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ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

DevanagariMarathipublished1,172 पृष्ठ

तथा कूरा अथवा चंदन । नहीं करता अग्नि भक्षण ।
तब तक रहते हैं भिन्न । इस प्रकार ॥ ५३ ॥
पांच अथवा षोड़श । तब तक होता कस ।
जब तक है पारस । नहीं छूता ॥ ५४ ॥
ऐसे हैं यह शुभाशुभ । रहता है भरतर्षभ ।
जब तक न होता लाभ । मेरे प्रकाशका ॥ ५५ ॥
अजी ! रात्र और दिव । तब तक द्वैत भाव ।
जब तक है अभाव । सूर्यका जहां ॥ ५६ ॥
इसीलिये होते ही मेरी भेट । उसके सभी कर्म हैं सुभट ।
मिट कर मिल जाता है पाट । मेरे सायुज्यका ॥ ५७ ॥
देश काल तथा स्वभाव । जिसका नाश न संभव ।
ऐसा पद वह पांडव । पाता अविनाशी ॥ ५८ ॥
अथवा मानो पांडुसुता । आत्माकी मेरी प्रसन्नता ।
अलंकार उसे मिलता । इससे बड़ा क्या लाभ ॥ ५९ ॥
चेतसा सर्वकर्माणि मयि संन्यस्य मत्परः ।
बुद्धियोगमुपाश्रित्य मच्चित्तः सततं भव ॥ ५७ ॥
समर्पणका रहस्य—
इसीलिये हे अर्जुन । सभी कर्म समर्पण ।
कर तू अपने जान । मेरे स्वरूपमें ॥ १२६० ॥
वह समर्पण धनुर्धर । कृत्रिम रूपसे तू न कर ।
आत्म-विवेकसे धरकर । कर तू चित्तवृत्तिको ॥ ६१ ॥
फिर वह विवेक बल । सभी कर्ममें जो निराला ।
मेरे रूपमें ही निर्मल । देखेगा तू ॥ ६२ ॥
मुझ मत्पर वृत्तीसे सौंपके कर्म जो सब ।
समत्वमें स्थिरतासे मुझमें चित्त तू रख ॥ ५७ ॥
८२१ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-योग

तथा कर्मका जन्म-स्थान । मेरी प्रकृति जो अर्जुन ।
करेगा उसका दर्शन । अपनेसे दूर ॥ ६३ ॥
अपनेसे प्रकृति भिन्न । नहीं रहती है अर्जुन ।
करेगा उसका दर्शन । अपनेसे दूर ॥ ६४ ॥
इससे प्रकृतिका नाश । होकरके कर्म-संन्यास ।
उत्पन्न होगा अनायास । सकारण ॥ ६५ ॥
मिटकर सब कर्म-जात । आत्मा मात्र मैं रहता पार्थ ।
उसमें बुद्धिको तू व्रतस्थ । करके रख ॥ ६६ ॥
बुद्धि है जो अनन्ययोगसे । मुझमें पैठ जायेगी ऐसे ।
तब अन्य विषय त्यागसे । मुझेही भजेगा चित्त ॥ ६७ ॥
तज कर विषय जात । चित्त हुवा मुझमें रत ।
चिंतन करेगा सतत । मेरा ही वह ॥ ६८ ॥
मच्चित्तः सर्वदुर्गाणि मत्प्रसादात्तरिष्यसि ।
अथ चेत्त्वमहंकारान्न श्रोष्यसि विनंक्ष्यसि ॥ ५८ ॥
इस सेवासे जब अभिन्न । भरेगा चित्त मुझसे जान ।
मेरा प्रसाद हुवा संपूर्ण । जान तू यह ॥ ६९ ॥
वह सकल दुःख धाम । भोगे जाते जो मृत्यु जन्म ।
दुर्गम वे सब सुगम । होंगे तुझे ॥ १२७० ॥
सूर्य-सहायका जो आश्रय । आंखोंको मिलता धनंजय ।
रहा क्या वहां तमका भय । कह तू मुझे ॥ ७१ ॥
वैसे ही है प्रसाद मेरा अर्जुन । करता जीवदशा उपमर्दन ।
उसे कैसे संसारका हौवा जान । डरायेगा कभी ॥ ७२ ॥
इसीलिये हे पार्थ । संसारका जो गर्त ।
तरेगा तू निश्चित । मेरी कृपासे ॥ ७३ ॥
सभी दुःख तभी मेरी कृपासे तर जायगा ।
नाश निश्चित पायगा न मान यह मानसे ॥ ५८ ॥
ज्ञानेश्वरी ८२२

अथवा तू साभिमान । मेरा सब ये कथन ।
रखेगा सीमापे जान । कान मनकी ॥ ७४ ॥
यदि तू है नित्य मुक्त अव्यय । व्यर्थ होकर वह धनंजय ।
देहाहंकारका आघात भय । होगा तुझको ॥ ७५ ॥
जिस देह संबंधमें पार्थ । प्रति पगमें है आत्मघात ।
भोगनेमें होगा सदा श्रांत । शांति न मिलेगी ॥ ७६ ॥
इस बोलका तू धनुर्धर । नहीं करेगा यदि विचार ।
मृत्यु न होके भी भयंकर । पायेगा मृत्यु ॥ ७७ ॥
यदहंकारमाश्रित्य न योत्स्य इति मन्यसे ।
मिथ्यैष व्यवसायस्ते प्रकृतिस्त्वां नियोक्ष्यति ॥ ५९ ॥
पथ्य-द्वेषी पोसता है ज्वर । या दीप-द्वेषीको अंधःकार ।
विवेक-द्वेषसे अहंकार । पोसता वैसे ॥ ७८ ॥
स्वदेहका नाम अर्जुन । पर देहका नाम स्वजन ।
संग्रामका नाम मलिन । पापाचार ॥ ७९ ॥
ऐसी अपनी मति अर्जुन । तीनोंको नाम देकर तीन ।
मै न लडूंगा ऐसा वचन । कहती है जो ॥ १२८० ॥
मनमें ऐसा निश्चय एक । करेगा यदि तू आत्यंतिक ।
कार्य करेगा सो नैसर्गिक । स्वभाव तेरा ॥ ८१ ॥
तथा मैं अर्जुन ये आत्मिक । इनको मारना है पातक ।
यह है जान भ्रम-मूलक । है तत्वहीन ॥ ८२ ॥
पहले होता है तू लडाका । तथा फिर शस्त्र उठानेका ।
फिर कहता न लड़नेका । विचार अपना ॥ ८३ ॥
इसीलिये नहीं जूझना । व्यर्थ है तेरा जो कहना ।
लौकिक दृष्टिसे भी जान । तो भी व्यर्थे ॥ ८४ ॥
कहेगा न लडूंगा मैं वश हो अहंकारके ।
यह निश्चय है पार्थ करायेगा स्वभाव जो ॥ ५९ ॥
८२३ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-योग

