तो उसे भक्तिभाव से करना वह जानता है किन्तु पूज्य और पूज्यकत्व यह भावना
मन में लाये बिना ही वह ब्राह्मण की पूजा करता है। धनुष्य की प्रत्यंचा खींच कर वह बाण चलाना भी जानता है,
निशाना साध कर वह लक्ष्यभेद भी करता है किन्तु इससे मेरी कीर्ति बढ़े ऐसी इच्छा वह नहीं करता। उसके हाथ
से कर्म इस तरह होते हैं जिस प्रकार सागर में तरंगें सहज ही उठती हैं। इस प्रकार उसके हाथ से अनेक कर्म होते
हैं किन्तु वह निजस्वरूप में निश्चल ही रहता है। जिस प्रकार मृगजल भरता है उसी प्रकार वह भी निर्विकार ढंग
से व्यापार करता है लेकिन मन में तिलमात्र भी अभिमान नहीं रखता। सूर्यकांत से अग्नि उत्पन्न होता है, वह कार्य
सूर्य करता है ऐसा कहते हैं उसी प्रकार उसके हाथ से जो भी व्यापार होते हैं वे उसके किये नहीं होते। सूर्यकांत
से अग्नि निकले यह कल्पना सूर्य के मन में भी नहीं होती उसी प्रकार मुक्त भी सारी क्रियाएँ करते समय
निरभिमानी ही बना रहता है। अब पैर की क्रियाओं के सम्बन्ध में बताते हैं। वह जब चलता है तो उसके पैरों के
नीचे की जमीन खिसक जाती है। वह स्वयं अपने पर ही स्वानंद से चलता रहता है। जल की लहरें जल पर
अखण्ड गति से चलती रहती हैं उसी प्रकार वह अपने आत्मस्वरूप में चित्स्वरूप में ही चलता रहता है। पैर होते
हुए भी वह अपनी मर्जी से पैरों के बिना चलता है, वह सर्वांग से चलता है क्योंकि वह सर्वव्यापी हो जाता है।
जिस प्रकार जल अखण्डदण्डायमान होकर बिना पैरों के चलता रहता है उसी प्रकार नित्य सावधान रहने वाला
मुक्त भी पैरों के बिना चलता रहता है। वायु जिस प्रकार पैरों के बिना सर्वत्र भ्रमण करता है उसी प्रकार
आत्मस्वरूप में संचार करना मुक्त का लक्षण है। इस प्रकार बिना हलचल किये ही उसका सर्वत्र गमन होता है।
चलते रहने का स्मरण ही उसे नहीं होता। ऐसा ही मुक्त का लक्षण होता है। अब मुक्त के स्त्रीभोग के सम्बन्ध में
बताते हैं। मूलतः 'आत्मा' और 'आत्मी' ये दो नहीं हैं, इसलिये उसे स्त्री-पुरुष भावना की जानकारी ही नहीं
होती। प्रारब्ध के कारण वह स्त्री का उपभोग करता है। नट नाटक करता है तो पुरुष होते हुए भी वह स्त्री का वेष
धारण करता है और स्त्री दीखने लगता है। उस समय स्त्री और पुरुष ये दोनों भाव उसके पास रहते हैं। उसी
प्रकार यह गृहस्थाश्रमी बन जाता है अथवा अर्धनारी नटेश्वर में जो पुरुष है वही स्त्री रहता है। उसी प्रकार मुक्त
को भी स्त्री या पुरुष के रूप में आत्मभावना ही रहती है। स्वयं अपनी ही छाया का आलिंगन करे, इस प्रकार द्वैत
की कल्पना छोड़ वह स्त्री का उपभोग करता है। छाया बिलकुल पास होते हुए भी वह कहाँ रहती है इसकी
जानकारी वह नहीं रखता उसी प्रकार मुक्तों को भी स्त्रियों की आसक्ति नहीं होती। इस प्रकार स्त्री-पुरुषों के
ग्यारहवाँ अध्याय २८१
विकार उत्पन्न होने पर भी उसकी आत्मस्थिति नहीं ढलती और संयोग से संतति होने पर उसे उसमें अपनी ही
आत्मप्रतीति होती है। इससे 'आत्मा वै पुत्र नामासि' इस श्रुति की सत्यता सिद्ध होती है क्योंकि वह सर्वकाल पुत्रों
को भी आत्मभाव से ही देखता है। वह स्वयं ही माता रहता है और स्वयं ही पिता रहता है और पुत्ररूप से स्वयं
ही क्रीड़ा करता है। जन में अथवा वन में उसे अपने सिवा कुछ भी नहीं दिखाई देता। स्त्री, पुत्र संतति ये सब
मुक्तों को आकाश में विचरण करने वाले बादलों की तरह लगते हैं। वे यथासमय आते हैं और चले जाते हैं। स्त्री
संभोग में जो सुख प्राप्त होता है वह सुख मुक्तों को सदा प्राप्त होता रहता है। इसलिये मुक्त को स्त्री सुख की
विशेष कामना नहीं होती। अब धन की दृष्टि के सम्बन्ध में बताते हैं। राजहंस के लिये गोबर का जो महत्त्व होता
है वही महत्त्व मुक्त को धन का होता है। उसे उससे कभी भी आसक्ति नहीं होती। वह उसके प्रति उदासीन ही
रहता है। जिस प्रकार व्याघ्र को मिष्ठान्न अच्छा नहीं लगता उसी प्रकार मुक्त को धन नहीं भाता क्योंकि उसे धन
का लोभ नहीं होता। जिस प्रकार कौआ चारा चुगते समय कर्कट के ढेले को स्पर्श नहीं करता उसी प्रकार मुक्त
अमूल्य रत्नमाला देखकर घृणापूर्वक थूक देता है। जिसे धन की आस्था रहती है उसे कल्पांत में भी मुक्तता नहीं
प्राप्त होती। उसी प्रकार जिसे स्त्री की वासना होती है उसे कभी परमार्थ या आत्मज्ञान प्राप्त नहीं होता। अब निद्रा
के सम्बन्ध में बताते हैं। ससुराल में श्रम से थकी हुई लड़की जिस प्रकार विश्राम के लिये मैके आती है उसी
प्रकार मुक्त की निद्रा के पास समाधि भी विश्राम के लिये आती है। जागृति, स्वप्न और सुषुप्ति इन तीन
अवस्थाओं को स्पर्श न कर वह दिन रात आत्मस्वरूप में स्थित होकर आत्मा में ही सोया रहता है। इस प्रकार
आत्मस्वरूप में सोये रहने पर उसके नीचे न तो धरती रहती है न ऊपर आकाश। उसकी निद्रा का सबसे बड़ा
चमत्कार यह है कि चलते-फिरते समय भी उसकी निद्रा नहीं टूटती। खाना खाते समय भी वह अखण्ड निद्रा में
रहता है। सारांश, वह सहज भाव से निजरूप होकर रहता है। सोनेवाला और जगानेवाला वह स्वयं ही रहता है
और कौन किसे जगायेगा? वह स्वस्थ मन से निजरूप में सोया रहता है। जागृत अवस्था में भी वह सोया रहता है
और सोये रहने पर भी जागता रहता है। इस प्रकार स्वयं ही निजरूप हो जाने के कारण वह निद्रा के आश्रित नहीं
रह जाता। शय्या, शयन और शयनमन्दिर सब कुछ वही रहता है। अपने स्वरूप का स्वयं ही निवास होने के
कारण वह निरन्तर निजरूप में सोया रहता है। इस प्रकार वह जो भी कर्म करने जाता है वहीं परब्रह्म प्रकट होता
है। मुक्त को किसी नियम की पाबन्धी नहीं होती। यही मुक्त का रहस्य है। मुक्त को यदि नियम का बन्धन होगा
तो फिर साथ-साथ साधन भी आ जायेगा और साधन आने पर मुक्तता कभी नहीं मिल पायेगी। मुक्त को तो कभी
भी किसी चीज की आसक्ति नहीं होती। उसके हाथ से बचे हुए प्रारब्ध के अनुसार कर्म होते रहते हैं। जिसका
अहंकार नष्ट हो गया हो वह सचमुच मेरा ही रूप है। इसके सम्बन्ध में विचार करने की आवश्यकता नहीं है
क्योंकि वह वेदशास्त्र संमत है। जो नित्यमुक्त तथा निर्विकार रहता है वह व्यवहार में मेरे जैसा ही आचरण करता
है। लहरों के भीतर और बाहर जैसे समुद्र ही होता है उसी प्रकार उसके भीतर और बाहर मैं ही रहता हूँ। इस
प्रकार जो परब्रह्म होकर रहता है उसके लिये धर्माधर्म स्वप्न की तरह हैं। इन्द्रियों का कर्म भी उसे बाधक नहीं
होता। इसका रहस्य वही जाने!
न था बद्ध्यते विद्वांस्तत्र तत्रादयान गुणान्।
प्रकृतिस्थोऽप्यसंसक्तो यथा खं सवितानिल ॥१२॥
जिन इन्द्रियों के कर्म करने से मूर्ख को दृढ़बद्धता प्राप्त होती है, उसी इन्द्रियों से जब ज्ञाता कर्म करता है
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तो उसे नित्यमुक्तता प्राप्त होती है। मूर्ख को कर्म का अहंकार रहता है और ज्ञाता सभी कर्मों में निरभिमान रहता
है। जीवों के बन्धन और मोक्ष का कारण अहंकार है इसे ध्यान में रखो। 'मैं कर्ता हूँ', 'मैं भोक्ता हूँ', 'यही
मूर्खों' का दृढ़बन्धन है। किन्तु वह प्रकृति कर्म ज्ञाता अहंकार से अपने माथे पर नहीं लेता। ज्ञाता के उसी
निरभिमान के सम्बन्ध में मैंने तुम्हें बताया। इन्द्रियों को विषयभोग सौंपते समय वह अपना अभोक्तापन अच्छी
तरह जानता है। अपनी छाया विष्ठा पर पड़े अथवा पालकी में चढ़े उसका सुख-दुःख व्यक्ति को नहीं होता उसी
प्रकार देह का सुख-दुःख अथवा मान-अपमान मुक्त को बाधक नहीं होता। ज्ञाता विषयसुख की भी अभिलाषा
नहीं करता। चित्र की सम्पत्ति की तरह विषय भी मिथ्या है ऐसा उनका विचार होता है। इसलिये जिसे प्रकृति के
गुणों के प्रति कोई अहंकार नहीं होता वह देह में रहते हुए भी विदेही और नित्यमुक्त रहता है। उद्धव! देह में
रहते हुए भी वह विदेही कैसे हुआ? यदि तुम ऐसी कल्पना कर रहे हो तो उसके सम्बन्ध में तुम्हें एक उदाहरण
बताता हूँ। आकाश सब लोगों पर है, सभी पदार्थों से लगा हुआ दीखता है लेकिन किसी भी पदार्थ के दोष से
वह मलिन नहीं होता। उस आकाश ही ही तरह ज्ञाता भी देह में होते हुए भी सदा देहकर्मों के प्रति अलिप्त रहता
है। जिस प्रकार किसी बड़े पत्थर से आकाश को ढँका नहीं जा सकता उसी प्रकार प्रकृति के गुण क्षुब्ध हो जाने
पर वह जड़बद्ध नहीं हो जाता। आकाश लोगों के बीच होने पर भी जिस प्रकार लोगों के घर्षण से उस पर घट्टा
नहीं पड़ता उसी प्रकार वह प्रकृति के कर्म के अनुसार आचरण करते हुए भी उसके गुणों से अलिप्त रहता है।
आकाश पानी में डूबा हुआ दिखायी देता है किन्तु वह सूखा ही रहता है। उसी प्रकार वह पत्नी और बाल-बच्चों
के बीच रहकर भी उनके दोषों में लिप्त नहीं होता। कोई यदि आकाश को कालिख लगाना चाहे तो वह लगाने
वाले को ही काला करती है उसी प्रकार मुक्त को दोषी कहने से कहने वाले को ही दोष लगता है। ठंडक, धूप
अथवा जल की धारा जिस प्रकार आकाश को स्पर्श नहीं करतीं उसी प्रकार द्वंद्वों के समुदाय में मुक्त निर्द्वन्द्व वृत्ति
से खड़ा रहता है। अनेक प्रकार के मेघपटल गरजते हुए आकाश को ढँक लेते हैं लेकिन आकाश उनमें होते हुए
भी उनसे अलग रहता है। वह उन मेघों को स्पर्श भी नहीं करता। उसी प्रकार मोहममता का जोर मुक्त को सताने
