ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
सुनो हैं ये अतीव निकट के । आप्त जन सब परिवारके ।
इन्हें कटु बोलें तभी पापके । भागी हैं हम ॥ २४ ॥
एतान्न हन्तुमिच्छामि घ्नतोऽपि मधुसूदन ।
अपि त्रैलोक्यराज्यस्य हेतोः किं नु महीकृते ॥ ३५ ॥
चाहे सो इन्हें करने दो । हमको अभी मारने दो ।
किंतु मनमें न लाने दो । इनका अहित ॥ २५ ॥
मिले यदि विश्व साम्राज्य । तब भी हमें यह वर्ज्य ।
कार्य अनुचित जो त्याज्य । नहीं करूंगा ॥ २६ ॥
निहत्य धार्तराष्ट्रान्नः का प्रीतिः स्याज्जनार्दन ।
पापमेवाऽऽश्रयेदस्मान् हत्वैतानातातयिनः ॥ ३६ ॥
यदि आज हम ऐसा करेंगे । कौन हमारा आदर करेंगे ।
तेरा दर्शन भी कैसा करेंगे । कह श्रीकृष्ण ॥ २७ ॥
वध करनेसे गोत्र जनोंका । घर बनके महा-पापका ।
खोऊंगा मैं तुझको हाथका । जो है अपना ॥ २८ ॥
कुल नाशके पापसे । पूर्णता डूब जानेसे ।
देखूंगा मैं तुझे कैसे । इस भांति ॥ २९ ॥
जैसे उद्यानमें अनल । लगा देख अति प्रबल ।
क्षण भी न रहे कोयल । स्थिर वैसे ॥ २३० ॥
स-कर्दम सरोवर । देख करके चकोर ।
करे उसका अव्हेर । वैसा ही तू ॥ ३१ ॥
अजी ओ मेरे देवराय ! । मिटनेसे पुण्य-संचय ।
छोड़कर होग अदृश्य । हमसे तब ॥ ३२ ॥
इन्हें न मारना चाहूँ यदि ये मारते मुझे ।
विश्व-साम्राज्य छोड़ूंगा पृथ्वीकी बात क्या भला ॥ ३५ ॥
घातसे कौरवोंका है क्या होगा अपना हित ।
भले ये आततायी हैं इनका घात पाप है ॥ ३६ ॥
२५ अर्जुनविषादयोग
(4)
तस्मान् नार्हा वयं हंतुं धार्तराष्ट्रान् स्वबांधवान् ।
स्वजनं हि कथं हत्वा सुखिनःस्याम माधव ॥ ३७॥
इसीसे म यह नहीं करूंगा । रणमें शस्त्र नहीं उठाऊंगा ।
क्यों कि मुझे यह युध्द प्रसंग । दीखता निंद्य ॥ ३३ ॥
तुझसे ही जब वियोग होगा । भला तब हमारा क्या रहेगा ।
उस दुखसे हृदय फटेगा । तेरे बिन श्रीकृष्ण ॥ ३४ ॥
तब कौरव वध होगा । हमें राज्य-भोग मिलेगा ।
यह सारा अशक्य होगा । कहता है पार्थ ॥ ३५ ॥
यद्यप्येते न पश्यंति लोभोपहतचेतसः ।
कुलक्षयकृतं दोषं मित्रद्रोहे च पातकम् ॥ ३८ ॥
कथं न ज्ञेयमस्माभिः पापद्स्मान् निवर्तितुम् ।
कुलक्षयकृतं दोषं प्रपश्यद्भिर्जनार्दन ॥ ३९ ॥
अभिमान मदसे भूलकर । यदि आये ये रणभूमिपर ।
केसा होगा यहां मंगलकर । यह देखना होगा ॥ ३६ ॥
ऐसा कैसा यह करना । अपनोंको आप मारना ।
जानबूझकर है लेना । विष कालकूट ॥ ३७ ॥
अजी कभी राह चलते । यदि कहींसे सिंह आते ।
उसको टालकर जाते । इसीमें भला है ॥ ३८ ॥
तथैव घात बंधूका हमें योग्य नहीं कभी ।
घातसे स्वजनोंके क्या जीयेंगे सुखसे हम ॥ ३७ ॥
लोभसे नष्ट है बुद्धि जिससे ये न जानते ।
कुलके क्षयका पाप तथा क्या मित्र-द्रोहका ॥ ३८ ॥
पापसे बचना ऐसे न सोचें क्या भला हम ।
कुलक्षय महा-दोष दीखता स्पष्ट ही यहां ॥ ३९ ॥
ज्ञानेश्वरी २६