तब जो तू मैं न लडूंगा। ऐसे ही निश्चय करेगा ।
तो भी वह व्यर्थ करेगा । स्वभाव तेरा ॥ ८५ ॥
स्वभावजेन कौन्तेय निबद्धः स्वेन कर्मणा ।
कर्तुं नेच्छसि यन्मोहात्करिष्यस्यवशोऽपि तत् ॥ ६० ॥
सभी स्वभावके आधीन हैं—
प्राचीकी ओर जो प्रवाह बहता । उसमें उलटा ही कोई तैरता ।
उसका हठ अवश्य ही रहता । पानी खींचता ओघमेंही ॥ ८६ ॥
या कहेगा चावलका दाना । न उगूंगा मैं चावल बना ।
उसका स्वभाव बदलना । शक्य है क्या ॥ ८७ ॥
वैसे ही क्षात्र-संस्कार सिद्ध । प्रकृतिने बनाया प्रबुद्ध ।
कहता युद्ध मुझे निषिद्ध । करायेगा वही ॥ ८८ ॥
शौर्य तेज और दक्षता । इत्यादिक जो पांडुसुता ।
दिये हैं गुणोंको जन्मता । प्रकृतिने तुझे ॥ ८९ ॥
तब क्षात्र-गुणानुरूप । युद्ध करना मान पाप ।
युद्धसे रहना निर्लेप । तुझे असंभव ॥ १२९० ॥
क्षात्र-गुणोंसे तू अर्जुन । बंधा है स्वभावसे जान ।
क्षात्र-प्रवाहमें पतन । होगा ही तेरा ॥ ९१ ॥
अपना जो यह जन्म-मूल । न विचार कर तू केवल ।
न लडेगा इसपे अचल । व्रत लेगा ॥ ९२ ॥
जैसे बांध कर हाथ पाय । किसीको रथमें डाला जाय ।
न चलके भी वह निश्चय । पहुंचेगा दिगंतमें ॥ ९३ ॥
कुछ भी न करूंगा मैं ऐसे । कह कर अपनी ओरसे ।
रहेगा तू यदि निश्चयसे । लड़ेगा ही ॥ ९४ ॥
अपने ही स्वकर्मोंसे बंधा है तू स्वभाविक ।
टालना चाहता जो है करेगा तू अवश्यश ही ॥ ६० ॥
ज्ञानेश्वरी ५२४

विराट राज-पुत्र उत्तर । भागा रण-भूमि छोड़कर ।
तब लड़ा तू ही धनुर्धर । इसी स्वभावसे ॥ ९५ ॥
महावीर जो ग्यारह अक्षोहिणी । हराये अकेलेने कोदंडपाणी ।
वही स्वभाव यहां तुझे सेनानी । बनायेगा निश्चित ॥ ९६ ॥
रोगीको कभी क्या रोग भाता । या दरिद्रीको दारिद्य भाता ।
किंतु जो प्रारब्ध है भोगाता । अति बलवान ॥ ९७ ॥
वह अदृष्ट जो है मित्र । कराता है ईश्वराधीन ।
वह ईश भी है अर्जुन । हृदयमें तेरे ॥ ९८ ॥
ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति ।
भ्रामयन्सर्वभूतानि यंत्रारूढानि मायया ॥ ६१ ॥
सबमें व्याप्त ईश्वर अपनी मायासे विश्व चलाता रहता है—
अंतरमें सब भूतोंके । महा नभमें हृदयके ।
सहस्रकर चिद्वृत्तिके । होता है उदय ॥ ९९ ॥
अवस्थात्रय तीनों लोक । प्रकाश करके अशेष ।
अन्यथा दृष्टिके पांथिक । जगाते हैं जो ॥ १३०० ॥
देहोदकके सरोवरमें । खिले जो विषय कमलमें ।
जीव षट्पदसे जीवनमें । चराता है वह ॥ १ ॥
रहने दे रूपक जो ईश्वर । सकल भूतोंका है अहंकार ।
अपने सिरपे ले निरंतर । प्रकटता है ॥ २ ॥
अपनी मायाका जो आड वस्त्र । लगाके अकेला चलता सूत्र ।
बाद नटते रहते चित्र । चौरासी लाख ॥ ३ ॥
ब्रह्मादिसे कीटांत । अशेष भूतजात ।
देख योग्यता पार्थ । दिलाता देह ॥ ४ ॥
रहा है सब भूतोंके हृदयमें परमेश्वर ।
मायासे ही चलाता जो यंत्रोंपर चढा कर ॥ ६१ ॥
८२५ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-योग

