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ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 906

वैसे धर्माधर्म जो सकल । दिखाता है अज्ञान है मूल ।
तजके वह त्यागो सकल । धर्मजात ॥ ९५ ॥
मिट जाता जब अज्ञान । सहज रहता मैं ही जान ।
जानेसे जैसे स-नींद स्वप्न । रहता है आप ॥ ९६ ॥
वैसे मैं एकके बिन नहीं । भिन्नाभिन्न कुछ भी कहीं ।
सोऽहं-बोधसे हो उसमें ही । अनन्य सदैव ॥ ९७ ॥
किंतु है उनसे भेद बिन । मेरा ही जानना एकपन ।
उसका ही नाम है शरण । आना मेरी ॥ ९८ ॥
जैसे घटका होनेसे नाश । गगनमें गगन प्रवेश ।
इस भांति होता समरस । आनेसे शरण ॥ ९९ ॥
स्वर्ण-मणि जैसे स्वर्णमें । या कल्लोल जैसे पानीमें ।
वैसे अर्जुन तू मुझमें । पा ले आश्रय ॥ १४०० ॥
भिन्न अस्तित्व रखकर शरणागतिका विवेचन—
अथवा समुद्रके उदरमें जैसे । वडवानल आश्रय पाता है वैसे ।
सिंधुको वह जलाके सुखाता वैसे । तज दे वह ॥ १ ॥
मेरे ही शरणमें आना । जीवत्वसे भिन्न रहना ।
निर्लज्ज है ऐसे बोलना । ऐसी वह प्रज्ञा ॥ २ ॥
सहज ही करता है धनुर्धर । कोई राजा जब दासीका स्वीकार ।
वह दासी भी समान स्तरपर । आती है वैसे ॥ ३ ॥
अजी ! विश्वेश्वर मैं भेटता । तथा जीव बंध न छूटता ।
ऐसी यह अमंगल वार्ता । न सुनना कभी ॥ ४ ॥
मद्रूप हो मुझसे मिलना । भक्ति मेरी ऐसी ही करना ।
ऐसी भक्ति देता है जो ज्ञान । उसको कर प्राप्त ॥ ५ ॥
जिस मट्ठेसे निकाला नवनीत । फिरसे उसीमें डाला वह पार्थ ।
फिर कभी उसमें नहीं मिलता । उसी प्रकार ॥ ६ ॥
ज्ञानेश्वरी ८३४