सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

DevanagariMarathipublished1,172 पृष्ठ

पृष्ठ 894, कुल 1172 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 894

तथा कर्मका जन्म-स्थान । मेरी प्रकृति जो अर्जुन ।
करेगा उसका दर्शन । अपनेसे दूर ॥ ६३ ॥
अपनेसे प्रकृति भिन्न । नहीं रहती है अर्जुन ।
करेगा उसका दर्शन । अपनेसे दूर ॥ ६४ ॥
इससे प्रकृतिका नाश । होकरके कर्म-संन्यास ।
उत्पन्न होगा अनायास । सकारण ॥ ६५ ॥
मिटकर सब कर्म-जात । आत्मा मात्र मैं रहता पार्थ ।
उसमें बुद्धिको तू व्रतस्थ । करके रख ॥ ६६ ॥
बुद्धि है जो अनन्ययोगसे । मुझमें पैठ जायेगी ऐसे ।
तब अन्य विषय त्यागसे । मुझेही भजेगा चित्त ॥ ६७ ॥
तज कर विषय जात । चित्त हुवा मुझमें रत ।
चिंतन करेगा सतत । मेरा ही वह ॥ ६८ ॥
मच्चित्तः सर्वदुर्गाणि मत्प्रसादात्तरिष्यसि ।
अथ चेत्त्वमहंकारान्न श्रोष्यसि विनंक्ष्यसि ॥ ५८ ॥
इस सेवासे जब अभिन्न । भरेगा चित्त मुझसे जान ।
मेरा प्रसाद हुवा संपूर्ण । जान तू यह ॥ ६९ ॥
वह सकल दुःख धाम । भोगे जाते जो मृत्यु जन्म ।
दुर्गम वे सब सुगम । होंगे तुझे ॥ १२७० ॥
सूर्य-सहायका जो आश्रय । आंखोंको मिलता धनंजय ।
रहा क्या वहां तमका भय । कह तू मुझे ॥ ७१ ॥
वैसे ही है प्रसाद मेरा अर्जुन । करता जीवदशा उपमर्दन ।
उसे कैसे संसारका हौवा जान । डरायेगा कभी ॥ ७२ ॥
इसीलिये हे पार्थ । संसारका जो गर्त ।
तरेगा तू निश्चित । मेरी कृपासे ॥ ७३ ॥
सभी दुःख तभी मेरी कृपासे तर जायगा ।
नाश निश्चित पायगा न मान यह मानसे ॥ ५८ ॥
ज्ञानेश्वरी ८२२