तब जो शरीरका आकार । सम्मुख आया है देखकर ।
तदनुरूप ही ओढ कर । कहता मैं यह ॥ ५ ॥
सूतसे सूत लपेटा जाता । या घाससे घास बांधा जाता ।
जल बिंबको आप मानता । बालक जैसे ॥ ६ ॥
उसी भांति देहका आकार । आप ही दूसरा मानकर ।
देहको आत्मा समझकर । होता प्रकट ॥ ७ ॥
ऐसे हैं ये शरीराकार । यंत्रमें भूत धनुर्धर ।
डालकर हिलाता डोर । प्रारब्धका जो ॥ ८ ॥
उसका वहां जो कर्मसूत्र । बांधकर रखा है स्वतंत्र ।
वह उसके गतिका पात्र । होता है सदा ॥ ९ ॥
क्या कहूं मैं तुझे धनुर्धर । उडाता रहता निरंतर ।
गगनमें तिनके समीर । वैसे भूतोंको है यह ॥ १३१० ॥
जैसे चुंबकके साथ । भ्रमता है लोह नित ।
वैसे चलते हैं भूत । ईश्वराज्ञासे ॥ ११ ॥
जैसे अपनी चेष्टा पार्थ । करते समुद्रादि नित ।
चंद्र-सांनिध्यके साथ । उसी प्रकार ॥ १२ ॥
उससे सागर उछलता । सोमकांतमणि पसीजता ।
कुमुद चकोरका मिटता । सभी संकोच ॥ १३ ॥
वैसे बीज प्रकृति वश । अनेक भूत एक ईश ।
चलता रहता अशेष । तेरे हृदयमें ॥ १४ ॥
अर्जुनपन नहीं लेकर । 'मैं' ऐसे स्फुरता निरंतर ।
वही है तत्वता धनुर्धर । उसका रूप ॥ १५ ॥
इसीलिये करना प्रवृत्त । जान तू प्रवृत्तिको सतत ।
निश्चित ही लड़ायेगी पार्थ । तुझको यह ॥ १६ ॥
इसीलिये स्वामी है यह ईश्वर । उसीकी चलती है प्रकृति पर ।
वह करा लेती सब धनुर्धर । इंद्रियोंसे कार्य ॥ १७ ॥
ज्ञानेश्वरी ८२६

करना या न करना पार्थ । प्रकृतिके सिरपे दे नित ।
वह प्रकृति है आधीनस्थ । जिस हृदयस्थके ॥ १८ ॥
तमेव शरणं गच्छ सर्वभावेन भारत ।
तत्प्रसादात्परां शांतिं स्थानं प्राप्स्यसि शाश्वतम् ॥ ६२ ॥
ईश्वर शरणता ही शांतिका एकमेव साधन है—
अहं वाचा तन मन । देकर जा तू शरण ।
जाती है गंगा अर्जुन । सागरमें जैसे ॥ १९ ॥
फिर उसके प्रसादसे । सर्वोपशांति-प्रमदासे ।
कांत होकर स्वानंदसे । रमेगा स्वरूपमें ॥ १३२० ॥
उत्पत्ति होती जहांसे उत्पन्न । विश्रांतिका जहां विश्रांति-स्थान ।
अनुभूति बोध लेती अर्जुन । अनुभवका जहां ॥ २१ ॥
उस निजात्मपदका राय । होकर रहेगा तू अव्यय ।
सुनता है यहां धनंजय । कहता श्रीहरि ॥ २२ ॥
इति ते ज्ञानमाख्यातं गुह्याद्गुह्यतरं मया ।
विमृश्यैतदशेषेण यथेच्छसि तथा कुरु ॥ ६३ ॥
गीता नामसे यह विख्यात । सभी वाङ्मयका जो मथित ।
जिससे होता है हस्तगत । आत्म-रत्न ॥ २३ ॥
वेदांतमें इसको ज्ञान । ऐसा नाम दिया महान ।
इससे सदा यशोगान । हुवा वेदांतका ॥ २४ ॥
बुद्ध्यादिक जो ज्ञानवान । इसीसे है प्रकाशमान ।
“मैं” सर्व द्रष्टाका दर्शन । होता है इससे ॥ २५ ॥
उसीकी ओटमें जा तू पायेगा सर्व भावसे ।
कृपासे उसकी श्रेष्ठ शांतिका स्थान शाश्वत ॥ ६२ ॥
ऐसा जो गूढसे गूढ कहा ज्ञान तुझे अब ।
सोचके यह सारा तू स्वेच्छासे योग्य जो कर ॥ ६३ ॥
८२७ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-योग

यह है वह आत्मज्ञान । मेरा गुह्यसे गुह्य धन ।
तुझसे कैसे मैं वंचन । करूं सखासे ॥ २६ ॥
इस कारणसे है अर्जुन । दिया अपना गुप्त निधान ।
तुझसे होकर सकरुण । हमने यहां ॥ २७ ॥
ममतासे भूलकर पार्थ । माता बोलती अ-यथार्थ ।
तुझसे भी हम इस अर्थ । बोलते हैं सदा ॥ २८ ॥
जैसे आकाशको भी छानना । तथा अमृतको भी छीलना ।
अथवा दियासे कराना । दिव्य जैसे ॥ २९ ॥
जिसका शरीर है प्रकाशन । करता पातालका अणु जान ।
उस सूर्यकी आंखोंमें अंजन । लगाना कैसे ॥ १३३० ॥
ऐसे मैं सर्वज्ञ अर्जुन । विचारसे कर मंथन ।
सबसे यह भला जान । कहा तुझसे ॥ ३१ ॥
तू ही अब इस पर । कर अपना निर्धार ।
निर्धारके बाद फिर । कर जो योग्य ॥ ३२ ॥
यह सुनकर धनंजय । स्वस्थ हो रहा उस समय ।
तब कहे देव हो सदय । भला तू अवंचक ॥ ३३ ॥
भोजनमें बैठा क्षुधित । कहकर हुवा मैं तृप्त ।
होता आप क्षुधा पीडित । तथा मिथ्याचारी ॥ ३४ ॥
वैसे मिला सर्वज्ञ श्रीगुरु । करानेमें जो आत्म-निर्धार ।
नहीं पूछता मान आभार । मनमें उसके ॥ ३५ ॥
तब तो अपनेको ही फंसाता । तथा अपनी ही वंचना करता
और अपने आप है दूर जाता । सत्य-स्वरूपसे ॥ ३६ ॥
तेरे मौनमें जो है अर्जुन । भेद जानता है मेरा मन ।
सुनना है फिर वह ज्ञान । अल्पमें एक बार ॥ ३७ ॥
कहता तब वह धनुर्धर । जानता देव तू मेरा अंतर ।
ऐसे कौन है जानेगा दूसरा । मेरा हृदय ॥ ३८ ॥
ज्ञानेश्वरी ८२८