प्राप्त प्रकाशको छोड़ना । अंधकूपमें फिर जाना ।
उससे है क्या लाभ होना । कहो देव ॥ ३९ ॥
आगको सम्मुख देख कर । गये न उसको लाघकर ।
क्षणमें वह लपटेकर । जला देगा ॥ ४० ॥
वैसे दोष असाधारण । घेरते हैं हमको पूर्ण ।
जानकर भी आचरण । करना कैसे ॥ ४१ ॥
पूछ कर इतना बोले पार्थ । सुनो देव इसका मतितार्थ ।
कहूंगा इस पापका अनर्थ । अब तुझसे ही ॥ ४२ ॥
कुलक्षये प्रणश्यंति कुलधर्माः सनातनाः ।
धर्मे नष्टे कुलं कृत्स्नम् अधर्मोऽभिभवत्युत ॥४०॥
जेसे लकडीका घर्षण । उपजाता अग्नि महान ।
उससे जल जाता इंधन । प्रज्वल होके ॥ ४३ ॥
कुलमें वैसे परस्पर । वध किया तो स-मत्सर ।
उससे महादोष घोर । कुलघातका होगा ॥ ४४ ॥
अधर्माभिभवात् कृष्ण प्रदुष्यंति कुलस्त्रियः ।
स्त्रीषुदुष्टासु वार्ष्णेय जायते वर्णसंकरः ॥ ४१ ॥
इससे है ऐसा पाप । करें कुल-धर्म लोप ।
बढ़ता अधर्म व्याप । कुलमें ही ॥ ४५ ॥
इससे सारासार विचार । किसके कैसे क्या है आचार ।
मिट जाते हैं मूल आधार । विधि-निषेधके ॥ ४६ ॥
कुलके क्षयसे नाश कुल-धर्म सनातन ।
अधर्म फैलता सारा कुलके धर्म-नाशसे ॥ ४० ॥
अधर्म फैल जानेसे भ्रष्ट होती कुल-स्त्रियां ।
स्त्रियोंके भ्रष्ट होनेसे होता है वर्ण-संकर ॥ ४१ ॥
२७ अर्जुनविषादयोग
बुझाकर हाथका दीप । तममें चलनेसे आप ।
टकराये अपने आप । स्वाभाविक ॥ ४७ ॥
वैसा कुलक्षय जब होता । कुलमें आद्य-धर्म मिटता ।
कहो तब वहां क्या होता । पापके बिन ॥ ४८ ॥
छूटते हैं तब यम औ' नियम । टूटता मन-इंद्रियोंका संयम ।
घडता है व्यभिचारका कुकर्म । कुलस्त्रियोंसे ॥ ४९ ॥
उत्तममें अधमका संस्कार होता । इस भांति वर्ण अवर्णमें घुलता ।
तब है मूल सहित उखड जाता । संस्कृति धर्म ॥ ५० ॥
जैसे चौराहेके बलि पर । उडते हैं काग चहूं ओर ।
वैसे हैं दोष घुसते घोर । सत्कुलोंमें ॥ ५१ ॥
संकरो नरकायैव कुलघ्नानां कुलस्य च ।
पतंति पितरो ह्येषां लुप्त पिंडोदक क्रियाः ॥ ४२ ॥
फिर उस पूर्ण कुलको । तथा उस कुलघातिको ।
नरक मिला दोनोंको । इसको जान ॥ ५२ ॥
वंश विस्तार ही समस्त । होता जाता है जो पतित ।
गिरते पूर्वज स्वर्गस्थ । इससे सभी ॥ ५३ ॥
लोप होते जहां नित्य-कर्म । फिर कैसे नैमित्तिक धर्म ।
कहां रहे तब श्राध्द कर्म । किसके लिये ॥ ५४ ॥
नखाग्रमें डसनेसे साप । शिखाग्रतक विषका व्याप ।
वैसे आब्रह्म डूबता आप । समूचा कुल ॥ ५५ ॥
दोषैरेतैः कुलघ्नानां वर्णसंकरकारकैः ।
उत्साद्यंते जातिधर्माः कुलधर्माश्च शाश्वताः ॥ ४३ ॥
इससे नर्कमें जाता कुलघ्नों सह है कुल ।
पितरोंका अधःपात होता है श्राद्ध लोपसे ॥ ४२ ॥
दोषसे है कुलघ्नोंके होता है वर्ण-संकर ।
डूबते जातिके धर्म कुल धर्म सनातन ॥ ४३ ॥
ज्ञानेश्वरी २८
उत्सन्नकुलधर्माणां मनुष्याणां जनार्दन ।
नरके नियतं वासो भवतीत्यनुशुश्रुमः ॥ ४४ ।