का प्रयत्न करता है लेकिन उसे उनमें से किसी की भी बाधा नहीं सताती। वह उन सबसे अलिप्त ही रहता है।
आकाश को जलाने का प्रयत्न करने से आग ही बुझ जाती है उसी प्रकार तीन गुण यदि मुक्त को बाँधना चाहें तो
गुणों का गुण ही समाप्त हो जाता है। प्रलयवायु के प्रहार से आकाश उड़ नहीं जाता लेकिन सारी वायु ही
आकाश में समा जाती है। वैसे देखा जाय तो वह गगन में भी नहीं मिलता उसी प्रकार अविद्या भी अपने स्वभाव
धर्म के अनुसार मुक्त को बद्ध नहीं कर पाती। 'अविद्या' इस नाम से ही वह मिथ्या है यह स्पष्ट मालूम होता है।
मुक्त को वह दिखायी ही नहीं देती। आकाश की तरह जो सब कर्मों में होते हुए भी अलिप्त रहता है वही ज्ञाता
है। जिस प्रकार सूर्य अलिप्त रह कर आचरण करता है उसी प्रकार मुक्त की स्थिति रहती है यह ध्यान में रखो।
घृत, मधु तथा जल इन सब में प्रतिबिम्बित होकर भी सूर्य जैसे उन सबसे अलिप्त रहता है उसी प्रकार बाल्य,
युवावस्था एवं वार्धक्य इन अवस्थाओं से मुक्त अलिप्त ही रहता है। अथवा सूर्य प्रकाश से शुभ अथवा अशुभ
कर्म होता रहता है लेकिन सूर्य उन दोनों से अलग रहकर अपने स्वयं प्रकाश से प्रभावित होता रहता है। इस
प्रकार गृहस्थाश्रम धर्म का निर्वाह कर नित्य नैमित्तिक कर्म करते हुए भी मुक्त को कर्म का बन्धन नहीं होता।
आत्मज्ञान के कारण वह अकर्त्ता ही बना रहता है। सूर्यकान्त में अग्नि उत्पन्न कर सूर्य अकर्त्ता ही रहता है, उसी
प्रकार आत्मतत्व जानने वाला कर्म करते हुए भी अकर्त्ता ही रहता है। सूर्य जल में प्रतिबिम्बित होता है लेकिन
वह भींगता नहीं है। उसी प्रकार स्त्री की संगत से उसे बाल-बच्चे होते हैं लेकिन उसका ब्रह्मचर्य भंग नहीं होता।
ग्यारहवाँ अध्याय २८३
अब तक सूर्य की अलिप्तता का वर्णन किया। अब देह में रहकर अलिप्तता कैसी होती है उसका लक्षण बताता
हूँ, सुनो। प्राण देह में रहता है जिसके कारण देह का चलन होता है, लेकिन देह के दोष को प्राण स्पर्श नहीं
करता। वह सुख-दुःख से अलिप्त ही रहता है। उसी प्रकार मुक्त संसार में रहकर सारा प्रपंच व्यवहार करता है
लेकिन उस संसार का तिल मात्र का दोष उसे नहीं लगता। वायु सबको स्पर्श करता है लेकिन स्पर्श का दोष उसे
नहीं लगता। उसी प्रकार अहंभाव न रख मुक्त देह गेह में विचरण करता है। वायु सब जगह पहुँचता है लेकिन
वह किसी के प्रति आसक्त नहीं होता। इस प्रकार स्वयं विषयी बने बिना मुक्त का विषय सेवन होता है। वायु
जिस प्रकार एक जगह स्थिर नहीं रहती उसी प्रकार मुक्त की भी देहगेह में आसक्ति नहीं रहती। वायु आकाश में
विश्राम करता है और मुक्त निर्गुण में। श्रीकृष्ण उद्धव से कहते हैं, ऐसा जो अगाधपन है वही मुक्त की मुक्ति का
कारण बनता है। इसमें भी विवेक प्रमुख है यह याद रखो।
वैसारद्येक्षयासङ्गशितया छिन्नसंशयः।
प्रतिबुद्ध इव स्वप्नान्नानात्वाद् विनिवर्तते ॥ १३॥
विवेक से बुद्धि अत्यन्त प्रगल्भ होती है, उसे नित्य और अनित्य का ज्ञान होता है लेकिन वह ज्ञान अधूरा
रहता है, वैराग्य के बिना उसकी वृद्धि नहीं होती। लेकिन वैराग्य कितना भी बड़ा क्यों न हो वह विवेक के बिना
अन्धा है इसे ध्यान में रखो। उसे अपना पतन मालूम नहीं होता इसलिये वह अन्धे कुएँ में गिर पड़ता है। अन्धा
हाथी उन्मत्त होने पर इधर-उधर भागने लगता है, गड्ढे में गिरकर वह मर सकता है यह बात उसकी समझ में
नहीं आती। उसी प्रकार विवेक के बिना वैराग्य लंगड़ा है। जहाँ विवेक और वैराग्य मिलते हैं वहीं नित्य का
संग्रह और अनित्य का त्याग दिखायी देता है। वही सद्विद्या रूपी खड्ग है जो नैराश्य के तेज से जगमगाता है।
उसे वह गुरुवाक्यरूपी सील पर घिस कर तेज करता है और उसके प्रहार से संकल्प-विकल्प का समूल खात्मा
कर देता है। 'असम्भावना' अर्थात् सत्य वस्तु असत्य मालूम होना और 'विपरीत भावना' अर्थात् देह को ही
आत्मा समझना ये सारी भावनायें और वासनायें जब पूरी तरह टूट जाती हैं तभी आत्मस्वरूप में पुरुष जागृत हो
गया ऐसा समझना चाहिये। अविद्यारूपी दीर्घस्वप्न में जो नाना प्रकार के भोगों का अनुभव कर रहा था उसका
गुरुवाक्य के कृपा आशीर्वाद से जब अद्वैत में जागरण होता है तब द्वैत का ठिकाना ही नहीं रह जाता 'मैं' और
'मेरा' की भावना व्यर्थ हो जाती है और अविद्या के कारण उत्पन्न भेद का संशय मिटने से वह आत्मानुभव का
आनन्द लेने लगता है। जागने पर स्वप्न का स्मरण हो आता है लेकिन वह सहज ही मिथ्या मालूम होता है। मुक्त
को भी संसार वैसा ही दिखायी देता है इसलिये वह उन दोनों से अलिप्त रहता है। इस प्रकार मुक्त का जो
आचरण रहता है वह इस प्रकार अलिप्त रहता है इसे ध्यान में रखो। 'कथं वर्त्तेत' अर्थात् वह किस प्रकार का
आचरण करता है इस प्रश्न के उत्तर में प्रसंग के अनुसार यह लक्षण बताया। अब 'कथं विहेश्त' अर्थात् वह
किस प्रकार विहार करता है? इस प्रश्न का उत्तर सुनने के लिये उद्धव का मन विचलित हो उठा है यह जानकर
श्रीकृष्ण ने कहना प्रारम्भ किया।
यस्य स्युर्वीतसंकल्पाः प्राणेन्द्रियमनोधियाम्।
वृत्तयः स विनिर्मुक्तो देहस्थोऽपिहि तद्गुणैः ॥ १४॥
विद्यमान देह में रहते हुए भी देहस्थ गुण मुक्त को स्पर्श नहीं करते। पापपुण्य की कथा एवं सुख-दुःख
की वार्त्ता उसके कानों पर नहीं जाती। जिस प्रकार कै किया हुआ पित्त कोई ग्रहण नहीं कर सकता उसी प्रकार
२८४ श्रीमद् एकनाथी भागवत
एक बार त्याग किये हुए संकल्प विकल्पों को वह कल्पांत में भी स्पर्श नहीं करता। इसलिये मुक्त का मन,
बुद्धि, इन्द्रिय और प्राण ये सब संकल्पशून्य हो जाते हैं। इसीलिये मुक्त पर पापपुण्य का प्रभाव नहीं होता। जिस
समय इन्द्रिय विषयक्रीड़ा में व्यस्त रहते हैं उस समय भी मुक्त संकल्पशून्य ही रहता है। उसके मन में मन नहीं
होता इसीलिये वह वृत्तिशून्य रहता है। बच्चों को अलंकारों का मोल मालूम नहीं होता लेकिन उन्हें पहनने से
उनकी शोभा बढ़ जाती है उसी प्रकार उसके इन्द्रिय भले ही कर्म में रत हों लेकिन मुक्त अकर्ता होकर अलिप्त
रहता है। जो संकल्परहित होकर विहार करता है वही सचमुच मुक्त है। 'कथं विहरति' इस प्रश्न का उत्तर
संक्षेप में बतलाया। मैंने मुक्त के जो भी लक्षण बताये वे सब मुक्त स्वयं ही जानता है। अन्य लोग विद्वत्ता के
बल पर मुक्त को नहीं पहचान सकते। वे सभी वेदशास्त्रों में पारंगत रहते हैं किन्तु वे भी मुक्त को नहीं पहचान
सकते जिसके देह में देह का अहंकार है वे मुक्त के लक्षण नहीं जान पायेंगे। मैंने बताये हुए लक्षणों को पोथी
लेकर यदि कोई आतुरता से त्रिभुवन में ढूँढ़े तो उसे भी मुक्त की स्थिति नहीं मालूम होगी क्योंकि जो सचमुच
ही मुक्त को पहचानता है वह भी सचमुच मुक्त ही रहता है। केवल अनुमान के आधार पर मुक्त की पहचान
होगी यह आशा करना व्यर्थ है। जो सचमुच सूर्य को देखता है वह उसने प्रकाशित किये हुए संसार को भी
देखता है उसी प्रकार जो सचमुच मुक्त को पहचानता है उसे संसार भी नित्यमुक्त ही दिखाई देता है। वहाँ
किसी को मुक्त और किसी को बद्ध कहना बिलकुल अनुपयुक्त है। जो ऐसा समझते हैं वे महामूर्ख, अनाड़ी
और अज्ञान के कारण अन्धे हैं ऐसा मानना चाहिये। मुक्त को पहचानना बिलकुल ही कठिन है यह जानकर
उद्धव को चिन्ता हुई है यह जानकर श्रीकृष्ण ने कहा, इससे पहले मुक्त के जो लक्षण बतलाये उन्हें मुक्त ही
जानते हैं। अब लौकिक रूप में मुक्त को पहचान सको ऐसे लक्षण भी बताता हूँ। उद्धव को ढाँढ़स बँधाने की
दृष्टि से श्रीकृष्ण ने कहा, मुक्त को पहचानने के लक्षण बताता हूँ, सुनो। तब उद्धव भी एकाग्र होकर सुनने
लगा। अब मुक्त को पहचानने के लक्षण मालूम होंगे यह जानकर उद्धव का मन अधीर हो उठा। यह जानकर
श्रीकृष्ण ने भी निराली शैली में निरूपण प्रारम्भ किया।
यस्यात्मा हिंस्यते हिंस्रैर्येन किंचिद् यदृच्छया।
अर्च्यते वा क्वचित्तत्र न व्यतिक्रियते बुधः ॥ १५॥
श्रीकृष्ण बोले, हिंसा करने वाले मुक्त के देह की हिंसा करे, उसे छिन्न-भिन्न करें, उसे मारें या काटें उसकी
भर्त्सना करें या उसे गाली दें लेकिन इसकी पीड़ा मुक्त को कभी नहीं होती और यदि बड़े गौरव के साथ उसकी
पूजा करें तो भी वह उसे अपना गौरव नहीं मानता। देह में विद्यमान रहते हुए भी उसमें देहबुद्धि का अंश भी
नहीं होता। इसी को जीवन्मुक्तता कहते हैं। इसीलिये उसे देह की व्यथा की बाधा नहीं होती। जिस प्रकार पुरुष
के साथ छाया रहती है, वह पुरुष के कारण ही विचरण करती है, उसकी ममता पुरुष के मन में नहीं रहती, उसी
प्रकार मुक्त का देह भी उसके साथ विचरण करता है लेकिन उसका अहंकार उसे नहीं होता। यह मुक्त का नित्य
स्वभाव है। उसे कोई 'चोर' कहे, 'जासूस' कहे, 'जेबकतरा कहे' और इसके लिये दण्ड दे अथवा 'आप श्रेष्ठ
पुरुष हैं' कह कर देवता की तरह उसकी पूजा करे जो जिस प्रकार छाया के मानापमान की पुरुष को पीड़ा नहीं
होती उसी प्रकार पूजा अथवा पीड़ा से उसकी समता नहीं टूटती। देह बाघ के मुँह में पड़े अथवा प्रारब्ध से वह
पालकी में चढ़े तो भी उसे हर्ष या विषाद नहीं होता क्योंकि समत्व के कारण वह निर्द्वन्द्व हो जाता है। देह को
सूली पर चढ़ाने के लिए ले जाते समय भी 'मैं अब मरने वाला हूँ' इस बात का उसे दुःख नहीं होता अथवा उसे
