ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअज्ञानवश कुछ न जानता । जो सोचना वह नहीं सोचता ।
फिर भी बडी नीति है कहता । हमको ही ॥ १ ॥
होते हैं जो विवेकी । न सोचते दोनोंकी ।
आना जाना भ्रांतिकी । मानकर ॥२ ॥
न त्वेवाहं जातु नाऽऽसं न त्वं नेमे जनाधिपाः ।
न चैव न भविष्यामः सर्वे वयमतः परम् ॥ १२ ॥
आत्म लक्ष्य—
कहता हूं बात एक । यहां हम तुम देख ।
तथा भूपति अनेक । सारे जन ॥ ३ ॥
नित्य ऐसे ही रहेंगे । या निश्चित क्षय होंगे ।
यह भ्रांति छोड देंगे । दोनों व्यर्थ ॥ ४ ॥
यह जन्म तथा नाश । दीखता है भ्रमवश ।
तत्वतः है अविनाश । वह वस्तु ॥ ५ ॥
जैसे पवन जल हिलाता । उससे हिलोर जो उठता ।
उसको कहें क्या जनमता । कह तू पार्थ ॥ ६ ॥
वायुका वही स्फुरण गया । हिलोर भी वहां बैठगया ।
तब कहें क्या है मर गया । सोचकर देख ॥ ७ ॥
देहिनोऽस्मिन् यथा देहे कौमारं यौवनं जरा ।
तथा देहांतरप्राप्तिः धीरस्तत्र न मुह्यति ॥ १३ ॥
सुनो शरीर है एक । वयसे भेद अनेक ।
यह प्रत्यक्ष ही देख । प्रमाण तू ॥ ८ ॥
मैं तू तथैव ये राजे पहले थे सभी यहां ।
वैसे ही हम जो सारे होंगे भविष्यमें यहीं ॥ १२ ॥
देहीको देहमें आता बाल्य तारुण्य औ' जरा ।
वैसा ही है नया देह न डिगे धीर जो कभी ॥ १३ ॥
४३ सांख्ययोग