ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभगवान उवाच
अशोच्यानन्वशोचस्त्वं प्रज्ञावादांश्च भाषसे ।
गतासूनगतासूंश्च नानुशोचंति पंडिताः ॥ ११ ॥
फिर अर्जुनसे कहता है। हमने अचरज देखा है।
आज तुमने यहां किया है। मेरे समक्ष ॥ ९१ ॥
बनता बड़ा जानकार । न छोड़ता मूर्ख विचार ।
औ' कहता नीति विचार । सिखाना चाहुं ॥ ९२ ॥
जन्मांधका पागलपन । करता है जैसा थैमान ।
वैसा तेरा श्यानापन । दौडता चहूँ ओर ॥ ९३ ॥
अपनी बात न जानता । तो भी कौरवोंकी सोचता ।
देखकर विस्मय होता । मुझे अतिशय ॥ ९४ ॥
मुझे कह तू जरा अर्जुन । तुझपे है स्थित त्रिभुवन ।
अनादि यह विश्व-निर्माण । असत्य क्या ? ॥ ९५ ॥
सर्व समर्थ है यहां एक । उससे निर्माण होते लोक ।
कहना जगतका तू देख । व्यर्थ है क्या ? ॥ ९६ ॥
औ' ऐसा हुआ है क्या सांप्रत । जन्म मृत्यु तुझसे निर्मित ।
नाश होंगे ये तेरे ही हाथ । तेरे करनेसे ॥ ९७ ॥
भ्रमसे तू अहंकृति मानता । यदि इनका घात न करता ।
तो यह सैन्य क्या अमर होता । चिरजीवि-सा ॥ ९८ ॥
अथवा तू है एक घातक । तथा अन्य सभी हैं मृतक ।
चित्तमें ऐसा ही भ्रम एक । नहीं आने दे ॥ ९९ ॥
अनादि सिद्ध है यह पूर्ण । होना जाना स्वभाव कारण ।
सोचनेका तुझे क्या कारण । है इसमें ॥ १०० ॥
श्री भगवानने कहा
करता तू वृथा शोक कहता ज्ञान भी फिर ।
ज्ञानी न करता शोक गतागत विचारका ॥ ११ ॥
ज्ञानेश्वरी ४२