ग्यारहवाँ अध्याय २८५
हाथी पर बिठा कर सब लोग उसकी पूजा करें तो उसकी वृत्ति आनन्दित नहीं होती। सुख-दुःखादि व्यथाएँ
अविद्या के कारण होने के कारण अनित्य हैं। इस प्रकार देह का मिथ्यात्व जान लेने के कारण उसे उसकी व्यथा
नहीं होती। जहाँ सम्मान होता दिखाई देता है वहाँ वह उस सुख से अभिभूत नहीं होता अथवा अपमान के घावों
से भयभीत होकर भाग नहीं जाता। देह पर अनेक प्रकार की विपत्तियाँ आती हैं लेकिन वह कौतुकवश उन्हें
देखता रह जाता है। शरीर मेरा है और मुझे व्यथा हो रही है इस बात का मुक्त को अनुभव ही नहीं होता।
जीवन्मुक्त में विदेह स्थिति इतनी दृढ़ हुई रहती है कि उसे देहदुःख की व्यथा बाधित नहीं करती। लौकिक सृष्टि
की नानाविध वार्त्ताओं से अथवा स्तुति सुमनों से उसकी पूजा की जाय अथवा अपशब्दों से उसकी निन्दा की
जाय तो उससे मुक्त को दुःख नहीं होता।
न स्तुवीत न निन्देत कुर्वतः साध्वसाधु वा।
वदतो गुणदोषाभ्यां वर्जितः समदृङ्मुनिः ॥ १६ ॥
दुष्टों द्वारा निन्दा के तीखे बाणों से हृदय पर प्रहार करने पर भी उसका मन नहीं कहता कि ये दुष्ट हैं,
उनके उन दोषों का वह उल्लेख भी नहीं करता। अथवा भक्त, सात्त्विक और साधु ये तीनों मिलकर 'तुम शुद्ध
दैवी पुरुष हो' कह कर उसकी स्तुति करें तो भी वह गुणानुवाद सुनकर 'मैं उत्तम पुरुष हूँ' इस प्रकार का भाव
उसके मन में नहीं आता। वह लोगों में ऊँच-नीच का भेदभाव नहीं करता। ये लोग अत्यन्त 'सज्जन हैं', 'भले
हैं', 'गुणी हैं' ऐसी भाषा मुक्त के मुँह से नहीं निकलती। साधु हो या दुष्ट हो उन्हें वह ब्रह्मरूप ही समझता है।
निजात्मदर्शन से निजबोध होने के कारण वह चारों ओर तद्रूप होकर ही देखता रहता है। सारा विश्व मैं ही हूँ
ऐसा अनुभव होने के कारण उसे किसी की निन्दा या किसी की स्तुति करने की इच्छा ही नहीं होती। स्तुति और
निन्दा अपनी ही जगह विलीन हो जाती है। उसे आत्मसाक्षात्कार में ही विश्राम मिलता है, निजात्मपद में ही उसे
आराम मिलता है। 'साधु' और 'असाधु' का भ्रम नष्ट होकर वह स्वयं ही आत्माराम होकर रहता है। दुष्ट
कहकर जिसकी निन्दा की जाये उसे वह आत्मस्वरूप से देखने लगता है और तो और साधु कहकर जिसके गुणों
का वर्णन किया जाय तो वह भी उसे आत्मस्वरूप में दिखाई देता है। दाहिना अंग शुद्ध अर्थात् वन्दनीय और
बायाँ अंग अशुद्ध इसलिये त्याज्य ऐसा किसी को नहीं लगता। वह दोनों में ही उसका समान भाव रहता है उसी
प्रकार वन्दन करने वाले को तथा निन्दा करने वाले को भी समान भाव से देखता है। इसलिये वह किसी को
'साधु' अथवा किसी को 'असाधु' कहना अर्थात् स्तुति या निन्दा करने का उसने त्याग किया रहता है।
स्वानन्दसुख का बोध और समान भाव से वह समपद पर पहुँचा रहता है। उद्धव ! यही मुक्त की पहचान है, याद
रखो। अब और भी कुछ लक्षण तुम्हें बताता हूँ। मैंने तुम्हें प्रकट रूप से दिखाई देने वाला मुक्त का लक्षण बताया
है। लेकिन लोग इसे कहाँ मानते हैं? क्योंकि लोगों के तर्क-वितर्क बड़े विचित्र रहते हैं। भाग्य से इनमें से
एकाध लक्षण किसी मुक्त में सहज ही दिखाई देता है लेकिन केवल उतने ही से जगत में मुक्त को कौन स्वीकार
करेगा? क्योंकि जो मुक्त है वह अपनी मुक्तता की पहचान लोगों से छिपाकर रखता है। इसके विपरीत जो अपनी
मुक्तता का दिखावा करते हैं उन्हें स्वभाव का लोभी समझना चाहिये। शुक और वामदेव की मुक्तता को सभी
स्वीकार नहीं करते फिर दूसरों की क्या बात की जाय? मेरी मुक्तता भी अनेक लोग स्वीकार नहीं करते। मैंने
गोवर्धन पर्वत उठाया, दावाग्नि निगल लिया, अघासुर तथा बक दैत्य का संहार किया, कालिया का विनाश
किया। जब तक मैं देहधारी हूँ, तब तक मैं नित्य ये पराक्रम करता रहता हूँ। आत्मसुख की तो मैंने लूट मचा दी
२८६ श्रीमद् एकनाथी भागवत
है। फिर भी मेरी मुक्तता को ब्राह्मण स्वीकार नहीं करते, फिर दूसरों की बात क्या करें? सारांश, संसार में अत्यन्त
कुतर्क भरे हुए हैं इसलिये मुक्तों की मुक्तता स्वयं मुक्त ही जानते हैं। दूसरा कितना ही चतुर क्यों न हो वह
उसका लक्षण नहीं जान सकता।
मुक्त इस संसार में जड़ एक मूक पिशाच की तरह विचरण करता है। अब वे लक्षण भी यथार्थ ढंग से
बताता हूँ।
न कुर्यान्न वदेत् किंचिन्न ध्यायेत् साध्वसाधु वा।
आत्मारामोऽनया वृत्त्या विचरेज्जडवन्मुनिः ॥ १७॥
मुक्त कायिक, वाचिक अथवा मानसिक इनमें से कोई भी कर्म उद्देश्यपूर्वक नहीं करता। उससे जो भी
कर्म होता है, वह स्वाभाविक रूप में होता है। इसी का नाम है 'अहेतुक' कर्म। गुणों में ध्यान रखकर स्तुति
अथवा निंदा की बातें न कर व मौन रहता है। लेकिन मौन का अहंकार करना भी उसका उद्देश्य नहीं होता।
अगर वह मौन का अहंकार रखता है तो वह मुक्त बन्धन में पड़ जायेगा। इसलिये बोलना और न बोलना यह
दोनों छोड़ वह मौनी हो जाता है। असत् वृत्ति से अर्थात् अनात्मवस्तु के निषेध से अशाश्वत का निराकरण कर
परब्रह्म का अखण्ड चिन्तन करने बैठा तो पुण्याई के कारण सद्गुरु की पहचान मिली जिससे ध्येय, ध्याता,
ध्यान समाप्त होकर भेद की भावना ही नष्ट हो गयी और चारों ओर चैतन्य ही भर गया। शास्त्रों की सहायता से
शाश्वत और अशाश्वत की जो दीवार खड़ी की जाती है वह चैतन्य की बाढ़ में ढह जाती है। तब सन्त और
असंत का भान ही नहीं रहता और चारों ओर चैतन्य ही भर जाता है। मन का मनपन टूट कर वृत्तिशून्य अवस्था
प्राप्त हो गयी। उस चैतन्य का मन में ध्यान करो तो मन ही चैतन्य हो जाता है। इससे ध्यान सहज ही टूट गया।
यही मुक्त का प्रमुख लक्षण है। उद्धव! चैतन्य में ही चित् खो जाने के कारण सच्चा मुक्त लोगों में जड़-मूक-
पिशाच की तरह विचरता हुआ दिखाई देता है। (इसीलिये वह औरों में अच्छी तरह पहचाना जाता है। इसलिये
उसका यह भी एक लक्षण है) नैष्कर्म ब्रह्म की उसे दृढ़ प्राप्ति हुई रहती है। अन्तर के निज बोध के कारण वह
प्रसन्न दिखाई देता है। हाँ बाह्य संसार में वह अवश्य ही जड़ बना दिखाई देता है जैसे अचेतन पत्थर हो।
संकल्प और विकल्प को उभारने वाला मन आत्मस्वरूप में ही लीन हो जाने के कारण वह अपने स्थान से नहीं
उठता। इसीलिये जड़ मालूम होता है। शब्द ब्रह्म को निगल कर वह स्वयं निःशब्द ब्रह्म हुआ रहता है। इसलिये
'निंदा' या 'स्तुति' का नाम नहीं लेता। सदासर्वदा सर्वांग से 'गूंगा' रहता है। 'ब्रह्म' कभी भी वाचा से व्यक्त
नहीं हो सकता। इसलिये यदि वह कहता भी है तो मात्र संकेत से। वह किसी की स्तुति या निंदा भी नहीं
करता। इसीलिये उसे 'गूँगा' कहते हैं। हे उद्धव! उसके मन में धन का कभी भी लोभ नहीं होता। इसीलिये वह
कभी द्रव्य को स्पर्श नहीं करता। इसीलिये लोग उसे पिशाच कहते हैं। उसकी पैशाचिकता का विचित्र चमत्कार
है। संसार जिसका प्राशन नहीं कर सकता उस ब्रह्मरस का वह पान करता है और जिसका भक्षण नहीं किया जा
सकता उस अभक्ष्य का वह भक्षण करता है। संसार जहाँ जा नहीं सकता उस अगम्य स्थान पर वह गमन करता
है। संसार का मन जहाँ प्रवेश नहीं करता वहाँ यह सर्वांग के साथ प्रवेश कर जाता है। विधि-निषेध का विचार
ही वह मन में नहीं लाता। कर्माकर्म का प्रयत्न वह नहीं करता। उसके अंगों से स्वानंद फूटता रहता है।
इसीलिये संसार उसे पिशाच कहते हैं। इस प्रकार मुक्त की जड़ता, गूँगेपन और पिशाच के लक्षण मिथ्या अथवा
बाह्य नहीं होते वे वास्तविक होते हैं। व्यर्थ की किचकिच उसे अच्छी नहीं लगती। ध्यान रखो कि मुक्त के मन
ग्यारहवाँ अध्याय २८७
में किसी भी बात का आग्रह नहीं होता। जो अत्यन्त आग्रही होता है वह सचमुच ही बद्ध है। मुक्त के ये जो
लक्षण बताये हैं वही साधकों के साधन होते हैं। सिद्ध को वह सहज ही प्राप्त होते हैं। उसी प्रकार जो इन
साधनों को साध्य करना जानता है वह साधक भी इसका लाभ लेता है। इसके अतिरिक्त जो अन्य शास्त्रज्ञ और
पण्डित होने का अहंकार करते हैं उन्हें जिस प्रकार सज्जन दुर्बुद्धि को दूर ढकेल देते हैं उसी प्रकार मुक्तों की
पंक्ति से दूर कर दिया जाता है। जो उपलब्ध साधन का उपयोग न कर केवल शास्त्र का अहंकार करता है और
दिन-रात धन और मान-सम्मान की इच्छा करता है वह आत्मज्ञान से अलिप्त रहता है। जो स्वयं को कुशल
कर्मठ याज्ञिक एवं शास्त्र सम्पन्न एवं वेदपाठी कहते हैं अथवा सदा धन की इच्छा से लोलुप रहते हैं उन्हें भी
यह सुख नहीं प्राप्त होता। उद्धव! उन्होंने अब तक जो भी कष्ट किये हैं वे सब व्यर्थ हो जाते हैं। उसके
सम्बन्ध में जो सच्चाई है उसे बताता हूँ।
शब्दब्रह्मणि निष्णातो न निष्णायात् परे यदि।
श्रमस्तस्य श्रमफलो ह्यधेनुमिव रक्षतः ॥ १८ ॥
वेदों का पठन कर वेदशास्त्रों का अर्थ जानकर अति पण्डित बनता है। चारों वेद उसकी जिह्वा पर सदा
खड़े रहते हैं। स्वरयुक्त संहिता, पद, क्रम, अरण, ब्राह्मण, सूत्र, निरुक्त, जटापाठ, ध्वजस्थ आदि सवर्णक पढ़
सकता है। आयुर्वेद, धनुर्वेद, गायन शास्त्र के सारे भेद जानने वाला, काव्यनाटक का उत्तम मर्मज्ञ, वेद तथा
उपवेद जानने वाला, व्याकरण में नितांत पारंगत, सांख्यशास्त्र, योगशास्त्र, तर्कशास्त्र में निपुण, वैशेषिक शास्त्र का
जानकार यज्ञ का कर्ममीमांसक, वेदांत का निरूपण करने में बृहस्पति, वार्तिक शास्त्र का ज्ञाता, तीनों प्रस्थान हाथ