यह ज्ञेय जो यहां संपूर्ण । इसका ज्ञाता तू एक जान ।
सूर्य ऐसे सबका वर्णन । करना क्या फिर ॥ ३९ ॥
सुनके यह श्रीकृष्ण । बोलता है तू अर्जुन ।
है क्या हमारा वर्णन । यह अल्प ॥ १३४० ॥
सर्वगुह्यतमं भूयः शृणु मे परमं वचः ।
इष्टोऽसि मे दृढमिति ततो वक्ष्यामि ते हितम् ॥ ६४ ॥
अनन्य भक्तसे कहा गया हृदयका गूढ—
एकाग्र कर संपूर्ण ध्यान । फिरसे यह बात तू सुन ।
मेरा वचन यह अर्जुन । जो अति निर्मल ॥ ४१ ॥
वाच्य है इसीलिये बोलना । या श्रव्य है इसीलिये सुनना ।
ऐसे नहीं तो तेरा अर्जुना । भला है भाग्य ॥ ४२ ॥
नहीं होती है कभी दृष्टि प्रेमार्द्र । पिल्लोंको कूर्माकी दृष्टि है प्रेमार्द्र ।
वैसे ही होता आकाश भी प्रेमार्द्र । चातकके लिये ॥ ४३ ॥
जहां जो व्यवहार नहीं होता । उसका फल भी तब मिलता ।
जब दैव अनुकूल हो जाता । उस समय ॥ ४४ ॥
वैसे जो द्वैतका आना जाना । रोकके ऐक्य-घरमें जाना ।
तथा वहांका सुख भोगना । जो है रहस्य ॥ ४५ ॥
तथा जो निरुपचार प्रेम । विषय होता है प्रियोत्तम ।
दूसरा नहीं होकर आत्म । जानना यह ॥ ४६ ॥
देखनेके लिये दर्पण । पोंछना स्वच्छ जो अर्जुन ।
अपने लिये होता जान । उसके लिये नहीं ॥ ४७ ॥
तेरे लिये अब मैं पार्थ । बोलता अपने ही साथ ।
मैं तू यह भेद यथार्थ । नहीं हममें ॥ ४८ ॥
गूढ जो सब गूढोंका फिरसे वाक्य उत्तम ।
हितार्थ कहता तेरे होगा तू सुन मप्रिय ॥ ६४ ॥
८२९ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-योग

इसीलिये यह हृदयका गुह्य । कहता मैं जीवसे ही धनंजय ।
अनन्यगति भक्तसे कैसे सह्य । रखना यह गूढ ॥ ४९ ॥
जलको सर्वस्व देता अपना । नून नहीं रहता तब भिन्न ।
तथा देनेमें सर्वस्व अं न । लजाता भी नहीं ॥ १३५० ॥
वैसे तू मुझमें अपना । न रखता द्वैत अर्जुन ।
तब तुझसे है छिपाना । रहा क्या गूढ ॥ ५१ ॥
इसीलिये गूढ जो संपूर्ण । खुलता है जिससे अर्जुन ।
यह शुद्ध गोप्य जो वचन । सुन तू अब ॥ ५२ ॥
मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु ।
मामेवैष्यसि सत्यं ते प्रतिजाने प्रियोऽसि मे ॥ ६५ ॥
तब तू बाह्य और अंतर । अपने अन्य सभी व्यापार ।
मुझ व्यापकके धनुर्धर । कर विषय ॥ ५३ ॥
सर्वेंद्रिय मन वचन प्राणसे मुझमें लीन हो—
अथवा सर्वांगसे जैसे । वायु मिला है आकाशसे ।
सब कर्ममें तू भी वैसे । मुझसे मिल ॥ ५४ ॥
मानो तू अपना मन । कर मेरा ही सदन ।
मेरे श्रवणसे कान । भरे निरंतर ॥ ५५ ॥
आत्म-ज्ञानमें शुद्ध सिद्ध । रहते जो संत प्रसिद्ध ।
वहां हो तेरी दृष्टि बद्ध । कामुकोंकी सी ॥ ५६ ॥
सब विश्वका मैं वसतिस्थान । उस मेरे नाम जो अर्जुन ।
उसको अंतःकरणमें स्थान । दे तू वाचासे ॥ ५७ ॥
हाथोंका जो है करना । तथा पैरोंका चलना ।
यह ही मेरे कारण । ऐसे कर तू ॥ ५८ ॥
प्रेमसे करके ध्यान भज तू पूज तू मुझे ।
होगा तू मुझमें लीन प्रिय जो जान सत्य है ॥ ६५ ॥
ज्ञानेश्वरी ८३०