अहो बत महत्पापं कर्तुं व्यवसिता वयम् ।
यद्राज्यसुखलोभेन हंतुं स्वजनमुद्यताः ॥४५॥
सुन प्रभुजी वचन एक । यहां घडता महापातक ।
जिस संग दोषसे लौकिक । पाता है भ्रांति ॥ ५६ ॥
जैसे है अपने घरको । लगी आग सब गांवको ।
निगलती है सर्वस्वको । जला करके ॥ ५७ ॥
वैसे ही उस कुल संगतिसे । दूसरे जनके बरतनेसे ।
उनके ऐसे हीन संसर्गसे । फैलते हैं दोष ॥ ५८ ॥
ऐसे नाना दोषोंका सकल । भांडार होता है ऐसा कुल ।
कहता पार्थ उसे केवल । नरक भोग घोर ॥ ५९ ॥
उस स्थानमें हुआ पतन । न होता कल्पांतमें उत्थान ।
कुलक्षयका पाप महान । अर्जुन कहता ॥ ६० ॥
अजी सुनके यह कानसे । घिन नहीं की तूने चितसे ।
कठोर किया हिय वज्र-से । कृष्ण तूने ॥ ६१ ॥
अपेक्षा है क्यों राज्य औ' सुख । जिसके लिये वह क्षणिक ।
जानकर भी यह ये दोष । नहीं त्यजना क्या ? ॥ ६२ ॥
आये यहां अपने कुलके श्रेष्ठ । हमने देखा शत्रु दृष्टिसे भृष्ट ।
नहीं क्या यह महादोष अनिष्ट । किया हमने ॥ ६३ ॥
जिनके कुलके धर्म डूबते उनको नित ।
होता नरकमें वास सुनते हैं यही हम ॥ ४४ ॥
कैसा यह महापाप करने जा रहे हम ।
मारना स्वजनोंको भी राज्यके सुख लोभसे ॥ ४५ ॥
२९ अर्जुनविषादयोग
यदि मामप्रतीकारमशस्त्रं शस्त्रपाणयः ।
धार्तराष्ट्रा रणे हन्युस्तन्मे क्षेमतरं भवेत् ॥ ४६ ॥
इस पर भी क्या है जीना । उससे भला चुप होना ।
शस्त्र छोडकर सहना । इनके तीर ॥ ६५ ॥
इससे जो कुछ होगा । मरनेमें भला होगा ।
यह पाप नहीं होगा । कभी मुझसे ॥ ६६ ॥
ऐसा देखकर सकल । अर्जुनने अपना कुल ।
कहा तब राज्य केवल । है नरकवास ॥ ६७ ॥
संजय उवाच
एवमुक्त्वार्जुनः संख्ये रथोपस्थ उपाविशत् ।
विसृज्य सशरं चापं शोकसंविनमानसः ॥ ४७ ॥
उस समयमें ऐसे । अर्जुन बोला कृष्णसे ।
संजय कहे राजासे । सुनियेजी ॥ ६८ ॥
अति उद्वेगसे ऐसे फिर । खिन्न मन गद्गद होकर ।
कूद कर आया पृथ्वी पर । रथसे वह ॥ ६९ ॥
राज कुंवर ऐसा पदच्युत । होकर के सर्वथा उपरत ।
या जैसे रवि हो राहुग्रस्त । हुआ हतप्रभ ॥ २७० ॥
अथवा महासिद्धिके भ्रममें । तापस उलझा मोहजालमें ।
तथा फंस कामना भंवरमें । हुआ है दीन ॥ ७१ ॥
इससे तजके शस्त्र रहना शांत होकर ।
मारेंगे फिर शस्त्रोंसे रणमें मुझे कौरव ॥ ४६ ॥
संजयने कहा
रणमें कहके ऐसा शोकाकुल धनंजय ।
डाल कर सभी शस्त्र रथमें बैठ ही गया ॥ ४७ ॥
ज्ञानेश्वरी ३०
तैसा वह धनुर्धर । दुःखावेगसे जर्जर ।
रथको था जो सुंदर । दिया छोड ॥ ७२ ॥
तथा छोड तीर कमान । करते अश्रुपात नयन ।
राजन् सुनो यह कथन । बोला संजय ॥ ७३ ॥
दूसरे अध्यायकी प्रस्तावना —
इस पर वैकुंठ नाथ । देखके खेद-मूर्ती पार्थ ।
किस भांतिका परमार्थ । कहेगा भला ॥ ७४ ॥
सविस्तर करेगा वर्णन । सकौतुक कहेगा कथन ।
कहेगा ज्ञानदेव वचन । निवृत्तिदास ॥ ७५ ॥
गीता श्लोक ४७
ज्ञानेश्वरी ओवी २४७.