जोड़ कर सामने खड़े। शिल्पशास्त्र में नितांत निपुण, पाकशास्त्र में पारंगत, रत्नों की उत्तम परख करने वाला,
अश्वपरीक्षा में भी दक्ष; आगमोक्त मंत्र-तंत्र में तैयार, शैवदीक्षा, वैष्णवदीक्षा का सार जानने वाला, सौर, शाक्त,
तारण-मारण आदि मंत्र-तंत्र में कोई हाथ धरनेवाला नहीं, कामशास्त्र में निपुण, संगीतशास्त्र में भी प्रवीण, कविता
करने में कुशल, राजनीति में भी निपुण, निघंटु जिह्वा पर, नटों का चमत्कार करने में दक्ष, प्रसिद्ध पंचाक्षरी,
प्रसिद्ध वैद्य एवं रसायनशास्त्रवेत्ता। औषधि वही तैयार करे, भूत भविष्य का ज्योतिष जानने वाला, अमरकोशादि
शब्दकोश तथा अठारह पुराण कंठस्थ, प्रश्नावली देखना भी आता है, स्वप्नाध्याय तो कोई उसके ही मुख से सुने।
इतिहास के अध्याय मुखोद्गत, जाने गर्भ के लक्षण, शब्दव्युत्पत्ति का गहरा ज्ञान, साधक-बाधक प्रमाणों की
जानकारी, समयसूचकता तो पीठ पर हाथ धरे, बोलने के काम में तो साक्षात् बृहस्पति। ब्रह्मज्ञान पर ऐसे बोले
जैसे हथेली पर आँवला धरा हो लेकिन आत्मानुभव के सम्बन्ध में अन्धा। जिस प्रकार मोर के पंखों पर आँखें
बनी रहती है किन्तु उनमें दृष्टि न होने के कारण वे अन्धी रहती हैं, उसी प्रकार विद्वानों की स्थिति रहती है। जिन
स्तनों से दूध निकलता है उन्हीं स्तनों से लगी किलनी से चिपके रहने के कारण मूर्ख लोग रक्त ही चूस लेते हैं।
उसी प्रकार ऐसे विद्वान विषय से जूझते रहते हैं। किलनी के मुँह में दूध आने लगता है तो उसे छोड़ कर वह
केवल रक्त ही ग्रहण करती है, उसी प्रकार विद्वान भी ज्ञान बेच कर विषय माँगते हैं। मक्खी सुगन्धी चन्दन को
छोड़ बड़े चाव से गन्दगी पर जाकर बैठती है उसी प्रकार पण्डित लोग भी आत्मज्ञान को छोड़कर विषयों से ही
आकृष्ट होते हैं। अद्वैत मत की सिद्धता कर वह ज्ञान बेचने के लिए देश देशांतर जाते हैं, मूर्ख लोग ज्ञानियों का
उपहास करते हैं फिर भी सम्मान की इच्छा करते ही हैं। ज्ञाता जब ब्रह्म का निरूपण करता है तो सात्विक लोगों
का मन परमार्थ की ओर मुड़ता है लेकिन वक्ता केवल द्रव्य की इच्छा करता है। इस प्रकार विद्वानों का ज्ञान
२८८ श्रीमद् एकनाथी भागवत
विपरीत हो जाता है। कहना कुछ और करना ठीक उसके विपरीत तो फिर ब्रह्मज्ञान किसलिये? जहाँ धन और
मान-सम्मान रहता है वहाँ आत्मज्ञान नहीं हो सकता। धन और मान-सम्मान से चिपक कर ब्रह्मज्ञान की कथा
कहने बैठो तो सहस्र कल्पों में भी आत्मसाक्षात्कार से भेंट नहीं होगी। एक-एक पद के अनेक आख्यान सुनाये,
या एक-एक श्लोक के दस-दस अर्थ बताये लेकिन जब तक मन में मानाभिमान है तब तक ब्रह्मज्ञान कैसे
होगा? मैं महान पण्डित, मैं बड़ा ज्ञाता इस अहंकार से ही वे त्रस्त हो जाते हैं। ऐसा अन्धा बालक नित्य अपने
बाप के साथ रहने पर भी उसे नहीं पहचानता। वही गति विद्वानों की रहती है। वे निरन्तर आत्मा से एकरूप रहते
हैं, दिन-रात उसी का वर्णन करते हैं लेकिन उस रूप को पहचानते नहीं हैं। विषय सेवन करने के लिये वे
शास्त्रव्युत्पत्ति का व्याख्यान सुनाते हैं, उनका वह परिश्रम बाँझ गाय की सेवा करने की तरह व्यर्थ होता है। बाँझ
गाय कभी बच्चा नहीं जनती, रस्सी छूटने पर भागती फिरती है, रोज दूसरों से उलझ कर सरकारी बगीचों में जाती
है और उसका प्रायश्चित्त उसके मालिक को भोगना पड़ता है। पण्डितों की दशा भी वैसी ही होती है। उनकी
विद्वता से उनकी वाणी पुष्ट होती है। यही वाणी विषयों में उलझती है और उससे भी नहीं सँवरती। जिस प्रकार
अभागे पुरुष के हाथ में सोना भी मिट्टी हो जाता है उसी प्रकार पण्डितों की विद्वत्ता भी विषयासक्ति के कारण
नष्ट हो जाती है। ब्राह्मण को हाथी दान में मिलने पर वह उसका पोषण नहीं कर पाता और उसे कौड़ियों के
मोल बेच देता है। वही हाल विद्वानों की विद्वत्ता का होता है। अद्वैतशास्त्र का सिद्धान्त वे जानते हैं यह उनका
अलभ्य लाभ है लेकिन उसे वे विषयसुख के लिये बेच देते हैं। ऐसे विद्वान सचमुच मूर्ख हैं। घान में गन्ना डालने
से वह उसका रस निकाल कर बर्तन में भर देता है और स्वयं सूखे चपटों को लेकर करकराता रहता है ऐसी
स्थिति विद्वानों की होती है। विद्वान लोग जब ज्ञान कथन करते हैं तो उसमें जो उपयोगी होता है उसे सात्त्विक
लोग ग्रहण कर लेते हैं और निःसत्व शब्दरूपी चिपाड़ों से विद्वानों का मुँह करकराता रहता है। उसमें मधुरता
कैसी? नपुंसक के हाथ पद्मिनी सौंपने से जैसे वह जीवनभर रोती रहती है उसी प्रकार विद्वानों के घर में विद्वत्ता
भी रोती ही रहती है। जरा देखो! यदि ब्रह्मज्ञान के बिना केवल शब्दज्ञान से संन्यास ग्रहण किया जाय और ध्यान
धारण न किया जाय तो संन्यास व्यर्थ है। शब्दज्ञान के अनुसार जिस प्रकार कहा गया है उस प्रकार यदि आचरण
न किया जाय और विषयासक्ति से रहा जाय तो समझ लो वह अपने हाथ से मुँह में मिट्टी डालता है। वेदशास्त्र
सम्पन्न होकर उस पर जीविका चलाने लगा तो समझ लो वह एक व्यापारी अवश्य हो जायेगा किन्तु अपना
मूलधन खो देगा। कोई रत्न के बदले कौड़ी खरीदे अथवा अमृत के बदले मांड पिये वही पण्डितों का अन्त होता
है। अर्थात् वे आत्मज्ञान से वंचित हो जाते हैं। कितने कष्ट से उन्होंने शब्दज्ञान प्राप्त किया था, लेकिन उतने ही
कष्ट के साधन से परब्रह्म को भेंट कर सकते थे। ईंट के बदले पारस पत्थर मिलने से मूर्ख पुरुष दुःखी होते हैं।
पेट भरने के साधन के रूप में तथा अपनी विद्वत्ता के प्रदर्शन के उद्देश्य से वे सिफारिश लेकर श्रीमानों के पास
जाते हैं। जिस प्रकार पेट भरने के लिये मांड पीना आवश्यक है उसी प्रकार विद्वान लोग पेट के लिये वितंडावाद
करते रहते हैं। व्युत्पत्ति बल से वेद का अर्थ निकाल कर जब परब्रह्म साध्य नहीं कर पाते तो उस श्रम का फल
श्रम ही प्राप्त होता है। उत्तम रत्न घान में डालो तो न तेल ही निकलता है और न ख़ली ही प्राप्त होती है, रत्न
व्यर्थ ही चकनाचूर हो जाते हैं। उसी प्रकार विद्वान विद्वत्ता के फेर में पागल हो जाते हैं। वे परिश्रम का फल
परिश्रम के रूप में ही प्राप्त करते हैं। श्रम से श्रम कमाते हैं, दुःख से दुःख भोगते हैं। यही बात श्रीकृष्ण उद्धव
को दृष्टांत देकर बताते हैं।
ग्यारहवाँ अध्याय २८९
गां दुग्धदोहामसतीं च भार्यां देहं पराधीनमसत्प्रजां च।
वित्तं त्वतीर्थीकृतमङ्ग वाचं हीनां मया रक्षति दुःखदुःखी ॥ १९॥
दूध के लालच में सूखी गाय का दूध निकालने लगो तो चम्मच भर दूध तो हाथ नहीं आता, अलबत्ता गाय
की दुलत्ती खानी पड़ती है। नटखट, अंग-चोर हर किसी को मारने वाली, ढेर सारा खाने वाली, अधर्मशील, लात
मारने वाली और बेकाबू, छूटी तो भाग कर राजमहल में घुस जाएगी, लाठी से मारो तो जगह से हिलने का नाम
नहीं लेगी, चाल भी ठीक नहीं, अपने मन से भटकती, चरती रहती है। जिससे दूध कभी न मिले, जो कभी
गाभिन नहीं होती, ऐसी गाय को पोसने में पोषक को ही दुःख होता है। ऐसे ही घर को सुव्यवस्थित रखना यह
गृहिणी का कर्त्तव्य है लेकिन यदि वह स्त्री ही पुरुष के अनुकूल न हो तो उसके कारण पुरुष को दुःख ही
अधिक होता है और हमेशा सिरदर्द रहता है। निन्दा करना, आज्ञा का पालन न करना, पति को ऊलजलूल
बकना, स्वयं मिष्ठान्न खाना यह स्त्रियों का बुरा लक्षण है। व्यवस्थित खाने-पीने को दो, पर्याप्त धन दो तो गुड़
की तरह मधुर बन जाती है लेकिन उसे धर्म करते हुए देखो तो सर फोड़ लेने की इच्छा होती है। यह स्त्री
सचमुच असाध्वी है। जो पापपुण्य का विचार नहीं करती, कामचारी, धर्मशून्य होना यह दुराचारी स्त्री का लक्षण
है यह ध्यान में रखो। ऐसे असाध्वी स्त्री के संग से सुख कैसे प्राप्त होगा? ये पुरुष अति दुःख से दुःखी होते हैं।
जिसका देह पराधीन रहता है वह जीवन में सदा दीन बने रहते हैं। पराधीन को कल्पांत में भी समाधान प्राप्त
नहीं होगा। अपनी सत्ता छोड़ जो पराधीन हो जाता है वह कभी स्वप्न में भी सुख की बात नहीं देखता। जो 'पर'
अर्थात् माया के अधीन हो गया उस पराधीन को स्वप्न में भी सुख का संवाद प्राप्त नहीं होता। वह सदा दुःख में
ही रहता है यह ध्यान में रखो। जो कहता है कि पराधीन को सुख है वह विशुद्ध मूर्ख है। दुःखों का दुःख
पराधीन को अवश्य भोगना पड़ता है। अब 'संतति का विचार' सुनो। किसी को 'सुपुत्र' मिलता है तो किसी को
'कुपुत्र'। कुछ तो इतने मूर्ख होते हैं कि उनसे माँ-बाप को रात-दिन दुःख ही प्राप्त होता है। जो नरक से तारता
है, जो पूर्वजों का उद्धार करता है, जो माँ-बाप को परमेश्वर समझ कर उनकी अनन्य भक्ति करता है, जो माँ-
बाप को छोड़ अन्य तीर्थों को जाने की इच्छा नहीं करता, उनके चरणों के तीर्थ से असीम पवित्रता प्राप्त होती है
ऐसी जिसकी भावना रहती है; जिस प्रकार लक्ष्मी और नारायण हैं उसी प्रकार मेरे माता-पिता हैं यह समझ कर
जो अत्यधिक भक्ति से उनका भजन करता है, उनकी सेवा से कभी नहीं ऊबता; जो सत्त्व से अधिक सात्त्विक,
जो पितृवचन का पालन करता है, धर्म और अधर्म का सतत विचार करना यही जिसका स्वाभाविक धर्म है, जो
माता-पिता की सेवा से ही अपना उद्धार कर लेता है और सारे पितरों को मुक्त करता है, वही संसार में 'सत्पुत्र'