अपना अथवा पराया । उपकारमें धनंजय ।
कर तू योग्य उपाय । हो मेरा याज्ञिक ॥ ५९ ॥
एकेक क्या है यह सिखाना । अपनेमें पूजा भाव लाना ।
विश्व मद्रूप मान करना । पूजा सुखसे ॥ १३६० ॥
तब सब भूत-द्वेष मिटकर । करेगा मुझ एकको नमस्कार ।
इससे मेरा आश्रय धनुर्धर । पायेगा निश्चित ॥ ६१ ॥
तब इस विश्वमें भी फिर । तीसरेकी बात मिटकर ।
मेरा तेरा एकांत धनुर्धर । रहेगा केवल ॥ ६२ ॥
तब सभी अवस्थामें । मैं तुझमें तू मुझमें ।
भोग करेगा मोदमें । बढेगा सुख ॥ ६३ ॥
तब यहां जो प्रतिबंध करना । तीसरा जग सब मिट ही जाना ।
फिर है मेरा ही अनुभव आना । शेष जो मैं हूं ॥ ६४ ॥
जैसे जलकी जो प्रतिभा । जल नाशके होगी बिंब ।
होनेमें रहता विलंब । किसका वहां ॥ ६५ ॥
पवन तथा अंबर । या कल्लोल औ' सागर ।
मिलनेमें धनुर्धर । रोक है कैसे ॥ ६६ ॥
वैसे तू और मैं हम । दिखाते हैं देह-धर्म ।
फिर इसका विराम । मुझमें ही है ॥ ६७ ॥
इस मेरे बोलनेमें । शंका न कर मनमें ।
अन्यथा नहीं इसमें । तेरी सौगंध ॥ ६८ ॥
जैसे तेरी सौगंध लेना । मानो है अपनी ही लेना ।
प्रीति जातिको है लजाना । आता ही नहीं ॥ ६९ ॥
वेद कहता है निष्प्रपंच । जिससे विश्वाभास है सच ।
उसकी आज्ञाका नट-नाच । कालको जीतना ॥ १३७० ॥
यदि मैं देख सत्य-संकल्प । तथा विश्व-हितकर्ता बाप ।
तब मैं सौगंधका आक्षेप । करता ही क्यों ॥ ७१ ॥
८३१ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-योग

किंतु है तेरे ही कारण । देवत्व छोड़ा है अर्जुन ।
तथा रहा हूं मैं अपूर्ण । और पूर्ण हुवा तू ॥ ७२ ॥
राजा जैसे अपने कार्यार्थ । अपनी सौगंध देता पार्थ ।
वैसे मैं अपनी शपथ । लेता हूं अब ॥ ७३ ॥
इस पर कहता है पार्थ । देव ऐसे न बोल बहुत ।
तेरे नामसे होते समस्त । कार्य हमारे ॥ ७४ ॥
इतने परभी कहने बैठता । कहनेमें सौगंध भी तू दिलाता ।
इसभांति तेरा विनोद अनंता । असीम है देव ॥ ७५ ॥
जैसे कमलका विकास । करना रविका एकांश ।
किंतु देता पूर्ण प्रकाश । नित्य ही वह ॥ ७६ ॥
पृथ्वीको शांत करके सागर । भरते जितना वर्षता नीर ।
किंतु दिखा करके शाईंधर । बहाना चातकका ॥ ७७ ॥
इसभांति है यह तेरा औदार्य । मुझे निमित्त बनाके देवराय ।
विश्व-हितार्थ देता तू दयामय । यह ज्ञान-दान ॥ ७८ ॥
देव कहते रहने दे अर्जुन । न करना ऐसे हमारा वर्णन ।
इस उपायसे पायेगा तू जान । मत्स्वरूपको ही ॥ ७९ ॥
सैंधव जब सिंधुमें पड़ता । उसी क्षण पिघलने लगता ।
उसको कौन कारण रहता । अलग रहनेका ॥ १३८० ॥
सर्वत्र भजनेसे मुझे ऐसे । तत्वतः सब ही मैं हो जानेसे ।
अहंता सब नष्ट हो जानेसे । होता है मद्रूप ॥ ८१ ॥
इस भांति तुझे कर्मसे । मद्रूप होने तक ऐसे ।
साधना प्रकार जो ऐसे । बताये सारे ॥ ८२ ॥
कर्म सारे मुझको अर्जुन । करनेसे सदा समर्पण ।
मिलेगी मेरी वृत्ति प्रसन्न । तुझको सदैव ॥ ८३ ॥
मिलनेसे मेरा यह प्रसाद । तुझको होगा मेरा ज्ञान सिद्ध ।
तब समरस होगा विशुद्ध । मद्रूपमें तू ॥ ८४ ॥
ज्ञानेश्वरी ८३२

ऐसी स्थितिमें तुझको तब । न रहेगा साध्य साधने सब ।
करनेका रहता क्या तब । कह तू मुझको ॥ ८५ ॥
अपने सभी कर्मोंको अर्जुन । करनेसे मुझे सदा अर्पण ।
मिली है तुझे यह प्रसन्न । वृत्ति मेरी ॥ ८६ ॥
इसी लिये यह मेरा प्रसाद । तोडकर बुद्धिका प्रतिबंध ।
देता है तुझे यहां आत्मबोध । ऐसे पगलाके मैं ॥ ८७ ॥
इससे स-प्रपंच अज्ञान जाता । एक ही एक मैं दीखता रहता ।
विविध रूपसे तुझे यहां पार्था । यह है गीता-तत्व ॥ ८८ ॥
तुझको अब यह मेरा अपना । विविध रूपसे दिया है जो ज्ञान ।
जिससे तजेगा तू सब अज्ञान । मूल जो धर्माधर्मका ॥ ८९ ॥
सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज ।
अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः ॥ ६६ ॥
शरणागतिका विवेचन—
आशासे जैसे दुःख जन्मता । निंदासे दुरित प्रसक्ता ।
वैसे जन्म लेती है दीनता । दुर्भाग्यसे ही ॥ १३९० ॥
वैसे स्वर्ग-नरक सूचक । जन्मता अज्ञान धर्मादिक ।
तभी तू वह कर निःशेष । ज्ञानसे सदैव ॥ ९१ ॥
करमें डोर उठाकर । छोड़ दे वह सर्पाकार ।
या निद्रा-त्यागसे संसार- । स्वप्नका वैसे ॥ ९२ ॥
अथवा जाने पर कामला । जाता है चंद्र प्रकाश पीला ।
व्याधि त्यागसे कडुवा भला । जाता है मुखका ॥ ९३ ॥
अथवा दिवसका त्याग करनेसे । मिटता मृगजल अपने आपसे ।
अथवा है जैसे लकडीके त्यागसे । तजता अग्नि ॥ ९४ ॥
सारे ही छोडके धर्म मेरा आश्रय तू कर ।
जलाऊंगा सभी पाप तेरा मैं शोक ना कर ॥ ६६ ॥
(92) ८३३ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-योय