ॐ
२
सांख्य योग
संजय उवाच
तं तथा कृपयाविष्टमश्रुपूर्णाकुलेक्षणम् ।
विषीदन्तमिदं वाक्यम् उवाच मधुसूदनः ॥ १ ॥
अर्जुनकी मनोदशा
संजयने कहा राजासे । पार्थने साश्रु नयनसे ।
अति शोकाकुल होनेसे । किया रुदन ॥ १ ॥
स्वकुल देखकर समस्त । स्नेह उपजा अत्यद्भुत ।
उससे द्रवित हुवा चित्त । इस प्रकार ॥ २ ॥
जलमें घुलता जैसे नून । अथवा हिलता वातसे घन ।
ऐसे वह दृढ अन्तःकरण । हुवा द्रवित ॥ ३ ॥
मोहाधीन होनेसे वह ऐसा । दिखाया जैसा मुरझाया-सा ।
कीचमें फंसा हुआ-सा जैसा । राजहंस ॥ ४ ॥
इस भांति वह पांडुकुमार । महामोहमें हो अति जर्जर ।
खड़ा देख उसे श्रीशार्ंगधर । बोले ऐसा ॥ ५ ॥
संजयने कहा
ऐसा जो करुणाग्रस्त अधीर अश्रु-पूरित ।
करता था जभी शोक उससे कृष्णने कहा ॥ १ ॥
भगवान उवाच
कुतस्त्वा कश्मलमिदं विषमे समुपस्थितम् ।
अनार्यजुष्टमस्वर्ग्यम् अकीर्तिकरमर्जुन ॥ २ ॥
क्लैब्यं मा स्म गमः पार्थ नैतत्त्वय्युपपद्यते ।
क्षुद्रं हृदयदौर्बल्यं त्यक्त्वोत्तिष्ठ परंतप ॥ ३ ॥
कृष्णका उपदेश—
कहे हरि सोचलो तुम अर्जुन । शोक करने योग्य क्या यह स्थान ।
तूं कौन है क्यों आया है यह जान । औ' करता क्या है ? ॥ ६ ॥
तुझे हुआ क्या है ? । क्या न्यून आया है ? ।
औ' करना क्या है ? । खेद क्यों ? ॥ ७ ॥
कभी न सोचना तू असंगत । न छोड़ना कभी धैर्य उदात्त ।
भागे तुझसे अ-यशकी बात । कोसों दूर ॥ ८ ॥
तू है शौर्य-वृत्तिका स्थान । क्षत्रियोंमें अति महान ।
तेरी कीर्ति-कथाका गान । त्रिभुवनमें ॥ ९ ॥
तूने जीता रणमें शिवको । मिटाया निवात कवचोंको ।
तथा हराया है गंधर्वोंको । पराक्रमसे ॥ १० ॥
देखनेसे यह तेरे सम्मुख । दीखते हैं बौने ये तीनों लोक ।
ऐसा है पौरुषका लौकिक । अर्जुन तेरे ॥ ११ ॥
ऐसा तू इस स्थान पर । वीर-वृत्तिको छोड़कर ।
दीन-सा अधोमुख होकर । रोता रहा है ॥ १२ ॥
कैसे विषम वेलामें सूझा पाप यह तुझे ।
न सोहता बड़ोंको जो देता दुष्कीर्ति दुर्गति ॥ २ ॥
न हो निर्वीर्य तू पार्थ तुझे न शोभता यह ।
अपनी दुबली वृत्ति छोडके उठ तू अब ॥ ३ ॥
(3) ३३ सांख्ययोग
सोचकर देख तू अर्जुन । किस करुणासे उदासीन ।
कहो अंधेरेमें कैसे भानु । ढका आज ॥ १३ ॥
डरता क्या मेघसे पवन । है क्या अमृतको भी मरण ।
निगलता आगको ईंधन । सोचले तू ॥ १४ ॥
या नमकसे क्या पानी पिघलेगा । अन्य स्पर्शसे कालकूट मरेगा ।
अथवा महाशेषको निगलेगा । मंडूक अल्प ॥ १५ ॥
सिंहसे भिडे क्या जंबूक । ऐसा हुवा क्या अलौकिक ।
दिखाया है सच कौतुक । तूने आज ॥ १६ ॥
इसलिये सुन अर्जुन । न होने दो चितको दीन ।
धैर्य दो मनको तत्क्षण । सावध होके ॥ १७ ॥
छोड़ दो यह अज्ञान । उठालो तीर कमान ।
रणमें किसका कौन । कारुण्य कैसे ॥ १८ ॥
तू है बड़ा जानकार । रणमें दया विचार ।
करना ऐसा अपार । उचित है क्या ॥ १९ ॥
इससे कीर्तिका नाश । परलोक अप भ्रंश ।
कहता जगन्निवास । अर्जुनसे ॥ २० ॥
इसीलिये शोक न कर । मनमें तू धीरज धर ।
तज दे तू पांडुकुमार । इस शोकको ॥ २१ ॥
तुझे नहीं यह उचित । इसमें अकीर्ति बहुत ।
अब भी तू अपना हित । सोचले ठीक ॥ २२ ॥
संग्राम समयमें ऐसे । करुणासे हित हो कैसे ।
आप्त हुये क्या ये अभीसे । कहो मुझे ॥ २३ ॥
पहलेसे क्या जानता नहीं । संग्राम है कुल-जनसे ही ।
करता है यह अ-कारण ही । शोक तू पार्थ ॥ २४ ॥