है। ऐसे पुत्र का पालन-पोषण करने में माँ-बाप को आनन्द प्राप्त होता है। वह पितृभक्ति कर स्वयं भी तरता है
और पूर्वजों का भी उद्धार करता है। 'सत्पुत्र' उत्पन्न होने पर इतना सुख प्राप्त होता है। अब तुम्हें 'असत्प्रजा'
की स्थिति बताता हूँ। मूल में यह शब्द 'असत्प्रज' है। उसके व्यवहार के बारे में बताते हुए लज्जा आती है।
लेकिन वह भी तुम्हें बताता हूँ। ऐसे जो पुत्र पैदा होते हैं उनका प्रेम केवल पत्नी और धन पर होता है। माँ-बाप
की बिलकुल उपेक्षा करते हैं। ये दुष्ट, शठ, कर्मभ्रष्ट और अत्यन्त दुर्जन होते हैं, इनकी पूँजी है झूठ बोलना,
झूठी कसम खाना, माँ-बाप को ठगना और सात्त्विक लोगों को कष्ट देना यही इनका धन्धा होता है, स्वयं तो
नरक जाते ही हैं पर पूर्वजों को भी वहाँ ले जाते हैं। ऐसे कुपुत्रों का जो पोषण करते हैं वे अति दुःख से दुःखी
होते हैं। पेट में फोड़ा पैदा हो जाये तो जैसे उसे फोड़ना सम्भव नहीं है उसी प्रकार असत् संतति का संसार उसे
असह्य दुःख भोगने का बाध्य करता है। ऐसे पुत्र जब तक जीवित रहते हैं तब तक दुःख भोगना पड़ता है और
२९० श्रीमद् एकनाथी भागवत
मरने पर नरक देते हैं। इस प्रकार दुष्ट संतति के लाड़-प्यार का अर्थ है दुःख से असीम पाप भोगना। उसी प्रकार
गांठ में धन होते हुए उसे सत्पात्र को दान न करना यही सब दुःखों का मूल है। इसीलिये धन के लोभी को
अपार दुःख भोगना पड़ता है। धन प्राप्त करने के लिए अनेक प्रकार के प्रयत्न तथा धोखाधड़ी करनी पड़ती है।
तिस पर यदि अनेक प्रकार के संकट सह कर धन प्राप्त हो भी जाय तो पहले उसे संग्रह करने के लिये दुःख
भोगना पड़ता है, फिर उसकी रक्षा करने के लिये दुःख भोगना पड़ता है, उस धन के लिये जब पत्नी और बच्चे
भी घात करने के लिये तैयार हो जाते हैं तो फिर औरों की क्या कथा वर्णन की जाय ? सत्पात्र को दान न देकर
जो कुबेर का धन सुरक्षित रखता है उसे दुःखातिरेक के कारण अनेक विघ्नों का सामना करना पड़ता है और
इससे धर्म की रक्षा नहीं होती। इस प्रकार रखा हुआ धन चला जाता है तो उससे दुःख की ज्वाला भड़क उठती
है। इस प्रकार अमीरों को सैकड़ों जन्म लेने पड़ते हैं और वे करोड़ों दुःख भोगते रहते हैं। नरदेह प्राप्त कर जिसे
अव्यंग वाणी प्राप्त हुई है और फिर भी जो हरिनाम का उच्चार नहीं करता उसके लिये तो पाप रखा ही हुआ है।
जमीन में गाड़ कर रखे हुए लोहे को जिस प्रकार मिट्टी खा जाती है और उसका कोई उपयोग न होकर वह व्यर्थ
नष्ट हो जाता है, उसी प्रकार नामोच्चार के बिना वाणी व्यर्थ नष्ट हो जाती है। आसन, ध्यान आदि की चिन्ता में
न पड़ जो राम का नाम लेता है उसके करोड़ों जन्मों के कष्टों का परिहार उससे होता है, वही वाणी अत्यन्त
उत्तम है। जो नित्य रामनाम का जाप करता है उसे मेरे ही जैसा (परमेश्वर जैसा) समझना चाहिये। सारे नियमों
का पालन उसी ने किया यही माना जायेगा और सभी पुरुषों में वही उत्तम पुरुष है इसे ध्यान में रखो। चतुर्वर्णों में
जो कोई रामनाम का अखण्ड जप करेगा वही मेरा लाड़ला बन जायगा। त्रिभुवन में भी मेरा उससे अधिक दुलारा
कोई नहीं है। जिसे यह रामनाम अच्छा नहीं लगता, समझ लो उसके मुँह में पातकरूपी मुखरोग लग गया है।
वह स्वयं ही अपने सुख से वंचित हुआ और आत्मघाती सिद्ध हुआ ऐसा समझना चाहिये। रामनाम के सिवाय
जो मुँह है उसे केवल चमड़े का कुण्ड समझना चाहिये और उसमें की जीभ को केवल चमड़े का टुकड़ा
समझना चाहिये। असत्य मल से वह जीभ लिपटी रहती है अथवा हरिनाम के सिवाय जो वाणी है वह गलित
कुष्ट से सड़ी हुई है ऐसा समझना चाहिये। उसमें से असत्यरूपी कोढ़ का पानी रिसता रहता है और निन्दा की
बदबू फैली रहती है। ऐसी वाणी में सचमुच अधर्म के कीड़े पड़ते हैं ओर वे चारों ओर बिलबिलाते रहते हैं।
ऐसी वाणी जिसके सामने आती है, वह उससे मुँह फेर लेता है और नाक पर कपड़ा रखकर 'हरहर' कहता है।
छोटे-बड़े सभी उस वाणी पर थूकते हैं। उस वाणी की दुर्गन्ध मुझे भी असह्य हो उठती है। ऐसी वाणी का जो
रखवाला है वह दुर्बुद्धि है। उस पर अनर्थों का पहाड़ टूटता है और अनेक दुःख प्राप्त होते हैं। ऐसे पुरुष की
वाणी सचमुच दुःखों का परिपाक है। जो वाणी नाम से विमुख होती है वह वाणी शुद्ध नरक है ऐसा समझो फिर
वह वाणी वेदश्रुत ही क्यों न हो ? जो नामकीर्त्तन की निन्दा करता है वह महापातकी से भी अधिक पापी है।
उसके कारण पृथ्वी को भी अत्यन्त पीड़ा होती है। नामकीर्तन से ही वाणी धन्य हो उठती है इस भाव का
निरूपण स्पष्ट करने के लिये श्रीकृष्ण तैयार हुए।
यस्यां न मे पावनमङ्ग कर्म स्थित्युद्भवप्राणनिरोधमस्य।
लीलावतारेप्सित जन्म वा स्याद् वन्ध्यां गिरं तां बिभृयान्न धीरः॥२०॥
मेरे नाम, कर्म और गुणों की कीर्ति संसार को पवित्र करती है तथा महान दोषों का विनाश करती है।
हरिनाम का स्मरण करने से जड़ जीवों का उद्धार होता है। तुम कहोगे "मैं विद्या तथा अविद्यातीत ब्रह्मस्वरूप
ग्यारहवाँ अध्याय २९१
हूँ' तो फिर तुम्हें गण, नाम तथा कर्म किस बात का ? और कीर्तन धर्म भी कैसे होगा ? लेकिन उद्धव ! तुम ऐसी
बात मन में न लाओ। मैं अपनी ही माया के सहारे अपनी अनेक लीलाएँ दिखाता हूँ, अनेक अवतार धारण करता
हूँ और बिना कुछ किये ही सबका पालन और संहार करता हूँ। ब्रह्मा, विष्णु और महेश्वर ये त्रिगुणात्मक तीन
गुणावतार हैं, लेकिन उन तीनों रूपों में सचमुच मैं ही रहता हूँ, मैं ही चराचर का निर्माण करता हूँ और उनका
संहार भी करता हूँ। ब्रह्मदेव के रूप में सृष्टि को उत्पन्न करने वाला भी मैं, विष्णु के रूप में उसका प्रतिपाल
करनेवाला भी मैं और रुद्ररूप से उसका संहार करने वाला भी मैं ही हूँ यह समझ लो। जिस प्रकार बाल्य, यौवन
तथा वार्धक्य इन तीनों अवस्थाओं का कर्त्ता एक ही पुरुष होता है, उसी प्रकार उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय इन
तीन कर्मों का कर्त्ता मैं ही हूँ। 'मैं' कर्त्ता होते हुए अकर्त्ता हूँ और अकर्त्ता के रूप में कर्त्ता हूँ। मेरी यह बात स्वयं
मैं ही जानता हूँ, दूसरा नहीं जानता। मेरे नाम और कर्मों का वर्णन करने से उस वक्ता को मेरी ही उपाधि प्राप्त
होती है और मेरी लीलावतारों का कीर्तन किया जाय तो कीर्तनकार को आत्मप्राप्ति होती है। सारे अवतारों में
श्रेष्ठ श्रीराम, श्रीकृष्ण आदि के जन्मकर्म, उनके विविध चरित्र तथा लीलाएँ इनका जो अखण्ड गायन करते हैं
उन्हें आत्मप्राप्ति होती है। श्रीराम ने सहज लीला के रूप में सेतु का निर्माण किया तथा समुद्र में पत्थरों को तैरने
के लिये बाध्य किया, श्रीकृष्ण ने खेल ही खेल में गोवर्धन पर्वत उठा लिया और दावाग्नि को निगल लिया,
श्रीराम ने एक ही बाण से ताड़का का वध किया, श्रीकृष्ण ने बाल्यावस्था में ही पूतना का स्तन चूस कर उसे मार
डाला। श्रीराम ने पैर से अहिल्या का उद्धार किया, श्रीकृष्ण ने यमलार्जुन दोनों का ही उद्धार किया। जिस धनुष
को उठाने में रावण भी लड़खड़ा कर गिर पड़ा वही धनुष तोड़कर श्रीराम ने सीता का वरण किया, श्रीकृष्ण
शिशुपाल आदि को जीत कर भीमकराजा की कन्या रुक्मिणी को घर ले आये। श्रीराम ने सुबाहु, खर, दूषण
आदि का वध किया, श्रीकृष्ण ने अधासुर, बकासुर, केशी आदि को मारा। श्रीराम ने सुग्रीव को राजपाट देकर
उसकी सिंहासन पर स्थापना की। उसी प्रकार श्रीकृष्ण ने उग्रसेन को सिंहासन पर बिठाया। श्रीराम ने वानर सेना
एकत्र कर राक्षसकुल का वध किया श्रीकृष्ण ने बालगोपाल इकट्ठा कर सारे मल्लों को मार डाला। श्रीराम ने
रावण और कुम्भकर्ण को मारा, श्रीकृष्ण ने कंस और चाणूर का वध किया। श्रीराम ने बालि नामक वानर को
धोखा दिया, श्रीकृष्ण ने महाघोर कालयवन को ठगा। श्रीराम ने राज्य पर विभीषण को स्थापित किया, श्रीकृष्ण ने
राज्य पर धर्म की स्थापित की। एक बाप की आज्ञा से वनवास पर गया तो दूसरा माता के मृतपुत्रों को लेकर
आया। इन अवतारों का चरित्र वर्णन कर ही पहले चोर रहा कोली महान ऋषि वाल्मीकि बना और व्यास जाटपुत्र
होते हुए व्यास अवतार चरित्रों का गायन करने से ही त्रिभुवन में श्रेष्ठ कहलाये। इन दोनों अवतारों की महानता
का वर्णन करते-करते ही दोनों महान कवि हो गये। देवताओं ने भी स्तुतिस्तोत्रों का गायन तथा वन्दन कर व्यास-
वाल्मीकि को गौरवान्वित किया है। उन महाकवियों की काव्यकथा शेष नेत्रद्वार से श्रवण करते-करते तथा दो
सहस्र नेत्रों से सुनने पर भी उसका मन नहीं भरता। यही कथा सुनने के लिये स्वर्ग में इन्द्र ने बृहस्पति का
चरणस्पर्श किया। इस प्रकार सारे त्रिभुवन में इन अवतारों की चरित्रकथा की. कीर्ति फैली हुई है। कथा महिमा
का वर्णन अब बन्द करता हूँ। लेकिन केवल मेरे नाम का स्मरण करने से ही मैंने अजामिल ब्राह्मण का उद्धार
किया। हरिनाम स्मरण से ही गजेन्द्र का उद्धार हुआ। पक्षी को नाम लेने के बहाने राम इन दो अक्षरों का स्मरण
किया लेकिन केवल उतने से ही महापापी वेश्या का उद्धार हो गया। वेदशास्त्रों का अर्थ जानना कठिन है किन्तु
मेरा नाम कठिन नहीं है यह ध्यान में रखो पठन करने से वेदशास्त्र पढ़ सकते हैं लेकिन केवल उतने से ही मुझमें
प्रवेश नहीं हो पाता। लेकिन कोई सहज ही मेरा नाम ले ले तो वह मुझे अच्छा लगता है। वेदशास्त्रों के अधिकारी