वैसे धर्माधर्म जो सकल । दिखाता है अज्ञान है मूल ।
तजके वह त्यागो सकल । धर्मजात ॥ ९५ ॥
मिट जाता जब अज्ञान । सहज रहता मैं ही जान ।
जानेसे जैसे स-नींद स्वप्न । रहता है आप ॥ ९६ ॥
वैसे मैं एकके बिन नहीं । भिन्नाभिन्न कुछ भी कहीं ।
सोऽहं-बोधसे हो उसमें ही । अनन्य सदैव ॥ ९७ ॥
किंतु है उनसे भेद बिन । मेरा ही जानना एकपन ।
उसका ही नाम है शरण । आना मेरी ॥ ९८ ॥
जैसे घटका होनेसे नाश । गगनमें गगन प्रवेश ।
इस भांति होता समरस । आनेसे शरण ॥ ९९ ॥
स्वर्ण-मणि जैसे स्वर्णमें । या कल्लोल जैसे पानीमें ।
वैसे अर्जुन तू मुझमें । पा ले आश्रय ॥ १४०० ॥
भिन्न अस्तित्व रखकर शरणागतिका विवेचन—
अथवा समुद्रके उदरमें जैसे । वडवानल आश्रय पाता है वैसे ।
सिंधुको वह जलाके सुखाता वैसे । तज दे वह ॥ १ ॥
मेरे ही शरणमें आना । जीवत्वसे भिन्न रहना ।
निर्लज्ज है ऐसे बोलना । ऐसी वह प्रज्ञा ॥ २ ॥
सहज ही करता है धनुर्धर । कोई राजा जब दासीका स्वीकार ।
वह दासी भी समान स्तरपर । आती है वैसे ॥ ३ ॥
अजी ! विश्वेश्वर मैं भेटता । तथा जीव बंध न छूटता ।
ऐसी यह अमंगल वार्ता । न सुनना कभी ॥ ४ ॥
मद्रूप हो मुझसे मिलना । भक्ति मेरी ऐसी ही करना ।
ऐसी भक्ति देता है जो ज्ञान । उसको कर प्राप्त ॥ ५ ॥
जिस मट्ठेसे निकाला नवनीत । फिरसे उसीमें डाला वह पार्थ ।
फिर कभी उसमें नहीं मिलता । उसी प्रकार ॥ ६ ॥
ज्ञानेश्वरी ८३४

लोहेपे जंग सहज चढ़ता । किंतु उसे जब परिस छूता ।
सुवर्णपे कभी नहीं चढ़ता । जंग अर्जुन ॥ ७ ॥
जाने दे काष्ठोंका कर मंथन । करने पर अग्निको उत्पन्न ।
उसी काष्ठमें कहो अग्नि कण । समाता क्या कभी ॥ ८ ॥
अभिन्न शरणागतिसे सभी मैं हो जाता हूँ—
ऐसे अद्वयत्वमें मुझ । शरण आनेसे है तुझ ।
धर्माधर्म जो है सहज । नहीं छूएंगे ॥ ९ ॥
कभी क्या कह तू दिनकर । देखता है क्या कहीं अंधार ।
जागृतिमें होगा क्या गोचर । कभी स्वप्न ॥ १४१० ॥
वैसे मुझमें होनेसे मिलन । मेरी सर्व-व्यापकतासे भिन्न ।
रहनेका क्या रहा कारण । कह तू मुझे ॥ ११ ॥
इसलिये उसकी नहीं । चिंता व्यर्थ करना कहीं ।
तेरे पाप पुण्यका मैं ही । बनूंगा सारा ॥ १२ ॥
जलमें गिरा हुवा लवण । सब ही जल होता अर्जुन ।
बनूंगा मैं अनन्य शरण । तुझको वैसे ॥ १३ ॥
वहां जो सभी बंधका कारण । पाप है मुझसे रहता भिन्न ।
मेरे बोधमें ही वह विलीन । होगा सारा ॥ १४ ॥
इतनेमें ही तू सहज । मुक्त हुवा है पार्थ आज ।
जान ले भली भांति मुझ । करूंगा मैं मुक्त ॥ १५ ॥
इसीलिये न रहा है अर्जुन । मनमें चिंताका कोई कारण ।
मुझ एकको मान तू शरण । आज ही सुमति ॥ १६ ॥
ऐसे सभी रूपसे जो सुंदर । तथा सभी दृष्टिसे जो चतुर ।
कहता है जो सर्व व्याप कर । रहता श्रीकृष्ण ॥ १७ ॥
फिर शाम-सुंदर स-कंकण । पसार कर स्व-बाहू दक्षिण ।
आलिंगन करता स्व-शरण । भक्त-राजको ॥ १८ ॥
८३५ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-जोग