यह संघर्ष नहीं आजका । यह चला है जन्म कालका ।
आज ही क्यों ऐसा करुणाका । पुलक उठा ॥ २५ ॥
ज्ञानेश्वरी ३४
अब ही क्या है हुआ ऐसा । आया यह तरस कैसा ।
अर्जुन यह विचित्र-सा । किया अनुचित ॥ २६ ॥
इस मोहसे ऐसा होगा । नाम जो था वह मिटेगा ।
परलोक साथ जायेगा । लौकिकके ॥ २७ ॥
शिथिलता ऐसी हृदयकी । कारण होगी जो अहितकी ।
जानो संग्राममें पतनकी । क्षत्रियोंके ॥ २८ ॥
ऐसा वह कृपावंत । सिखाता है जो सतत ।
सुन यह पांडुसुत । बोले ऐसा ॥ २९ ॥
अर्जुन उवाच
कथं भीष्ममहं संख्ये द्रोणं च मधुसूदन ।
इषुभिः प्रतियोत्स्यामि पूजार्हा वरिसूदन ॥ ४ ॥
अर्जुनका प्रत्युत्तर—
देव सुनोजी इतना । कारण नहीं बोलना ।
अपनेमें ही सोचना । यह युद्ध है क्या ॥ ३० ॥
युद्ध नहीं यह अपराध । करना है कुलका उच्छेद ।
करना पडा यह प्रमाद । हमको यहां ॥ ३१ ॥
माता पिताका वंदन । देना उन्हे समाधान ।
छोड़ करना हनंन । उचित है क्या ॥ ३२ ॥
सन्त-वृंदका करे वंदन । हो सके तो करना पूजन ।
छोड़ सुनाना निंदा वचन । उचित है क्या ? ॥ ३३ ॥
हमारे कुल-गुरु ये ऐसे । वंदनीय हमें नियमसे ।
हमें पूज्य भीष्म द्रोण वैसे । सदा सर्वत्र ॥ ३४ ॥
जिनका वैर न करता है मन । स्वप्नमें भी यह असंभव जान ।
उनका करना प्रत्यक्ष हनन । कैसे देव ॥ ३५ ॥
रणमें मैं लडूं कैसे विरुद्ध भीष्म-द्रोणके
कैसे मारूं इन्हे बाण हमें ये पूजनीय हैं ॥४॥
३५ सांख्ययोग
अजी जलने दो ऐसा जीवन । सबका हुआ क्या अंतःकरण ।
वधमें क्या क्षात्रत्व- अभिमान । गुरुजनोंके ॥ ३६ ॥
पार्थका गुरु है यह द्रोण । दिया धनुर्विद्याका शिक्षण ।
है क्या उसकी यह दक्षिणा । वध करना ॥ ३७ ॥
जिसकी कृपासे मिला वर । उसीसे मनमें अभिचार ।
ऐसां बनुं क्या मैं भस्मासुर । कहता अर्जुन ॥ ३८ ॥
गुरुनहत्वा हि महानुभावान
श्रेयो भोक्तुं भैक्ष्यमपीह लोके ।
हत्वार्थकामांस्तु गुरुनिहैव
भुंजीय भोगान्रुधिरप्रदिग्धान ॥ ५ ॥
देख गंभीर होता सागर । वह भी है ऊपर ऊपर ।
न क्षोभता हृदय सागर । द्रोणका कभी ॥ ३९ ॥
अपार यह गगन । उसका भी होगा भान ।
अगाध अति गहन । है द्रोण हृदय ॥ ४० ॥
अमृत भी बिगडेगा । वज्र भी टूट जायेगा ।
किंतु दोष न आयेगा । इनके मनमें ॥ ४१ ॥
ममता होती है माताकी । ख्याति है इस बातकी ।
किंतु मूर्ति है ममताकी । द्रोणाचार्य ॥ ४२ ॥
ये हैं कारुण्यके आगर । सकल गुणोंके सागर ।
विद्या सिंधु हैं ये अपार । कहता पार्थ ॥ ४३ ॥
ऐसे हैं ये महान महत । हमसे हैं अति कृपावंत ।
अब कहो क्या करना घात । असंभव यह ॥ ४४ ॥
न मारके पूज्य आचार्य श्रेष्ठ
जीना भला है भिक्षान्नसे ही ।
हितेच्छुओंके वधसे ये भोग
किस भांति भोगें जो रक्त सिक्त ॥ ५ ॥
ज्ञानेश्वरी ३६
ऐसोंको रणमें मारना । फिर राज्य सुख भोगना ।
इसका विचार करना । हे असंभव ॥ ४५ ॥
दूभर है राज्य भोग भोगना । इंद्रपद भी ग्रहण करना ।
इससे अधिक भला है जीना । भिक्षान्नसे ही ॥ ४६ ॥
न तो देश-त्याग कर जाना । गिरी-कंदरामें जा बसना ।
करमें शस्त्र नहीं धरना । इनके सम्मुख ॥ ४७ ॥
पैने शस्त्रोंसे मर्म-स्थान । करना इनका भेदन ।
फिर इनके खूनमें सान । पाना भोगैश्वर्य ॥ ४८ ॥
रक्त-सिक्त वे ऐसे । भोग भोगना कैसे ।
न जंचे मुझे ऐसे । वचन तेरे ॥ ४९ ॥
दीन अर्जुनकी अनन्य शरणता—