२९२ श्रीमद् एकनाथी भागवत
केवल ब्राह्मण हैं किन्तु मेरे नाम के अधिकारी चारों वर्ण हैं और संसार का उद्धार मेरे नाम से ही होता है इसे
ध्यान में रखो। जहाँ नित्य मेरा नाम लिया जाता है, वहाँ सचमुच मैं ही रहता हूँ। इसमें सोचने या विचार करने
की कोई आवश्यकता नहीं है। मेरा नाम ही तारने में समर्थ है। जिस वाणी से मेरा जन्म, नाम, कीर्ति अथवा
गुणानुवाद का पठन नहीं होता वह वाणी व्यर्थ की बकवास करने वाली पिशाचिनी है, यह जान लो। जिस मुँह
से मेरी कीर्ति का वर्णन नहीं किया जाता है वह केवल मदिरा भरा प्याला है। उस मद्य के प्याले के नशे की
गन्दगी के भय से नाम वहाँ आता ही नहीं है। जिस वाणी से नाम का उच्चार नहीं होता उसे बाँझ समझना चाहिये
क्योंकि वह हरिकथा का गर्भ धारण नहीं करती। उस वाणी के अन्य सारे उद्योग निष्फल हैं। श्रीकृष्ण ने उद्धव से
कहा, भैय्या! एक अच्छा उपाय सुनो। मेरा नाममार्ग अत्यन्त सुगम होने के साथ ही परिपूर्ण है। वहाँ किसी अन्य
मार्ग की आवश्यकता ही नहीं है। इसलिये सज्जनों को हरि के नाम के अतिरिक्त वाणी का उपयोग करना ही
नहीं चाहिये। यही उद्देश्य श्रीकृष्ण ने अत्यन्त प्रेम से प्रदर्शित किया। शब्दव्युत्पत्ति का ज्ञान प्राप्त कर लेने से
उसकी योग्यता बढ़ेगी। उसे पंडिताई प्राप्त होगी लेकिन वैराग्य प्राप्त नहीं होगा और वैराग्य के बिना मेरी प्राप्ति
कदापि नहीं होगी। मान लो वैराग्य प्राप्त हो भी गया तो वह भी यदि विवेक के बिना उत्पन्न हुआ तो जिस प्रकार
आँखें न होने के कारण ज्येष्ठ होते हुए भी धृतराष्ट्र का राजपाट चला गया, उसी प्रकार विवेक के बिना वैराग्य
अन्धा है और अनधिकारी है। उसमें सन्मार्ग देखने का सामर्थ्य नहीं है। उसका परिभ्रमण व्यर्थ है। जो विवेक से
परिपूर्ण है उसका वैराग्य उफन कर बाहर आता है। उसे मेरी कुछ विचित्र जिज्ञासा रहती है। उसी का वर्णन
श्रीकृष्ण करते हैं।
एवं जिज्ञासयापोह्य नानात्वभ्रममात्मनि।
उपारमेत विरजं मनो मय्यर्प्य सर्वगे॥ २१॥
जरा देखो! जिसके मन में मेरा नित्यमुक्त तथा नाशरहित स्वरूप जानने की उत्कट इच्छा बनी रहती है, उसे
उसके अतिरिक्त और कुछ स्मरण नहीं होता। मुझे जानने की इसी तीव्र उत्कंठा को जिज्ञासा कहते हैं। मुझे प्राप्त
करने के लिये वह कभी विद्वत्ता या मान-सम्मान को स्वीकार नहीं करता। श्रवण और मनन तथा मन में विचार
करने के बाद देहादिक संसार चिन्तन व्यर्थ है ऐसा उसने निश्चित किया रहता है। इससे गुरुचरणों में उसका पूर्ण
विश्वास रहता है और पूर्ण ब्रह्म के प्रति दृढ़ निश्चय रहता है। अतः अगले मार्ग पर चलने के लिये वह
भगवद्भजन के प्रति तत्पर हो जाता है अथवा कर्म की झंझट छोड़कर वह ध्याननिष्ठ हो जाता है। अतः ध्येय,
ध्याता और ध्यान इस त्रिगुट का उसे भान नहीं रह जाता, चारों ओर चैतन्य भर जाने के कारण वह भी सनातन
परब्रह्म होकर रह जाता है। वहाँ कर्त्ता, कर्म और क्रिया का क्या काम? भेदभाव का भ्रम मिट जाता है, अन्दर
बाहर परब्रह्म ही भरा रहता है और गुरुकृपा से मन निश्चल हो जाता है। चारों ओर सर्वकाल, सभी देशों में जहाँ
परब्रह्म व्याप्त हो जाता है वहीं आत्मज्ञान स्थिर हो जाता है। ऐसे परब्रह्म का ध्यान जो नहीं कर पाता उसके लिये
दूसरा आसान उपाय बताता हूँ।
यद्यनीशो धारयितुं मनो ब्रह्मणि निश्चलम्।
मयि सर्वाणि कर्माणि निरपेक्षः समाचर॥ २२॥
मन स्वभावतः चंचल होता है और विषयवासना उससे भी अधिक चपल! इसी कारण से निर्गुण ब्रह्म में
प्रवेश करने का सामर्थ्य मन नहीं जुटा पाता। वह सामर्थ्य लाने के लिये सांख्य, योग अथवा संन्यास का जो मार्ग
ग्यारहवाँ अध्याय २९३
है उसमें आने वाले परिश्रम से यदि बचना है तो बस अत्यन्त उल्हास से मेरे प्रति भक्ति बढ़ानी चाहिए। इससे
पहले बद्धमुक्तों के लक्षण बताते समय मुक्तों का लक्षण भी बताया था और शब्दों का पांडित्य करने वालों के
खोखले शब्दज्ञान का भी विवेचन किया था। अब अपनी आत्मभक्ति का उद्धव से वर्णन करने के उद्देश्य से
श्रीकृष्ण आदरपूर्वक भक्ति का स्वरूप बता रहे हैं। उद्धव! यदि इच्छापूर्वक मत्कर्म करने हों तो मनोधर्म भक्ति को
अर्पण कर देना चाहिये और आनन्दपूर्वक मेरे गुण, कीर्ति तथा नाम आदि का स्मरण करना चाहिये। मेरे भजन से
ही कार्य सम्पन्न होगा यह विश्वास मन में दृढ़ कर दिन रात, अथक मेरे भजन में प्रवृत्त होना चाहिये। भजन पूर्ण
होने पर भी मन नहीं भरता एक पल भी व्यर्थ नहीं जाने देना चाहता। मेरे भजन में विशेष प्रेम होते हुए भी
वैदिक, लौकिक अथवा दैहिक नैमित्तिक कर्म नहीं छोड़ना चाहिये। वह कर्म भक्तों को बाधक नहीं होता।
लेकिन मेरे सभी कर्मों का आचरण करते समय फल की आकांक्षा की कल्पना नहीं करनी चाहिये यही भक्तों का
गूढ़ मर्म है।
जो अन्तर से बिना ऊबे मुझ पर भक्ति रख सारे कर्म करता है और कभी फल की आशा नहीं करता वही
भक्ति का अधिकारी होता है इसे ध्यान में रखो। पीपल का पेड़ फल खाने की आशा से नहीं लगाया जाता उसी
प्रकार इच्छापूर्वक कर्म करने से आगे फल की इच्छा उत्पन्न ही नहीं होती। मेरा भजन करने पर ज्ञान की भी कमी
नहीं पड़ती मुझ पर भक्ति कर मेरा भजन करने से ही मेरे भक्तों को नित्यमुक्तता प्राप्त होती है। ज्ञान के बिना
भक्ति नहीं होती यह केवल शब्दज्ञान है। भक्ति से ही प्रत्यक्ष अपरोक्ष ज्ञान की प्राप्ति होती है इसलिये मेरा भजन
करते समय भक्तों को ज्ञान की कमी नहीं होती। घर गृहस्थी में रहने पर भी मेरे भक्तों को उसका बन्धन नहीं
होता। जिसके मुख में मेरा नाम होता है, जिसे मेरे भजन की लगन रहती है, जिसके मन में मैं आत्माराम रहता हूँ
उसके घर मुक्ति दासी की तरह रहती है। लेकिन जिसकी प्रवृत्ति निर्विषय हो जाती है उसके लिये मुक्ति का क्या
महत्त्व है ? भक्तों को किसी भी कर्म में विषय की आसक्ति नहीं रहती है। उसका मन विषय में नहीं रहता।
उसका विषय मैं भगवान ही रहता हूँ। वे सदा मुझमें ही लोलुप रहते हैं इसलिये वे नित्यमुक्त रहते हैं। भक्त यदि
विषयों का सेवन करते भी हैं तो उसे कण-कण में मुझे ही अर्पित करते हैं और समस्त प्राणिमात्र में वे मेरा ही
रूप देखते हैं। इसीलिये मुक्ति उनका वन्दन करती है। इसलिये मेरे भक्तों पर कर्मों का बन्धन तो नहीं ही लगता,
बल्कि मेरा स्मरण और कीर्तन करते हुए वे संसार का बन्धन तोड़ देते हैं। मेरे भक्तों का जो निवास होता है वही
मेरा भी निवास रहता है इसे ध्यान में रखो। उसके द्वार पर मुक्ति आठों पहर हाथ जोड़ कर खड़ी रहती है। मेरा
भजन करते रहने से किसी बात की कमी नहीं रह जाती। चारों पुरुषार्थों की अपेक्षा भक्ति मुझे अधिक प्रिय है।
ज्ञान, नित्यानित्यविवेक तथा भक्ति इनमें भी मेरा अत्यन्त प्रेम रहता है। उसी प्रकार प्यारे भक्तों का भी मुझे रात
दिन अधिक से अधिक सुख प्राप्त होता है। जिस प्रकार एकमेव बच्चा रहने पर माँ को वह अधिक प्रिय रहता है
उसी प्रकार प्यारे भक्तों का कौतुक करने में मुझे अत्यन्त सुख का अनुभव होता है। इसलिये ऐसे भक्तों को मैं
तत्काल अपनी छत्रछाया में ले लेता हूँ और उसे आत्मसुख देता हूँ। अगर वह उसे ग्रहण नहीं करता तो मैं उसका
दास बन जाता हूँ जिसने अपने प्रेम के कारण अपनी चित्तवृत्ति मुझे अर्पण की उसकी सेवा करने का निश्चित
विचार मैं उसी क्षण से करता हूँ। प्यारे भक्तों का जूठा खाने में अथवा उनके घोड़ों को नहलाने में मुझे जरा भी
लज्जा नहीं होती। अधिक क्या कहा जाय ? उनके घर की जूठन उठाने में मुझे जरा भी लज्जा नहीं होती। प्यारे
भक्तों की मुझे इतनी अधिक चाह है कि उनके जूते भी मैं अपने मस्तक पर धारण करता हूँ। प्रेमी भक्तों की बात
कहते-कहते श्रीकृष्ण भाव विह्वल हो उठे। उनका कंठ भर आया। शरीर पर रोमाञ्च उभर आये। उन्होंने दौड़कर
२९४ श्रीमद् एकनाथी भागवत
उद्धव को आलिंगन दिया। श्रीकृष्ण का प्रेम ही अद्भुत था। आँखें अश्रुपूरित हो गयीं और वे स्वानंदजीवन की
वर्षा करने लगीं। मानों श्रीकृष्ण अपने आसुओं से उद्धव को भक्ति के साम्राज्य का राज्याभिषेक कर रहे थे।
प्रसंगानुसार, भक्तों की कथा कहते-कहते उनकी आँखों के सामने उद्धव दिखायी दिया और उन्होंने दौड़ कर उसे
बाहुपाश में बाँध लिया। श्रीकृष्ण को भक्तों से बहुत प्रेम था। जिस समय उसने आलिंगन दिया उस समय वह
कार्यकारण भी भूल गया, अपने धाम जाने का भी उसे विस्मरण हो गया और 'मैं' और 'तुम' का तो उसे स्मरण
ही नहीं रहा। मैं देवता हूँ और उद्धव भक्त हैं इस भेदभाव का भी उसे स्मरण नहीं रहा। कथा निरूपण की बात
भी उसे याद नहीं रही। उद्धव अपने आपको भूल गया और कृष्ण अपने को। प्रिय लोगों की बात सुनाते समय
परस्पर की बात से परे एकता के कारण दोनों गले मिले। प्रेम की चाह बहुत बड़ी चीज है। भक्ति का सच्चा सुख
क्या है वह आज उद्धव को मालूम हुआ। भक्ति का जो अलौकिक प्रेम होता है उसी को इस समय उद्धव ने
अभिव्यक्त किया। श्रीकृष्ण निजधाम की ओर जा रहे थे उस समय यदि उद्धव ने नहीं पूछा होता तो श्रीकृष्ण ने
ज्ञान, वैराग्य और भक्ति की कथा क्यों सुनायी होती ? उद्धव ने सचमुच भक्तिप्रेम विशेष होता है यह बात उजागर
की। उद्धव के उस प्रश्न से ही श्रीमद्भागवत त्रिभुवन में पूज्य हो गये। इसलिये तन, मन और प्राण से उद्धव की
