ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंविराट राज-पुत्र उत्तर । भागा रण-भूमि छोड़कर ।
तब लड़ा तू ही धनुर्धर । इसी स्वभावसे ॥ ९५ ॥
महावीर जो ग्यारह अक्षोहिणी । हराये अकेलेने कोदंडपाणी ।
वही स्वभाव यहां तुझे सेनानी । बनायेगा निश्चित ॥ ९६ ॥
रोगीको कभी क्या रोग भाता । या दरिद्रीको दारिद्य भाता ।
किंतु जो प्रारब्ध है भोगाता । अति बलवान ॥ ९७ ॥
वह अदृष्ट जो है मित्र । कराता है ईश्वराधीन ।
वह ईश भी है अर्जुन । हृदयमें तेरे ॥ ९८ ॥
ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति ।
भ्रामयन्सर्वभूतानि यंत्रारूढानि मायया ॥ ६१ ॥
सबमें व्याप्त ईश्वर अपनी मायासे विश्व चलाता रहता है—
अंतरमें सब भूतोंके । महा नभमें हृदयके ।
सहस्रकर चिद्वृत्तिके । होता है उदय ॥ ९९ ॥
अवस्थात्रय तीनों लोक । प्रकाश करके अशेष ।
अन्यथा दृष्टिके पांथिक । जगाते हैं जो ॥ १३०० ॥
देहोदकके सरोवरमें । खिले जो विषय कमलमें ।
जीव षट्पदसे जीवनमें । चराता है वह ॥ १ ॥
रहने दे रूपक जो ईश्वर । सकल भूतोंका है अहंकार ।
अपने सिरपे ले निरंतर । प्रकटता है ॥ २ ॥
अपनी मायाका जो आड वस्त्र । लगाके अकेला चलता सूत्र ।
बाद नटते रहते चित्र । चौरासी लाख ॥ ३ ॥
ब्रह्मादिसे कीटांत । अशेष भूतजात ।
देख योग्यता पार्थ । दिलाता देह ॥ ४ ॥
रहा है सब भूतोंके हृदयमें परमेश्वर ।
मायासे ही चलाता जो यंत्रोंपर चढा कर ॥ ६१ ॥
८२५ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-योग