उस समयमें अर्जुन । कहता है कृष्ण तू सुन ।
किंतु वह न देता कान । सुन करके भी ॥ ५० ॥
यह जानकर चौंका अर्जुन । फिरसे बोला अपना वचन ।
देता नहीं तू देव अवधान । मेरी बात पर ॥ ५१ ॥
न चैतद्विद्मः कतरन्नो गरीयो
यद्वा जयेम यदि वा नो जयेयुः ।
यानेव हत्वा न जिजीविषाम-
स्तेऽवस्थिताः प्रमुखे धार्तराष्ट्राः ॥ ६ ॥
जो विचार मेरे मनमें । बोला मैं वह इस स्थानमें ।
अब है भला जो करनेमें । जाने वह तू ही ॥ ५२ ॥
होगी हमारी जय या उन्हींकी
किसमें भलायी यही न जानूं ।
हत्यासे जिनके जीना न चाहूं
वही खडे हैं युद्धार्थ डटके ॥ ६ ॥
३७ सांख्ययोग
किंतु जिनसे बैर करना । मृत्यु सम है यह कल्पना ।
लेकर खडे युद्ध-भावना । वे इस रणमें ॥ ५३ ॥
अब क्या ऐसोंका वध करना । अथवा इन्हे छोड़कर जाना ।
इन दोनोंमें हमें क्या करना । यह हम न जानते ॥ ५४ ॥
कार्पण्य दोषोपहतस्वभावः
पृच्छामि त्वां धर्मसंमूढचेताः ।
यच्छ्रेयः स्यान्निश्चितं ब्रूहि तन्मे
शिष्यस्तेऽहं शाधि मां त्वां प्रपन्नम् ॥ ७ ॥
कौन बात करना यहां उचित । वह विचारही नहीं स्फुरित ।
इस मोहसे ग्रस्त है मम चित्त । अकुलाहटसे ॥ ५५ ॥
आंखों पर जब धुंद पडता । दृष्टिका तेज तब भ्रंश होता ।
पासका भी कछु नहीं दीखता । वस्तुमात्र ॥ ५६ ॥
मेरा ऐसा ही हुआ है । भ्रांतिने मन लीला है ।
निज-हित किसमें है । वही न दीखता ॥ ५७ ॥
देव ! विचार कर देखना । जिसमें हित है वह कहना ।
तू है प्रिय सखा ही अपना । तथा सर्वस्व ॥ ५८ ॥
जैसे तू गुरु बंधु पिता । तू हमारा इष्ट देवता ।
तू ही है रक्षण करता । सदा सर्वत्र ॥ ५९ ॥
कभी शिष्यका अनादर । न होता है गुरुके घर ।
जैसे सरिताको सागर । त्यजे कैसे ॥ ६० ॥
अथवा आपत्यको माता । छोड़ती कर निष्ठुरता ।
किसके बल वह जीता । कह तू कृष्ण ॥ ६१ ॥
दीनातासे नष्ट हुयी स्व-वृत्ति
घिरा मोहसे है स्वधर्म-ज्ञान ।
कैसे मेरा श्रेय होगा कहोजी
पगमें झुका हूं ले शिष्यभाव ॥ ७ ॥
ज्ञानेश्वरी ३८
सर्वोपरि तू हैं ईश वैसे । हमारा जीवनाधार जैसे ।
असहमत मेरी बातसे । अब जो कही थी ॥ ६२ ॥
तो करना क्या उचित । यहां है धर्म-सम्मत ।
कहो मुझे तू त्वरित । पुरुषोत्तम ॥ ६३ ॥
न हि प्रपश्यामि ममापनुद्यात्
यच्छोकमुच्छोषणमिंद्रियाणाम् ।
अवाप्य भूमावसपत्नमृद्धं
राज्यं सुराणामपि चाधिपत्यम् ॥ ८ ॥
हरि-कृपाका वर्णन—
देखकर यह कुल सकल । हृदय हुआ है शोक विव्हल ।
सुनकरके वह तेरे बोल । होगा शांत ॥ ६४ ॥
मिलेगा यह पृथ्वीतल । या महेंद्र पद सकल ।
मन है जो मोह विव्हल । शांत न होगा ॥ ६५ ॥
भूना हुआ बीज जैसे । अच्छे खेतमें बोनेसे ।
औ' खाद पानी देनेसे । नहीं अंकुरता ॥ ६६ ॥
यदि आयुष्य भरा हो किसीका । उपयोग न होता औषधका ।
वहां उपाय परमामृतका । एकमात्र ॥ ६७ ॥
वैसे राज्य-भोग समृद्धि । न दें संजीवन जीवबुद्धि ।
अनुग्रह ही है कृपानिधि । तव कारुण्यका ॥ ६८ ॥
ऐसा बोला है अर्जुन । जो था मोह-मुक्त क्षण ।
मोह-उर्मिसे तत्क्षण । हुआ व्याप्त ॥ ६९ ॥
यहां मिलेगा बिना शत्रु राज्य
वैसे ही इंद्रासन स्वर्गमें भी ।
तोभी न होगा यह शोक शांत
मेरे सभी इंद्रिय सोखता जो ॥ ८ ॥
३९ सांख्ययोग
मुझे लगता यह नहीं मो-लहर । यह है असंगत कोई अन्य प्रकार ।
इसपर पड़ा काल-सर्पका असर । महामोहकें ॥ ७० ॥