बड़े प्रेम से आरती उतारनी चाहिये। इससे अधिक उसकी स्तुति करने में वाणी असमर्थ है। जो शब्दों में भी
व्यक्त नहीं किया जा सकता, बुद्धि भी जिसका आकलन नहीं कर सकती वह भक्तिप्रेम का आत्मगुह्य उद्धव को
देने के लिये श्रीकृष्ण ने आलिंगन का केवल बहाना किया। उस पुरुषोत्तम ने भक्ति का शुद्ध और अति उत्तम प्रेम
उद्धव को दिया और उससे श्रीकृष्ण आनन्दित हुआ। प्रेमी भक्तों की कथा सुनाते-सुनाते, महाराज ! मैं श्लोक का
अर्थ भी भूल गया। कृष्ण को भी प्रेम की यह कथा अच्छी लगी इसलिये उसे नियंत्रण में रखना कठिन हो गया।
प्रेम का स्वभाव ही कुछ ऐसा है कि वह स्मरण का मरण नहीं होने देता। यह बात सज्जन जानते ही हैं क्योंकि वे
भक्तिप्रेम को जानते हैं। लेकिन यह सब होते हुए भी मेरा सबसे बड़ा अपराध तो है ही क्योंकि श्लोक का अर्थ
भूलकर मैं बहक गया। इसके लिये लोग मुझे क्षमा करें। इस पर श्रोताओं ने कहा, “रुको! जिस निरूपण से
आनन्द प्राप्त होता है उसके सम्बन्ध में ऐसी बातें सहन नहीं होतीं। इतना मधुर है वह रहस्य। भागवत वैसे भी
उत्तम है, तिस पर उसमें भक्तिप्रेम का वर्णन है, उससे मानों परब्रह्म ही प्रकट हो गया और हमारा मनोरथ पूर्ण हो
गया। श्लोकों का सम्बन्ध छूटा और कथाभाग दूर हट गया ऐसी प्रार्थना करने की आवश्यकता नहीं है। हमलोग
श्रीकृष्णगुणानुवाद में तल्लीन हो गये हैं। तुम्हारे इस भक्तिप्रेम का निरूपण सुनकर श्रवणसुख में बाढ़ आ गयी है,
वह रुकेगी ऐसा नहीं लगता। इसलिये चुपचाप निरूपण को चलने दो।” प्रेमी भक्तों की कथा कहते समय कृष्ण
और उद्धव एकरूप होकर गले में बाँहें डालकर बैठे थे वह दुनिया से न्यारी मिलनी श्रीकृष्ण ने छुड़ायी और मन
ही मन बोले, यह बिलकुल अयोग्य है क्योंकि उद्धव यदि अभी ही ऐक्यरूप में पहुँच गया तो फिर मेरी कथा को
इससे अच्छा श्रोता और कौन मिलेगा? मेरे भक्तिज्ञान का विस्तार करने के लिये मेरे भक्तों का सखा एक उद्धव
ही है, इसीलिये उसे सच्चे आत्मज्ञान का बोध कराकर उसे ब्रह्मपाप से विलग किया। गुह्यज्ञान की सारी मिठास
और भक्तिप्रेम की चाह, साथ ही श्रीकृष्ण की दृढ़ मधुरता तथा चाह सचमुच उद्धव के पास ही थी। भक्तिप्रेम का
एकमेव भोक्ता श्रीकृष्ण हैं और कृष्ण की कृपा भक्त ही जानते हैं। यह बात अनिर्वचनीय है। उसका शब्दों में
वर्णन नहीं हो सकता। कृष्ण ने उद्धव से कहा, हुँ! अब सावधान हो जाओ और भक्तिमार्ग के लिये उपयोगी आगे
की कथा सुनो। फल का त्याग कर यदि सारे कर्म मुझे अर्पण करना सम्भव न हो तो प्रेमलक्षण का अत्यन्त सरल
निरूपण सुनाता हूँ, उसे ध्यान से सुनो।
ग्यारहवाँ अध्याय २९५
श्रद्धालुर्मे कथाः शृण्वन् सुभद्रालोकपावनीः ।
गायन्ननुस्मरन् कर्म जन्म चाभिनयन् मुहुः ॥ २३ ॥
मेरी कथा का श्रवण प्रारम्भ करने पर वहाँ काल का भी प्रवेश सम्भव नहीं है फिर दूसरों की क्या बात
की जाय? और वहाँ कर्मबन्धन किस बात का? हरिकथा में जो क्षण व्यतीत होता है उसे काल भी ग्रस नहीं
सकता। इसलिये हरिकथा का श्रवण यदि श्रद्धापूर्वक किया गया तो उसी को 'काल की सार्थकता' समझना
चाहिये। अब कथा का माहात्म्य सुनो। यदि श्रद्धापूर्वक कथा श्रवण की जाय तो उसके प्रत्येक अक्षर से तीनों
लोकों के पातक भस्म हो जाते हैं। अब श्रद्धा किसे कहते हैं यह भी सुनो। हरिकथा श्रवण करते समय जिसके
अर्थ की ओर मन लगा रहता है उसी का अर्थ है श्रद्धापूर्वक श्रवण करना। कथा का प्रतिपादन सुनकर भी
नास्तिक कहते हैं, "भगवान तो है ही नहीं। जो कहते हैं कि ईश्वर है वह केवल अपना पेट भरने के लिये हमें
उस पर जरा भी विश्वास नहीं है।" ऐसे नास्तिकों की बात की चिन्ता न कर जिसकी आस्तिकता बढ़ती जाती
है उसी का नाम है श्रेष्ठ श्रद्धा और उसमें अप्रतिम सुख होता है। श्रवण में अथवा ध्यान में लय, विक्षेप, कषाय
तथा रसास्वाद आदि से बाधा उत्पन्न होती है। इसलिये इन चारों बाधाओं से बचना चाहिये। हरिकथा सुनते
समय भी यदि मन में विषय की चिन्ता लगी रहे तो वह अच्छा है ही नहीं। प्रमुख विक्षेप यही है। स्त्रियों के
हावभाव का वर्णन, उनके नेत्र कटाक्षों का वर्णन एवं श्रृंगार चेष्टाओं का वर्णन सुनने में ही जिसकी श्रद्धा रहती
है उसका नाम है 'रसास्वादन'। अथवा वह हरिकथा सुनने के लिये बैठा अवश्य रहता है किन्तु उस कथा में
उसका मन बिलकुल नहीं रहता। उसका चित्त कहीं अन्यत्र ही भ्रमण करता रहता है। उसे मर्कटरूपी विक्षेप
कहते हैं। अन्यथा अनेक प्रकार के उद्वेग होने के कारण हरिकथा सुनते रहने पर भी उसमें मन नहीं लगता
अथवा नींद आ जाती है। उसे तत्काल लय विक्षेप समझना चाहिये। सुनने अथवा ध्यान में बैठने पर सगुण
अथवा निर्गुण इनमें से कोई भी रूप मन में नहीं उभरता और आँखों के आगे नीले-पीले रंग नाचने लगते हैं।
यही तीन गुणों के क्षोभ का मिश्रण है। इसे 'कषाय' कहते हैं। श्रवण और ध्यान में इस प्रकार के दोष हैं। उसी
प्रकार प्रेम तीन प्रकार का है। चतुर लोग इन तीनों प्रकार के प्रेम को पहचानते हैं। उसके लक्षण बताता हूँ,
सुनो। महान वीरों के समर में पराक्रम अथवा भीषण युद्ध का वर्णन सुनकर मन प्रसन्नता से नाच उठता है, वह
राजस प्रेम है। दुःख शोक का प्रसंग, मरने की वार्ता अथवा शोक कथाओं का सुनना भी जिसे सहन नहीं होता,
उनमें का प्रत्येक प्रसंग सुनकर आँखों से आँसुओं की धारा बहने लगती है, सिसकी आने से जिसका बदन
थर-थर काँपने लगता है वह सच्चा तामस है, यह समझ लो। सगुण मूर्ति का ऐश्वर्य, शंख, चक्र, कमल, गदा
तथा पीताम्बर धारण किये गोविन्द का वर्णन सुनकर जो प्रसन्न हो उठता है, आँखों से आनंदाश्रु बहने लगते हैं,
सिसकी रूक नहीं पाती, मन कृष्णमय हुआ रहता है, वह प्रेम सात्त्विक होता है। चौथे प्रकार के प्रेम की
कल्पना भी अतर्क्य है। उद्धव! तुम मेरे अत्यन्त लाडले हो इसलिये तुम्हें उसके बारे में भी बताता हूँ। तुम्हारा
भक्ति का स्वरूप महान है। उसके कारण मुझे गुप्त बात भी बतानी पड़ती है। तुम्हारे सिवाय दूसरों को देखने
पर दूसरा अधिकारी पुरुष दिखायी नहीं देता। श्रीकृष्ण ने कहा, ध्यान दो। निर्गुण परब्रह्म के स्वरूप के बारे में
जानकर जिसका मन चित्तस्वरूप में डूब जाता है उसे पुनः होश में आने का भान ही नहीं रहता। नमक का
टुकड़ा समुद्र में डालने पर वह जिस प्रकार समुद्र के आकार का ही हो जाता है उसी प्रकार वह भी साक्षात्
ब्रह्मस्वरूप ही हो जाता है। चित्त और चैतन्य का मिलन होने पर और लिंगदेह का बन्धन टूटने पर आँखों में
अश्रुओ की बाढ़ आ जाती है, शरीर रोमांचित हो जाता है, जीव भाव की दशा टूट जाती है और भाव विह्वल
होने के कारण गला रुंध जाता है, शब्द मुँह से बाहर नहीं आ पाते। शरीर से पसीना बहने लगता है, नेत्र
अधोन्मीलित हो जाते हैं, आश्चर्य अपरिमित हो उठता है और वह स्वानंद से भर जाता है। इसे चौथा प्रेम जान
लो। यही उत्तम भागवत की स्थिति है। वही मैंने यथार्थ रीति से बतायी। इस स्थिति को जानने वाला बस मैं ही
हूँ। निर्गुण में प्रेम होना यह शुद्ध सात्त्विक लक्षण है। इसके लक्षण या तो मैं जानता हूँ या जो ब्रह्मस्वरूप हैं वे
जानते हैं। उद्धव! श्रद्धापूर्वक श्रवण करने से इतना लाभ है, यह ध्यान में रखो। श्रद्धा से श्रवण करने का
माहात्म्य त्रैलोक्य में बहुत अधिक है। विवेकी और इच्छारहित वक्ता मिले तो उसे श्रद्धापूर्वक श्रवण करना
चाहिये या श्रोता यदि ज्ञानसम्पन्न हो उसे भी कथा कहनी चाहिये। जब श्रोता और वक्ता में से कोई भी न हो तो
अपने मन का ही आश्रय लेना चाहिये और मेरे अवतार, अवतार कार्य आदि का अकेले में ही विचार करना
चाहिये। विषयों की आस्था त्याग कर तथा काल को टक्कर देकर, मेरे कीर्तन में अत्यन्त उल्हास धारण करना
चाहिये। वासना का त्याग कर तथा लौकिक की लज्जा न कर श्रीकृष्ण का नामस्मरण करते हुए नृत्य के साथ
कीर्तन करना चाहिये। रामकृष्ण, हरि, गोविन्द आदि का काव्य गायन करते हुए उनमें के अनेक प्रकार के
छन्दबंद पदों से कीर्तन में आनन्द की वर्षा कर देनी चाहिये। जिनसे आत्मज्ञान का लाभ हो ऐसे प्रिय पदों का
कीर्तन में गायन करना चाहिये तथा ऐसे समय संत समुदाय को सामने बैठाना चाहिये। वीणा, मृदंग, करताल
आदि वाद्य लेकर तथा वैष्णवों के समुदाय एकत्र कर कीर्तन में जयघोष करना चाहिये। काल-प्रहर की चिन्ता
नहीं करनी चाहिये। दशमी को धार्मिक उत्सव के उपलक्ष्य में जागरण करना चाहिये तथा सुमधुर गायन करना
चाहिये और मेरे अवतार कार्यों का स्मरण कर उनका हावभाव के साथ प्रदर्शन करना चाहिये। राम ने धनुष की
प्रत्यंचा खींचकर किस प्रकार शंकर का धनुष तोड़ा इसका हावभाव के साथ प्रदर्शन कर, वह राम मैं ही हूँ
ऐसी जो गर्जना करता है वह कीर्तन में रंग जमा देता है। कृष्ण ने गोवर्धन पर्वत किस प्रकार उठाया, किस तरह
दावाग्नि प्राशन किया, वह सब अपने हावभाव से प्रदर्शित कर तथा राम ने सेतु कैसे बाँधा इसका भी अनुकरण
करके दिखाता है, आलस त्याग कर जो अहंकार को दूर भगा कर रात-दिन कीर्तन का घोष करता है, उसमें भी
मैं अच्छा गायक हूँ इस बात का गर्व नहीं करता, गायन की प्रौढ़ता, ज्ञान का अभिमान तथा चतुराई के गर्व को
