श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२८४ श्रीमद् एकनाथी भागवत
एक बार त्याग किये हुए संकल्प विकल्पों को वह कल्पांत में भी स्पर्श नहीं करता। इसलिये मुक्त का मन,
बुद्धि, इन्द्रिय और प्राण ये सब संकल्पशून्य हो जाते हैं। इसीलिये मुक्त पर पापपुण्य का प्रभाव नहीं होता। जिस
समय इन्द्रिय विषयक्रीड़ा में व्यस्त रहते हैं उस समय भी मुक्त संकल्पशून्य ही रहता है। उसके मन में मन नहीं
होता इसीलिये वह वृत्तिशून्य रहता है। बच्चों को अलंकारों का मोल मालूम नहीं होता लेकिन उन्हें पहनने से
उनकी शोभा बढ़ जाती है उसी प्रकार उसके इन्द्रिय भले ही कर्म में रत हों लेकिन मुक्त अकर्ता होकर अलिप्त
रहता है। जो संकल्परहित होकर विहार करता है वही सचमुच मुक्त है। 'कथं विहरति' इस प्रश्न का उत्तर
संक्षेप में बतलाया। मैंने मुक्त के जो भी लक्षण बताये वे सब मुक्त स्वयं ही जानता है। अन्य लोग विद्वत्ता के
बल पर मुक्त को नहीं पहचान सकते। वे सभी वेदशास्त्रों में पारंगत रहते हैं किन्तु वे भी मुक्त को नहीं पहचान
सकते जिसके देह में देह का अहंकार है वे मुक्त के लक्षण नहीं जान पायेंगे। मैंने बताये हुए लक्षणों को पोथी
लेकर यदि कोई आतुरता से त्रिभुवन में ढूँढ़े तो उसे भी मुक्त की स्थिति नहीं मालूम होगी क्योंकि जो सचमुच
ही मुक्त को पहचानता है वह भी सचमुच मुक्त ही रहता है। केवल अनुमान के आधार पर मुक्त की पहचान
होगी यह आशा करना व्यर्थ है। जो सचमुच सूर्य को देखता है वह उसने प्रकाशित किये हुए संसार को भी
देखता है उसी प्रकार जो सचमुच मुक्त को पहचानता है उसे संसार भी नित्यमुक्त ही दिखाई देता है। वहाँ
किसी को मुक्त और किसी को बद्ध कहना बिलकुल अनुपयुक्त है। जो ऐसा समझते हैं वे महामूर्ख, अनाड़ी
और अज्ञान के कारण अन्धे हैं ऐसा मानना चाहिये। मुक्त को पहचानना बिलकुल ही कठिन है यह जानकर
उद्धव को चिन्ता हुई है यह जानकर श्रीकृष्ण ने कहा, इससे पहले मुक्त के जो लक्षण बतलाये उन्हें मुक्त ही
जानते हैं। अब लौकिक रूप में मुक्त को पहचान सको ऐसे लक्षण भी बताता हूँ। उद्धव को ढाँढ़स बँधाने की
दृष्टि से श्रीकृष्ण ने कहा, मुक्त को पहचानने के लक्षण बताता हूँ, सुनो। तब उद्धव भी एकाग्र होकर सुनने
लगा। अब मुक्त को पहचानने के लक्षण मालूम होंगे यह जानकर उद्धव का मन अधीर हो उठा। यह जानकर
श्रीकृष्ण ने भी निराली शैली में निरूपण प्रारम्भ किया।
यस्यात्मा हिंस्यते हिंस्रैर्येन किंचिद् यदृच्छया।
अर्च्यते वा क्वचित्तत्र न व्यतिक्रियते बुधः ॥ १५॥
श्रीकृष्ण बोले, हिंसा करने वाले मुक्त के देह की हिंसा करे, उसे छिन्न-भिन्न करें, उसे मारें या काटें उसकी
भर्त्सना करें या उसे गाली दें लेकिन इसकी पीड़ा मुक्त को कभी नहीं होती और यदि बड़े गौरव के साथ उसकी
पूजा करें तो भी वह उसे अपना गौरव नहीं मानता। देह में विद्यमान रहते हुए भी उसमें देहबुद्धि का अंश भी
नहीं होता। इसी को जीवन्मुक्तता कहते हैं। इसीलिये उसे देह की व्यथा की बाधा नहीं होती। जिस प्रकार पुरुष
के साथ छाया रहती है, वह पुरुष के कारण ही विचरण करती है, उसकी ममता पुरुष के मन में नहीं रहती, उसी
प्रकार मुक्त का देह भी उसके साथ विचरण करता है लेकिन उसका अहंकार उसे नहीं होता। यह मुक्त का नित्य
स्वभाव है। उसे कोई 'चोर' कहे, 'जासूस' कहे, 'जेबकतरा कहे' और इसके लिये दण्ड दे अथवा 'आप श्रेष्ठ
पुरुष हैं' कह कर देवता की तरह उसकी पूजा करे जो जिस प्रकार छाया के मानापमान की पुरुष को पीड़ा नहीं
होती उसी प्रकार पूजा अथवा पीड़ा से उसकी समता नहीं टूटती। देह बाघ के मुँह में पड़े अथवा प्रारब्ध से वह
पालकी में चढ़े तो भी उसे हर्ष या विषाद नहीं होता क्योंकि समत्व के कारण वह निर्द्वन्द्व हो जाता है। देह को
सूली पर चढ़ाने के लिए ले जाते समय भी 'मैं अब मरने वाला हूँ' इस बात का उसे दुःख नहीं होता अथवा उसे