मर्म-स्थान जो हृदय कमल । उसपे कारुण्यका सम काल ।
दंश किया है महा-मोह व्याल । चढ़ता विष लहर ॥ ७१ ॥
इसके प्रभावको जानकर । जिसकी कृपादृष्टि ही उतार ।
दौड़ा है श्रीहरी करुणाकर । सपेरा बनके ॥ ७२ ॥
व्याकुल वह पांडुकुमार । समीप उसके जादूगर ।
रक्षा करेगा वह सत्वर । कृपा-लीलासे ॥ ७३ ॥
इसीलिये वह पार्थ । जो है मोहफणिग्रस्त ।
जानकर यह बात । कही मैंने ॥ ७४ ॥
वहां खड़ाथा धनुर्धर । मोहसे व्याकुल होकर ।
जैसे बादलोंमें भास्कर । निस्तेज होता ॥ ७५ ॥
वैसा खड़ा वह पांडुकुमार । दुःखावेगसे होकर जर्जर ।
जैसे ग्रीष्मकालमें गिरिवर । होता दावानल ग्रस्त ॥ ७६ ॥
इसलिये सहज सुनील । कृपामृतसे जो है सजल ।
अनुकूल हुआ श्रीगोपाल । महामेघ हो ॥ ७७ ॥
द्युति है वहां सुदर्शनकी । झलक वही विद्युल्लताकी ।
सजी हुई गंभीर वाणीकी । गर्जना-सी ॥ ७८ ॥
अब होगी वह वर्षा उदार । शांत होगा अर्जुन गिरिवर ।
फूटेगा ज्ञानका नव अंकुर । उसी स्थानपे ॥ ७९ ॥
सुनो यह कथा गहन । जिससे शांत होता मन ।
ज्ञानदेवका है बचन । जो निवृत्तिदास ॥ ८० ॥
संजय उवाच
एवमुक्त्वा हृषीकेशं गुडाकेशः परंतप ।
न योत्स्य इति गोविंदमुक्त्वा तूष्णीं बभूव ह ॥ ९ ॥
ऐसा अर्जुन जो वीर बोलके कृष्णसे यह
अंतमें मैं न जूझूंगा कहके शांत हो गया ॥ ९ ॥
ज्ञानेश्वरी ४०
अहंता छंदन—
संजय ऐसा बोला । राजा ! अर्जुन बोला ।
पुनः हो शोकाकुल । यह बात ॥ ८१ ॥
धनंजय बोला श्रीकृष्णसे । अब न कहो कुछ मुझसे ।
न लडूंगा सर्वथा इनसे । निश्चित यह ॥ ८२ ॥
ऐसा कहकर अर्जुन । बैठा रहा हो मौन ।
देख कर यह श्रीकृष्ण । हुआ चकित ॥ ८३ ॥
तमुवाच हृषीकेशः प्रहसन्निव भारत ।
सेनयोरुभयोर्मध्ये विषीदंतमिदं वचः ॥ १० ॥
फिर कहता मन ही मन । क्या करता है यह अर्जुन ।
न जानता यह अनजान । क्या करना अब ॥ ८४ ॥
अब होगा कैसे इसको ज्ञान । कैसे आयेगा धीरजका भान ।
करता है श्रीकृष्ण अनुमान । मांत्रिकसा ॥ ८५ ॥
अथवा देख असाध्य-व्याधी । अमृत सम दिव्य औषधि ।
योजता है वैद्य निरवधि । निदान करके ॥ ८६ ॥
करता श्रीहरि विवेचन । दोनों सेनाओंके मध्यस्थान ।
जिससे होगा मुक्त अर्जुन । महामोहसे ॥ ८७ ॥
उस निश्चित हेतुसे । हरिने कहा क्रोधसे ।
माताके क्रोधमें जैसे । रहता स्नेह ॥ ८८ ॥
औषधके तीतापनके अंदर । होता है जैसे अमृतका असर ।
वह गुण रूपसे ही निरंतर । दीखता वैसे ॥ ८९ ॥
वैसे ऊपरसे कठोर । अंदर जो अति मधुर ।
ऐसे वाक्य शार्गधर । बोला पार्थसे ॥ ९० ॥
पार्थसे यों हृषीकेश हंसके कहने लगे ।
खडा जो शोकमें डूबा वहीं उभयं सैन्यमें ॥ १० ॥
(6) ४१ सांख्ययोग
भगवान उवाच
अशोच्यानन्वशोचस्त्वं प्रज्ञावादांश्च भाषसे ।
गतासूनगतासूंश्च नानुशोचंति पंडिताः ॥ ११ ॥
फिर अर्जुनसे कहता है। हमने अचरज देखा है।
आज तुमने यहां किया है। मेरे समक्ष ॥ ९१ ॥
बनता बड़ा जानकार । न छोड़ता मूर्ख विचार ।
औ' कहता नीति विचार । सिखाना चाहुं ॥ ९२ ॥
जन्मांधका पागलपन । करता है जैसा थैमान ।
वैसा तेरा श्यानापन । दौडता चहूँ ओर ॥ ९३ ॥
अपनी बात न जानता । तो भी कौरवोंकी सोचता ।
देखकर विस्मय होता । मुझे अतिशय ॥ ९४ ॥
मुझे कह तू जरा अर्जुन । तुझपे है स्थित त्रिभुवन ।
अनादि यह विश्व-निर्माण । असत्य क्या ? ॥ ९५ ॥
सर्व समर्थ है यहां एक । उससे निर्माण होते लोक ।