भक्त और भगवानका सामरस्य—
नहीं पा करके जिसको । बगलमें मार बुद्धिको ।
वाचा लौट आई पीछेको । जिस स्थानसे ॥ १९ ॥
ऐसा है जो कुछ एक । वाणी बुद्धिको रोक ।
देनेमें किया है सुख । आलिंगन ॥ १४२० ॥
हृदयसे हुवा हृदय एक । हृदय हृदयमें सना नेक ।
द्वैत न भंगते किया है देख । अपनासा अर्जुनको ॥ २१ ॥
दीपसे दीप जलाया । ऐसा आलिंगन भया ।
द्वैत न तोड़ते किया । अपनासा पार्थ ॥ २२ ॥
तब आया सुखका पूर । पार्थमें वह भरपूर ।
बडे भी यहां डूबकर । गये प्रभु पूर्ण ॥ २३ ॥
सिंधुसे सिंधु मिलने आता । पानी उसमें दूना बढ़ता ।
उफानमें ओछा ही दीखता । तब आकाश ॥ २४ ॥
वैसे उन दोनोंका मिलन । यहां समेटे किसको कौन ।
किंतु यहां तब नारायण । ढूंंसता विश्व ॥ २५ ॥
गीता वेदका भी मूल-सूत्र है—
ऐसे जो वेदका मूल-सूत्र । सर्वाधिकार एक पवित्र ।
श्रीकृष्णने तब गीताशास्त्र । किया प्रकट ॥ २६ ॥
वेदोंका मूल है कैसी गीता । ऐसे कोई मुझसे पूछता ।
तब जो मैं संबंध कहता । यह प्रसिद्ध ॥ २७ ॥
अजी बने जिसके निःश्वास । इससे बनी वेदोंकी रास ।
सत्य प्रसिद्ध बोलता खास । स्व-मुखसे यह ॥ २८ ॥
इसीलिये वेदोंका मूलभूत । गीता-तत्त्व कहना है उचित ।
अन्य भी एक यहां यथार्थ । उपपत्ति भिन्न ॥ २९ ॥
स्वरूपसे जो नहीं नाशता । विस्तार आपमें समा लेता ।
उसीको असीम कहा जाता । विश्वमें संपूर्ण ॥ १४३० ॥
ज्ञानेश्वरी ८३६

वह कांड - त्रयात्मक । शब्दराशि जो अशेष ।
गीतामें है रहा सुख । बीजमें जैसे ॥ ३१ ॥
इसीलिये वेदका बीज । श्रीगीता ही है यह मुझ ।
लगा है वैसे भी सहज । लगता ही है ॥ ३२ ॥
जो है वेदके तीनों भाग । गीतामें उमडे हैं चांग ।
भूषण करनेसे सर्वांग । शोभता जैसे ॥ ३३ ॥
कर्मादिक जो उसके तीन । कांड हैं यहां किस स्थान ।
गीतामें है जो वे संपूर्ण । दिखाऊंगा अब ॥ ३४ ॥

गीता और वेदकी समानता—

गीताका जो पहला पर्व । शास्त्र-प्रवृत्तिका प्रस्ताव ।
दूजा सांख्य - शास्त्र सद्भाव । है प्रदर्शित ॥ ३५ ॥
मोक्ष-दानमें जो स्वतंत्र । ज्ञान प्रधान यह शास्त्र ।
इसीमें है यह सु-सूत्र । लिया हाथमें ॥ ३६ ॥
फिर हैं जो अज्ञानमें बद्ध । मोक्ष-पदमें चढ़ने सिद्ध ।
उन्हे साधनारंभ विशुद्ध । कहा तीसरेमें ॥ ३७ ॥
तथा जो देहाभिमानमें बद्ध । छोडकर काम्य-कर्म निषिद्ध ।
विहित कर्म करें अप्रमाद । कहा है यह ॥ ३८ ॥
सद्भावसे ऐसे कर्म करना । तीसरे अध्यायका है कहना ।
श्रीकृष्णका निर्णय जो जानना । कर्मकांड ॥ ३९ ॥
और वे ही नित्यादिक । अज्ञानंका आवश्यक ।
आचरनेसे मोचक । होगा ऐसे ॥ १४४० ॥
ऐसी जब अपेक्षा होती । बद्धमें मुमुक्षुता आती ।
तब ब्रह्मार्पणत्व कृती । करना भी सिखाया ॥ ४१ ॥
जो काया वाचा मनसे । विहित हो सब ऐसे ।
वह ईश्वरोद्देश्यसे । करनेको कहा । ४२ ॥

८३७ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-बोध

कर्मयोगसे उपासना । ईश्वर-स्थानमें करना ।
श्रीहरिका यह कहना । चौथेके अंतमें ॥ ४३ ॥
वहांसे जो एकादशाध्याय । पूर्ण होने तक धनंजय ।
कर्मसे ईश-भजन कार्य । कहा है सारा ॥ ४४ ॥
इन आठ अध्यायोंमें है स्पष्ट । देवताकांड किया है निर्दिष्ट ।
शास्त्रोंमें कहे गये सभी पट । खोले हैं यहां ॥ ४५ ॥
तथा यही ईश्वर-प्रसादसे । मिलता श्रीगुरु-संप्रदायसे ।
सच्चा अपरिपक्व ज्ञान जिसे । प्रतीत किया जान ॥ ४६ ॥
वही अद्वेष्टावि श्लोकोंमें । तथा अमानित्वादिकमें ।
परिपक्व किया ज्ञानमें । बारहवाका अंत ॥ ४७ ॥
वह बारहवाका अध्याय प्रथम । तथा पंद्रहवा अध्याय अंतिम ।
ज्ञान-फल-पाक सिद्ध निरुपम । है निरूपण ॥ ४८ ॥
इसीलिये इन चारमें । ऊर्ध्व-मूलांत अध्यायमें ।
ज्ञान-कांड इस स्थानमें । कहा गया है ॥ ४९ ॥
एवं कांडत्रय निरूपण । करता है जो श्रुति-वचन ।
गीता पद रत्नोंके भूषण । पहनते यहां ॥ १४५० ॥
कहने पर ये कांडत्रयात्मक । श्रुति मोक्ष-फल जो है एक ।
प्राप्त करना है यह आवश्यक । कहा गरजकर ॥ ५१ ॥
उसीके साधन ज्ञानसे । वैर करते जो सदासे ।
अज्ञान वर्ग है जो उसे । कहा सोलहवेमें ॥ ५२ ॥
शास्त्रोंके यहां इसी साथीको । साथ ले जीतना है शत्रूको ।
ऐसा वह संदेश सबको । देता सत्रहवां ॥ ५३ ॥
इसभांति है पहलेसे । सत्रहवें तक जो ऐसे ।
बखाने हैं स्पष्ट-रूपसे । स आत्म-विश्वास ॥ ५४ ॥
यह अर्थ जात संपूर्ण । किया तात्पर्य अर्थ-पूर्ण ।
अष्टादशमें निरूपण । कलशाध्याय जो ॥ ५५ ॥
ज्ञानेश्वरी ८३६