जो न्योछावर कर देता है और शुद्ध प्रेम तथा सादगी से कथा का गौरव करता है, उससे मुझे अत्यन्त आनन्द
प्राप्त होता है। नामसंकीर्तन का जयघोष जब अपनी चरम सीमा पर रहता है और नामोच्चार के साथ सबकी
एक साथ ताली बजती है, उससे महान पातक भी भस्म हो जाते हैं। वैष्णवों के उस समुदाय में मैं भी खड़ा
रहता हूँ। क्षीरसागर में भी जो सुख मुझे नहीं प्राप्त होता, वैकुण्ठ में जो सुख देखने को भी नहीं मिलता वह
सुख मुझे कीर्तन में मिलता है। कीर्तन के वश में मैं डोलता रहता हूँ। प्यारे भक्तों को मैं बहुत चाहता हूँ। भक्तों
की भक्ति के कौशल से मैं भी कीर्तन के ताल पर आनन्द से नाचता रहता हूँ। इस प्रकार के कीर्तन में अनेक
पाप-प्रायश्चित्त विलीन हो गये, यमदूतों का मार्ग अवरुद्ध हो गया और पापों का तो उन्मूलन ही हो गया।
नामस्मरण की चाह से करोड़ों मंत्र बीज लज्जित हो उठे और तपादिक साधन तो हरिनाम से पागल हो गये।
हरिनाम का जयघोष सुनते ही योगयाग मुँह छिपाने लगते हैं। उस हरिनाम के भय से विषयसुखों का तो
पलायन ही हो गया और अधर्म अपने स्थान पर ही जम से गये। हरिनाम का, गर्जन सुनकर समस्त दोषों का
दिगंत में पलायन हो गया और तीर्थों का गर्व भी चूर-चूर हो गया। ऐसा यह कीर्तन कौशल हरि को अत्यन्त
प्रिय लगता है। मेरे प्रेम में मदमस्त होकर जो रात-दिन कीर्तन करते रहते हैं वे मन से तथा वाणी से अनेक
प्रकोर के कार्य करते हुए भी मेरे सिवा और कुछ नहीं जानते।
ग्यारहवाँ अध्याय २९७
मदर्थे धर्मकामार्थान्नाचरन् मदपाश्रयः।
लभते निश्चलां भक्तिं मय्युद्धव सनातने॥ २४॥
मेरे जो उत्तम भक्त हैं उनका धर्म, अर्थ और काम मैं ही हूँ। उनका मनोधर्म मेरे अतिरिक्त और कोई कार्य
करना ही नहीं जानता। मेरा भजन यही उनका उत्तम कर्म है मुझे जो धर्म अर्पण होता है वही उनका पवित्र धर्म है
मेरी चाह करना यही उनकी शुद्ध इच्छा है और उस इच्छा का विश्राम भी मुझमें ही है। वे अनेक प्रकार का धन
खर्च कर परमार्थ का ही संग्रह करके रखते हैं। अशाश्वत रूप सम्पत्ति का संग्रह मेरे भक्तगण नहीं करते। धन में ही
जिसका चित्त लगा रहता है वे अभक्त हैं, इसे याद रखो। वे जो भी भजन आदि करते हैं वह किसी नट द्वारा पैसों
के लिये किये नाटक की तरह है। मन और वाणी से किये गये जो कर्म मुझे अर्पण नहीं होते वह सब ढोंग रहता
है। वह केवल पेट भरने के लिये होता है। वह भक्ति के विरुद्ध होता है। उस विरुद्ध धर्म का लक्षण भी बताऊँगा।
मेरे भजन को कम कर जो पैसा कमाने निकलता है उस भक्त का यह लक्षण प्रमुखता से भजन के विरुद्ध है। पास
का धन खर्च करना नहीं जानता और मेरा सूखा ही भजन करता है, इस प्रकार जिसने मुझे ठगा है यह कार्य
मुख्यतः विरोधी लक्षण है। इसी को 'अर्थविरुद्धता' कहते हैं। अब जो भक्त दुष्ट वासना से कर्म करता है, और मैं
भगवान का भजन कर रहा हूँ इसलिये मुझे कोई दोष नहीं लगेगा इस भावना में जो दुष्ट वासनाओं में ही लिपटा
रहता है उसका वह आचरण भजन के विरुद्ध लक्षण है। वह भजन भक्तों को अभक्त अवश्य बना देते हैं। मुझे
अर्पण न कर जो भी श्राद्ध करता है उसकी कल्पना भी श्राद्ध के विरुद्ध है। श्राद्ध का जो संकल्प है वह मुझे अर्पण
करने से ही विरुद्ध नहीं होता ऐसा वेद भी कहते हैं। 'पितरस्वरूपी जनार्दन' यह श्राद्ध का प्रमुख संकल्प है और
ऐसा होते हुए मुझे नैवेद्य भी अर्पण नहीं करते। अन्न भी ब्रह्म है और मैं भी ब्रह्म हूँ और यही श्राद्ध का गूढ़ रहस्य
है। लेकिन इस शुद्ध कर्म को न समझ वे व्यर्थ ही भ्रम बढ़ाते हैं। सारे जगत को उत्पन्न करनेवाला मैं हूँ, समस्त
पितरों का मुख्य पिता भी मैं हूँ, ऐसे मुझको कर्म अर्पण न कर श्राद्ध करना सभी दृष्टियों से विरुद्ध है। मुझे अर्पण
किये बिना जो भी कुछ किया जाता है, वह सब अभक्त के ही रूप में होता है। ऐसे विरुद्ध धर्म का जो आचरण
करता है उसे अत्यन्त भयंकर दुःख प्राप्त होता है। उत्तम भक्तों का लक्षण यही है कि वे संकल्प के बिना ही मुझे
अन्नपानादि अर्पण करते हैं और उसका रहस्य जानते हैं। जो मेरे प्रति ध्रुव की तरह अटल भजनशील रहते हैं उन्हें
मेरी स्थिर और अटल भक्ति प्राप्त होती है। आर्त, जिज्ञासु और अर्थार्थी इन तीनों को जो प्राप्त नहीं होता, उद्धव !
वह मेरी चौथी भक्ति है जो उन्हें उनके मेरे प्रति प्रेम के कारण प्राप्त होती है। आर्त अपनी पीड़ा दूर करने के लिये
मुझे भजता है, जिज्ञासु ज्ञानप्राप्ति के लिये मेरा भजन करता है और तीसरा जो अर्थार्थी है वह मेरा भजन कर पर्याप्त
धन पाने की कामना करता है। लेकिन इनके सिवा चौथा एक ज्ञानी होता है जिसके मन में इन कल्पनाओं का
अंशमात्र भी नहीं होता इसलिये चौथी भक्ति उसके पास घर समझ कर रहती है। जिसे भक्ति में चारों ओर मैं ही मैं
दिखायी पड़ता हूँ उसकी वैसी स्थिति मेरे भजन के ही कारण होती है। बिना संकल्प किये सब कुछ मुझे अर्पण
होता है यह चौथी भक्ति का लक्षण है। उस भक्ति में मेरा भजन अतर्क्य है। उसमें जो भी कर्म किया जाता है वही
मेरी पूजा होती है, वहाँ जो बातें होती हैं वही मेरा जप है, वहाँ जो भी दिखायी देता है वह अधोक्षजा का ही दर्शन
होता है। वहाँ चलना वही मेरी यात्रा है, वह जो भक्षण करता है वही यज्ञ में मुझे अर्पित की हुई आहुति होती है।
उसकी निद्रा ही मेरी समाधि होती है। इस प्रकार वह मुझमें ही भजन करता रहता है। इस प्रकार उसके सारे कर्म
सहज रूप में अनायास ही मुझे प्राप्त होते हैं। उद्धव ! यह सनातन चौथी भक्ति उसे पूरी तरह प्राप्त होती है। उद्धव !
अब शायद तुम्हारे मन में यह विचार आये कि यह पहली, दूसरी, तीसरी और चौथी भक्ति मूल रूप में चली आ
२९८ श्रीमद् एकनाथी भागवत
रही है यह बात काल्पनिक है। तो मेरी जो सहज प्रकाशस्थिति है उसी को 'भागवति शक्ति' कहा गया है। वेदांत में
इसी को 'संविति' कहते हैं और शैवों के अनुसार इसी का नाम 'शक्ति' है। बौद्ध इसे 'जिनेश', 'नेमिनाथ' कहते
हैं, जोगी 'आदिनाथ' कहते हैं, कोई 'भैरव', कोई 'खंडेराव', कोई 'गाणपत्य' कहते हैं तो कोई इसे 'अव्यक्त' भी
कहते हैं। कोई कहते हैं कि यह 'आदिमाता' है। सौर कहते हैं कि यही 'सविता' है। उपासना के भेदों की तरह
इसके नामों में भी अनेक भेद हैं। तो यह जो प्रकाश की स्थिति है उसी को 'भक्ति' कहते हैं। उसी के प्रकाश से
त्रिभुवन में उत्पत्ति, स्थिति और लय का भास होता है। मेरी जो अनेक अवतार मालिकायें हैं, वे इसी प्रकार से
उज्ज्वल रीति से प्रकाशित हैं। देवी, देवतागण सब इसी प्रकार से प्रकाशित दिखाई देते हैं। मेरे अवतारों की
उत्पत्ति भी उसी प्रकाश से होती है और मेरे अनेक चरित्र उसी प्रकाश में प्रवेश करते हैं। इस प्रकाश की जो प्राप्ति
है वही मेरी सनातन भक्ति है यह जान लो। उद्धव ! मैंने उसे यथार्थ रूप में समझाया। निश्चल भक्ति सनातन है यह
मूल श्लोक में है। इसीलिये मैंने सनातन भक्ति का सविस्तार वर्णन किया। मूल श्लोक के पद तथा पद का अर्थ
छोड़कर व्यर्थ की बात नहीं की। अब श्रोतागण सावधान रहें क्योंकि आगे की कथा अत्यन्त रमणीय है। लेकिन हे
उद्धव ! मेरी यह भक्ति कैसे प्राप्त होगी यह पूछोगे तो उत्तर यही है कि भक्तिभाव से सत्संगति करने से मेरी भक्ति
प्राप्त होती है।
सत्सङ्गलब्धया भक्त्या मयि मां स उपासिता।
स वै मे दर्शितं सद्भिरञ्जसा विन्दते पदम् ॥ २५॥
मुख्य रूप से संतों की सेवा यही साधन भगवान को भाता है। वह जब साध्य होता है तो संतवचन की ही
तरह वह आत्मभाव और आत्मभक्ति प्रदान करता रहता है। जिसे सत्संगति के मेले में रहना अच्छा लगता है, जो
साधुवचनों का भूखा रहता है, साधु के मुख से निकले शब्द को अमान्य करना जो नहीं जानता, वही आत्मभक्ति
का भाग्यवान पुरुष है। साधुवचनों पर उसकी अपार श्रद्धा है यह देख कर ही सद्गुरु उस पर कृपा करता है।
साधु चराचर में श्रेष्ठ गुरु है। सचमुच गुरु के अलावा संसार से तारने वाला कोई अन्य नहीं है। गुरुवचन से भक्तों
को आत्मभक्ति देने वाला सर्वथा मैं ही हूँ। संसार में जो सद्गुरु है उसकी आज्ञा मैं माथे से लगाता हूँ। वह जिस
पर कृपा करता है उसका मैं तत्काल उद्धार करता हूँ। उस सद्गुरु में मेरा स्वरूप है यह जानकर जो भजन करता
है उसे मैं कितना लाड़ करता हूँ यह कहना मेरे लिये भी कठिन है। उसका इहलोक और परलोक दोनों चलाने
वाला मैं ही हूँ। उसके कारण मुझे अत्यन्त आनन्द प्राप्त होता है और उसके आनन्द से मेरे आनन्द को भी उफान
आता है। उसके गुरु ने उसे जो मार्ग दिखाया है उस पर चलने में उसे जरा भी प्रयास या परिश्रम नहीं करना
पड़ता। अगर कोई संकट सामने आता है तो मैं श्रीकृष्ण दौड़कर सशरीर उसके सामने खड़ा हो जाता हूँ। उसे जो
पद प्राप्त करना है वह पद ही मैं उसके पास ले आता हूँ। संतों की सेवा के प्रति कितना प्रेम है इसे श्रीकृष्ण बता
रहे हैं। ऐसा भाषण सुनकर उद्धव भाव विह्वल हो गये और मन ही मन विचार करने लगे कि ऐसा साधु पुरुष
कौन होगा? उसके स्वरूप के बारे में क्यों न पूछा जाय? उस भक्ति का लक्षण भी क्या होगा? भजन की वह
पहचान कौन-सी है? इसे सविस्तार जानने के लिये उद्धव ने प्रश्न किया।
उद्धव उवाच
साधुस्तवोत्तमश्लोक मतः कीदृग्विधः प्रभो।
भक्तिस्त्वय्युपयुज्येत कीदृशी सद्भििरादृता ॥ २६॥