कहना जगतका तू देख । व्यर्थ है क्या ? ॥ ९६ ॥
औ' ऐसा हुआ है क्या सांप्रत । जन्म मृत्यु तुझसे निर्मित ।
नाश होंगे ये तेरे ही हाथ । तेरे करनेसे ॥ ९७ ॥
भ्रमसे तू अहंकृति मानता । यदि इनका घात न करता ।
तो यह सैन्य क्या अमर होता । चिरजीवि-सा ॥ ९८ ॥
अथवा तू है एक घातक । तथा अन्य सभी हैं मृतक ।
चित्तमें ऐसा ही भ्रम एक । नहीं आने दे ॥ ९९ ॥
अनादि सिद्ध है यह पूर्ण । होना जाना स्वभाव कारण ।
सोचनेका तुझे क्या कारण । है इसमें ॥ १०० ॥
श्री भगवानने कहा
करता तू वृथा शोक कहता ज्ञान भी फिर ।
ज्ञानी न करता शोक गतागत विचारका ॥ ११ ॥
ज्ञानेश्वरी ४२
अज्ञानवश कुछ न जानता । जो सोचना वह नहीं सोचता ।
फिर भी बडी नीति है कहता । हमको ही ॥ १ ॥
होते हैं जो विवेकी । न सोचते दोनोंकी ।
आना जाना भ्रांतिकी । मानकर ॥२ ॥
न त्वेवाहं जातु नाऽऽसं न त्वं नेमे जनाधिपाः ।
न चैव न भविष्यामः सर्वे वयमतः परम् ॥ १२ ॥
आत्म लक्ष्य—
कहता हूं बात एक । यहां हम तुम देख ।
तथा भूपति अनेक । सारे जन ॥ ३ ॥
नित्य ऐसे ही रहेंगे । या निश्चित क्षय होंगे ।
यह भ्रांति छोड देंगे । दोनों व्यर्थ ॥ ४ ॥
यह जन्म तथा नाश । दीखता है भ्रमवश ।
तत्वतः है अविनाश । वह वस्तु ॥ ५ ॥
जैसे पवन जल हिलाता । उससे हिलोर जो उठता ।
उसको कहें क्या जनमता । कह तू पार्थ ॥ ६ ॥
वायुका वही स्फुरण गया । हिलोर भी वहां बैठगया ।
तब कहें क्या है मर गया । सोचकर देख ॥ ७ ॥
देहिनोऽस्मिन् यथा देहे कौमारं यौवनं जरा ।
तथा देहांतरप्राप्तिः धीरस्तत्र न मुह्यति ॥ १३ ॥
सुनो शरीर है एक । वयसे भेद अनेक ।
यह प्रत्यक्ष ही देख । प्रमाण तू ॥ ८ ॥
मैं तू तथैव ये राजे पहले थे सभी यहां ।
वैसे ही हम जो सारे होंगे भविष्यमें यहीं ॥ १२ ॥
देहीको देहमें आता बाल्य तारुण्य औ' जरा ।
वैसा ही है नया देह न डिगे धीर जो कभी ॥ १३ ॥
४३ सांख्ययोग
होता है प्रथम कौमार्य । बदलता उसे तारुण्य ।
उससे नहीं होता लय । शरीरका ॥ ९ ॥
इस चैतन्यके भी ऐसे । बदलते शरीर वैसे ।
जो यह जानता है उसे । न मोह न दुःख ॥ १० ॥
मात्रास्पर्शास्तु कौंतेय शीतोष्ण सुखदुःखदाः ।
आगमापायिनोऽनित्यास्तांस्तितिक्षस्व भारत ॥ १४ ॥
न जाननेका है यह कारण । जो है इंद्रियोंका आधीनपन ।
यह खींचता है अंतःकरण । इससे है भ्रम ॥ ११ ॥
इंद्रियां विषय सेवन करतीं । जिससे हर्ष शोक हैं उपजातीं ।
तथा अंतरंगको रस है देतीं । संसर्गसे अपने ॥ १२ ॥
विषयोंमें नहीं रहती । सदैव एकसी ही स्थिति ।
कभी दुःखकी है दीखती । कभी सुखकी ॥ १३ ॥
देखो है यह शब्दकी व्याप्ति । कहते हैं निंदा तथा स्तुति ।
उपजाते हर्ष शोक अति । श्रवणद्वारसे ॥ १४ ॥
मृदु और कठिन । स्पर्शके हैं दो गुण ।
त्वचा दे संग कारण । हर्ष शोक ॥ १५ ॥
सुरूप और कुरूप । रूपके हैं ये स्वरूप ।
नेत्रोंसे देते अमाप । सुख औ' दुःख ॥ १६ ॥
सुगंध औ' दुर्गंध । ये हैं गंधके भेद ।
दें विषाद औ' मोद । घ्राणके संग ॥ १७ ॥
ऐसा ही द्विविध रस । उपजाता प्रीति त्रास ।
तभी यह अपभ्रंश । विषय संगका ॥ १८ ॥
होनेसे इंद्रियोंके आधीन । भोगना शीत तथा उष्ण ।
जो हैं सुख दुखके कारण । अपनेको ॥ १९ ॥
शीतोष्ण विषय-स्पर्श फेंकते सुख दुःखमें ।
यही तू झेल ले सारा आते जाते अनित्य ये ॥ १४ ॥
ज्ञानेश्वरी ४४