ऐसा वह सकल सांख्य सिंधु । श्रीमद्भगवद्गीताका प्रबंध ।
सर्व-ज्ञान औदार्य-रूप वेद । मूर्तिमान है यह ॥ ५६ ॥
वेदोंकी कृपणता और गीताकी उदारता—
मूलमें हैं वेद अति संपन्न । किंतु हैं जो उतने ही कृपण ।
कानमें लगे मात्र तीन वर्ण । अन्योंसे दूर ॥ ५७ ॥
यहां भव-व्यथामें जो ग्रस्त । स्त्री शूद्र आदि प्राणि हैं व्यस्त ।
उन्हे अवसर न दें स्वस्थ । बैठे हैं वेद ॥ ५८ ॥
पीछेका यह व्यंग देख कर । उसको करनेमें अब दूर ।
प्रकाशमें आया है वेद-सार । गीताके रूपमें ॥ ५९ ॥
अर्थसे मनमें प्रवेश कर । श्रवणसे कानमें भरकर ।
पठनार्थ मुखमें घर कर । रहती है जो ॥ १४६० ॥
गीताका पाठ जो जानता । उसके साथ जो रहता ।
गीता लिखकर उठता । पुस्तक रूपमें ॥ ६१ ॥
ऐसा ऐसा निमित्त कर । संसारके चौराहे पर ।
डालते हैं अपरंपार : अन्न छत्र वेद ॥ ६२ ॥
अंतरिक्षमें करने विहार । तथा बसने आ पृथ्वी पर ।
सर्व-दीप्तिके अन्य व्यवहार । चलते आकाशसे ॥ ६३ ॥
करते हैं जो गीता-तत्व सेवन । उनमें उत्तम अधम न मान ।
सबको कैवल्य-दान दे समान । विश्वको देती शांति ॥ ६४ ॥
पिछली निंदासे डरकर । वेद बैठे गीताके अंदर ।
अब पाते हैं कीर्ति सुंदर । गीतासे दिगंत ॥ ६५ ॥
इसीलिये वेदोंकी सुसेव्यता । वह जो यहां मूर्ति रूप है गीता ।
पार्थसे यहां श्रीकृष्ण कहता । उपदेशरूप ॥ ६६ ॥
बछियाके निमित्त जो क्षीर । मिलता है वह पीता घर ।
वैसे करता जगदुद्धार । पार्थके निमित्त ॥ ६७ ॥
८३९ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-बोध

करके चातकका निमित्त । दौड़ते मेघ पानीके साथ ।
तथा करते विश्वको शांत । उसी प्रकार ॥ ६८ ॥
अथवा अनन्य गति जो कमल । उसके लिये है सूर्य यथा काल ।
उदय होकर देता है सकल । सुख विश्वको ॥ ६९ ॥
वैसे अर्जुनको कर कारण । गीता प्रकाशित कर श्रीकृष्ण ।
दूर किया भार जन्म मरण । इस संसारका ॥ १४७० ॥
शास्त्र-रत्नोंकी दीप्ति सकल । तीनों लोकमें कर उज्ज्वल ।
कृष्ण-मुखाकाशमें निर्मल । शोभता गीता-सूर्य ॥ ७१ ॥
पितृ-कुल किया जो पवित्र । पार्थ इस ज्ञानका हो पात्र ।
जिसने किया गीता स्वतंत्र । विश्वका घर ॥ ७२ ॥
द्वैत स्थितिमें आकर गुरु-शिष्य संवाद—
फिर वह जगद्गुरु श्रीकृष्ण । पार्थका जो अद्वय मिलन ।
समेट लेता है उसी क्षण । द्वैत-स्थितिमें ॥ ७३ ॥
जब कहता है यहां श्रीकृष्ण । जीव करता क्या शास्त्र-ग्रहण ।
तब कहता है पार्थ श्रीकृष्ण । कृपा देवकी ॥ ७४ ॥
अजी ! पानेमें निधान । भाग्य लगता अर्जुन ।
भोगमें वह धन । उससे अधिक ॥ ७५ ॥
जैसे क्षीर-सागरके समान । न जमता जो दूधका बर्तन ।
सुर असुरोंको कैसे मंथन । करना पडा है ॥ ७६ ॥
उस प्रयत्नका भी आया फल । आंखोंसे देखा अमृत निर्मल ।
जतन करनेमें है सकल । गये चूक ॥ ७७ ॥
परोसा जो अमृतत्व पानेमें । कारण हुवा जो मृत्यु लानेमें ।
न जान कर भोग भोगनेमें । होता है ऐसा ॥ ७८ ॥
नहुष हुवा जो स्वर्गाधीश्वर । किंतु भूला वहांका व्यवहार ।
इससे सर्प हुवा पृथ्वीपर । जानता है तू ॥ ७९ ॥
ज्ञानेश्वरी ८४०